सुख-दुःख का चक्कर


January 17, 2013

यूं तो मनुष्य की चाहतों का कोई अंत नहीं। प्रतिदिन नयी-नयी अनगिनत इच्छाओं को प्राप्त करने का सिलसिला चलता रहता है। इसी चक्कर में सुबह से शाम व्यक्ति खटता रहता है और हरसंभव कोशिश करता है। इन चाहतों का ही मायाजाल है कि मानव आदिकाल से आदी-शक्तियों के पास भी पहुंच जाता है। और फिर ईश्वर से भी अपनी विभिन्न मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए प्रार्थना करता है। यही नहीं, हर तरह के पूजा-पाठ व धार्मिक कर्म-कांड करने को तत्पर रहता है। इस चाहत को पूरा करने के संपूर्ण घटनाक्रम को अगर हम थोड़ा ठहरकर देखें तो हर व्यक्ति आमतौर पर इसके द्वारा ही सुख प्राप्त करता है। ऐसा न होने पर चूंकि वो दुःखी हो जाता है, इसलिए ऐसी अवस्था से बचने के लिए ही ईश्वर के दरबार में जाता है। वह प्रभु से सुख प्राप्ति के इसी माध्यम को मांगता रहता है। यहां मांगने की सूची उम्र, वर्ग, समाज और व्यक्ति विशेष की आवश्यकता पर निर्भर करती है। अब जैसे छात्र मूलतः विभिन्न परीक्षाओं में अधिक से अधिक अंक के साथ सफल होने के लिए पूजा करेगा तो कोई युवा नयी से नयी मोटरसाइकिल से लेकर आधुनिक इलेक्ट्रानिक उपभोग का उपकरण या अच्छी पैकेज वाली नौकरी और जीवनसाथी के लिए प्रार्थना करेगा। कन्याएं अमूमन अच्छे वर की कामना करती हैं। ये सभी हमारे खुश होने का कारण बनते हैं। नयी गाड़ी में बैठने, अच्छे अंक प्राप्त करने और बड़ी नौकरी लगने आदि पर जो खुशी मिलती है, उसे ही हम सुख समझते हैं। और इनके न मिलने पर दुःखी हो जाते हैं। अर्थात इसका मतलब तो यह हुआ कि हमारे अदंर से उपज रहा सुख-दुःख, इन उपभोग की वस्तुओं या बाह्य अवस्था पर निर्भर है। मगर थोड़ा ध्यानपूर्वक देखने पर यह सोचकर बड़ा अजीब लगता है कि क्या यही सुख की अवस्था होती है? कुछ हद तक तो यह सच है। हर काल और हर युग में समकालीन नयी-नयी उपभोग की वस्तुओं की प्राप्ति को सुख से जोड़ दिया गया। पिछली शताब्दी में किसी नवयुवक को ट्रांजिस्टर या घड़ी मिल जाये, वह उसे पाकर खुश हो जाया करता था। मगर यहां सवाल उठता है कि वास्तव में क्या ये निर्जीव वस्तुएं सुख दे सकती हैं? अगर ये सुख दे सकती तो इन्हें हर युग और समाज में इसे देते रहना चाहिए? परंतु आज किसी युवा को ट्रांजिस्टर दे दें वह खुश नहीं होगा। वैसे भी कई परिवार के उदाहरण ऐसे मिल जायेंगे जहां सभी भौतिक सुविधाएं होने पर भी कई कारणों से लोग कहते-सुने-देखे जा सकते हैं कि अमुक-अमुक घर में सब कुछ है मगर सुख नहीं है। कहावतें बहुत कुछ कह जाती हैं। तभी तो लोग यह भी कहते पाये जाते हैं कि जैसा भी है वो अपने घर में सुखी है। और फिर कई ऐसे भी मिलेंगे जो सारी विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं में मस्त रहते हैं। अर्थात हर हाल में खुश रहते हैं।

तो क्या सुख एक मानसिक अवस्था है? एक सोच है? क्या यह हमारे खुशी होने से संबंधित है? तो क्या जब व्यक्ति खुश होगा तभी सुखी कहलायेगा? असल में ये उपभोग की वस्तुएं किसी सीमा तक ही खुशियां दे पाती हैं। उनकी आदत हो जाने पर खुशी की तीव्रता कम होने लगती है। और तो और, अगर किसी समय उसका बेहतर विकल्प उपलब्ध हो तो उसे प्राप्त न कर पाने की स्थिति में उल्टा वही वस्तु दुःख का कारण भी बन जाती है। अर्थात सीधे-सीधे यहां भौतिक सुविधा व वस्तु से उत्पन्न सुख स्थायी नहीं हुआ।

तो क्या फिर मानवीय संबंध सुख देते हैं? बहुत हद तक यह सच है। मानवीय संबंध भावनाओं से संबंधित होते हैं। जहां दो व्यक्ति एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और एक साथ समय व्यतीत करते हैं। एक-दूसरे की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अब चूंकि इसमें दो छोर होते हैं, दो बिंदु जहां बीच में रिश्तों की कड़ी बनती है। इसलिए इसमें से एक भी सिरा कमजोर होने पर इस डोर के ढीले हो जाने का खतरा बना रहता है। यहां दोनों संबंधित व्यक्ति पर एक-दूसरे को खुशी देना निर्भर करता है। बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि देने वाले और लेने वाले की स्थिति क्या है। अर्थात यहां अकेले आपके हाथ में कुछ नहीं। और फिर सामने वाला निर्जीव वस्तु मात्र भी तो नहीं। उसकी अपनी सोच, जरूरतें, शारीरिक-मानसिक अवस्था, विचार, संस्कार, स्वभाव और व्यवहार हो सकता है। यह आपके कितना अनुकूल है, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपकी अपनी चाहत क्या है। और इन सबके ऊपर एक महत्वपूर्ण स्थिति जो फिर सभी बातों को ढक लेती है कि आप सामने वाले को किस रूप में लेते हैं। किस दृष्टि से देखते हैं। अगर आपको किसी से प्रेम है, विश्वास है तो फिर आप उसकी कमियों को भी नजरअंदाज करते हैं। मगर यह स्थिति सदैव बनी रहे, कोई जरूरी नहीं। अर्थात पहले निर्जीव वस्तु और अब सजीव व्यक्ति, दोनों ही बाह्य स्थिति में मिलने वाली खुशी से उत्पन्न होने वाला सुख, पूरी तरीके से न तो आपके हाथ में है और न ही स्थिर है। यहां इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि हर मां-बाप अपने बच्चों को बेहद प्यार करते हैं। यही बच्चे उन्हें अपनी बाल-सुलभ बातों व शैतानियों से खुशियां देते हैं। यह उन्हें सुख प्रदान करता है। बचपन में उनके द्वारा की जाने वाली उद्दंडता भी नादानी के रूप में देखी और समझी जाती है। और अमूमन माता-पिता उसे देखकर हंसते हुए पाये जाते हैं। मगर वही बच्चा जब बड़े होकर उसी तरीके की कोई हरकतें करता है तो यह दुःख का कारण बन जाता है। उसकी कुछ बातें तंग करती हैं। यही कारण है कि बच्चे की युवा अवस्था पर पहुंचने पर दो पीढ़ियों के रिश्तों में परिवर्तन आने लगता है। तो यहां भी रिश्ते सुख का स्थायी कारण तो नहीं बन पाये! यही नहीं, अपनों का विश्वासघात या कोई भी ऐसा कारण जिसकी आपने अपेक्षा न कर रखी हो, के होने पर दुःख होता है। या फिर कोई भी व्यक्ति जिसे आप दिलोजान से चाहते हैं, वह आपसे दूर चला जाये, तब भी दुःख होता है। अपनो से ही अपेक्षाएं होती हैं जिनके पूरा न होना दुःख का प्रमुख कारण बनता है। अर्थात ये रिश्ते, यहां सुख कहां दे रहे, यह तो दुःख का कारण बन गये। यहां तक कि पति-पत्नी के बीच भी शारीरिक संबंध बहुत हद तक सुख का कारण बने रहते हैं। मगर उसमें भी एक-दूसरे की इच्छाओं को जब तक संतुष्टि प्राप्त नहीं होती तब तक यह संभव नहीं। और फिर किसी एक की इच्छाशक्ति कम होते ही संबंधों में बिखराव आने लगता है। कुछ समय बाद अन्य चाहते इस पर हावी हो सकती हैं। इसीलिए दांपत्य जीवन का सुख भी स्थायी नहीं रह पाता। इसके अतिरिक्त शारीरिक मुश्किलें भी हो सकती हैं, जो आपके दुःख का कारण बन जाती है। और कई बार स्थायी बीमारी होने पर बनी रहती हैं। ये शरीर भी तो एक सीमा के बाद आपके वश में नहीं। इस तरह से देखें तो वो सुख जो कहीं बाहर से प्राप्त हो रहा है वह किसी भी स्थिति में स्थिर और स्थायी नहीं हो सकता। उल्टा दुःख का कारण बन रहा है।

 तो कहीं इसे इस तरह से तो नहीं लिया जाना चाहिए कि सुख और दुःख दो अवस्थाएं हैं। एक के अनुपस्थित होने पर दूसरे का स्वाभाविक रूप से प्रवेश हो जाता है। मगर सुख की अनुपस्थिति में दुःख का आगमन तो समझ आता है मगर दुःख के हटते ही व्यक्ति सुखी हो जाये यह कोई जरूरी नहीं। मगर ऐसी अवस्था में सुख का कोई भी नया कारण आने पर वह पुराने दुःख को कुछ देर के लिए आपके मानसिक पटल से हटा जरूर देता है। अर्थात संक्षिप्त में कहें तो यह सुख और दुःख का द्वंद्व किसी न किसी रूप में आपके दिमाग के साथ खेलता रहता है। और आपके तमाम सामाजिक, भावनात्मक, पारिवारिक व दैनिक क्रियाओं को प्रभावित करता है। यूं तो धर्म और अध्यात्म इससे बचने की शिक्षा युगो-युगो से देते रहे हैं और व्यक्ति को इससे ऊपर उठने के लिए कहते हैं। मगर यह धर्म और अध्यात्म का ज्ञान भी तो सुख प्रदान करने की एक अवस्था ही है, जिसके ध्यान से हटते ही व्यक्ति पुनः दुःखी हो जाता है। सतसंगों में अधिकांश भक्तों को पूजा-पाठ में लीन देखा जा सकता है मगर कुछ समय बाद जैसे ही यह अवस्था या ध्यान अपने केंद्र से विचलित होता है, भक्तजन पुनः दुःखी होने लगते हैं। और फिर एक नयी तलाश प्रारंभ हो जाती है सुख प्राप्त करने की। इसीलिए लोगों को विभिन्न धर्म गुरुओं-बाबाओं और मठों के दरवाजों पर दर-दर भटकते हुए देखा जा सकता है। सच तो यह है कि सुख और दुःख के इस भयानक चक्रव्यूह से बचना मानवीय स्वभाव के लिए आसान नहीं। वह अपने आपको जितना भी योगी बनाने का प्रयास करे, अवस्था स्थायी नहीं हो पाती। ऐसे अवस्था में बेहतर तो यही है कि इस सुख और दुःख के चक्कर को अपने नियंत्रण में ले लिया जाये। एक ऐसी अवस्था जहां न तो कोई सुख प्रदान करे और न ही कोई चीज दुःखी कर सके। सच भी तो है इससे पहले कि कोई आपको नियंत्रित करे, अच्छा है आप उसे नियंत्रित कर लें।मनोज सिंह  

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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