पूंजीवाद के समर्थन में बौद्धिक दलाली


October 16, 2012

पूंजीवाद जिस रफ्तार से विश्वस्तर पर अर्थव्यवस्था के अतिरिक्त संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, सत्ता के साथ-साथ संपूर्ण समाज को अपने नियंत्रण में ले रहा है, देखकर हैरानी होती है। अगर आप निष्पक्ष और सतर्क नागरिक हैं तो होनी भी चाहिए। यूं तो पूंजीपतियों की शासन व्यवस्था में हमेशा से दखलअंदाजी रही है मगर पिछले कुछ बीस-पचीस वर्षों के कालखंड में जिस तीव्रता से इसने अपनी शक्ति और साम्राज्य का विस्तार किया है, गंभीर चिंतन का विषय है। इतनी तीव्र गति से तो इतिहास का कोई भी अन्य राजवंश व धर्म, फिर चाहे वो दुनिया के महानतम सम्राट व धर्मगुरु ही क्यों न रहे हों, अपने साम्राज्य का विस्तार नहीं कर पाये थे। सफलतम महाराजा भी अपनी समस्त राजनीतिक, कूटनीतिक, सामरिक शक्ति लगाने के बावजूद कहीं न कहीं किसी न किसी बिंदु पर मात खा जाते थे। उधर, कुछ एक धर्म ने चारों दिशाओं में विस्तार तो किया मगर इतनी तेजी से नहीं। तो फिर, ऐसी क्या वजह है कि पूंजीवाद का विजय अभियान बड़ी आसानी से हर ओर तेजी से फैल रहा है? क्या यह उसके अकेले के प्रयासों का नतीजा है? यह स्वीकार करना तो उचित न होगा मगर पूंजीपति के एकमात्र शस्त्र, उसकी खरीदने की असीमित क्षमता की पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लोकप्रिय कहावत है कि दुनिया में सब कुछ बिकता है, बस खरीदने वाला होना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो हर एक की कीमत होती है। लगता है कि इसी कहावत की मूल भावना को पकड़कर पूंजीवाद ने खुले बाजार में अनियंत्रित होकर वो खेल खेला कि कोई भी विरोधी बचा ही नहीं। और जब कोई विरोध ही नहीं होगा तो फिर आपको आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है। ऐसे में गति का तीव्र होना भी स्वाभाविक है। यही नहीं उसने जीत की खुशी में अपने आभामंडल की चमक इतनी तेज कर रखी है कि उसकी रोशनी में भूखे-नंगों की बढ़ती जनसंख्या किसी को दिखाई भी नहीं देती। और वह देखना-दिखाना भी नहीं चाहता। मजेदार स्थिति तो तब उत्पन्न होती है जब खुद भूखा-नंगा भी इस रोशनी में नहाकर स्वयं को चमकता देख भ्रमित ही नहीं होता, कुछ देर के लिए तो वह अपने पेट की भूख भी भूल जाता है। इतना ही नहीं बाजार का खेल उसे भूखे-नंगे की स्थिति में भी मदमस्त रखने में सक्षम है। यह सब कैसे संभव हुआ? यह इतना आसान तो नहीं!! यकीनन इसके लिए एक सुनियोजित रणनीति बनी होगी, जिसमें चतुर-चालाक व चतुराई से भरे कई दांवपेंच होंगे। और फिर जिस पर योजनाबद्ध ढंग से अमल किया गया होगा। अंत में इतना जरूर कहा जा सकता है कि ये युक्तिपूर्ण चाल अत्यंत सफल रही। मगर फिर इसे समझने के लिए अपने पूर्वाग्रहों को सर्वप्रथम खत्म करना होगा। आधुनिक शिक्षा-पद्धति से प्राप्त तथाकथित ज्ञान से स्वयं को दूर करके व्यावहारिक बुद्धि के स्तर को उठाना होगा। खुली व स्वस्थ आंखों से देखने पर ही सही दृश्य देखा जा सकता है क्योंकि किसी चश्मे से देखने पर आकृति का रंग-रूप-आकार सब कुछ बदल जाता है।

सर्वप्रथम सवाल उठता है कि पूंजीवाद का विरोधी कौन-कौन हो सकता है? राजनीतिक स्तर पर राजनेता? उसे तो पूंजीवाद ने बड़ी आसानी से अपने प्रभाव में ले लिया है। धार्मिक स्तर पर धर्मगुरु को नियंत्रण में करना कभी भी मुश्किल नहीं रहा। वैसे भी ये तीनों प्रारंभ से सत्ता के भागीदार रहे हैं। असल में पूंजीवाद ने अपने खेल को एकतरफा करने के लिए बड़ी चतुराई से बुद्धिजीवियों को अपने नियंत्रण में लिया। अवाम, फिर चाहे उसमें अमीर हो गरीब हो, बच्चा-बूढ़ा-जवान-अनपढ़ कोई भी हो सभी के मस्तिष्क व सोच को संचालित तो आखिरकार ये बुद्धिजीवी वर्ग ही करता है। ऐसे में अगर कोई इसी को नियंत्रण में ले ले तो फिर कुछ और करने की आवश्यकता ही कहां रह जाती है? इसे समझने के लिए कुछ ज्यादा भटकने की जरूरत नहीं है। टेलीविजन पर आने वाले तमाम विद्वान-वार्ताकारों को देखें-सुने, ये कितने एकतरफा व पक्षपातपूर्ण होते हैं, जानना मुश्किल नहीं। वे आमतौर पर अर्थशास्त्र के ऐसे-ऐसे क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करते हैं कि सामान्यजन के कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता। आधारहीन तर्कों और काल्पनिक तथ्यों का ऐसा मायाजाल परोसा जाता है कि आम दर्शक उसमें उलझकर रह जाता है। और अंत में शब्दार्थ में जाने की बजाय उस कथन को उसी तरह से स्वीकार कर लिया जाता है जिस तरह से उसे प्रस्तुत किया गया है। प्रिंट मीडिया में भी कारपोरेट घराने के पोषित लेखकों की बाढ़ आ चुकी है। इन्हें पूंजीवादी लेखक कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। और इन आधुनिक बुद्धिजीवियों को अपनी समर्पित सेवा के एवज में, आर्थिक रूप से पूरी तरह संतुष्ट किये जाने के अतिरिक्त वो सब कुछ दिया जाता है जिसकी चाहत ये रख सकते हैं। उधर, अखबार व मीडिया के संपादक से लेकर पत्रकार/एंकर तक सभी आजकल आकर्षक आर्थिक पैकेज प्राप्त करते हैं। और जब उनकी नौकरी पूंजीवादी सेठ के हाथों में हो तो ऐसे में निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद कोई कैसे कर सकता है? नमक-हरामी को तो वैसे भी हमारे यहां अधर्म घोषित किया गया है। ऐसे में इनका भी कारपोरेट समर्थक बन जाना स्वाभाविक है। संक्षिप्त में कहें तो, ये सभी अपने-अपने मालिकों का हित साधते हैं। यूं तो समाचारपत्र समूह पहले भी सेठ-साहूकारों के हाथों में ही रहे हैं मगर तब इसे कहीं न कहीं नैतिकता का बल मिल जाया करता था। अब इसका मात्र आवरण ओढ़ा जाता है, वरना कारपोरेट कल्चर ने तो समाज से मानवीयता और नैतिकता जैसे शब्दों को ही खत्म कर दिया। अब पूंजी के अतिरिक्त कुछ और महत्वपूर्ण ही नहीं रहा। इस खेल में भी मीडिया ने बेहतरीन रोल अदा किया। अब वही दिखाया और परोसा जाता है जो पूंजीवादी व्यवस्था के समर्थन में हो, उसके फायदे के लिए हो।

बहरहाल, उपरोक्त खेल इतना सरल भी नहीं, जितना दिखाई देता है। या यूं कहें कि इस खेल को इतनी चतुराई से खेला गया या खेला जा रहा है कि आम दर्शक को समझ ही नहीं आता। तभी तो वो इनकी बातों में आ जाता है। कई बार हम समझ नहीं पाते कि टिप्पणीकार, वार्ताकार, पत्रकार व एंकर किसके पक्ष में लिख-बोल रहा है। सच भी कह रहा है या सब कुछ तोड़-मरोड़ रहा है? सत्य तो यह है कि कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से, कभी भावनाओं के सहारे तो कभी प्रतीकों के माध्यम से, कभी मुखौटों के द्वारा तो कभी-कभी किसी कृत्रिम घटनाक्रम के माध्यम से वो अपने दर्शक-पाठक का विश्वास जीतता चला जाता है। फिर उसे नियंत्रण में लेकर मानसिक रूप से निष्क्रिय कर दिया जाता है। अर्थात सोचते-समझने की शक्ति समाप्त। ऐसे में फिर आमजन वही करता है जो उसे बताया जाता है। कई बार समाज में आदर्श पैदा किये जाते हैं जो फिर अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीवाद के लिए काम करते हैं। इसके लिए ऐसी चालें चली जाती हैं कि कई बार तो तार जोड़ पाना भी मुश्किल होता है। ध्यान से देखें तो यहां सिर्फ मीडिया को लेकर ही खेल नहीं खेला गया बल्कि कला, साहित्य, सिनेमा को भी अपने नियंत्रण में लेकर ऐसा गहरा प्रहार किया है कि हमारी संस्कृति व सभ्यता की जड़ें तक हिल गईं। पिछले बीस-पचीस साल के सिनेजगत में आये परिवर्तन को ध्यान से देखें तो हीरो-हीरोइनों की सफलता-असफलता के पीछे भी किसी न किसी षड्यंत्र की बू आती है। अब सिनेमा मात्र मनोरंजन नहीं रहा, न ही यह सामाजिक आदर्श प्रस्तुत करता है, बल्कि उसका ध्येय दर्शक को उपभोक्ता में परिवर्तित करना है। आज के नायक-नायिका रोल-माडल नहीं सेल्स-पर्सन बन चुके हैं। क्या कभी पूर्व में आपने किसी हीरो-हीरोइन को सामान बेचते देखा है? नहीं। अब हमारे फिल्मी चरित्र विज्ञापन में ही नहीं फिल्मों में भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बाजार की मदद करते हैं। कहानी में, डायरेक्शन में, फोटोग्राफी में ऐसे ट्विस्ट दिये जाते हैं कि प्रेम-भावना और रिश्ते भी प्रोडक्ट बन चुके हैं। आज के हीरो-हीरोइन सामाजिक मूल्य और नैतिकता की बात नहीं करते। उनकी फिल्में ही नहीं व्यक्तिगत जीवनशैली भी दर्शक को आकर्षित करती है और बाजार की मदद करती है। अब पेंटिंग्स या मूर्तियां कितनी कलात्मक हैं, उनका मूल्यांकन उनकी बिकने की कीमत पर निर्भर करता है। जो कोई लाखों-करोड़ों में बिकेगा, बाजार उसे सफल घोषित कर देता है। बदले में लोकप्रियता प्रदान करता है। अर्थात अब कला के पैमाने व कलाकार की महानता पैसों पर निर्भर करने लगी है। जिसका नियंत्रण और संबंध सीधे-सीधे पूंजी के हाथों में है। अब सिनेजगत में क्लासिक्स नहीं रचे जाते। आजकल सफलता बाक्स-आफिस में प्रथम सप्ताह में इकट्ठा किये गये रुपयों के आंकड़ों पर निर्भर करती है। साहित्य में भी जो बिकता है उसे महानतम घोषित करने की परंपरा प्रारंभ हो चुकी है। ऐसा ही कुछ खेल के क्षेत्र में भी है। खिलाड़ी वही खिलाये जाते हैं, इतना ही नहीं खेल के मैदान में सफल किये जाते हैं जो बाजार के लिए उपयोगी हैं। वरना कब वो गुमनामी के अंधेरे में फेंक दिये जाते हैं, पता ही नहीं चलता। और फिर ये तमाम लोकप्रिय सितारे बाजार की रौनक बढ़ाने के काम आते हैं। उधर, धर्म के क्षेत्र में भी पूंजी का साम्राज्य हो चुका है। अब पूजा-स्थलों पर आ रहे पैसों की बात प्रमुखता से की जाती है। चढ़ावा-दान नये पैमाने हैं। आस्थाओं की भी कीमत लगा दी गई है। जितना अधिक चढ़ावा उतना अधिक मीडिया में कवरेज। असल में दर्शकों को आस्था मुफ्त में बांटकर पीछे से बाजार अपना खेल चुपचाप खेलता है। 

संक्षिप्त में कहें तो उपरोक्त सभी की बौद्धिक दलाली न होती तो पूंजीवाद इस स्तर तक नहीं पहुंचता। कहा तो यहां तक जाता है कि इनकी सहायता से पूंजीवाद का खूंखार रूप आना तो अभी शेष है। अगर यह सच हुआ तो वह भयानक होगा। ये दरबारी तो पहले भी हुआ करते थे मगर अमूमन राजा की प्रशंसा तक ही सीमित रहते थे। और जब कभी ये चाटुकारिता में अपनी सीमाओं और यथार्थ से दूर गये, राजवंशों को बर्बाद कर दिया। इनकी इसी कारनामों की वजह से राजाओं में अहंकार उत्पन्न हुआ और परिणामस्वरूप युद्ध थोपे गये। इतिहास ने विनाश के कई वीभत्स रूप अपने अंदर समेट रखे हैं। मगर कहीं भी संबंधित बुद्धिजीवी-कलाकार आदि जिम्मेदार नहीं ठहराये गये। ऐसे में इन बुद्धिजीवी वर्ग के दरबारी से दलाल बनने के सफर पर गौर किया जाना जरूरी हो जाता है। पता नहीं इसका अंजाम क्या हो? अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता इसलिए भी है कि दलाली को समाज ने कभी भी स्वीकार नहीं किया। फिर भी इनके द्वारा इसे स्वीकार करना किसी को भी अचंभित करेगा। मगर क्या ये पुरानी कहावत भी भूल गये कि दलाली का माल सबको हजम नहीं होता।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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