तारे भी मिट्टी के बने होते हैं


October 10, 2012

कभी-कभी किसी-किसी वार्तालाप से अनायास ही बड़ी सारगर्भित बात निकलकर बाहर आती है। हुआ यूं कि पिछले दिनों फेसबुक पर एक मित्र द्वारा हिन्दी फिल्मी दुनिया से संबंधित एक लोकप्रिय हीरो के संदर्भ में लंबी-चैड़ी प्रशंसात्मक बातें लिखी गईं। कई फेस-बुक दोस्तों ने इसे पसंद किया तो कइयों ने इसके समर्थन में अपने-अपने मत भी दिये। सभी कथन उपरोक्त संदर्भित हीरो के व्यक्तित्व को चमका रहे थे। कुछ ही घंटों में अच्छी-खासी संख्या में प्रतिक्रियाएं आ चुकी थीं कि तभी विदेश में बसे एक मित्र के कथन ने इस सिलसिले को अचानक रोक दिया था। उसके कथनानुसार, वह उपरोक्त फिल्मी हीरो के साथ दस-पंद्रह दिन बिता चुका है और ऊपर कही गई तमाम बातों से इत्तिफाक नहीं रखता। साथ में सिर्फ इतना ही लिखा गया था कि आगे कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। मजेदारी वाली बात यह है कि इस सीधे-सीधे की गई टिप्पणी के बाद कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी। मानो सबको सांप सूंघ गया हो। अगर हम इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करें तों पायेंगे कि मूल कथन लिखने वाले व्यक्ति के मन में गढ़ी गयी उस फिल्मी हीरो की छवि का आधार उसके द्वारा विभिन्न फिल्मों में निभाये गये किरदारों एवं पत्र-पत्रिकाओं में छपी उससे संदर्भित किस्से-कहानियां हैं जो कि यथार्थ से दूर है। सच पूछा जाये तो इसी तरह से किसी भी लोकप्रिय व्यक्ति विशेष से संबंधित विशिष्ट धारणाएं, फिर चाहे वो काल्पनिक और सुनी-सुनाई ही क्यों न हो, आमजन के बीच प्रचलन में आ जाती हैं। जैसा कि उपरोक्त घटनाक्रम में अन्य दोस्तों ने भी बिना जाने-समझे अपनी-अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दीं।

इसी चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए मुझे अपना एक अनुभव याद आ रहा है। कुछ समय पूर्व की बात है। जिस शहर में मैं पदस्थ था वहां एक अति लोकप्रिय अध्यात्मिक बाबा का आगमन हुआ। उनके व्यक्तित्व, अध्यात्मिक शक्ति, विचार, ज्ञान आदि-आदि के बारे में कई सकारात्मक बातें सुन रखी थीं। विश्वभर में उनके लाखों अनुयायी हैं। तो फिर उस शहर में भी हजारों की भीड़ उनके दर्शनार्थ जमा होनी ही थी। बहरहाल, मुझे इस तरह के घटनाक्रमों में कभी दिलचस्पी नहीं रही। बात यहां विश्वास की नहीं है। मगर मुझे इस तरह के कार्यक्रमों में जाने का कोई औचित्य नजर नहीं आता। यूं तो मैं पूर्णतः आस्तिक हूं और साथ ही किसी भी धर्मगुरु का निरादर करने का न मेरा कोई उद्देश्य है न ही स्वभाव। लेकिन फिर भी, अब इसे मेरे मतानुसार समय की बर्बादी समझ लें या फिर पसंद-नापसंद, मैं इन सबसे आमतौर पर बचता हूं। मगर उस बार एक साथी अधिकारी जो एक प्रभावशाली पद पर विराजमान थे, के विशेष आग्रह को मैं ठुकरा न सका था। उसकी उपरोक्त बाबा पर गहरी आस्था थी। उसने अधिकारपूर्वक उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलवाने का निमंत्रण मुझे दिया था। मेरे मन में श्रद्धा-आस्था जैसी कोई बात तो नहीं थी मगर फिर उस साथी अधिकारी का मित्रवत् दिल रखना भी जरूरी था। और फिर मेरा ऐसा कोई परहेज या नकारात्मक विचार अथवा दृष्टिकोण भी तो नहीं था। और अंततः, एकदम निराकार भाव से ही सही, मैं उस साथी अधिकारी के साथ उपरोक्त बाबा से मिलने पहुंचा। पंडाल में हजारों भक्तजनों की भीड़ थी। बाबा का प्रवचन चल रहा था। वातावरण संगीतमय और सुव्यवस्थित था। प्रवचन के तुरंत बाद मुलाकात होगी, ऐसा साथी मित्र ने पहले ही बता दिया था। और कार्यक्रम खत्म होते ही हम पंडाल के पीछे बने विशिष्ट कक्ष की ओर बढ़े थे। बाबा को वहां कुछ खास भक्तों और समर्थकों से मिलवाया जाना था। कमरे में कुछ एक विशिष्ट मेहमान नजर आ रहे थे। हमारा क्रम आता, इससे ठीक पहले दो भक्तजन बाबा के सम्मुख पहुंचकर हाथ जोड़े खड़े हो गये थे। वे शायद भीड़ में से, किसी तरह इस कक्ष तक पहुंचने में सफल हुए थे। अर्थात वे विशिष्ट आमंत्रित व महत्वपूर्ण नागरिक नहीं थे और सामान्य भक्त लग रहे थे। आयोजन पक्ष के कुछ सदस्य उनसे टोकाटाकी व पूछताछ कर रहे थे मगर वे किसी भी तरह बाबा के नजदीक से दर्शन के साथ दो पल उनके साथ आस्थापूर्ण बात करना चाह रहे थे। इस दौरान बाबा का व्यवहार उनके प्रति रूखा-सा प्रतीत हो रहा था। इस सबके बीच मेरे साथी अधिकारी ने किसी के माध्यम से बाबा के कानों तक कुछ कहलवाया था। और तभी मैंने पाया कि मेरे आगे वाले दोनों भक्तों की ओर बाबा ने बड़ी उलाहनापूर्ण दृष्टि के साथ देखा और फिर नाराज होते हुए झल्लाये भी। यह देख आयोजकों द्वारा तुरंत उन दोनों भक्तों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया गया। और परिणामस्वरूप अब हम बाबा के सामने थे। हमारे पहुंचते ही उनके चेहरे के भाव बदल चुके थे। और वे हमसे बड़ी प्रसन्नतापूर्वक मिले थे। उस दो-चार मिनट में वो मुझसे बात करके मुझे अध्यात्मिक रूप से प्रभावित करने का प्रयास करते रहे। मगर मैं मुस्कराता हुआ चुपचाप बैठा रहा, बिना किसी विशेष अपेक्षा के साथ। न जाने क्यों उस दौरान आगे वाले दोनों भक्तजनों का चेहरा बार-बार मेरी आंखों के सामने से गुजर जाता था। बाबा के अचानक हुए हृदय-परिवर्तन और चेहरे के बदलते भावों ने मेरे मन में इस मत को पुनः सत्यापित किया कि हम सभी इंसान हैं। फिर चाहे वो आम हो या खास, भोगी हो या योगी, बाबा हो या भक्त। विभिन्न मानवीय गुण-अवगुणों से लैस।यह सत्य है हम जब किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर बहुत अधिक आस्था या विश्वास करने लगते हैं, तब एक तरह का एकतरफा विशिष्ट संबंध स्थापित हो जाता है। ऐसे में हम उसके हर कथन और कार्य को पसंद करने लगते हैं। यही नहीं उसके समर्थन में सदैव खड़े और मौका पड़ने पर बोलने भी लगते हैं। जबकि अमूमन इसका कोई आधार नहीं होता। ऐसी परिस्थिति में कई बार प्रेम, श्रद्धा व विश्वास आगे बढ़कर अधंसमर्थन के भावों में परिवर्तित हो जाता है। अध्यात्म के क्षेत्र में इसकी अधिक संभावना होती है और वहां इसे अंधभक्ति कह सकते हैं। इस स्तर पर पहुंचने पर कोई तर्क नहीं चलता। अनुयायियों को कुछ और दिखाई भी नहीं देता। और इस तरह वो व्यक्ति अपने समर्थकों के लिए एक आदर्श बन चुका होता है जिसके काल्पनिक आभामंडल का निर्माण तक हो जाता है। जिसे फिर देख-देखकर अनुयायी प्रेरित होते रहते हैं और उत्साह से उपजी ऊर्जा के लिए भी इस आभामंडल को ही प्रमुख स्रोत मान लेते हैं। इस संपूर्ण प्रक्रिया के कई सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक पक्ष तो हो ही सकते हैं मगर साथ ही इसका एक मानसिक पक्ष भी है। जब कभी भी हम किसी बात या अवस्था व व्यवस्था से बहुत दुखी, प्रताड़ित या परेशान हो जाते हैं और कुछ भी आगे न करने की स्थिति में पहुंच जाते हैं, तब ऐसे में किसी के द्वारा उस संदर्भ व समर्थन में कही गई छोटी-सी बात भी हमें आकर्षित करती है। डूबने को तिनके का सहारा कहावत यहां चरितार्थ हो सकती है। कमजोर को जरा-सा भी मजबूत कंधा, फिर चाहे वो बातों का ही क्यों न हो, मिला नहीं कि वो उसके सहारे खड़ा हो जाता है। और फिर थोड़ी-सी राहत मिलते ही दुर्बल तुरंत अंधभक्त भी हो जाता है। पिछले दिनों के एक घटनाक्रम से इसे बेहतर समझा जा सकता है। भ्रष्टाचार से त्रस्त हिन्दुस्तान की आम जनता कुछ एक अनजान व्यक्तियों के समूह के साथ किस हद तक समर्थन में आ खड़ी हुई थी। जबकि उनमें से अधिकांश का पूर्व में कोई विशेष जन-आधार नहीं था। उनकी बातों की विश्वसनीयत व कार्यकुशलता का कोई प्रमाण न होने के बावजूद उन्हें जनसमर्थन मिल रहा था। और तो और, कुछ ही समय में उन लोगों की तमाम मानवीय कमजोरियों के प्रकट होने और उस समूह के बिखर जाने के बावजूद कई अंधसमर्थक उनके साथ बने रहे। यही नहीं सब कुछ उजागर होने के बावजूद, अंत में बचे दो-चार चतुर-चालाक की कही हर बात पर अब भी कुछ मुट्ठीभर लोग ताली बजाने को तैयार रहते हैं। और उनकी हर एक हरकतों के समर्थन में लड़ने-झगड़ने को तैयार खड़े मिलते हैं। समझाने पर पलटकर तर्क, फिर चाहे वो अधकचरा ही क्यों न हो, देने के लिए तत्पर रहते हैं। असल में अब यह उनका समर्थन नहीं बल्कि वो भावना है जो उन्हें अंत तक यह मानने को तैयार नहीं होने दे रही कि वे गलत साबित हुए हैं। और फिर कोई विकल्प भी उन्हें नजर नहीं आता। पहले से हताश हो चुका ये वर्ग अब किसी और को ढूंढ़ने के लिए तैयार नहीं। उनके सामने उपस्थित अन्य स्थापित नेताओं पर उन्हें विश्वास नहीं। उनकी दृष्टि में राजनीति से जुड़ा हर व्यक्ति भ्रष्ट है। उनके मतानुसार इन नेताओं के वास्तविक जीवन और विचारधारा में, संक्षिप्त में कहें तो कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है। मगर इस वर्ग द्वारा लाख चिल्लाने के बावजूद इन राजनेताओं के आज भी असंख्य समर्थक हैं जो उनकी बातों से प्रभावित होकर उनके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

 इस तरह के व्यक्ति विशेष का आकर्षण सिर्फ हिन्दुस्तान में नहीं, पूरे विश्व में देखा जा सकता है। और यह सिर्फ आज-कल ही नहीं, इतिहास के पन्नों में भी आदिकाल से प्रचलित है। शिक्षा और ज्ञान ने समाज के इस पहलू पर कोई असर किया हो, महसूस नहीं होता। पढ़े-लिखों को और अधिक अंधसमर्थक होते हुए देखा जा सकता है। युवाओं में जोश के कारण भटकाव की संभावना अधिक होती है। आमजन सुनी-सुनाई बातों पर भी, अगर वो उसे ठीक-ठीक लग रही है तो उस पर बिना किसी जांच-पड़ताल के विश्वास कर लेता है। इसमें समर्थक की मानसिक कमजोरी जहां महत्वपूर्ण रोल अदा करती है वहीं उस तथाकथित नायक की काल्पनिक छवि का भी अपना योगदान होता है। तभी समाज में विशिष्ट छवि बनाने के लिए हर तरीके के हथकंडे अपनाये जाते हैं। जिसके लिए सर्वप्रथम इन नायकों को जनता से दूर रखा जाता है। जिससे आमजन उसकी मानवीय असलियत न जान सके। प्राचीन काल में राजाओं को भी प्रजा से दूर रखा जाता था। अवाम को अपने महाराज के दर्शन कम ही हो पाते थे। दरबारी राजा की प्रशंसा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे जो फिर आमजन में किस्से-कहानी बनकर रातोरात फैल जाता था। इस तरह से एक आम नागरिक तमाम उम्र राजा की काल्पनिक छवि ही दिल में बसाये रखता था। बड़े-बड़े फिल्मी नायक और सितारे भी कुछ पल के लिए ही अपने फैंस के बीच जाया करते हैं। यही नहीं, समय गुजर जाने व प्रभाव खत्म होने के बाद, वृद्धावस्था में ये सितारे अमूमन अपने समर्थकों के बीच में जाने से बचते हैं। वो नहीं चाहते कि उन्हें वास्तविक रूप में कोई देखे। यह शायद सबके लिए उचित भी है। वरना हमारे कई सपने बिखर जायेंगे। जैसा कि हम चांद-तारों के बारे में न जाने क्या-क्या सोचा करते थे। मगर जब उनके नजदीक पहुंचे तो पाया कि वो भी तो मिट्टी के ही बने हुए हैं।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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