आंदोलन से समाज का हित-अहित


August 6, 2012

किसी आंदोलन की सफलता-असफलता, समय-काल और समकालीन परिस्थितियों पर निर्भर करती है। मगर समाज को होने वाले हित-अहित का मूल्यांकन आने वाली पीढ़ी इतिहास पढ़ने से अधिक अपने तत्कालीन जीवन की हकीकत से करती है। आंदोलन फिर चाहे वो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक मुद्दे पर हो, जब तक जनता की भागीदारी नहीं, तब तक वो जनांदोलन नहीं हो सकता। व्यवस्थाजनित बुराइयों, कमजोरियों, तकलीफों, मुश्किलों से तंग अवाम की कोख में क्रांति के बीज पनपते हैं। और फिर जितना अधिक जनता में आक्रोश होगा उतना ही बड़ा आंदोलन खड़ा होगा। हां, आगे का घटनाक्रम इस बात पर निर्भर करता है कि नेतृत्व कौन कर रहा है और वो इसे किस दिशा में ले जाता है? विश्व इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जनता के आक्रोश को समकालीन नेतृत्व ने एक ऊर्जा के रूप में उपयोग किया, फलस्वरूप परिवर्तन हुए। जितना बड़ा आंदोलन होगा उतने ही अनुभवी, दूरदर्शी, परिपक्व व संतुलित नेतृत्व की आवश्यकता होती है। अनियंत्रित और शक्तिशाली घोड़े के लिए कुशल घुड़सवार चाहिए, अन्यथा इतिहास गवाह है कि छोटी-सी चूक की सजा समाज सदियों तक भुगतता है।पिछले कुछ वर्षों से हिन्दुस्तान भ्रष्टाचार को देख-पढ़कर बेचैन हो रहा था। काली कमाई की नयी-नयी ऊंचाइयों को देख तो वो क्रोधित हो उठा। ऐसे में अवाम में आक्रोश का दिन-प्रतिदिन बढ़ना ही था। और फिर अपनी ही व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव तेजी से पनपने लगा। कह सकते हैं कि इस बार यह एक अवस्था में विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी थी। इस बीच कुछ एक लोगों ने इस ऊर्जा के साथ बहकर फिर धीरे से इसकी सवारी करने की कोशिश की। उनको समर्थन मिलना स्वाभाविक था। रातोंरात मिली लोकप्रियता और घर-घर हुई अचानक चर्चा के पीछे एक यही कारण था कि हर दिल में क्रोध की अग्नि जल रही थी। आंदोलन के नेतृत्व को सपने दिखाना आवश्यक है फिर चाहे वो संभव हो न हो। क्रोधाग्नि में जल रहा अवाम इस पर अमूमन चर्चा को तैयार नहीं होता। और न ही उसे सोचने और समझने की फुर्सत होती है। अतः जनलोकपाल घर-घर पहुंचा। यह वास्तविकता में कितना कारगर होगा यह तो समय ही बतायेगा। मगर इससे आशाएं बहुत पैदा कर दी गई थीं। बहरहाल, यह लेख का विषय नहीं। और फिर जिन्होंने इसे उठाया था वही जब इसे छोड़कर आगे निकल पड़े तो हम क्यों इस पर अपनी ऊर्जा खर्च करें। फिलहाल, ठगी-सी जनता अवाक्‌ है, प्रश्न तो वो बाद में करेगी। फिलहाल तो पूछा ही जा सकता है कि बेसब्र-बेचैन जनता को लोकपाल आंदोलन से क्या मिला?जब अवाम समस्त शासन व्यवस्था के भ्रष्ट आचरण से परेशान हो, ऐसे में शीर्ष पर बैठे लोगों को कोई जितना अधिक लक्ष्य बनाएगा उसे उतनी अधिक लोकप्रियता और समर्थन हासिल होगा। यह काम टीम-अन्ना ने बखूबी किया। उधर, व्यवस्था में बैठे लोगों से, अब इसे चूक कहें, बेवकूफी कहें, नासमझी कहें या फिर सोची-समझी मिल-जुलकर बनाई गयी राजनीतिक चाल का एक हिस्सा, जो भविष्य ही निश्चित करेगा, मगर यह तय है कि बदले में सीधी प्रतिक्रिया देने से अचानक कुछ अनजान चेहरों को उन्होंने जाने-अनजाने ही अपने समकक्ष ला खड़ा किया। रातोंरात मिली लोकप्रियता से टीम-अन्ना सुपर सितारा घोषित हो गई थी। यह कम रोचक नहीं कि यहां बिना कुछ किये ही नेतृत्व और भीड़ के बीच एक विश्वास कायम हो गया। इस दौरान टीम-अन्ना और मीडिया एक-दूसरे का काम बखूबी करते नजर आये। यहां तक तो सब ठीक था। एक अच्छा उद्देश्य सबको दिखाया जाता था। इसके बावजूद इतने कम समय में जब आंदोलन को लेकर सवाल खड़े होने लगे थे, तो विश्वास नहीं होता था, मगर अब लगता है कि सब सच ही तो था। इसमें कोई शक नहीं कि आंदोलनकारियों को मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। सभी को पता होना चाहिए कि सच्चे-झूठे इल्जाम लगेंगे और इसके लिए तैयार होना चाहिए। सत्ता से लोहा लेना आसान नहीं। यहां टीम-अन्ना की सफलता-असफलता, उनके मतों, कथनों और तर्कों व उनकी घटती लोकप्रियता-विश्वसनीयता के विश्लेषण की कोई आवश्यकता नहीं। लेकिन जब एक आंदोलन की आवश्यकता से अधिक चर्चा हो तो उसके प्रति सजग और सतर्क रहना जरूरी हो जाता है। जब समाज की सेहत पर फर्क पड़ने वाला हो तो वहां हर नागरिक को जागरूक रहना होगा। ऐसे में हर घटनाक्रम पर नजर रखने की जवाबदारी लेखक और सामाजिक चिंतक की होती है।आमरण अनशन का यूं ही समाप्त हो जाना शायद तथाकथित बुद्धिमान आंदोलनकर्ताओं के लिए अप्रत्याशित नहीं, हो सकता है सब कुछ योजनाबद्ध हो, मगर भोली जनता अभी तक कुछ ठीक से समझ नहीं पा रही। असल में किसी भी आंदोलन को लंबे संघर्ष के लिए एक ठोस कार्यक्रम की आवश्यकता होती है। गहरी विचारधारा के साथ नेतृत्वों में अनुभव, परिपक्वता और दूरदर्शिता की आवश्यकता होती है। नेतृत्व के व्यवहार में सहनशीलता, समझदारी, त्याग, सौम्यता, संतुलन के साथ निःस्वार्थ भाव की आवश्यकता होती है। क्या यह सब टीम-अन्ना के पास था? और भी कई सवाल खड़े होते हैं। जिनका सिलसिलेवार जवाब से अधिक विश्लेषण की आवश्यकता, अब नयी बनने वाली अन्ना-पार्टी को अधिक होनी चाहिए। क्योंकि राजनीति की जरूरतें तो और विकराल है। यूं तो टीम-अन्ना में आपसी मतभेद अवाम के लिए कोई मायने नहीं रखते मगर जब आप ड्राइविंग सीट पर विराजमान होने के लिए ट्रायल दे रहे हों और बस से यात्री उतरने लगें तो शंका का होना स्वाभाविक है। किसी भी आंदोलन को क्रांति में परिवर्तित करने के लिए अधिक से अधिक लोगों का जुड़ना आवश्यक होता है। और राजनीति में तो बहुमत जरूरी है। मगर यहां तो खेल शुरू भी नहीं हुआ था और टूटन शुरू हो चुकी थी। बड़ी सफाई से इल्जाम लगाया गया कि आंदोलनकारियों को तोड़ा जा रहा है, बेवजह बदनाम किया जा रहा है। मगर यह तो राजनीति में और अधिक होगा। विरोधी आपको सब कुछ थाली में सजाकर परोसकर खाने के लिए देने वाला नहीं। और फिर जिस तरह से आप सब कुछ कहने और करने के लिए स्वतंत्र हैं वही अधिकार तो अब सामने वाले को भी प्राप्त है। अब तो कोई यह भी कह सकता है कि अगर सभी राजनीतिक नेता खराब हैं तो आखिरकार अच्छा कौन है? और फिर आपकी बातों का भी भरोसा क्यों किया जाये? क्या जरूरी है कि आपके सुझाये विकल्प सत्ता में बैठने पर भ्रष्ट नहीं होंगे? क्या आप देवलोक से आये हैं? एक ऐसा समाज जिसकी नस-नस में, हर कदम, हर सांस में भ्रष्टाचार के कण मौजूद हों वहां सिर्फ दूसरों पर उंगली उठाना, उचित नहीं जान पड़ता। सच तो यह है कि समाज को एक संपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाले आंदोलनकर्ता, चतुर-चालाक हैं, हिम्मती भी हैं, और अब लोकप्रिय भी हैं। वे अब तक जो भी कह-कर रहे थे तो अवाम ने भी उनका साथ दिया। मगर अब राजनीतिक महत्वाकांक्षा के उजागर हो जाने पर बात भिन्न होगी। उलटा भ्रम के हट जाने से धीरे-धीरे तस्वीर साफ नजर आने लगेगी। बंद मुट्ठी अब खुल चुकी है। अब दूसरे उसका मूल्यांकन करेंगे। यूं तो किसी भी आंदोलन का आधार भी ईमानदार होना चाहिए लेकिन आज के बाजार में यह कम से कम असंभव प्रतीत होता है। भ्रष्टाचारियों, फिर चाहे वो किसी भी स्तर का हो, के कंधों पर बैठकर भ्रष्ट व्यवस्था को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। अवाम टीम-अन्ना के आंदोलन में इस बात की अनदेखी करती थी मगर अब तो अन्ना-पार्टी राजनीति में प्रवेश कर रही है, जिसका प्रवेश-शुल्क बहुत महंगा है। इसका मूल्य चुकाने के दौरान अन्ना-पार्टी पर सबकी नजर होगी। और फिर यहां प्रवेश करने के बाद व्यवस्था के अंदर बैठा आदमी अपनी जड़ों को नहीं खोदता उलटा नींव मजबूत करने में प्रयासरत हो जाता है। व्यवस्था परिवर्तन की बात अब अन्ना-पार्टी के मुंह से शोभा नहीं देगी। सच तो यह है कि वह सत्ता परिवर्तन का प्रयास करते-करते सत्ता के भागीदार तो बन ही जायेंगे। बहरहाल, यह बहुत दूर की बात है मगर इसकी संभावना को देखें तो पायेंगे कि टीम-अन्ना अभी से ही अहम्‌ की शिकार है। विचारों के प्रति अडिग होना अच्छा है लेकिन व्यवहार से अडिग नहीं होना चाहिए। लेकिन जब अनुभव की कमी हो और बहुत जल्दी बहुत सस्ते में लोकप्रियता मिल जाये तो ऐसा अमूमन होता है। यहां यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं और न ही इसके विश्लेषण की आवश्यकता है कि टीम-अन्ना के सदस्यों को ही इतनी लोकप्रियता क्यों प्राप्त हुई? क्योंकि गली-गली कई अरविंद, मनीष, किरण और कुमार कहीं अधिक ईमानदारी से काम कर रहे हैं, मगर सबको वो नहीं प्राप्त हुआ जिनके वे हकदार हैं। कहने वाले तो बहुत कुछ कहते हैं, अफवाहों पर ध्यान न भी दें, तब भी किस्मत के अतिरिक्त यहां बहुत कुछ होने का आभास होता है। यह किसी देशी-विदेशी संस्था की सोची-समझी रणनीति हो या न हो, कोई अदृश्य हाथ किसका फायदा पहुंचा रहे हैं, भी उतना महत्वपूर्ण नहीं। मगर इतना जरूर है कि पहले भ्रष्टाचार ने देश को खोखला किया और अब भ्रष्टाचार विरुद्ध आंदोलन का असफल होना देश का अहित करेगा। मगर दूसरों पर दिनभर इल्जाम लगाने वाले तथाकथित अहिंसा-प्रेमी अन्ना-टीम इन बातों को सुनते ही हिंसक हो जाती है।कोई चाहे कुछ भी कहे इस आंदोलन का राजनीतिक रूपांतरण अर्थात उद्देश्य का पूरी तरह बदल जाना, के परिणाम बहुत दूरगामी हैं। व्यक्तिगत रूप से किसी को कितना अधिक फायदा हुआ या आगे होगा, इस लेख के लिए कतई महत्वपूर्ण नहीं। यहां देखने वाली बात यह है कि समाज का कितना अधिक नुकसान होगा। देश जल रहा था, उबल रहा था, भाप बन रही थी, प्रेशर तैयार हो रहा था यकीनन अगर सब कुछ ठीक चलता तो परिवर्तन का धमाका जरूर होता। मगर यहां पर मानों किसी ने प्रेशर कुकर की सीटी बजा दी। फलस्वरूप प्रेशर खत्म हो गया। ऐसे में शोर तो बहुत हुआ मगर खिचड़ी नहीं पकी। गुब्बारा तैयार हो रहा था फूल रहा था उसे एक नयी ऊंचाई पर पहुंचना था मगर ऐसा लगता है किसी ने उस पर अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ लाद दिया। ऐसे में गुब्बारे को नीचे तो आना ही है। इस आंदोलन की असमय मौत से हम क्या कुछ खोने जा रहे हैं, हम अभी नहीं समझ पा रहे। सच तो यह है कि धीरे-धीरे जनाक्रोश डिफ्यूज हो जाएगा। ऐसे में जाने-अनजाने भ्रष्टाचार की इस ऊंचाई को समाज की स्वीकृति मिल जायेगी। हर दिन अपनी जरूरतों के लिए लड़ने वाला आम आदमी थक-हारकर वर्तमान अवस्था को स्वीकार कर लेगा। विभिन्न बीमारियों से ग्रसित यह समाज एक महामारी अपने शरीर में स्थायी रूप से लगा लेगा। ऐसे अति बीमार समाज के साथ हम कैसे जियेंगे, इसकी कल्पना से ही रूह कांप जाती है। मगर इससे किसी को क्या? आने वाली पीढ़ी का जो होना है सो होगा, मगर कई चतुर-चालाक स्वार्थिंयों ने अपना वर्तमान तो बना ही लिया और भविष्य के रंगीन सपने देखने लगे। लेकिन वो भूल गये कि बाजार के युग में मीडिया रातोंरात मॉडल बदल देता है, और तो और किसी को चर्चित तो कर सकता है मगर चुनाव नहीं जिता सकता। क्योंकि जनता सब समझती है।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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