चिंता नहीं चिंतन


June 23, 2012

जब लेख लिखना शुरू किया था तब यह शंका गाहे-बगाहे मन में उभरती रहती कि हर हफ्ते कहां से एक विषय प्राप्त होगा। बाजार के युग में राजनीति, क्रिकेट और बॉलीवुड के अतिरिक्त मीडिया में कहीं कुछ और दिखाई नहीं देता। लेकिन सिर्फ इन्हीं मुद्दों पर लिखना संभव नहीं। ऐसे में बोर होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। शुक्र है कि मेरे सामने ऐसी अवस्था नहीं आयी। फिर इसकी भी और एक वजह रही कि मेरा प्रारंभ से ही मत था कि उपरोक्त विषयों के अलावा भी समाज में अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक मुद्दे हैं जिस पर लिखा जाना चाहिए। पाठकों की निगाहें इन्हें खोजती हैं। सत्य है, हमारे आसपास घटने वाली हर घटना से समाज और मानव का कोई न कोई संबंध होता है। ये बहुत कुछ कहती हैं। इनसे समझा भी जा सकता है। यह हमारे शरीर के उन लक्षण की तरह है जो संभावित रोग के बारे में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संकेत देते हैं। इनके सूक्ष्म विश्लेषण से समाज के अंदर उत्पन्न हो रही बीमारियों, फैल रही व्याधियों और पनप रहे असाध्य रोगों का पता लगाया जा सकता है। इनके गहन अध्ययन से भविष्य की परिकल्पना करके समाज की दिशा और दशा सुनिश्चित की जा सकती है। मगर यह इतना सीधा और सरल भी नहीं, वरना सब कुछ आवश्यकतानुसार न होता? असल में मानव का सामाजिक जीवन किसी एक बिंदु से नियंत्रित नहीं होता। यही कारण है जो समाज की अवस्था एवं व्यवस्था पर सतत निरीक्षण और निरंतर परीक्षण एवं समयानुसार बदलाव जरूरी है। जिसमें समाज के बौद्धिक जगत की अपनी अहम भूमिका है। जिन्हें सदैव जागरूक रहना अति आवश्यक है। समाज में लेखक को विचारक की भूमिका निभानी होती है। लेखन यूं भी एक तपस्या है। जहां फिर निष्पक्ष व निःस्वार्थ भाव होने पर ही सही आकलन प्रस्तुत किया जा सकता है। विचार खुले और दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिए। लेखन के दौरान सामाजिक बंधन व व्यक्तिगत लाभ-हानि से दूर रहना भी अति महत्वपूर्ण है। मगर लेखक को सिर्फ आलोचना की दृष्टि नहीं अपनानी चाहिए। सकारात्मकता का भी अपना महत्व है। हां, नकारात्मक बिंदु के मिलते ही चिंता का होना स्वाभाविक है। जिसे फिर शब्दों में उतारकर तथ्यों को सही अर्थों में अवाम तक पहुंचाना जरूरी है। यह लेखन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जिसमें उसके अपने मूल उद्देश्य भी निहित हैं। जब यही चिंता व्यापकता की ओर बढ़ती है और हल ढूंढ़ने में प्रयासरत होती है तो चिंतन का प्रारंभ होता है। इस बिंदु पर आकर लेखक चिंतक बन जाता है।चिंता और चिंतन देखने में एक-दूसरे के काफी करीब लगते हैं। क्या इनके शब्दार्थ भी उतने ही समीप हैं? प्रथम द्रष्टया तो ऐसा लगता नहीं। मगर थोड़ी-सी गहराई में उतरते ही पाएंगे कि चिंतन में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में चिंता अवश्य होती है। और वहीं चिंता में चिंतन का अंश विद्यमान होता है। यह दीगर बात है कि चिंता से चतुराई कम होती है तो चिंतन से ज्ञान में वृद्धि होती है।चिंता, अर्थात किसी मुद्दे, संदर्भ या बात को लेकर परेशान होना। किसी होने वाले संभावित परिणाम के लिए चिंतित होना। अपेक्षित के न होने की चिंता सताती है तो अनचाहे के हो जाने की चिंता डराती है। हम जो चाहते हैं उसके उलट को सोच-सोच कर दिमाग खराब कर लेते हैं। इस अवस्था में एक प्रकार के डर का समावेश होता है। संदर्भित चिंतित व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुरूप व अनुकूल कार्य न होने की आशंका होती है। कई बार अनिष्ट को काल्पनिक रूप से सोचकर ही उद्वेलित हो जाना चिंता की निशानी है। सामान्यतः जो कुछ आपके पास है उसके छूटने, गुमने, बिछुड़ने, बिगड़ने या कम हो जाने का भय या कुछ मनचाहा प्राप्त होने की चाहत व मन की अभिलाषा के पूरी न हो पाने का डर, विभिन्न चिंताओं का कारण बन जाते हैं। इसे व्यक्ति के कमजोर आत्मविश्वास से भी जोड़कर देखा जा सकता है। छात्रों में परीक्षा, युवाओं में पहले नौकरी फिर परिवार आगे चलकर बच्चों की चिंता, ऐसे न जाने कितने ही व्यक्तिगत अनगिनत चिंताओं को सूचीबद्ध किया जा सकता है। मगर यही व्यक्ति जब समाज की चिंता करने लग पड़ता है तो यहीं से चिंतन की शुरुआत होती है। घर में लड़की पैदा हुई नहीं कि उसके दहेज की चिंता, आम बात है। मगर जब समाज की बेटियों की चिंता शुरू हो जाती है तो चिंतन का प्रारंभ होता है। आम नौकरी-पेशा घरों में, वेतन प्राप्त होते ही चिंताओं का सिलसिला चालू हो जाता है। बच्चों की फीस से लेकर घर के आटे-दाल, मकान, बिजली, गैस, टेलीफोन के बिल की चिंता। मगर जब इसी तरह की चिंता अवाम के लिए होती है तो इसे अर्थव्यवस्था पर चिंतन कहा जाना चाहिए। ऐसा कई बार लगता है कि चिंताएं आम आदमी को ही होती होंगी। मगर नहीं, बड़े आदमी की चिंताए भी बड़ी हो जाती हैं। सेठ-साहूकारों को तिजोरी में से चोरी हो जाने की चिंता सदियों से सताती रही है तो व्यापारियों के माल बिकने और उद्योगपतियों को शेयर बाजार की चिंता आजकल आम देखी जा सकती है। लोकप्रिय लोगों की चिंताएं तो और गजब होती हैं। फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों को दर्जनों सफल फिल्में देने के बाद भी, नई फिल्म के रिलीज होने पर चिंता करते देखा जा सकता है। नायक अपने शरीर सौष्ठव की चिंता में दुबला जाता है तो नायिका मोटे होने की चिंता में कुम्हलाती रहती हैं। नेता को चुनाव, फिर पद की चिंता, अगर सब कुछ ईश्वर की दया से सही है तो बच्चों को अपनी जगह कुर्सी पर बिठाने की चिंता। मगर जब यही बड़ा आदमी तमाम व्यक्तिगत चिंताओं से ऊपर उठता है तो तुरंत आदर की दृष्टि से देखा जाने लगता है। उसके आमजन से संदर्भित और संबंधित होते ही आदर्श मान लिया जाता है। और फिर सामाजिक कार्य करते ही वो समाज सुधारक के रूप में स्थापित होने लगता है। औरतों की चिंताओं का तो जवाब ही नहीं। आम गृहिणी के लिए घर और बच्चे चिंता के केंद्र में होते हैं। मगर यही नारी का प्रेम व्यक्तिगत परिधि से निकलकर जब ईश्वर से जा मिलता है तो मीरा का भक्ति-रस बन जाता है। और आध्यात्मिक चिंतन बनकर जन-जन में प्रवाहित होने लगता है। जब शारीरिक सौंदर्य प्रकृति से जुड़कर उसके रहस्य उजागर करने लगे और मानसिक पीड़ा परम आनंद देने लग पड़े तो महादेवी वर्मा के शब्द चिंतन बन जाते हैं। मीरा से महादेवी, आत्मा से परमात्मा के मिलन का दिव्य-दर्शन है। आजकल के साहित्यकारों की चिंता भी कम हास्यास्पद नहीं। अन्य लेखकों की आलोचना करना फैशन बन चुका है। दूसरे की प्रसिद्धि पर झुंझलाहट स्वभाव बनता जा रहा है। प्रतिद्वंद्वी विचारधारा का सदा विरोध और उस पर नाहक टिका-टिप्पणी करके आत्ममुग्ध होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इनके लेखन में समाज की चिंता दिखायी तो जाती है मगर दृष्टिकोण सीमित और संकुचित होता है। लेकिन फिर जैसे ही यह चिंता सतह से नीचे गहराई में उतरने लगती है तो साहित्य में चिंतन का प्रारंभ होता है जो फिर समाज की जड़ों को सींचता है और विश्व मानव जगत को मजबूती प्रदान करता है।चिंता क्या आधुनिकता की देन है? शायद। पहले चिंताओं की तीव्रता और उसे जन्म देने वाले कारण कम हुआ करते थे। वर्तमान की गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने इन्हें बढ़ा दिया है। आज अपेक्षा, चाहत, महत्वकांक्षा का दौर है तो चिंता मुफ्त में मिलती है। ये चिंताएं व्यक्तिगत हैं। यह 'मैं' को केंद्र बनाकर उसके चारों ओर घूमती रहती हैं। यही घेरा, जब 'मैं' और 'मेरे' के केंद्र को झुठलाकर स्वार्थी घर-परिवार की मजबूत दीवारों को तोड़कर बाहर निकलता है और मोहल्ले-शहर और समाज की ओर बढ़ जाता है, तो यही चिंता कहीं न कहीं चिंतन का रूप लेने लगती है। समाज की चिंता, देश की चिंता, विश्व की चिंता जब इंसान की सोच प्रक्रिया में शामिल हो जाती है तो वहीं से चिंतन प्रारंभ होता है। मैं से निकलकर, चारों ओर फैल जाने की क्रिया, अंदर से बाहर निकलने की प्रक्रिया, चिंता से चिंतन का सफर है।समाज की असमानता से चिंतित समाजशास्त्री कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे गरीब और दुखियारों का दुःख समाप्त हो। उनके वक्तव्य, कार्य, सोच व बातों के केंद्र में दबे-कुचलों की चिंताएं होती हैं जो कालांतर में सामाजिक चिंतन की विचारधाराएं बन जाती हैं। और यही राज्य की नीति में परिवर्तित व संदर्भित होते ही राजनैतिक चिंतन के रूप में देखी जा सकती है। इनके परिभाषित होकर अकादमिक होते ही शास्त्र बन जाते हैं। इनसे शासन व्यवस्थाओं का स्वरूप प्रभावित होता है। नये विकसित तंत्र का सफल होते ही इसका राज्याभिषेक हो जाता है। ये विचारधाराएं ही, विषम परिस्थितियों में कई बार क्रांति और विद्रोह का कारण बन जाती हैं। इनकी जड़ों में होता है वो चिंतन, जिसके बीज सोचने वाले की चिंताओं से उत्पन्न हुए थे। इतिहास गवाह है, क्रांतियां सबूत हैं, किसी भी राजनीतिक विचारधारा का विश्लेषण करें तो पाएंगे, समाज की किसी न किसी छोटी-बड़ी मगर जटिल परेशानियों को लेकर उत्पन्न हुए चिंता से ही इसका जन्म हुआ था। जिसने अपनी कोख में क्रांति का जनन होने से पूर्व लंबे समय तक चिंतन किया होगा। कुछ इसी तरह से व्यक्ति की बाह्‌य-अदृश्य व आत्मिक चिंताओं को दूर करने के लिए धार्मिक चिंतन की उत्पति होती है। धार्मिक उपदेशों व कथाओं के माध्यम से उसकी परलौकिक चिंताओं को शांत करने की कोशिश की जाती है। धर्म के द्वार पर आया व्यक्ति चिंताग्रस्त है तो धर्म के पास चिंतन है।चिंता से चिंतन का जन्म होता है तो चिंतन चिंता के नाश का कारण बनता है। चिंता की अति में मनुष्य का सर्वनाश सुनिश्चित है तो चिंतन से समाज का कल्याण होता है। चिंता चिता में जलती है, चिंतन चेतना को जाग्रत करता है। चिंता करना मानव का स्वाभाविक गुण है। शायद हमारी इतनी अधिक चिंताएं भी हमें अन्य प्राणियों से अलग करती है। जानवर अमूमन शरीरिक भूख के समय ही मानसिक रूप से क्रियाशील होते हैं। उनके लिए अस्तित्व की सुरक्षा ही चिंता का एकमात्र व प्रमुख कारण दिखाई देता है। अपनो की चिंता करना, सिर्फ मनुष्य का स्वभाव लगता है। मादा जानवर में अपने नवजात शिशु के लिए चिंता के कुछ अंश देखे जा सकते हैं। चिंता से चिंतन का सफर तय करना, मनुष्य के श्रेष्ठ योनि होने का प्रमाण है, गौरव है। इसके द्वारा परमानंद की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है। और यह अवस्था प्राप्त होती है निरंतर मनन से, साधना से, तपस्या से।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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