क्या कभी सतयुग था?


November 18, 2011

एक सम्मानित राष्ट्रीय पत्रिका के एक अंक में राष्ट्र कवि दिनकर जी का एक पत्र, जो उन्होंने 1953 में लिखा था, प्रकाशित हुआ था। पढ़कर एक मिनट के लिए मैं चौंका था। ऐसा लग रहा था कि मानो यह पत्र वर्तमान काल में लिखा गया है। अन्य लेखकों की आपस में ईर्ष्या-भाव, घर-परिवार में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्द्धा, संपत्ति के लिए विवाद व लड़ाई-झगड़े और फिर राजनीति के बारे में जो लिखा गया था उसे पढ़कर आश्चर्य होना स्वाभाविक था। पढ़कर जानकर अजीब लगा था। तो क्या आज की युवा पीढ़ी के मन-मस्तिष्क में विराजमान प्रतिष्ठित व सम्मानित लेखक भी आम मनुष्य की भांति लड़ते-भिड़ते रहते थे? क्या राजनीति पचास वर्ष पूर्व भी आज की तरह ही भ्रष्ट, भ्रमित व स्व-केंद्रित थी? क्या आमजन तब भी भौतिक व सांसारिक सुख को पाने के लिए बेहद परेशान रहते थे? ऐसे कुछ सवालों का उठना स्वाभाविक था। यह तो वो युग था जब देश नया-नया स्वतंत्र हुआ था। अवाम के मन-मस्तिष्क में संतोष और आत्मिक शांति होनी चाहिए। गांधीजी के आत्मसंयम व सादगी का प्रभाव अपने चरम पर होगा। और फिर राजेंद्र प्रसाद की तरह और भी कई वरिष्ठ एवं निःस्वार्थ सेवा करने वाले राजनेता रहे होंगे। तब तो समाज सेवा का भाव व देश-प्रेम अपने चरम पर होना चाहिए। तो फिर देश-समाज की ऐसी हालत कैसे? असल में लेखों से, समाचारपत्रों से, चिट्ठियों से तत्कालीन समाज की अवस्था-व्यवस्था व रूपरेखा को पढ़ा और समझा जा सकता है। विभिन्न सामाजिक परिस्थितियां समझी जा सकती हैं। मैं हैरान था यह पढ़कर कि जिस समय व काल को हम अच्छा माने बैठे हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ भी नहीं। तो क्या मनुष्य सदा अपनी इच्छाओं का गुलाम रहा है? या फिर व्यक्ति अपने वर्तमान काल को सदा दोष देता है? क्या अपने से पहले बीत चुके समय को बेहतर ठहराया जाता है? शायद ऐसी ही हमारी आम मानसिकता होती है। ऐसी मनःस्थिति या कहें परिस्थितिजन्य सोच जो हम अपने वर्तमान कष्टों के कारण पूर्व समय को बेहतर व न्यायोचित ठहराते हैं।
साहित्य से समकालीन समय को और अधिक गहराई से समझा जा सकता है। धर्मग्रंथ भी हमें समय विशेष के बारे में विस्तृत जानकारी देते हैं। इन्हें पढ़कर तत्कालीन समाज का खाका हमारी निगाहों में अपने आप खींचा चला जाता है। अगर हम सत्य और असत्य के चक्कर में न पड़ें, एक मिनट के लिए यथार्थ और कल्पना की परिभाषा व वर्गीकरण को दरकिनार कर दें, तब भी महाभारत और रामायण हमें बहुत कुछ बताते हैं। रामायण के युग में अगर भरत जैसा भाई था तो कैकेयी जैसी मां भी तो थीं। बाली जैसा बलवान मगर घमंडी वानर राजा अगर था तो सुग्रीव जैसा धर्मपरायण शूरवीर भाई भी था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे तो दुष्ट राक्षस रावण और उसकी विशाल सेना भी उसी युग में पायी जाती थीं। महाभारत तो फिर भिन्न-भिन्न अनगिनत चरित्रों से भरा हुआ है। शकुनि और दुर्योधन को छोड़ दें तो सीधे-सीधे किसी चरित्र को खलनायक घोषित कर देना मुश्किल कार्य होगा। लेकिन साथ ही किसी को नायक मान लेना भी कठिन होगा। यहां कोई भी चरित्र संपूर्ण नहीं है। सबकी अपनी-अपनी कमजोरियां हैं। और सभी ने अपने-अपने हिस्से की स्वार्थवश गलतियां की हैं। कहीं जानकर तो कहीं अनजाने में गलत नीतिगत फैसले लिये गये, अव्यावहारिक प्रतिज्ञाएं की गयीं, जिसका सीधा प्रभाव अवाम पर पड़ा और संपूर्ण राष्ट्र महायुद्ध की अग्नि में बेवजह जल उठा। सामान्य और संक्षिप्त रूप में कहें तो देवताओं के साथ-साथ राक्षस भी सदा से उपस्थित रहे हैं। या यूं कहें कि राक्षस के बिना देवताओं का मूल्यांकन संभव नहीं है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। यह प्रकृति का नियम है। रात के बिना दिन को परिभाषित करना मुश्किल होगा। हरेक अपने संदर्भ और हित को देखते हुए दोस्त-दुश्मन चिन्हित करता है। अपने-अपने दृष्टिकोण से अच्छे-बुरे की परिभाषाएं सुनिश्चित करता है। और फिर समाज में सब कुछ व्यवस्थित हो यह तो किसी भी समय-काल में कभी भी संभव नहीं लगता।
सिर्फ हिंदुस्तान के इतिहास में ही जयचंद नहीं हुए हैं। स्वार्थी, धोखेबाज और धूर्त इतिहास के हर पन्नों में पाये जाते रहे हैं। हर युग, हर काल, हर जगह इन्होंने अपने-अपने रंग दिखाये हैं। जिनका उद्देश्य राष्ट्र-विरोधी व जनविरोधी रहा है। बस नाम और तरीके बदलते रहे। यूरोप के इतिहास में सीजर और नेपोलियन का दुखद अंत ऐसे ही नहीं हो गया। जबकि ये दोनों ही महान योद्धा और सफल व लोकप्रिय राजा थे। असल में कुछ भी स्थायी नहीं। सर्वदा जीवन सुख से भरा रहे यह भी संभव नहीं। अवाम पूर्ण रूप से संतुष्ट रहे यह किसी भी काल में नहीं हो पाया है। वर्तमान को दोष देना और इतिहास को कल्पना अनुसार स्वेच्छा से बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना आदमी की फितरत रही है। सच तो यह है कि बुराई की गति आैर तीव्रता में कुछ अंतर हो सकता है। राक्षसों की संख्या में फर्क हो सकता है। पता नहीं सतयुग था या नहीं? मगर त्रेता युग के राम को भी असत्य पर सत्य की जीत के लिए युद्ध करना पड़ा। सीता को अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी। द्वापर युग में तो फिर द्रौपदी की रक्षा के लिए स्वयं श्रीकृष्ण को आना पड़ा। और फिर युद्ध में विजय के लिए साम-दाम-दंड-भेद सभी कुछ अपनाया गया। यहां कंस के बिना क्या श्रीकृष्ण की लीला परिभाषित की जा सकती है? कंस मामा की हत्या के बाद ही श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व को सही शब्दों में विस्तार से व्याख्या मिली। त्रेता युग व द्वापर युग में हुए असाधारण असुरों को देखकर लगता है कि क्या वास्तव में सतयुग में सब कुछ ठीक होगा? आदमी की फितरत को देखकर लगता नहीं। यहां शंका बेवजह नहीं।
उपरोक्त क्रम की अगली कड़ी के रूप में अगर कलियुग को देखें तो फिर चारों ओर फैली दुर्दशा को देखकर अधिक हैरानी नहीं होती। मनुष्य के स्वार्थी स्वभाव के कारण ऐसा तो होना ही था। मगर कलियुग की परेशानी कुछ और है। सीधे-सीधे कहें तो हर युग में उसके नायक और खलनायक हुआ करते हैं। हर एक नायक को प्रसिद्धि, उनके अस्तित्व को पहचान, खलनायक को परास्त करके ही हुई है। और तभी वो जननायक बन पाये। सवाल इतना-सा है कि आज के युग में खलनायक तो बहुत हैं मगर वर्तमान समय को उसके नायक की तलाश है। हां, मुश्किल इस बात की है कि आज राक्षसों की संख्या न केवल बढ़ी है बल्कि उन्होंने नायकों का स्थान भी लेना शुरू कर दिया है। और तो और इन असुरों को राजसत्ता का सुख प्राप्त होने लगा है। और ये पहले से अधिक बलवान और चतुर-चालाक हुए हैं। ये आज के दिन अधिक संगठित और सक्रिय हैं। शायद यही मूल अंतर कलियुग को अन्य युग से पूरी तरह अलग करता है, जहां अच्छे मनुष्य निष्क्रिय होकर असुरों को स्वीकार करने लगते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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