कथनी और करनी में अंतर


August 29, 2011

आजकल राजनीतिज्ञों पर यह आरोप अकसर लगा करता है कि वे झूठ बहुत बोलते हैं। वायदा नहीं निभाते हैं। अपनी बात पर टिके नहीं रहते। कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। मगर क्या ये कटु तथ्य दूसरों पर भी बराबरी से लागू नहीं होता है? बड़े-बुजुर्गों की बात माने तो हमारे पूर्वज अपने वचन पर कायम रहते थे, और जिंदगीभर उसे निभाते थे। यहां तक कि अगली पीढ़ी भी अपने बाप-दादाओं के वचन को निभाने की कोशिश करती थी। आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों के पतन के साथ ऐसे उदाहरण अमूमन दिखाई नहीं देते। लोग मिनटों में ही अपने कहे से मुकर जाते हैं। व्यक्तिगत लाभ के लिए सुविधा, समय व मौके अनुसार लोग धोखा देने की होशियारी से भी नहीं चूकते। सफलता के लिए कुछ भी करेगा और हर तरीका अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। सामाजिक जीवन में तो आजकल यह आम बात है। समाज का प्रतिष्ठित व विशिष्ट वर्ग भी अब इससे अछूता नहीं। अकसर शिक्षकों पर भी अब यह इल्जाम लगाया जाता है कि जो शिक्षा वह देते हैं उसी से वे स्वयं दूर होते हैं। पूर्व में ऐसा नहीं था। तभी उनकी बात मानी जाती थी। समाज में इज्जत थी। मान-मर्यादा थी। आमतौर पर धार्मिक गुरुओं से ऐसी अपेक्षा की जाती रही है परंतु यहां भी दावे के साथ कुछ कहना संभव नहीं।
समाचारपत्र क्या इस आरोप से बचे हुए हैं? नहीं। अब इसमें कोई संदेह भी नहीं रहा। यह अधिक चिंता का विषय है। संपादकों ने अपनी साख और गरिमा को गंवाया है। चौबीसों घंटे बोलने वाले मीडिया की स्थिति तो और भयावह है। यहां निष्पक्षता व निडरता की जगह बाजार का प्रभाव देखा जा सकता है। भ्रष्टाचार पर चीखने वाला स्वयं इस दलदल में फंसा नजर आता है। क्या किया जा सकता है, व्यावसायिकता के आते ही नैतिकता समाप्त होने लगती है। मगर इन सबके चक्कर में पत्रकारिता ने अपनी विश्वसनियता खोई है और उसके अस्तित्व के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो चुका है। यही हाल अमूमन प्रजातंत्र की हर एक संस्थान में देखा जा सकता है।
एक राष्ट्रीय पत्रिका के संपादक ने एक विशिष्ट अंक के अपने संपादकीय में यह सवाल पूछकर कि आजकल कहानियां पढ़ी क्यों नहीं जाती? समाज की आम चर्चा में क्यूं नहीं आ पातीं? एक मुद्दे को उठाने की कोशिश की थी। संक्षिप्त में सीधे-सीधे कहने का तात्पर्य था कि पाठक नदारद क्यों है? आगे जवाब विस्तार में दिया गया था। जो शायद ठीक भी था। यूं तो मनोरंजन के अन्य उपाय सुलभता से उपलब्ध होने के साथ-साथ बौद्धिक पठन-पाठन के कई दूसरे साधन व माध्यम भी आसानी से मिल जाना इसका प्रमुख कारण है। मगर इसके अतिरिक्त भी कुछ एक महत्वपूर्ण बिंदु हैं। लिखा गया था कि आजकल ऐसी कहानियां लिखी जाती हैं जो लोगों को समझ ही नहीं आती। कहा जा सकता है कि ये आम पाठक के जीवन से जुड़ी नहीं होतीं। वो इतनी क्लिष्ट और बोझिल बना दी जाती हैं कि उसमें जीवन-रस ही नहीं होता। कहीं आलोचकों को खुश करने के लिए तो कहीं कलात्मकता के नाम पर, ऐसी कठिन भाषा का उपयोग किया जाता है कि कई बार अच्छे-अच्छे बुद्धिजीवी भी कहानी का मर्म नहीं समझ पाते। इतना तक हंसी-हंसी में कह दिया जाता है कि जो न समझ आये वही कला है। ‘बिटवीन द लाइन’ के चक्कर में कई वाक्य-कथन हटा दिये जाते हैं, परिणामस्वरूप कहानी का प्रवाह टूटता-सा प्रतीत होता है। कहानी के अंत को इतना अस्पष्ट बना दिया जाता है कि सामान्य पाठक भ्रमित और अंधकार में तीर चलाता रह जाता है। यही सब कारण है कि कहानी का पाठक वर्ग आज नदारद है।
उपरोक्त बातें बहुत हद तक सच थीं और मैं इन्हें पढ़कर प्रभावित हुआ था। मैंने तुरंत उस पत्रिका के अंदर की कहानियों को एक तरफ से पढ़ना शुरू किया तो पाया कि संपादक महोदय ने वही काम कर रखा है जिसके विरोध में विस्तारपूर्वक उन्होंने लिखा था। अधिकांश कहानियां इतनी अस्पष्ट और बोझिल थी कि किसी एक को भी आधे से अधिक पढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाया था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि छपी हुई कहानियों का चुनाव वही भेदभावपूर्ण, जोड़तोड़ और संबंधों व नाम-दाम के हिसाब से हुआ है। ऐसा भी हो सकता है कि संपादक मंडल ने कहानी बिना पढ़े ही चुन ली हो।
निष्कर्ष निकलता है कि साहित्य भी अपने रास्ते से भटक चुका है और अपनी जिम्मेदारियों से भागता नजर आता है। समाज को दिशा देने वाला आज स्वयं भ्रमित है। पहले शब्द क्रांति और व्यवस्था परिवर्तन के लिए लिखे जाते थे अब खेल खेलते नजर आते हैं। जहां हम सच और पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं, वहां ऐसी हालत है तो जीवन के बाकी क्षेत्रों से क्या उम्मीद की जा सकती है? मूलतः साहित्य में व्यावसायिकता की कोई जगह नहीं। इससे पैसा नहीं कमाया जाता। लेकिन फिर साहित्य को भी बाजार के प्रभाव में आने की क्या मजबूरी हो सकती है? इसे सामाजिक चरित्र के पतन के रूप में देखा जा सकता है। और फिर साहित्य साहित्यकारों से ही पहचाना जाता है जो उसी समाज से आते हैं, जहां खरीदना-बिकना ही लक्ष्य रह गया है। इस अविश्वसनीय युग में नाम कमाने और अपनी बौद्धिकता थोपने के लिए संपादक-लेखक कुछ भी करेगा के सिद्धांत पर चल पड़े हैं। उपरोक्त विशिष्टजन ही नहीं आम आदमी के संस्कार व संस्कृति मर्यादा और आदर्श के स्तर पर आज सबसे ज्यादा निष्क्रिय हैं। हर आदमी चाहे वो फिर किसी भी क्षेत्र में हों, स्वकेंद्रित है, और पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार है। फिर चाहे उसे कथनी और करनी में फर्क ही क्यों न करना पड़े। पहले हम धन-बल नहीं, व्यक्ति के चरित्र की बात किया करते थे। उसका व्यक्तित्व देखा जाता था, जो विश्वास पैदा करता था। हम उसूलों की बात करते थे, सिद्धांतों पर मर-मिटते थे। यहां तक कि प्रचलित कहावत भी थी कि प्राण जाये पर वचन न जाये। लेकिन आज विशिष्ट-जन ही नहीं साधारण मनुष्य भी बाहर छोड़ अपने ही घर में, मौके के हिसाब से अपने वक्तव्य को बदलते देखे जा सकते हैं। वर्तमान में सामाजिक जीवन के तथाकथित आदर्श युग-पुरुष, परदे के पीछे विलासी और भोगी का जीवन जीते हुए आम देखे-सुने जा सकते हैं। शारीरिक सुख के लिए उच्छृंखलता पश्चिम की संस्कृति थी। पुरानी पुरबिया गंगा-जमुना संस्कृति में इसका कोई स्थान नहीं था। हमारे अनेक ऐसे लोकप्रिय प्रचलित मुहावरे व कहावतें थीं जिसके सहारे हम परिवार-समाज व मानवता को परिभाषित किया करते थे। मगर आज बाजार ने सब कुछ बदल दिया है। विश्वसनियता इतनी गिर चुकी है कि आपसी पारिवारिक संबंध तक टूट रहे हैं। कुछ भी विश्वास के योग्य नहीं रहा। यहां तक कि लिखी हुई बातों का भी यकीन नहीं रहा। लेकिन बाजार ने विज्ञापन के विभिन्न हथकंडे अपनाये हुए हैं। आकर्षक पैकेज और रंगीन पैकिंग के साथ दिन-रात झूठ कुछ इस तरह प्रचारित किया जाता है, सपनों का माया-जाल बुना जाता है कि अंत में हारकर अधिकांश मनुष्य इस बाजार की मायावी दुनिया से आकर्षित होकर जाल में फंस ही जाता है। और आदमी से उपभोक्ता बन जाता है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं रह गया जहां यह खेल न खेला जाता हो। आदमी के दिमाग को बाजार संचालित करता है। आज पढ़ा-लिखा व्यक्ति अधिक मूर्ख है। ऐसे में भौतिक जीवन पर आधारित आधुनिक सभ्यता से क्या उम्मीद की जा सकती है?
लेखकों, स्तम्भकारों, विचारक व चिंतकों की बात करें तो वहां भी कम बुरा हाल नहीं। उपभोक्तावाद के समर्थन में शब्दों से जिस तरह खेला जाता है, वो भयावह है। आज के अधिकांश लेखक स्वयं बाजारवाद के सिद्धांत पर चलते हैं। जहां धन ही धर्म है। बाजार ने सामाजिक व्यवस्था के हर अंग को प्रभावित किया है। शासक ही नहीं संपूर्ण शासन-तंत्र अर्थव्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसता नजर आ रहा है। इसी चक्कर में कब शासित को शोषित बना दिया जाता है पता ही नहीं चलता। मात्र पैसा जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता मगर नयी पीढ़ी को यही सिखाया जा रहा है। खुली अर्थव्यवस्था के चंद वर्षों में ही इसके दुष्परिणाम नजर आने लगे हैं मगर कोई समझने को तैयार नहीं। अवाम की अंतड़ियों में अन्न का दाना नहीं और उसे मॉल की चकाचौंध से पेट भरने को कहा जाता है। कैसी विडंबना है मगर यही सत्य है। असल में बाजार की चकाचौंध में व्यवस्था की कथनी और करनी में अंतर को देख पाना थोड़ा मुश्किल है। यहां सफेदपोश-नकाबपोश नायकों (?) को समझना भी आसान नहीं। जनता समझ भी जाये तो मजबूर होती है। या कहें मजबूर कर दी गयी है। यह दीगर बात है कि जब वो शारीरिक रूप से टूटने के बावजूद मानसिक रूप से आजाद होगी तो विद्रोह कर देगी। तब इसी व्यवस्थाओं को, इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह सच है कि अवाम की सहने की सीमा असीमित व अपरिभाषित होती है, लेकिन उसके सब्र का बांध कब अचानक टूट जाये कोई नहीं जानता। बहरहाल, सामाजिक व राजनीतिक नेतृत्व इसे समझने में असफल रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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