क्या क्रिकेट का पतन अब निकट है?


April 5, 2008

करोड़ों फूंककर आईपीएल के क्रिकेट का तमाशा विगत सप्ताह प्रारंभ हुआ। इसमें घर फूंक तमाशा देखने वाली जैसी कोई बात नहीं, न ही क्रिकेट के उद्धार की बात सच है। इसके पीछे का असल मकसद है अरबों कमाना। एक शुद्ध व्यवसाय। यह पहला मौका है जब क्रिकेट और फिल्म्स, मीडिया के साथ मिलकर जनता को दर्शक से उपभोक्ता बनाने पर उतर आयी है। विदेशों से नचनिया बुलाये गए, खूब आतिशबाजी हुई, आइटम गर्ल और ब्वाय पांच सितारा होटल एवं सिनेमा के पर्दे से निकलकर क्रिकेट मैदान में नाचने लगे। जिस क्रिकेट सितारे की एक झलक पाने को लोग परेशान रहते थे, और घंटों उनके होटल के बाहर धूप में खड़े पाये जाते थे, वो खुद जनता के बीच जाकर टिकट बेचने का काम कर रहे हैं। पैसे के बल पर मीडिया के कई माध्यम को खरीद लिया गया। अधिकांश समाचारपत्रों के मुख पृष्ठ पर संबंधित खबरें छपने लगी। रेडियो-टेलीविजन पर जोशभरे गाने गाये जाने लगे। विज्ञापन के माध्यम से लोगों के दिलोदिमाग पर प्रभाव डाला जाने लगा। सब कुछ अत्यधिक सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। लेकिन व्यवसाय के मैनेजमेंट गुरु यह भूल गए कि जीवन में सब कुछ अगर आदमी के हाथ में हो तो हर इंसान भगवान न बन जाए। जो भाग्य का स्वाद धीरूभाई अंबानी ने चखा, जरूरी नहीं कि उनकी आगे आने वाली पीढ़ी भी उतनी ही किस्मत पा जाए। असफलताएं भी इसी दुनिया का अभिन्न अंग है। पैसों के बल पर दुनिया खरीदने वाले यह भूल गए कि अगर विज्ञापन द्वारा बनायी गई स्वप्निल दुनिया एक मायाजाल है तो इसी में कहीं धूप कहीं छांव है। क्रिकेट के व्यवसायी ने सोचा कि हिन्दुस्तान की अवाम क्रिकेट की गुलाम है यहां आराम से पैसा वसूला जा सकता है। मगर प्रारंभिक रिपोर्ट को देखें तो यह सत्य साबित नहीं हो रहा।
असल में, क्रिकेट हिन्दुस्तान में सिर्फ खेल नहीं राष्ट्रवाद की भावनाओं, देशभक्ति की ललक से उभरा जोश, विदेशी को हराने की अभिलाषा, और इसी तरह की कई विचारों का सम्मिश्रण है। जिसके कारण आज यह सर्वाधिक लोकप्रिय है। ये विशुद्ध मनोरंजन भी नहीं। विश्व के अन्य देशों में भी कई खेल व कार्यक्रम हैं जिसमें इसी तरह का जुनून पाया जाता है। लेकिन हिन्दुस्तान में क्रिकेट की निरंतर बढ़ती लोकप्रियता के और भी कई कारण हैं। सफलता के नशे में चूर हमारे फिल्मी सितारे व व्यवसायी इसी को भुनाने चले हैं मगर वे यह भूल गए कि ऐसी कई फिल्में हैं जो अत्यधिक प्रचार के बावजूद कई बार बाक्स ऑफिस पर लुढ़क जाती है तो हर व्यापार जरूरी नहीं उतना ही सफल हो। शुरुआती भीड़ को ध्यान से देखें तो आईपीएल उतना सफल नहीं रहा जितना उससे उम्मीद की जा रही थी। तभी तो शाहरुख और प्रिटी जिंटा के परेशान होने की खबरें छन-छन कर आने लगी। जबकि जबरदस्ती दर्शक इकट्ठा करने के लिए करीना और अन्य फिल्मी सितारे कई जगह नाचते दिखाई दिये तो प्रिटी जिंटा से लेकर तमाम क्रिकेट के सितारे टिकट बेचते रहे। प्रारंभिक मैचों का विश्लेषण करें तो न तो उतनी भीड़ पायी गयी, न ही उनमें उतना जुनून था, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। कई लोग भविष्य में इसके सफल होने की उम्मीद लगाये बैठे हैं। क्रिकेट के पैसे पर जिंदा लेखक व खेल पंडितों का कहना है कि धीरे-धीरे लोगों में इसकी चर्चा बढ़ेगी, लेकिन कइयों ने इस पर आशंका जाहिर की है। खबर तो यह भी है कि आने वाली भीड़ मुफ्त टिकट वाली थी।
इतनी मार्किटिंग व माहौल पैदा करने के बावजूद इसकी असफलता के कई कारण बन सकते हैं। प्रारंभ में फिल्मी सितारों का आकर्षण तो कुछ दिन होगा लेकिन जब ये व्यक्तिगत रूप से भीड़ में कई बार उपस्थित होने लगेंगे तो कुछ दिनों बाद बंद मुट्ठी खुल जाएगी और जनता को प्रिटी जिंटा और करीना कपूर में वो आकर्षण नहीं दिखाई देगा जो वह सपनों में सजा के रखते हैं। और फिर दूसरी-तीसरी मुलाकात में ही उसे अपने मोहल्ले की लड़के-लड़कियां या दोस्त अधिक सुंदर और स्मार्ट दिखाई देने लगेंगे। यह वास्तविकता है कि फिल्मी सितारों से अधिक सुंदर चेहरे आम घरों में पाये जाते हैं। यह तो एक स्वप्निल मायाजाल होता है जिसमें फंसकर आदमी परदे पर उन्हें तमाम उम्र देखता रहता है। लेकिन जब यही परदे से निकलकर यथार्थ में उपस्थित होते हैं तो सपनों की दुनिया कांच के समान टूट जाती है और फिर हमारे जैसा ही सामान्य मनुष्य दिखाई देने पर उनका कोई आकर्षण नहीं बचता। वैसे भी कितने दिनों तक इस तरह से नाच-नाच कर लोगों को फुसलाया जा सकता है। दर्शक को हर बार नवीनता चाहिए। एक ही तरह की तो फिल्म भी देखना वो पसंद नहीं करता। हिन्दुस्तान के संदर्भ में क्रिकेट को मात्र एक खेल समझ लेना बड़ी मूर्खता होगी। मनुष्य ने आदिकाल से अपनी भावनाओं के गिरफ्त में आकर उसे मजबूत करने के लिए, अपने स्वाभिमान को संतुष्ट करने के लिए राष्ट्र और धर्म का निर्माण किया। और इनके माध्यम से अपने आप को स्थापित और परिभाषित किया। वो इसे अपने अस्तित्व से जोड़ता है। जब राष्ट्र जीतता है तो वो जीतता है। जब राष्ट्र हारता है तो यकीनन वो रोता है। ये भावनाएं ही हैं जो लोगों को एकजुट करती है और एक को दूसरे का विरोधी बनाती है। अपने और पराये के बिना उन्माद या जुनून संभव नहीं। यहां क्रिकेट मात्र मनोरंजन भी नहीं, ये तो इस उपमहाद्वीप में अनायास पनपती राष्ट्रीय भावना है। इन भावनाओं का ही असर है जो भारत-पाकिस्तान के मैचों में बिन बुलाये भीड़ इकट्ठा होती है। इसी तरह की भावनाओं के कारण सेनाएं सीमाओं पर लड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं। हिटलर ने इन्हीं भावनाओं का दुरुपयोग किया था। सत्य है, अगर ये मानवीय भावनाएं न हो तो राष्ट्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए। आदिकाल से कबीले, समूह और फिर जागीर को बनाने के पीछे इन भावनाओं का ही हाथ रहा है। जिस तरह से किसी राष्ट्र की सफलता के लिए उसके नागरिक की एकता व उसका भावनात्मक लगाव जरूरी है उसी तरह से किसी भी व्यक्ति या कार्यक्रम की लोकप्रियता के लिए उसके प्रशंसक वर्ग और उनसे उसका भावनात्मक लगाव जरूरी है। लेकिन आईपीएल में ऐसी किसी भी तरह की भावनाएं नदारद हैं। और अगर कोई बीयर या शराब पीने और भोजन करने के लिए मैच देखने एक बार चला भी गया तो बार-बार नहीं जाएगा। उसके बाद उसे किसी रेस्टोरेंट में पीना-खाना ज्यादा अच्छा लगेगा। माना की विज्ञापन के जोर से मिट्टी भी बेची जा सकती है। लेकिन यह नुसखा हर बार कारगर सिद्ध हो जरूरी नहीं। इस बार भी मीडिया रिपोर्टिंग को देखें तो खाली स्टैंड की दबी जुबान से चर्चा की गई। कई अंग्रेजी के तथाकथित राष्ट्रीय समाचारपत्रों ने तो कई-कई पृष्ठ के विशेषांक निकालने शुरू कर दिये। जबकि क्या यह इतना महत्वपूर्ण है? नहीं। उसके बावजूद लोगों में इसके प्रति उतना उत्साह नहीं दिखा। एक और अंतिम मगर महत्वपूर्ण बिंदु की हर एक को इसमें पैसे की खदान दिखाई दे रही है और हर आदमी इसे लूटना चाहता है। तभी तो फिर चाहे स्थानीय शासन हो या पुलिस प्रशासन, सभी ने अतिरिक्त पैसे की मांग शुरू कर दी। कहीं-कहीं मनोरंजन टैक्स लगाये जाने की बात भी सुनायी पड़ी। पाठकों को क्या लगता है, किसी-किसी समाचारपत्रों या टीवी में भी इतनी बड़ी-बड़ी रिपोर्टिंग ऐसी ही दी जा रही है। नहीं। खिलाड़ियों ने जमकर पैसे पहले ही कूट लिये। हीरो-हीरोइन भी संबंधों की खातिर एक बार तो नाचने आ जायेंगे लेकिन फिर बाद में वो भी रुपयों के लिए लार टपकायेगा। और जिसने पैसा लगाया है वो भी कमाना चाहेगा। और अंत में यह सब पैसा जनता जनार्दन से ही वसूलना है। लेकिन जनता अभी इसे पूर्ण रूप से समझ नहीं पा रही है। उसके लिए अगर यह सिर्फ मनोरंजन है तो उसके पास अब दूसरे साधन भी उपलब्ध हैं। और फिर रोज-रोज इसी तमाशे को देखकर वो भी तो बोर हो जाती है।
सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कहानी लोगों ने पढ़ी होगी। एक ही दिन में उसे काट कर सैकड़ों अंडे नहीं पाये जा सकते। इतिहास इस बात का गवाह है कि ऊंचाई पर चढ़कर वहां कोई स्थायी नहीं रहा। हां, उसके गिरने का कोई न कोई कारण अवश्य बनता है। कहीं ट्वेंटी-20 क्रिकेट का यह स्वरूप उसके पतन का कारण तो नहीं बनने जा रहा?

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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