और मुझे लज्जा आ गई


March 29, 2008

आखिरकार तसलीमा नसरीन को भारत छोड़ना पड़ा। ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ की पंक्तियां मुझे कानों में आकर झकझोर रही थीं। चूंकि तसलीमा को शरण लेने के लिए किसी और मुल्क में जाना पड़ा और हम देखते रह गए। एक नारी को, विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक ‘मेरा भारत महान’ को छोड़कर चुपचाप जाना पड़ा, जबकि वो यहां रहना चाहती थीं। पता नहीं उन्हें इस देश से प्रेम है या नहीं, मगर उन्होंने इसे पसंद जरूर किया। उन्हें यह अपने घर के समान लगता था। एक ऐसा विशाल देश, जिसने आने वाले हर मेहमान को सदा खुले दिल से स्वीकार किया। इतिहास साक्षी है कि बाहर से आने वालों को यहां रहने-बसने की दिल से स्वीकृति प्रदान की गई। विविधता से भरा हुआ, रंग-बिरंगी संस्कृतियों की छठा बिखेरता, सदियों से आध्यात्मिक गुरु की पदवी पर बैठा ऐतिहासिक देश। एक ऐसा देश जो ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा लगा-लगा कर पिछले कुछ वर्षों में एक बार फिर विश्व शक्ति के रूप में उभरने का दावा करता है। पता नहीं इस घटनाक्रम के बाद उसके इस ऐलान पर कितनी रोक लगेगी। कुछ और हो न हो एक प्रश्नचिह्न जरूर लगेगा। चूंकि जो शक्तिशाली होते हैं वो कमजोरों को, असहाय को सहयोग देते हैं। और इसी से उनकी शक्तिशाली होने का प्रमाण भी जुड़ता है। शरण में आये हुए को तो फिर अपनी जान दांव पर लगाकर भी सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसी से बड़े का बड़प्पन और उसकी विश्वसनियता प्रमाणित होती है। वैसे भी मेहमानों को भगवान मानने की हमारी संस्कृति रही है। तो फिर अचानक यह कैसे हुआ? यह सोचते ही मुझे लज्जा आयी। पता नहीं विश्व अब हिन्दुस्तान की संस्कृति को किस तरह से लेगा? आखिरकार इस नारी का गुनाह क्या था? जो उसे छिपाकर देश से बाहर भेजा गया। इसके पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। कोई कह सकता है कि हिन्दुस्तान के आवाम की भावनाओं को ठेस पहुंचाया जा रहा था। मगर यहां सवाल उठता है कि हमारे बीच ऐसे सैकड़ों मिल जाएंगे जो अपनी करतूतों से रोज देश के सिर को नीचा करते हैं। एक-दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले व्यक्तियों की तो इस देश में कमी नहीं। कोई कह सकता है कि दंगे भड़कने का अंदेशा था। मगर क्या हिन्दुस्तान में दंगे भड़काने वालों की कमी है। कम से कम लेखिका का तो ऐसा कोई उद्देश्य दिखाई नहीं देता था जबकि हमारे सैकड़ों राजनेता, धर्मगुरु इन्हीं बातों पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं और वोटों की राजनीति कर रहे हैं। तो फिर कहीं यह प्रजातंत्र की कमजोरी, वोट बैंक की राजनीति का एक घिनौना रूप तो नहीं? और अगर यही सत्य है तो मुझे अपने देश को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए अभी और आत्मपरीक्षण करने की आवश्यकता महसूस होती है। हमें अपने व्यक्तित्व में और अधिक विकास करना होगा। और मेहनत करनी पड़ेगी। कोई कह सकता है, चूंकि कहने पर किसी का रोक नहीं, कि मेहमान को मेहमान की तरह रहना चाहिए। तो फिर इसके विरोध में कहना चाहूंगा कि फिर वे मेहमान नहीं गुलाम कहलायेगा। अगर उसे कहने-बोलने, सुनने का हक न हो, अगर वह आने-जाने के लिए स्वतंत्र न हो तो फिर रहने के लिए दिया गया महल भी उसके के लिए जेल के समान ही होगा। ऐसे में मजबूरीवश तो कोई रह सकता है मगर खुशी-खुशी नहीं रहेगा और मौका मिलने पर जरूर छोड़ जाएगा। और यही हुआ। अंत में हार कर तसलीमा नसरीन इस देश को छोड़कर चली गयीं।
दूसरे देश पहुंचकर, तसलीमा नसरीन द्वारा बोले गए कथन में उनकी पीड़ा साफ झलकती है। लेखिका होने के कारण कोई इसे स्वाभाविक कह सकता है लेकिन कहे गए शब्द सरल और सहज थे। उनमें कोई जोड़-तोड़ नहीं था। शब्दों को पढ़कर उनकी डबडबाती आंखें और रुआंसे चेहरे के पीछे छिपे असीम दर्द को पाठक महसूस कर सकता था। हां, उनके द्वारा उपयोग किए गए एक शब्द ‘डेथ चैंबर’ को पढ़कर मुझे द्वितीय विश्व युद्ध की अचानक याद आ गई। नाजियों ने यहूदियों को मारने के लिए गैस चैंबर बनाये थे। इस अमानवीय कृत्य के लिए इतिहास हिटलर को कभी माफ नहीं कर पाया। मुझे डर है कि इस बेबाक और निडर लेखिका के द्वारा उपयोग किया गया यह शब्द हमारी विशिष्ट पहचान पर एक छोटा ही सही मगर अनचाहा दाग जरूर लगाएगा। जिसे देख-देख कर भविष्य में हमें सिर्फ शर्म आएगी। और तब हम कुछ नहीं कर पायेंगे। जब लेखिका हिन्दुस्तान के अनुभव के बारे में यूरोप के देशों में अपनी भावनाएं प्रदर्शित करेंगी तो हम निरुत्तर होंगे और आंख चुराने पर मजबूर।
मैंने अपने उपन्यास ‘कशमकश’ के लोकार्पण के लिए तसलीमा नसरीन को बुलाने की सोची थी तभी एक आईजी मित्र ने सुरक्षा का हवाला देते हुए मुझे ऐसा न करने की सलाह दी थी। विवादों में जबरन पड़ने की न तो कभी मेरी इच्छा रही और न ही हिम्मत। उन्हीं दिनों हैदराबाद में तसलीमा के साथ हादसा हुआ था। और मैं इससे अपने आप को बचा ले गया था। किसी विवाद में पड़कर झूठी लोकप्रियता हासिल करने की मेरी फितरत नहीं अन्यथा आज के युग में इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं। उसी दौरान मेरे मन में एक विचार आया था कि एक महिला के ऊपर इतने सारे पुरुषों द्वारा हाथ उठाये जाने पर क्या मर्दों को लज्जा नहीं आयी होगी? शायद नहीं। क्योंकि अन्यथा वो ऐसा न करते। यह सत्य है कि जिस देश में नारी देवी के रूप में पूजी जाती हो, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पदों पर आसीन होती हो, वहीं पर वो घर-घर में अबला बनकर रोती हैं। पुरुष उस पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर पौरुष दिखाने का प्रयास करता है। और उसे लज्जा नहीं आती। मैं तो कहूंगा कि एक अकेली नारी पर सरेआम पुरुषत्व दिखाकर राजनीति की गयी और देश चुप रहा है। सवाल उठता है कि वो एक लेखिका के रूप में कितनी भी गलत सही मगर सर्वप्रथम वे एक औरत हैं। और दूसरे जब हर किसी को बोलने का हक है, सभी को अपना मत प्रदर्शित करने का अधिकार है तो फिर एक अकेली औरत को इसके लिए मनाही क्यूं? तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि कानून को अपने हाथ में लेने का हक किसने किसको दिया। मगर इस देश का आवाम मौन धारण किए रहा। वो तसलीमा नसरीन को सुन सकता है, पढ़ सकता है, पसंद कर सकता है लेकिन साथ खड़ा नहीं हो सकता। तो क्या हम इतने कमजोर हो गए हैं? शायद। आज क्षेत्रीयवाद राष्ट्रवाद पर हावी है मगर हम सहते रहते हैं। हर दूसरे दिन गली-गली में मनुष्यता कलंकित होती है मगर हमारी आंखें बंद हैं। देश को विघटित करने के लिए ताकतें लगी हैं और हम चुप रहते हैं। और अगर जूझते भी हैं तो तब जब हमारा स्वयं का अस्तित्व खतरे में पड़ता है। मगर एक लेखिका जो सत्य कह रही है हमें सजग कर रही है हम उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं। कितना विरोधाभास है। हमें एक बात जान लेना चाहिए कि जिस राष्ट्र में बोलने व तर्क-वितर्क की आजादी नहीं, आत्मविश्लेषण या समालोचना व गुण-दोष की विवेचना की स्वतंत्रता नहीं, उसका विकास संभव नहीं। अरस्तु व प्लेटो को चुप करा रोम व ग्रीक सभ्यताएं फिर पनप नहीं पायी और उनका पतन प्रारंभ हो गया था। हिटलर सिर्फ इसलिए खत्म हुआ चूंकि वो किसी की सुनता नहीं था।
मैंने तसलीमा नसरीन की पुस्तक ‘लज्जा’ को पढ़ा है। अलमारी में बंद किये जाने वाले गूढ़ साहित्य को लिखने वालों को शायद यह लेखन पसंद न आये मगर सीधे, सरल और स्पष्ट होना कभी गलत नहीं हो सकता। मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र को इसमें समाचारपत्र की रिपोर्टिंग दिखाई देती है। सत्य है। तत्कालीन संदर्भित अखबार की खबरों को हू बहू उतारा गया है और यह आवश्यकता से अधिक बार लिखा भी गया है। मगर यहां सामाजिक रोग और उसकी तीव्रता को प्रदर्शित करना लेखिका का उद्देश्य हो सकता है।
कुछ एक को उनके लेखन में पोरनोग्राफी दिखाई देती है। मगर फिर इस देश में ऐसे कई हैं जो सेक्स की काल्पनिक बातें कर करके लोकप्रिय स्तंभकार, साहित्यकार और संपादक बन बैठे हैं। जबकि तसलीमा के लेखन में तो भोगा हुआ यथार्थ है जिसे किसी भी लेखक को नहीं छिपाना चाहिए। यकीनन ईश्वर की निंदा करना खराब है मगर फिर सजा देने के लिए ईश्वर के बंदों को ईश्वर बनने की आवश्यकता नहीं। ईश्वर इसके लिए स्वयं सक्षम है। और फिर अगर उसी ने सभी को पैदा किया है तो एक के द्वारा दूसरे को गलत साबित करना सरासर नाइंसाफी नहीं?

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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