गणतंत्र के मायने


February 2, 2008

विगत सप्ताह गणतंत्र दिवस शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। देश के गर्व का पर्व, अपनी पहचान, उमंग, उत्साह के उत्सव के दिवस पर मात्र एक दिन का विभिन्न शासकीय स्तर पर कार्यक्रम, मीडिया में देशभक्ति पर हल्का-फुल्का शोरगुल। क्या करें, आज की पीढ़ी को इसके मायने और महत्व ठीक से नहीं पता। एक मजाकिए साथी की बात सुने तो पंद्रह अगस्त को हम आजाद हुए थे और 26 जनवरी को भारतीय संविधान में बांध दिये गये। कुछ लोगों के लिए यह स्वतंत्रता, स्वदेश, स्वशासन को आगे बढ़ाता हुआ मात्र एकदिवसीय शब्द हो सकता है। बहरहाल, असल मायने जो भी हों लेकिन आज उनका संदर्भ और उपयोगिता बदलती जा रही है। मुझे हर बार की तरह इस बार भी ऑफिस जाना पड़ा। यह अब शासकीय आदत में शामिल हो चुका है। सच पूछे तो अधिकांश अधिकारियों की यह मजबूरी जान पड़ती है अन्यथा कइयों का ठंड में मन नहीं करता। तभी तो अधिकांश सहयोगी स्टाफ नहीं पहुंचता। मगर इस बार तो उपस्थिति की संख्या पिछली बार से भी बहुत कम थी। विश्लेषण का मन किया कि देखें गणतंत्र दिवस की भावना से कितने प्रतिशत लोग जुड़े हैं। अपने ही कार्यालय में ध्यान से देखने पर पता चला कि जो नियमित रूप से आया करते थे उनमें से काफी इस दौरान विगत वर्ष रिटायर हो चुके हैं। नया भर्ती किया गया युवावर्ग तो सदा की भांति अधिकतर अनुपस्थित था तो ‘महिला वर्ग’ गायब। असल में आज का नौजवान इस दिन कार्यालय आना नहीं चाहता, उसके लिए यह एक छुट्टी है। पूर्व संध्या पर वह राष्ट्रपति का भाषण भी नहीं सुनता। परेड को प्राइवेट चैनल दिखाना नहीं चाहते और मस्ती में डूबा युवावर्ग राष्ट्रीय चैनल का बटन कम दबाता है। उसके लिए यह दिन किसी पार्टी, आउटिंग, फिल्म या दोस्तों व रिश्तेदारों के यहां जाने और मस्ती करने में या फिर देर रात तक टीवी के मनोरंजन में डूबकर दूसरे दिन थोड़ी देर तक उठकर और फिर ठंड में दिनभर धूप की सिकाई करने में जाता है। बहुत हुआ तो रात का खाना सपरिवार बाहर। शाम बाजार में पहुंचिए, देखकर ताज्जुब होगा, एक तरफ जहां सुबह कार्यालय सुनसान पड़े थे, ध्वजारोहण का कार्यक्रम फीका लग रहा था, उपस्थिति न के बराबर थी, वहीं शाम को बाजार भरे पड़े थे। हर जगह उतरती ठंड में कपड़ों की सेल में ऐसी भीड़ होती है कि मानो मुफ्त में कुछ बंट रहा है। कई कार्यालयों में तो झंडा फहराने वाले, सलामी लेने वाले के अतिरिक्त इक्का-दुक्का ही उपस्थित होते हैं। कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो यही सत्य चारों ओर मिलेगा। कुछ राज्य व जिले या संस्था के मुख्यालयों में प्रमुख समारोह को छोड़ दें, जहां शासन का डंडा चलता है। मगर वहां भी ध्यान से देखें तो बच्चों के द्वारा रोनक बढ़ाई जाती है अन्यथा कई कारणों से उपस्थिति वहां भी कम होती चली जा रही है। वैसे भी अब स्कूल प्रबंधन बच्चों को बुलाने में खुश नहीं तो दूसरी ओर अभिभावक भेजने को राजी नहीं। अब बचे प्राइवेट संस्थाएं। सबसे पहले सवाल उठता है कि क्या प्राइवेट संस्थाओं में भी झंडा वंदन का समारोह होता है? इक्का-दुक्का उदाहरण को छोड़ दें तो नहीं। अर्थात आज के व्यावसायिक युग में जब अधिकांश क्षेत्रों पर गैर-सरकारी लोगों का कब्जा है तो स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय समारोह मनाने वालों का प्रतिशत भी कम होगा। असल में हर कोई पैसा कमाने में व्यस्त है। मस्ती, मनोरंजन का युग है। शासन का कंट्रोल हर क्षेत्र में कम या खत्म होता जा रहा है। सब अपने ढंग से स्वतंत्र हैं। पहले इस्पात बिका, पेट्रोल, केमिकल्स बिका, रोड, संचार, एयरपोर्ट बिका अब शुद्ध मनोरंजन और तथाकथित देशभक्ति से जोड़ने वाला क्रिकेट भी सरेआम बिका। बचा क्या है? सुरक्षा खरीदी जा सकती है, वोट खरीदे जा सकते हैं, न्याय के लिए पैसा चाहिए। ज्ञान भी बिकने लगा तो उधर स्कूल-कालेजों में गणतंत्र दिवस की रोनक समाप्त होने लगी है। जब बाजार ने पूरे विश्व को अपने कब्जे में ले लिया है तो अब बाजार के नियम ही तो चलेंगे। व्यावसायिक घरानों के लिए देश की सीमाएं कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए तो विदेश में कभी कहीं मुसीबत आने पर ही देश के राजनीतिक शासकों से जोर डलवाया जाता है अन्यथा पैसे कमाने के लिए इनकी मानसिकता पूरी तरह स्व-केंद्रित है। कुछ व्यावसायिक घरानों की प्रगति के साथ देश का नाम रोशन होने वाली बात जिस हद तक सत्य है उसी तरह उसका दूसरा अंधेरा पक्ष भी है। आज देश का हर बच्चा बाहर जाने के लिए उतावला है। पढ़ने के लिए या नौकरी के लिए, जब मौका मिले तब। अब हर दूसरे चौराहे पर स्टडी-इन आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा के बोर्ड मिल जायेंगे। ऐसे में नयी पीढ़ी के लिए गणतंत्र के नये मायने खोजने होंगे।
स्वाधीनता से पूर्व के इतिहास के बारे में रटाया जाता है कि अंग्रेज भी ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में व्यवसाय करने के लिए भारत आये थे। अर्थात आर्थिक व्यवस्था के प्रसारक द्वारा ही राजनीति गुलामी का बीजारोपण हुआ था। मगर हम फिर भी सचेत नहीं कि दूसरी आर्थिक शक्तियां हमें गुलाम बनाने की ओर अग्रसर हो रही हैं। आज हर एक देश की राजनीतिक ताकतों के लिए आर्थिक मद बहुत महत्वपूर्ण है। अब अधिकांश राजनीतिक शक्तियां व्यावसायिक घरानों के हाथों में नियंत्रित होती हैं। यूं लगता है कि मानो देश को कुछ चंद व्यावसायिक घराने चला रहे हों। कई फैसले तो इनके हितों को देखकर किए जाते हैं। भारत इससे अछूता नहीं। फिर चाहे वो बस से लेकर हवाई जहाज हो, मनोरंजन हो, खेल हो, पेट्रोल हो यहां तक की खाने-पीने की सब्जियां, दाल और चलने के लिए रोड सब कुछ तो व्यावसायिक घरानों के हाथ में है। उसमें भी वही चंद नाम और वही चेहरे। क्या इन नये महाराजाओं के लिए 26 जनवरी का कोई महत्व है? शायद नहीं। किसी भी क्षेत्र की सरकारी कंपनी में तो जोश से गणतंत्र दिवस मनाया जाता है मगर क्या उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी उसी तरह इस उत्सव को मनाती हैं? नहीं। उनका एकमात्र ध्येय है पैसा। अन्यथा कोई भी, यहां तक कि देश भी, कम से कम उनके लिए व्यावसायिक साम्राज्य को बढ़ाने से अधिक नहीं। लेकिन फिर भी आप 26 जनवरी को बंटने वाले इनामों की सूचियों में निगाह डालें तो सबसे अधिक यही चेहरे आपको दिखाई देंगे। इनकी संख्या सर्वाधिक है। मनोरंजन, खेल और व्यवसाय। इन्होंने समाज की हर एक चीज के मुख्य हिस्से को अपने कब्जे में कर लिया है और अब आपस में एक-दूसरे से साझीदारी भी करने लगे हैं। इनके लिए आदमी के घर को किसी भी तरह बाजार बना डालने से अधिक कुछ नहीं। उपभोक्ता की जेब काटना प्रमुख ध्येय है। ऐसे माहौल में क्या गणतंत्र के नये मायने नहीं होने चाहिए?
विगत दिवस चर्चा में छोटी बेटी ने पूछा कि क्या यह सत्य है कि ‘लता जी’ द्वारा गाये गये देशभक्ति के गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगो…’ को सुनकर प्रधानमंत्री नेहरू के आंखों में आंसू थे। मुझे कहना पड़ा ‘हां’। सवाल के पीछे एक आश्चर्य था। नयी पीढ़ी यह समझने को तैयार नहीं कि देशप्रेम की भावनाओं में बहकर आदमी जान भी दे सकता है। जैसा पूर्व में हजारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने किया था। यह उसके लिए अविश्वसनीय है कि देशभक्ति की भावना में बहकर लोग रो भी सकते हैं। क्या आज इस तरह के गाने से कोई रोयेगा? एक पल के लिए क्रिकेट में विदेशी से हारने पर एकजुट होना क्षणिक प्रतिक्रिया है, मीडिया द्वारा बुना गया जाल है, अपने हित के लिए। आप सामान्य रूप में, देश के लिए लोगों को बुलायें, क्या भीड़ इकट्ठा हो सकती है? नहीं। अब तो सामाजिक कार्य में भी मल्लिका शेरावत और बिपाशा बासु का सहारा लेना पड़ता है। अर्थात सौंदर्य, मनोरंजन और मस्ती का युग है। हर एक का जीवन नशे में डूबना चाहता है। सिर्फ यही मायने रह गये हैं। ऐसे में गणतंत्र में उन्हीं पुरानी बातों का राग अलापना एक ड्यूटी-सी लगती है जिसमें दिनभर 50-60 साल पहले की यादें शामिल हैं। मेरे एक दोस्त ने तो एक सवाल का जवाब तुरंत दिया कि गांधी जी भी इस बाजार के युग में आयें तो शायद पूरी तरह फेल हो जायें। सच है, हमें अब राष्ट्र व गणतंत्र के नये पैमाने, नयी मंजिलें, नयी सोच, नयी चीजें समझनी और विकसित करनी होगी। हर नये युग में बहुत दिनों तक पुराने को बनाये रखना संभव नहीं। यहां अच्छे और बुरे की बेवजह की बहस में पड़ने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि इतिहास सदैव अपने अंदर सब कुछ समेटते हुए आगे बढ़ता हुआ चला जाता है। रुकता नहीं। कुछ वर्षों पूर्व तक कर्ज को गलत घोषित करने वाले समाज में जब लोन सर्वाधिक प्रचलित हो तो लोगों को देश व स्वतंत्रता की नयी रेखाएं भी तय कर लेनी चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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