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Archive for July, 2010

Jul 24 2010

खाने की पत्तल पर चीन

Published by Singh Manoj under Weekly Article

अधिक पुरानी बात नहीं है। दो-ढाई दशक हुए होंगे। उत्तर प्रदेश के रायबरेली शहर, शहर नहीं कस्बा कहा जाना चाहिए, के एकमात्र उपलब्ध ठीक-ठीक होटल में चाइनीज व्यंजन के नाम पर नूडल का परोसा जाना एक बड़ी खबर थी। उन दिनों यह सुनकर आश्चर्य हुआ था। एक शाम शौकिया हम भी खाने पहुंचे तो साथ में पेपर-नेपकीन का मिलना तो अविश्वसनीय था। रायबरेली अपने विभिन्न विशिष्ट कारणों से अपने आकार के दूसरे शहरों की तुलना में एक बेहतर शहर रहा है जहां तथाकथित विकास प्रक्रिया के छींटे इधर-उधर गिरते हुए दिख जाएंगे। आसपास के क्षेत्र में कारखानों और संस्थानों के स्थापित होने पर बाहर से उच्च मध्यम वर्ग का आना-जाना लगा रहता है। अर्थात आधुनिकता का आगमन तो फिर होना ही है। बाजार द्वारा इनकी सुख-सुविधाओं को उपलब्ध कराना फिर एक स्वाभाविक प्रतिक्रियात्मक चक्र का हिस्सा है। और यह इस शहर में आसानी से देखा जा सकता है। वर्ना उस दौरान अच्छे-अच्छे शहरों के स्थानीय होटलों में चाइनीज के नाम पर कुछ भी नहीं मिलता था। अमूमन तो लोग इसका नाम भी नहीं जानते थे और अगर सुना हो भी तो देखा और खाया कभी न होगा। स्वाद और सुरुचि का तो फिर कोई सवाल ही नहीं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में भी यह आम नहीं था। उपलब्धता तो थी मगर कुछ एक विशिष्ट होटलों में ही मिलता था। जहां आम लोग नहीं जाया करते थे।
उन दिनों समोसे-कचोड़ी व आलू की टिकियां, इमली की चटनी या सौंठ के ऊपर प्याज व हरी मिर्च के टुकड़े या नमकीन सेव डालकर तो कहीं दही-चटनी के साथ खूब चला करती थी। आगरा वाले, मथुरा वाले, मेरठ-हरिद्वार इन नामों से चाटों की दुकान उत्तर भारत के हर शहर में मिल जाती थी। दिल्ली के चांदनी-चौक में मूंग-गाजर के हलवे और शुद्ध घी में बने तरह-तरह के खस्ता परांठा की खुशबू गलियों में तैयारी रहती। कढ़ाई में खौलते हुए दूध को कुल्हड़ में मलाई मारकर पीने से शामे जवान हुआ करती थीं। मिठाई पर विशेष जोर होता था। जलेबी, इमरती से लेकर पेड़ा-लड्डू-बर्फी आम होते हुए भी कई जगह की खास होती थी। मिल्क-केक, मोतीचूर और बेसन की अन्य मिठाइयों के विशेषज्ञ हलवाई हर शहर में होते थे। इनकी दुकानों में भीड़ लगी होती। बंगाल के छेने की मिठाइयों व मलाई-चॉप से रईसी टपकती थी। स्पंजी सफेद रसगुल्ला तो मुंह में रखते ही घुल जाता और गिनकर चार-पांच तो आराम से खाया ही जाता था। तब जाकर कुछ खाने का अहसास होता। एक काला गुलाब जामुन खा लेने पर तो मन मस्त हो जाता था। परवल की मिठाई खास लोगों के घर ही मिलती। दादी-नानी के हाथ के लड्डू, कभी धनिया-सौंठ मिलाकर आटे में, कभी सूजी या बेसन का, न जाने कितने तरह के मेवे व शुद्ध घी के साथ इस तरह बनाये जाते कि स्वाद और शक्ति का मिश्रण होता। गोंद के लड्डू से जच्चा-बच्चा तंदुरुस्त होते। इन्हें हफ्तों रखकर खाया जा सकता था। न तो फ्रिज की आवश्यकता पड़ती न ही इसकी कोई एक्सपायरी डेट होती। लोग घर से बाहर निकलते तो साथ में आठ-दस लड्डू और नमकीन-मीठी मठरियां रख दी जाती। आदमी किसी भी कीमत पर भूखा नहीं रह सकता था। जन्मदिन की खीर विशेष होती। शरद पूर्णिमा की रात में रखी गयी रबड़ी-खीर सुबह खाने में कमाल का स्वाद देती। घरों में सुबह-सुबह गर्म-गर्म परांठों के साथ सब्जियां या फिर आलू-पूरी खायी जाती, मेहमान के आने पर खस्ता कचोरियां खासियत हुआ करती थी। इतवार के दिन घर-घर में पकवान बनता। और आम दिनों में शहर व राज्य के हिसाब से अलग-अलग मैन्यू चला करता। पंजाब का राजमा-चावल तो यूपी में आलू-दम, बिहार का सत्तू तो महाराष्ट्र में बैंगन का तीखा भर्ता, राजस्थान की दाल-बाटी तो गुजरात की हर सब्जियों में मिठास मिलती। दक्षिण भारत तो अपने विशिष्ट व्यंजनों के लिए पहले से ही लोकप्रिय है। यूं तो छोला-भटूरा, पॉव-भाजी, इडली-डोसा अपने-अपने क्षेत्र में खूब चलते मगर उनका राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार नहीं हुआ था। किसी भी घर चले जाइए खाने की थाली कटोरियों से भरी होती। क्या खाये क्या न खाये, सोचना और समझना मुश्किल होता था। पेट खराब होना आम बात नहीं थी। और लोग छक कर खाते। हां, शादी-ब्याह में स्वाद के चक्कर में अधिक खाने से कुछ मुसीबत जरूर हो जाती थी। लेकिन फिर इसके लिए किसी को दोष देना ठीक नहीं। पांच तरह की मिठाइयां तो गरीब से गरीब घर में बना करती और इतने प्यार से खिलाई जाती कि मेहमान मना नहीं कर पाता। शादी के घर में, टोकरियों में बूंदी के लड्डू और बालू-शाहियां, बाल्टियों में रसगुल्ले हफ्तों तक रखे मिलते। खस्ता कचोरियां भी चटनी के साथ सुबह-सुबह महीनेभर खाई जाती। शादी की महक कई दिनों तक रहती। लोग अपनी छोड़ दूसरे की शादियों की बातें बरसों याद करते। मशहूर हलवाई बाहर से बुलवाये जाते। छप्पन भोग का तो स्वाद निराला होता। और शहनाई की मधुरता में कान के साथ-साथ दिल भी आनंदित होता। जीवन मंगलमय था।
आज परिदृश्य बदल चुका है। मात्र दो दशकों में खानपान का अला-कार्ड (मीनू कार्ड) बदल चुका है। वैसे तो संस्कृतियां और सभ्यताएं तालाब की तरह कभी भी एक जगह खड़ी नहीं हो सकती। यह तो नदी के प्रवाह की तरह बहती रहती हैं। लेकिन इतना तीव्र गति से परिवर्तन होगा सोचा न था। ऐसा तो सिर्फ बाढ़ में होता है। लेकिन फिर यह तबाही लाता है। आज नूडल्स और चौवमीन हर गली के नुक्कड़ में मिल जाएगा। मैगी के पैकेट गांव-गांव में उपलब्ध हैं। बर्गर व हॉट डॉग के बिना हमारी युवाओं की पार्टियां नहीं होती। पिज्जा और पास्ता में पूरा भोजन कर लिया जाता है। इस पर कोई भी टिप्पणी करने पर हमारा युवा वर्ग बिना कुछ सोचे-समझे नाराज हो सकता है। बोलने वाले को मूर्ख और रूढ़िवादी घोषित किया जा सकता है। पुरानी पीढ़ी को अविकसित बताया जाता है। हंसी भी उड़ाई जा सकती है। ब्रेड खाने वाला हमारा युवा वर्ग परांठा खाने से अपच की शिकायत करने लगता है। जिम में वर्कआउट करने वाला कैलोरी नाप कर खाता है। इन सब के बीच चीनी व्यंजन का एक विशेष व लोकप्रिय चलन है।
आज हर बड़े होटल में चाइनीज रेस्टोरेंट अलग से अवश्य मिलेगा। चाइनीज सैफ और बेयरे की विशेषता वाली जगहों में भारी भीड़ होती है। युवाओं की भीड़ पारंपरिक होटलों की जगह यहां अधिक मिलेगी। यहां जाना आधुनिकता की निशानी बन चुका है। और देसी व्यंजन पिछड़े होने का सबूत बना दिया गया। फलस्वरूप लोग घर का भारतीय भोजन खाने से बचते है। और लोगों की जुबान पर चाइनीज खाना चढ़ चुका है तभी तो चाइनीज रेस्टोरेंट की अनगिनत श्रृंखला खुल रही है। हाथ से खाना तो हम भूल चुके थे अब अंग्रेजी चम्मच की जगह चॉपस्टिक ने ले लिया। मछली और मुर्गे के साथ-साथ पोर्क, प्रॉन्स और केकड़े का प्रचलन तेजी से बढ़ा। स्टार्टर व मैनकोर्स के साथ शराब का परोसा जाना आम हो गया। चाइनीज व्यंजन का भारत में पहुंचकर बहुत हद तक उसका भारतीयकरण हो गया। सिर्फ नूडल्स को तरह-तरह से खाने में पेश किया जाता है। इनकी संख्या भारतीय अनगिनत व्यंजन के सामने कुछ भी नहीं। मीठे के नाम पर बेकरी और आइसक्रीम के अतिरिक्त कुछ नहीं। हर्बल चाय के चक्कर में दो घूंट की चीनी-चाय के सामने मुंबई की कड़क कट चाय का मजा ही कुछ और है। फिर भी पैन फ्राइड नूडल्स, पैन फ्राइड फिश, हक्का नूडल्स, मोमोस, दो-चार सॉसेश में, का स्वाद दिलोदिमाग पर छा चुका है। बात यहां अच्छे-बुरे की नहीं है। बात सोच की है। यहां नये भोजन के स्वाद से कोई आपत्ति नहीं, तकलीफ है तो इस बात पर कि अपनी संस्कृति व खान-पान को एक दृष्टि से अनदेखा किया जाता है। पढ़ा-लिखा युवा वर्ग जब इन चाइनीज और फास्ट-फूड के शारीरिक दुष्प्रभाव को जानते हुए भी अनजान बना रहता है तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। पश्चिमी संस्कृति में डूबा भारतीय समाज अपनी पहचान के अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ता महसूस होता है। ऊपर से खान-पान का नया प्रचलन एक तरह का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर सिर्फ ताकत से ही हुकूमत नहीं करता। भाषा, रहन-सहन, भोजन इसके अन्य हथियार हैं। अंग्रेज कई वर्षों से विश्व में सिर्फ अंग्रेजी के कारण राज कर रहे हैं। और उसी संदर्भ में देखें तो चीन हमारे रसोईघर में प्रवेश कर चुका है और हमारी पत्तल की जगह चाइनीज बोल्‌ (कटोरा) ने ले लिया। यूं तो चाइनीज व्यंजन पश्चिम में पहुंचकर यूरोपियन हो चुका है। मगर उससे अधिक पश्चिम का मेकडोनेल्ड, केएफसी एवं पिज्जा-हट चीन में घुसपैठ कर चुका है। यह एक तरह का संतुलन है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि चीनी व्यंजन जिस तेजी से हमारे भोजन में घुस रहा है, क्या ऐसी ही दिलचस्पी चीन में भी भारतीय खानपान को लेकर दिखाई देती है? या नहीं?

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Jul 17 2010

फीका था फीफा का फुटबाल

Published by Singh Manoj under Weekly Article

हममें से कितनों ने स्पेन को वर्ल्ड कप 2010 का विश्व चैंपियन सोचा था? बहुत कम। यह जानते हुए भी कि वो यूरोपियन चैंपियन है, इसके चाहने वालों की संख्या दुनिया में सीमित थी। और अपने पहले ग्रुप मैच में स्विट्जरलैंड से हार जाने के बाद तो इसकी संभावना और क्षीण हो गयी थी। ठीक इसी तरह नीदरलैंड एक सामान्य टीम के रूप में मानी जाती थी और किसी ने भी उसके उपविजेता होने का नहीं सोचा था। और भी कई कारण बने जो इस साल का फुटबाल वर्ल्ड कप भारी उलट-फेर का इतिहास बनकर रह गया। यह पहली बार हुआ कि पिछले वर्ल्ड कप की दोनों फाइलन टीमें पहले राउंड में ही बाहर हो गयी थीं। विजेता इटली स्लोवाकिया के हाथों हारकर अप्रत्याशित रूप से बाहर हुई तो फ्रांस दक्षिण अफ्रीका से हारकर शर्मनाक तरीके से अगले राउंड तक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पायी। उसके बाद तो मानो फुटबाल चाहने वालों पर पहाड़ टूटने का सिलसिला चल पड़ा। पांच बार की वर्ल्ड कप विजेता ब्राजील के चाहने वालों की संख्या, हिन्दुस्तान में ही नहीं विश्व भर में, स्वाभाविक रूप में सर्वाधिक है। महान फुटबालर पेले से लेकर रोनाल्डो जैसे कई खिलाड़ियों के अद्भुत खेल का इसमें योगदान है। मगर ब्राजील का नीदरलैंड से क्वार्टर फाइनल में हारना एक आश्चर्यजनक उलट-फेर था। दुखी मन से सही मगर अधिकांश ब्राजीली फुटबाल प्रेमियों ने अपना पाला बदला और दबे पांव अर्जेंटीना के पक्ष में खड़े हो गए। अर्जेंटीना के चाहने वालों की संख्या पहले भी कम न थी और इसका कारण करिश्माई मेराडोना का होना भी था जो इस बार कोच थे। इसमें कोई शक नहीं कि अर्जेंटीना को विश्व कप के दावेदारों में से एक माना जाता था और मेराडोना के आक्रामक खेल व 1986 के वर्ल्ड कप जीतने की यादें आज भी ताजा हैं। तभी तो उनकी आत्मविश्वास से भरी बातों ने प्रशंसकों की संख्या दुगुनी कर दी थी। अर्जेंटीना और जर्मनी का क्वार्टर फाइनल अघोषित फाइनल मैच की तरह देखा गया था और जबरदस्त रोमांच की उम्मीद लगाई गई थी। मगर फुटबाल प्रेमियों को जबरदस्त निराशा हाथ लगी थी। अर्जेंटीना की हार उतनी अधिक दिल दुखाने वाली नहीं थी जितना उनके खेल का घटिया प्रदर्शन और 0-4 गोल के स्कोर ने तो कइयों का दिल तोड़ दिया था। फुटबाल प्रेमियों ने फिर भी आस नहीं छोड़ी थी और टूटे दिल से यूरोप की पारंपरिक रूप से शक्तिशाली टीम जर्मनी के खेल पर अपनी निगाहें केंद्रित की थी। फुटबाल प्रेमियों द्वारा इतनी जल्दी-जल्दी अपनी पसंदीदा टीम बदलते पहले कभी नहीं देखा गया। लेकिन जर्मनी का सेमीफाइनल में स्पेन से हार जाना एक तरह से प्रेमियों के दिल के डूब जाने के बराबर था। यहां भी एक बार फिर सशक्त जर्मनी के कमजोर खेल ने अधिक निराश किया था।
खेल में जीत-हार रोमांच पैदा करता है और फुटबाल विश्व कप में इसका लंबा इतिहास रहा है। तगड़ी टीम को किसी नये के द्वारा चैलेंज देना दर्शकों में जोश भर देता है। फुटबाल के असंख्य प्रशंसक होने के पीछे उसका खेल है न कि स्टार खिलाड़ी या टीम का नाम। और दर्शकों को स्तरीय खेल देखने को न मिले तो उसके लिए बाकी सब व्यर्थ है। इस वर्ल्ड कप में उलट-फेर से अधिक खेल की नीरसता ने अपना ध्यान आकर्षित किया। गम हारने का तो था ही, कमजोर कोशिश पर अधिक दुख हुआ। सबसे पहले तो ब्राजील और पुर्तगाल के बीच के मैच को देखकर दर्शकों को जो हताशा हुई, उसका बयान करना मुश्किल है। यूं लग रहा था मानों दोनों फ्रेंडली मैच खेल रहे हों। मैच ड्रा हुआ था। यकीनन गणित के हिसाब से दोनों ही टीम का अगले राउंड के लिए क्वालीफाई करना सुनिश्चित था इसके बावजूद अच्छे खेल का प्रदर्शन न करना खेल की भावना से न खेलने के समान था। तभी तो अगले राउंड में पुर्तगाल की हार का गुस्सा उसके प्रशंसक पचा नहीं पाये। ब्राजील भी नीदरलैंड के साथ खेलते हुए अपनी आक्रामक शैली को छोड़कर रक्षात्मक शैली में इस तरह से खेलती चली गयी कि मैच उनके हाथ से कब निकल गया पता ही नहीं चला। पता नहीं ब्राजीली कोच डूंगा का यह कथन कितना सार्थक था कि उन्होंने ऐसी रक्षात्मक टीम गठित की है जिसे हराना मुश्किल है। यहां सवाल उठता है कि क्या आप हार से बचने आए हैं या जीतने? सत्य तो यह है कि बिना आक्रमण के जीत असंभव है। शायद तभी इसी आपाधापी में ब्राजील का मिड-फिल्डर मेलो आत्मघाती गोल कर बैठा और ब्राजील की हार का कारण बना। फिलिप मेलो रातों-रात देश का विलेन बन गया। ठीक भी तो है विश्व कप के रोड मैप को देखकर ब्राजील का फाइनल तक पहुंचना सबसे आसान लगता था। ठीक इसी तरह अर्जेंटीना व जर्मनी के हारने में ऐसा कहीं भी नहीं लगा कि सशक्त टीमें खेल रही हों। यही कारण है कि लाखों-करोड़ों आम स्वतंत्र और निरपेक्ष दर्शक अच्छे खेल की तलाश में भटकते नजर आए। यूं तो जर्मनी अपने ग्रुप मैचों में सर्बिया से भी हार चुकी थी लेकिन फिर भी स्पेन से उसका हारना अधिक दुखदायी था। अर्जेंटीना को एकतरफा खेल में हराने वाली सशक्त टीम अचानक इतनी कमजोर, असहाय व मैदान में इधर से उधर भागती नजर आयी। यूं तो फुटबाल प्रेमियों की अंतिम आस स्पेन पर टिकी थी और फाइनल वर्ल्ड कप उसने उसी के सहारे देख लिया लेकिन तब तक फुटबाल का असल खेल अपनी ऊर्जा ही नहीं चमक भी खो चुका था।
विश्व की सशक्त दावेदार टीमों के घटिया प्रदर्शन के उलट पराग्वे, उरुग्वे, घाना जैसी छोटी टीमों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वहीं न्यूजीलैंड और एवरी कौस्ट ने कई लोगों को हतप्रभ किया था। सशक्त टीमों का ही नहीं स्टार खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी ढीला रहा। ब्राजील के काका जहां अपनी चोट के कारण शायद खेल न दिखा पाए हों लेकिन पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो के चेहरे से उनके फैशन की दुनिया का अहम साफ-साफ दिखाई दिया। और वह मैदान पर भी रैंप पर चलते हुए प्रतीत हुए। उनकी अपने देश में जमकर आलोचना हुई। यह दीगर बात है कि आज के युग में जहां बाजार में पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, समय अनुसार प्रशंसकों को शांत कर दिया गया हो। लेकिन प्रशंसकों के दिल में पैसों से नहीं बैठा जा सकता। क्रिस्टियानो यकीनन लोगों के दिलों से उतर चुके होंगे और हो सकता है ब्राजील के पिछले विश्व कप के सितारे रोनाल्डिन्हो की तरह, जो इस बार नदारद थे, अगले विश्व कप में दिखाई न दे। बाजार अच्छे खिलाड़ी को स्टार तो बना सकता है लेकिन खेल नहीं पैदा कर सकता। सितारे तो चमकते हैं मगर यहां उनके प्रदर्शन पर मानो ग्रहण लग गया था। क्या वजह है जो अर्जेंटीना के मैस्सी फुटबाल ग्राउंड में लिटिल मैस्सी साबित हुए और जर्मनी के क्लाज व पुडॉस्की स्पेन के सामने बॉल पकड़ने के लिए नाचते से प्रतीत हुए। और इंग्लैंड का रूनी एक गोल के लिए रोता रह गया। एक तरह से महान खिलाड़ियों द्वारा दस नंबर जर्सी पहनने की परंपरा यहां धूमिल होती प्रतीत हुई। और शीर्ष स्थान खाली देख इस वर्ष के फीफा वर्ल्ड कप का सुपर सितारा ज्योतिष पॉल आक्टोपस बन गया। जिस फुटबाल ने पेले, मेराडोना, जिदान, मैजिको, रोनाल्डो, रिवेलिनो, गडमुलर जैसे महान खिलाड़ियों को जन्म दिया वही खेल आज सामान्य सितारे के लिए भी तरसता प्रतीत हुआ। क्या वजह है जो खिलाड़ी अपना सामान्य खेल भी नहीं दिखा पाये? स्पेन ने फार्म में नहीं चल रहे अपने स्टार टॉरेस तक को बाहर बिठाकर अंत में फल पाया मगर बाकी कोच ऐसा क्यूं नहीं कर पाये? कहीं न कहीं बाजार, विज्ञापन व क्लब के प्रेशर को इससे जोड़कर देखा जा सकता है। सट्टेबाजी के तार तो अदृश्य हैं। हां, अनुशासनहीनता भी एक प्रमुख कारण बना। और बाहर के लोगों को अपने देश से खिलाने का प्रयोग अव्यवहारिक और असफल हुआ। तभी तो फ्रांस में सारा गुस्सा कोच रेमंड डोमेनेक पर फूटा। हर विश्व कप में कुछ एक खिलाड़ी को देखकर भीड़ टूट पड़ती थी और बॉल उनके पैरों के पास पहुंचते ही दर्शक उत्साह में खड़े हो जाते थे। वो जोश वो गर्मी इस बार नदारद थी तभी तो दर्शक स्पेन की टच एंड पास जैसी नयी तकनीकी में किसी तरह स्वयं को संतुष्ट करते नजर आए। स्पेन का डेविड विला बिना किसी बेहद व्यक्तिगत बेहतरीन खेल के भी सितारे की तरह उभरा और उरुग्वे का डिएगो फोरलान प्लेयर ऑफ दा टूर्नामेंट बन गया।
फुटबाल एक आक्रामक खेल है। इसमें गति, ऊर्जा, शक्ति कलात्मकता, स्टैमना का अदभुत व संतुलित मिश्रण है। हाथ छोड़ शरीर का हर अंग प्रयोग किया जा सकता है और हर हाल में अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे निकलने की होड़ में यह खेल बच्चे-बूढ़े-जवान हर एक को जोश से भर देता है और खिलाड़ी को विरोधी टीम में घुसकर फुटबाल के साथ भागता देख दर्शक पागल हो जाते हैं। इस बार आधुनिकता के नाम पर रक्षात्मक शैली एवं कई स्थानों पर रैफरी का अनावश्यक यलो एवं रेड कार्ड का बार-बार प्रदर्शन खेल की स्वाभाविक गति को खराब करता प्रतीत हुआ। यह खेल तो प्रारंभ से गिरने, चोट लगने और तुरंत खड़े होकर फिर से खेलने के लिए भागने वालों का खेल है। खेल में तो चोट आएगी लेकिन यह जबरदस्ती प्रहार करता हुआ प्रतीत नहीं होना चाहिए। मगर नकली गिरने और चोट की नौटंकी इस बार खूब चली। जिसका बेहतरीन प्रदर्शन ब्राजील और नीदरलैंड के मैच में हुआ जहां रोबेन (नीदरलैंड) ने अपने गिरने और चोट खाने की नौटंकी से ब्राजील के खिलाड़ियों को रैफरी का धौंस दिखाकर पूरी तरह रक्षात्मक बना दिया। इलेक्ट्रॉनिक युग में अब तीसरे अम्पायर और कंप्यूटर की बातें की जानी लगी हैं लेकिन यह यकीनन फुटबाल की नैसर्गिक मस्ती को समाप्त कर देगा जहां बाईस खिलाड़ियों के बीच तीन अम्पायरों को दौड़ता देख खून में गर्मी आ जाती है। कंप्यूटर युग ने चाहे जितनी उन्नति कर ली हो मगर बंद कमरे में स्क्रीन पर गाड़ी तेज चलाना वो रोमांच पैदा नहीं कर सकता जो खुले मैदान में साइकिल चलाने से ही उत्पन्न हो जाता है। इस खेल के लाखों-करोड़ों प्रशंसक फुटबाल नहीं खेलते, न ही कइयों का देश खेलता है मगर वो मैदान में खेल का मजा लेने जाते हैं, न कि शकीरा का वाका-वाका देखने-सुनने। बाजार को इस बात की सदा से गलतफहमी रही है मगर सच तो यह है कि दर्शक को यहां अर्द्धनग्न नारी के नृत्य पर थिरकते कोमल पैर नहीं फुटबाल को नचाने वाले मजबूत पैर देखने का जुनून होता है। बॉल के साथ भीड़ को चीरते हुए तेज दौड़ना इस खेल की आत्मा है न कि टच एंड पास का नया फार्मूला। जिस खेल की चमक से आकर्षित होकर राष्ट्रों के प्रमुख खिंचे चले आते हों, भय है कि बाजार का काला जादू उसके तेज को फीका न कर दे।
मनोज सिंह

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Jul 09 2010

जड़ से जुड़ने का अहसास

Published by Singh Manoj under Weekly Article

नौकरी में तबादला एक आम बात है। और इसी सामान्य प्रक्रिया के चक्कर में आकर कई शहरों में काम कर चुका हूं। यह मेरा सातवां राज्य है। आज के युग में जब स्थानांतरण को विभागीय सजा के रूप में लिया जाता है, लेखक होने के कारण यह मेरे लिये फायदे का सौदा रहा। हर पल कुछ नया देखने-जानने की चाहत से उपजी इच्छाशक्ति व मानवीय संवेदनशीलता के कारण स्थानीय तत्वों ने सदा मुझे आकर्षित किया है। लोक संस्कृति अपने मूल रूप में बेहद सरल एवं सहज के साथ-साथ विशिष्ट भी होती है। बाजार की आंधी व इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के आने के पूर्व तक, सभ्यताएं प्रकृति को साथ लेकर धीरे-धीरे विकसित होती थीं और अपने साथ संपूर्ण इतिहास को ढोती चलती थीं। तभी तो साहित्य व कला के माध्यम से संदर्भित सभ्यता के विकासक्रम को पढ़ा जा सकता है। इन्हीं सब कारणों से हर नये शहर में जाते ही स्थानीय आम जनता के साथ जुड़ने की कोशिश रहती। मैंने पाया कि ग्लोबलाइजेशन का असर अब भी सतही है और बहुत कुछ बचा हुआ है। विभिन्न शहरों के इन खूबसूरत लम्हो व रोचक अनुभवों को यादों के पन्नों में सजाकर रखा भी है। गाहे-बगाहे यह खजाना लेखन में मददगार होता रहता है। कल्पना की सृजनशीलता में बेहद उपयोगी। समय के साथ उम्र व अनुभव बढ़ता है और व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। ऐसे में आदमी कई बार अलग-अलग दृष्टि से देखने लगता है। इसमें कोई शक नहीं भारत में विविधता है। हर प्रांत का अपना रहन-सहन और खान-पान है। हर नयी जगह मैंने इनको अपनाने का प्रयास किया और स्थानीय जीवनशैली में ढल जाने की कोशिश की। इन सबका अहसास दिल से करते हुए दिमाग पर सुनहरे अक्षरों से अंकित कर रखा है।
पंजाब में पिछले कुछ वर्षों से हूं। हमेशा की तरह स्थानीय सभ्यता व लोक संस्कृति से जुड़ने का प्रयास मेरा जारी था। मगर इस बार कुछ विशेष अनुभव हुए। अपने उपन्यास ‘बंधन’ का अनुवाद पंजाबी भाषा में होने के दौरान अनुवादक ने कथा के संदर्भ को लेकर कई बार चर्चा की। और धीरे-धीरे जाने-अनजाने ही मैं इस महान भाषा एवं गुरुमुखी लिपि से जुड़ने लगा। साहित्यिक गोष्ठियों व चर्चाओं में जाने लगा। स्थानीय साहित्य को सुनकर समझने का प्रयास किया तो पहली बार अहसास हुआ कि मूल भाषा के माध्यम से किसी सभ्यता व संस्कृति को जीने का मजा ही कुछ और है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कि तालाब के किनारे बैठकर गर्मी में लोगों को नहाते देखना या फिर खुद तालाब में उतरकर ठंडे पानी में नहाने का आनंद लेना। दोनों अनुभवों में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
भाषाएं दो मनुष्य के बीच संवाद-संपर्क का काम ही नहीं करती, यह दिलों में उतरने का माध्यम भी बनती है। दिल से दिमाग को जोड़ने का प्रबंध करती हैं। यह संस्कृति की आत्मा है। सभ्यता की कल्पना-शक्ति, वैचारिक जीवन का केंद्र और बौद्धिकता का आधार। इसमें संवेदना है तभी तो जीवन है और जीने के मायने हैं। ये भावनाओं को संचालित करती है। ऊर्जा व उष्मा प्रदान करती है। युद्ध में सैनिकों को जीतने के लिए बाध्य कर सकती है तो शांति में विकास की सहायक बन जाती है। यह विचारों को न केवल नियंत्रित करती हैं बल्कि उन्हें अर्थपूर्ण बनाती हैं। विचारधाराएं भाषा पर सवार होकर ही अवाम के मन-मस्तिष्क पर राज करती है। यह रुलाती है, यह हंसाती है। जीवन को रंगों से भर देती है। साहित्य ही क्यों, कला-संस्कृति-सभ्यता भाषा के बिना बेजान हैं। संगीत में यह रस भर देती है और नृत्य की तो अपनी भाषा होती है जो अर्थ प्रदान करती है। और हमारा मन स्पंदित होकर झूम उठता है। लिपि भाषा को स्थायित्व प्रदान करती है। समय के पैमाने पर खुद को अंकित करके भाषा को सदा के लिए अमर कर जाती है।
पंजाब का क्षेत्र इतिहास से भरा हुआ है। यह कर्म भूमि है। यहां का जीवन त्याग व बलिदान की लोक-कथाओं से भरा पड़ा है। इसका स्वाद स्थानीय भाषा में भी मिलता है। यही कारण है जो पंजाबी भाषा में कमाल का उत्साह है उमंग है उल्लास है ऊर्जा है। इसे भांगड़ा नृत्य में भी देखा जा सकता है। विपुल साहित्य है। इसमें सिर्फ युद्ध के विनाश व संघर्ष की कहानियों ही नहीं हैं, यहां भी प्रेम है, पीड़ा है, विरह है। जीवन के प्रति तीव्र आग्रह है। जीने की उत्कंठा है। और साथ है मस्ती, जो आधुनिक युग के आते-आते अंतिम छोर तक जाती प्रतीत होती है। इसमें भी जीवन का आनंद है। धर्म है संत है संदेश है। गुरुवाणी और श्री गुरुग्रंथ साहिबजी हैं। यहां के लोक-साहित्य में समसामयिक संदर्भों के हिसाब से समाज की तत्कालीन परिस्थिति का चित्रण देखा जा सकता है। भौतिक विकास की चाहत है तो जालिम व्यवस्था के प्रति विद्रोह भी है। इन सबका सही-सही अनुभव सिर्फ देख-सुनकर नहीं लिया जा सकता। जब तक आप भाषा व लिपि के माध्यम से स्थानीय साहित्य व संस्कृति की आत्मा से नहीं जुड़ेंगे, संबंध सतही होंगे।
इस दौरान पंजाबी के वरिष्ठ उपन्यासकार गुरदयाल सिंहजी से विशेष स्नेह स्वरूप बहुत कुछ सीखने व समझने को मिला। मेरे उपन्यास बंधन के पंजाबी अनुवाद के लिए उनके द्वारा दो शब्द लिखा जाना मेरे लिए गर्व का विषय बन गया। विगत दिवस उपन्यास ‘बंधन’ का पंजाबी अनुवाद लोकार्पित हुआ। पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के कुलपति डॉ. जसपाल सिंह एवं भारतीय साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. सतिन्द्र सिंह नूर ने इसका लोकार्पण किया। यह कुछ विशेष अनुभव दे गया। आमतौर पर इस तरह के कार्यक्रम में आने वाले मुख्य अतिथि पुस्तक पढ़ते नहीं। अगर तो अतिथि राजनीतिज्ञ हुआ तो उनसे उम्मीद भी नहीं की जाती लेकिन वरिष्ठ साहित्यकार तो कई बार और गजब करते हैं। बिना पढ़े ही घंटों बोल जाते हैं। कई बार बेचारा लेखक सिर पीटता रह जाता है। कार्यक्रम में लेखक की हैसियत और भीड़ के मिजाज को देखकर बोला जाता है। कभी-कभी बड़ाई के इतने पुल बांध दिए जाते हैं कि अगले दिन लेखक उठने की स्थिति में भी नहीं रहता और फिर कभी नहीं लिख पाता। बहरहाल, मेरे दोनों अतिथियों की बातचीत से मुझे इस बात की तसल्ली हुई कि उन्होंने उपन्यास पढ़ा है। तभी तो दोनों विद्वानों के उद्बोधन से कई विशेष जानकारियां प्राप्त हुईं। विद्वान आलोचक किसी भी कृति के अंदर छिपी हुई भावनाओं को, उद्देश्य को, संदेश को, विचार को, विचारधारा को, किस तरह से नये ढंग से पकड़ते हैं, विश्लेषित करते हैं और फिर उसे खोलकर दुनिया के सामने प्रदर्शित कर देते हैं यह भी एक कला है। यह हर एक के बस की नहीं। डॉ. नूर के इस कथन ने मुझे प्रभावित किया था कि उपन्यास को पढ़ने के दौरान मन में यह ख्यालात आये कि कहानी के नायक ने इतनी पीड़ा को सहते-सहते आत्महत्या क्यों नहीं की? उनके मतानुसार यहां एक तरह का संदेश है। चूंकि नायक संघर्ष करता है जीवन से जूझता है, इसीलिए वह पलायनवादी नहीं है। और यह चरित्र उन युवाओं एवं मजदूर किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है जो जीवन से हारकर आत्महत्या करते हैं। डॉ. नूर के इस कथन ने कार्यक्रम में पधारे कई वरिष्ठ पंजाबी लेखकों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि लेखक का किसी विचारधारा के साथ पूरी तरह जुड़ा होना कतई जरूरी नहीं। क्योंकि इसके कारण लेखक की स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता में प्रभाव पड़ता है। इसमें कोई शक नहीं कि विचारधाराएं दिशा तो देती हैं लेकिन साथ में आपके सोचने व समझने की शक्ति को सीमित भी कर देती हैं। जीवन निरंतर है उसकी समस्याएं भी नित नवीन हैं। विचारधाराओं का सीमित ज्ञान उसे राह नहीं दिखा सकता। सबसे मुश्किल इस बात की होती है कि विचारधारा को मानने वाले उसमें कोई बदलाव नहीं होने देना चाहते। जबकि सृष्टि में सब कुछ परिवर्तनशील है। शायद यही कारण है जो विचारधाराएं समय के साथ या तो मर जाती हैं या अनुपयोगी हो जाती हैं।
डॉ. जसपाल सिंह का कथन मन को शांत करता है। यह सिख धर्म के इस संदेश से प्रभावित लगता है कि सेवा का धर्म में प्रमुख स्थान है। सेवा करने वाले को पैगम्बर का दर्जा दिया जा सकता है। यह सेवाएं देश व समाज के साथ-साथ परिवार में भी हो सकती है। जरूरतमंद, कमजोर, बूढ़े, बच्चे, रोगी आदि-आदि। ये किसी भी रूप में हो सकते हैं। आज के बिगड़ते सामाजिक हालात में, जहां व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो चुका है, वहां इस तरह की भावनाएं समाज व व्यवस्था को सकारात्मक रूप से संगठित बनाए रखने में बहुत उपयोगी साबित होंगी। यह चेतना को जाग्रत करती है। मनुष्य के अंदर पनप रहे राक्षसी प्रवृत्ति का नाश करती है।
मुझे यह जानकर थोड़ी हैरानी हो रही है कि पंजाबी साहित्य जितना अपने देश में पढ़ा जाता है उससे कहीं अधिक विदेशों में इसका आकर्षण है। पंजाबी भाषी भाई विश्वभर में फैले हुए हैं। अपने देश से बाहर जाते ही अपनी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और भाषा के प्रति विशेष प्रेम का जन्म लेना, एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस बात का अहसास मुझे हो रहा है। चूंकि अपने उपन्यास की प्रतिक्रियाएं मुझे विदेशों से भी मिलने लगी हैं।
मनोज सिंह

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Jul 03 2010

राक्षस में देवगुण

Published by Singh Manoj under Weekly Article

आदमी की खाल में भेड़िया। इसी तरह की कहावतें व मुहावरें कहने-सुनने को आम मिल जाएंगी। व्यक्ति के चेहरे मात्र से उसके गुण-अवगुण का पता नहीं चलता। चरित्र कर्म द्वारा सुनिश्चित किए जा सकते हैं और परिस्थितियां उसे प्रमाणित करती हैं। यूं तो व्यक्तित्व का कोई आधार नहीं होता मगर पारंपरिक रूप में इसे संस्कारों से जोड़ दिया जाता है। किसी को पहचानना इतना आसान नहीं लेकिन हम आदतन अच्छे और बुरे की सामान्य वर्गीकरण से प्रभावित होते हैं। राक्षस और देवताओं के परस्पर युद्ध की कहानियों से पौराणिक कथाएं भरी पड़ी हैं। आधुनिक युग के नायक-खलनायक में इनका प्रतिबिंब देखा जा सकता है। धर्मग्रंथों में भी विभिन्न चरित्र अपने-अपने रूप-रंग में उपस्थित रहे हैं। राम और कृष्ण ने पृथ्वी पर जन्म लेकर देवताओं का प्रतिनिधित्व किया तो रावण और कंस, दुर्योधन व शकुनि ने राक्षस प्रवृत्ति को प्रदर्शित किया। बुराई पर अच्छाई की जीत हर युग के हर तरह की रचनाओं में दिखाई जाती रही। लेकिन यह कितना सच है बहस का एक विषय हो सकता है। बहरहाल, असत्य पर सत्य की विजय को बताकर सामान्यजन में विश्वास बनाए रखा गया। अच्छे और बुरे के बीच में संघर्ष सदा से चलता रहा है और आगे भी चलता रहेगा। जीवन निरंतर है। वास्तविकता में धरातल पर देखने पर यह पता चलता है कि जरूरी नहीं कि हर बार धर्म की ही विजय रही हो। इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि अधर्म ने भी पूरी क्रूरता के साथ शासन किया है, अंत फिर चाहे बेशक उसका भी हुआ हो। थोड़े समय के लिए ही सही कई तानाशाह अपनी बर्बरताओं की सारी सीमाओं को तोड़कर मानव सभ्यता पर जबरन राज करते रहे। इनमें से कइयों ने देवता और ऐतिहासिक पुरुष का चोला पहनने की कोशिश की। कई इसमें सफल भी रहे तो कई समय के पैमाने पर असफल। कई बार जानते हुए भी अवाम इस हकीकत से बचता रहा कि उसका शासक देवता नहीं राक्षस है। यह इसलिए भी कि जो शक्तिशाली है उससे कमजोर हमेशा डरता है भयभीत रहता है। भय समाप्त होते ही प्रतिरोध की प्रतिक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
अच्छाई और बुराई का अंतर्द्वंद्व आदमी के अंदर भी हर वक्त, जन्म से लेकर मरण तक, निरंतर जारी रहता है। वहीं इंसान एक स्थान पर देवता तो किसी और परिस्थिति में राक्षस के रूप में कार्य करने लगता है। दोनों प्रवृत्तियां मानव में सदैव विद्यमान रहती है, जिस वक्त जिस पर जो हावी हो जाए। कई बार जो दिखाई देता है वो होता नहीं है और जो होता है वो नजर नहीं आता। कई कठोर दिल वालों को अंदर से अति मुलायम कहा जाता है। नारियल के समान व्यक्तित्व होने की संज्ञा अमूमन दी जाती रही है। व्यक्ति के गुण-अवगुण स्थितियों के द्वारा प्रेरित होते हैं व भावनाओं के द्वारा नियंत्रित। इन्हें परिस्थितिजन्य भी कहा जा सकता है। बदला लेने के लिए, महत्वाकांक्षा के लिए, द्वेषवश, क्रोधवश, ईर्ष्यावश, लालच के कारण, बहकावे में आकर, मूर्खतावश इत्यादि कुछ उदाहरण हो सकते हैं। अच्छे लोगों को भी बुरों की तरह व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है। और बुरी आत्मा कहकर अमूमन हम बच जाते हैं।
विगत सप्ताह मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ देखी। इस फिल्म को देखने जाने के पीछे कई कारण थे। निर्देशक का अपना नाम और बेहतरीन रिकार्ड, ऐश्वर्या-अभिषेक का एक साथ आना और ‘रावण’ शब्द। मणिरत्नम का पूर्व प्रदर्शन देखें तो कथानक के स्तर पर कोई लंबी-चौड़ी कहानी नहीं होती। अंजलि, बाम्बे, रोजा, दिल से इत्यादि में इसे देखा जा सकता है। किसी एक मुद्दे को विस्तारित किया जाता है। मगर मूलकथा होती विशिष्ट है। सुनने में तो आया था कि फिल्म रावण, पारंपरिक रामकथा से प्रेरित है। तीव्र लोकप्रियता हासिल करने के रूप में भी इसे लिया जाता रहा। बहरहाल, सांकेतिक रूप में ही सही बीच-बीच में कभी किसी चरित्र के नाम से तो कभी पृष्ठभूमि से इसे संदर्भित बनाने की कोशिश जरूर की गई है। वैसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। बात यहीं तक सीमित नहीं है और अच्छाई-बुराई की सामान्य परिभाषाओं से यह फिल्म आगे निकलती प्रतीत होती है। यह दीगर बात है कि कई स्थान पर भ्रम उत्पन्न होता है। कभी कथानक के कारण, कहीं डॉयलाग तो कहीं चरित्रों के चेहरों के भाव से। इन सबके बीच एक बात जो मजबूती से उभरती है वो है खूबसूरत फोटोग्राफी। ऐसा लगता है कि मानो डायरेक्टर ने पूरी फिल्म को शुरू से लेकर अंत तक पानी में भिगो दिया। चारों ओर पानी ही पानी। तालाब-नदी-झरने-समुद्र-जलप्रपात का इतना सुंदर विशाल, भव्य व अलौकिक चित्रण किसी और हिन्दी फिल्म में कम से कम मैंने नहीं देखा। बरसात की बूंदें दर्शकों के मन को चंचल कर देती हैं। और पानी की फुहारें पिक्चर हॉल के अंधेरे में बैठे असंख्य सूखे शरीर को जलमय कर देती हैं। इस फिल्म में आंखें और रूमाल की जगह पहने हुए वस्त्र के भीग जाने का अहसास होने लगे तो कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं। जंगल की हरियाली अपने पूरे प्राकृतिक सौंदर्य के साथ उपस्थित है। प्रकृति का यौवन देखने वाले को मदहोश कर सकता है। इसको देखकर पहले तो यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि इस तरह का अनछुआ प्राकृतिक जंगल क्या अब भी हिंदुस्तान में कहीं बचा है? फिर यकायक चिंता उभरती है कि आज के बाजार और पूंजीवाद की नजर न लग जाए। वे कहीं इन तक पहुंच न जाए। बेहतरीन कोणों से लिया गया खूबसूरत नजारा। पूरी फिल्म में ताजगी है। सिल्क-सिफॉन, गहनों और डिजाइनर वस्त्रों को देख-देखकर बड़े से लेकर छोटे स्क्रीन तक आंखें थक चुकी थीं। बहुत दिनों बाद भारतीय वेशभूषा अपने असली पहनावे के साथ उपस्थित थी। गरीबी थी मगर उसका भौंडा प्रदर्शन नहीं था। संघर्ष था, समर्पण नहीं। हां, संगीत पक्ष सुना हुआ-सा लगा। एआर रहमान शिखर पर तो हैं मगर नवीनता का सृजन नहीं कर पा रहे।
वर्तमान दौर को संदर्भित बनाते हुए आधुनिक युग के मानव व दानव की कहानी को फिल्म में एक नये रूप में प्रदर्शन की कोशिश की गयी है। यह दीगर बात है कि यह एक गांव-कस्बे के स्तर की बनकर रह गयी। फिर भी इसमें कई नये मुद्दे उभर कर आते हैं। आधुनिक रावण, शासन के दृष्टिकोण से, यहां समाज कहना उचित न होगा, राक्षस तो है, लेकिन यहां उसके राक्षस होने का कारण है। उसका स्पष्टीकरण फिल्म का मोड़ है। वह अपनों के बीच एक सीधा-सादा व सरल इंसान है। और अंत तक पहुंचते-पहुंचते तो उसके गुण देवताओं के समान उपस्थित होकर उसे नायक से भी ऊंचे स्थान पर उठाकर बैठा देते हैं। दूसरी ओर, पारंपरिक नायक के अंदर छिपी राक्षसी प्रवृत्ति का प्रदर्शन जाने-अनजाने में ही सही, मगर हो गया है। पुलिस बर्बरता को सामान्य व सभ्य तरीके से दिखाया गया है। जीवन की हकीकत में तो यह और अधिक वीभत्स है। यूं तो फिल्म के नायक की जीत होती है लेकिन खलनायक की हार नहीं। उलटे वह तो खलनायक के पद से उठकर दर्शकों का भावनात्मक समर्थन लेकर ऐसे गजब ढंग से विदाई लेता है कि नायक की उपस्थिति धूमिल पड़ जाती है। इन सब चक्करों में आम दर्शक भ्रमित होता है।
अभिषेक का व्यक्तित्व एक सामान्य, सरल व भले इंसान का है। फिल्म में वह नायिका को डरा नहीं पाये। सच, उनका क्रोध भी मासूमियत ओढ़कर मीठा हो जाता है। वैसे तो यह ठीक भी है। वरना उनका चरित्र अंतिम दृश्य से लय नहीं बैठा पाता और बिल्कुल नहीं पचता। इसके उलट नायक का आक्रोश अति कठोर और कहीं-कहीं राक्षसी महसूस होता है। ऐश्वर्या का सौंदर्य एक बार फिर आकर्षित करता है। उनके मेकअप पर आलोचकों की दृष्टि जरूर जाती होगी मगर सामान्य दर्शकों की निगाह में उनका सौंदर्य प्रकृति के सौंदर्य के साथ संगीतमय नृत्य करता प्रतीत होता है। ताल में पूरे वैभव के साथ। यह फिल्म कई तरह के प्रश्न पूछती है और उसका जवाब भी देती जाती है। हर इंसान में एक राक्षस बैठा हुआ है। वह अपने-अपने ढंग से काम करता है। हम उसे अमूमन छुपाते हैं। कई बार उसका स्पष्टीकरण देते हुए तर्क-वितर्क के साथ न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी करते हैं। इसमें हम माहिर हैं। जबकि सच पूछा जाए तो सामाजिक व्यवस्था में उसके सही-गलत का फैसला इस बात पर अधिक निर्भर करता है कि वो किस ओर है। शासक की ओर या शासित के साथ, गरीब या अमीर, सुविधा-संपन्न या सुविधाविहीन वर्ग, विजेता या हारा हुआ। बहरहाल, इंसान के अंदर का हैवान सक्रिय होने पर अपनी पूरी शक्ति के साथ उपस्थित होता है। हर शरीर में एक समान। बस उसके रंग-रूप बदल जाते हैं। उधर, नर-नारी के बीच का द्वंद्व, उनके बीच विश्वास-अविश्वास का खेल भी बन जाता है। फिल्म की सफलता-असफलता की बातें करना आज के बाजार में सही ढंग से मुमकिन नहीं। पता ही नहीं चलता क्या खबर है और क्या विज्ञापन। खैर, फिल्मी इतिहास में इस बात के सैकड़ों उदाहरण हैं कि कई फिल्में सिर्फ अपने अंतिम दृश्य के कारण बेहद सफल रहीं। इसमें कोई शक नहीं कि अगर यह फिल्म आज के तथाकथित भागदौड़ वाली जिंदगी में देखने के बाद याद की जाएगी तो सिर्फ इसलिए कि उसका अंतिम दृश्य दर्शकों को झकझोर देता है।
मनोज सिंह

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