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Archive for June, 2010

Jun 26 2010

चिंता और चिंतन

Published by Singh Manoj under Weekly Article

शब्दों में समरूपता क्या उनके अर्थों को भी नजदीक लाती है? मनुष्यों में यह दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जुड़वां बच्चों के व्यवहार में कई बार बहुत हद तक समानता होती है। मूल स्वभाव व गुण एक समान नहीं हों तो भी, एक तरह के होने की संभावना अधिक है। मानव की रची गयी भाषा में भी इसके अंश देखे जाने चाहिए। चिंता और चिंतन देखने में एक-दूसरे के काफी करीब लगते हैं। क्या इनके शब्दार्थ भी आपस में उतने ही समीप हैं? प्रथम द्रष्टया तो ऐसा लगता नहीं। दोनों अपनी-अपनी राह पर बढ़ते दिखाई देते हैं। मगर व्यवहारिकता से निकलकर थोड़ी-सी गहराई में उतरते ही पाएंगे कि चिंतन में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में चिंता अवश्य होती है। और वहीं चिंता में चिंतन का अंश विद्यमान होता है। यह दीगर बात है कि चिंता से चतुराई कम होती है तो चिंतन से ज्ञान में वृद्धि होती है।
चिंता, अर्थात किसी मुद्दे, संदर्भ या बात को लेकर परेशान होना। किसी होने वाले संभावित परिणाम के लिए चिंतित होना। यहां ‘चाहा या अनचाहा’ दोनों ही संभावना हो सकती है। अपेक्षित परिणाम के न होने की चिंता सताती है तो अनचाहे परिणाम के हो जाने की चिंता डराती है। हम जो चाहते हैं उसके उलट को सोच-सोच कर दिमाग खराब कर लेते हैं। इस अवस्था में एक प्रकार के डर का समावेश होता है। संदर्भित चिंतित व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुरूप व अनुकूल कार्य न होने की आशंका होती है। कई बार काल्पनिक रूप से प्रतिकूल परिणाम व अनिष्ट को सोचकर ही उद्वेलित हो जाना स्वाभाविक लगता होगा मगर यही आगे जाकर मानसिक विकार पैदा करता है। छोटी-छोटी बातों में चिंता करते ही चेहरे पर परेशानी का तेजी से उभरना अस्वस्थ मन-मस्तिष्क के प्रारंभिक लक्षण हो सकते हैं। सामान्यतः जो कुछ आपके पास है उसके छूट जाने, गुम जाने, कम हो जाने, बिछड़ जाने, बिगड़ जाने का भय या कुछ मनचाहा प्राप्त होने की चाहत, जो आपके मन में एक अभिलाषा है, उसके पूरी न हो पाने का डर, विभिन्न चिंताओं का कारण बन जाते हैं। इसे कहीं न कहीं चिंता करने वाले व्यक्ति के कमजोर आत्मविश्वास से भी जोड़कर देखा जा सकता है।
छात्रों में परीक्षा परिणाम की चिंता, युवाओं में नौकरी की चिंता, फिर परिवार की चिंता, बच्चों की चिंता, सेहत की चिंता, भविष्य की चिंता, ऐसे न जाने कितने ही व्यक्तिगत अनगिनत चिंताओं को सूचीबद्ध किया जा सकता है। यूं समझ लो कि एक आम आदमी का संपूर्ण जीवन चिंताओं में ही गुजर जाता है। लड़की पैदा हुई नहीं कि उसके दहेज की चिंता। लड़का न हो तो उसकी चिंता, हो जाए तो उसके आत्मनिर्भर होने की चिंता। आम नौकरी-पेशा घरों में, महीने के प्रथम सप्ताह में, वेतन प्राप्त होते ही चिंताओं का सिलसिला चालू हो जाता है। बच्चों की फीस से लेकर घर के आटे-दाल, मकान, बिजली, गैस, टेलीफोन के बिल की चिंता। यह तो सामान्य चिंताए हुई। और इन्हें देखकर लगता है कि ये आम चिंताएं आम आदमी को ही होती होंगी। जबकि ऐसा है नहीं। शायद बड़े होने पर चिंताए भी बड़ी हो जाती हैं। यहां जान-माल की सुरक्षा चिंता का प्रमुख कारण बन जाता है। वरना सेठ-साहूकारों को तिजोरी में से नकदी व सोने-चांदी के चोरी हो जाने की चिंता सदियों से सताती है तो बड़े-बड़े व्यापारियों को माल बिकने की चिंता और उद्योगपतियों को शेयर बाजार की चिंता आजकल आम देखी जा सकती है। अगर सब कुछ सुरक्षित और व्यवस्थित है तो अपने व्यवसायिक साम्राज्य को बढ़ाने की चिंता। और अगर यह भी कारण नहीं बन पा रहा हो तो अपने प्रतिद्वंद्वी के तेजी से बढ़ने की चिंता। लोकप्रिय लोगों की चिंताएं तो और गजब होती हैं। फिल्मों के हीरो-हीरोइनों व निर्देशकों/निर्माता को दर्जनों सफल फिल्में देने के बाद भी, नई फिल्म के रिलीज होने पर चिंता करते देखा जा सकता है। हर फिल्म के हिट होने की चिंता। नायक अपने शरीर सौष्ठव की चिंता में दुबला जाता है तो नायिका मोटे होने की चिंता में कुम्हलाती रहती हैं। नेता को चुनाव जीतने की चिंता, फिर पद की चिंता, कुर्सी मिल जाने पर प्रमुख मंत्रालय की चिंता और अगर सब कुछ ईश्वर की दया से सही है तो बच्चों को अपनी जगह कुर्सी पर बिठाने की चिंता। बात अगली पीढ़ी तक ही सीमित नहीं रह जाती है, पोता-पोती की चिंता भी बुढ़ापे में शुरू हो जाती है। ये चिंताएं आदमी के साथ अंतिम समय तक साथ रहती हैं। औरतों की चिंताओं का तो जवाब ही नहीं, अधिकांश अपनी खूबसूरती की चिंताओं में घिरी रहती हैं। और कई बार तो इतनी चिंतित हो जाती हैं कि वही उनकी नैसर्गिक खूबसूरती को कम करने का कारण भी बन जाती है। आम गृहिणी के लिए रसोई, सफाई और बच्चे चिंता के केंद्र में होते हैं तो लोकप्रिय व्यक्तियों की पत्नियां अपने पति की महिला मित्रों को लेकर चिंतित रहती है। औरतों में चिंता अधिक होती हो ऐसा भी कुछ नहीं। बस इन चिंताओं का रूप-स्वरूप विस्तारित और बदलता रहता है।
चिंता क्या आधुनिकता की देन है? सीधे-सीधे तो नहीं, मगर यह जरूर कहा जा सकता है कि पहले चिंताओं की तीव्रता और पैदा करने वाले कारण कम हुआ करते थे। आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने इन्हें बढ़ा दिया है। वो भी इतना कि बच्चे के होश संभालते ही उसकी चिंताएं प्रारंभ हो जाती हैं। अपेक्षा, चाहत, महत्वकांक्षा पालने का शौक है तो चिंता मुफ्त में मिलती है।
ये चिंताएं व्यक्तिगत हैं। आदमी की निजी सुख-सुविधाओं, स्वास्थ्य, व्यवस्था, उन्नति, जीत, शक्ति व वैभव से संबंधित। कुछ न कुछ कहीं न कहीं यह ÷मैं’ को केंद्र बनाकर उसके चारों ओर घूमती रहती हैं। ‘मैं’ से निकलकर बहुत हुआ तो ‘मेरे’, इन दोनों शब्दों की परिधि के अंदर ही भटकती रहती है। यही घेरा, जब ‘मैं’ और ‘मेरे’ के केंद्र को झुठलाकर स्वार्थी परिवार की मजबूत घर की दीवारों को तोड़कर बाहर निकलता है और मोहल्ले-शहर और समाज की ओर बढ़ जाता है, तो अपने बृहद आकार में यही चिंता कहीं न कहीं चिंतन का रूप लेने लगती है। समाज की चिंता, देश की चिंता, विश्व की चिंता। जब चिंताएं निस्वार्थ भाव से इंसान की सोच प्रक्रिया में शामिल हो जाती है तो वहीं से चिंतन प्रारंभ होता है।
मैं से निकलकर सर्वज्ञ सर्वत्र विद्यमान होने की, चारों ओर फैल जाने की क्रिया, अंदर से बाहर निकल जाने की प्रक्रिया, चिंता से चिंतन का सफर है। साहित्य संपूर्ण समाज को सकारात्मक दृष्टि से देखते हुए, उसके बेहतरी की चिंता करता है, तभी उसमें चिंतन होता है। एक दार्शनिक, व्यक्तिगत जीवन में भी, समस्त मानव जाति को व्यापक दृष्टि में समेटकर, उसके मूल तथ्य की जब चिंता करने लग पड़ता है तो वो चिंतन हो जाता है। समाज की असमानता से चिंतित समाजशास्त्री कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे गरीब और दुखियारों का दुःख समाप्त हो। उनके वक्तव्य, कार्य, उनकी सोच, उनकी बातें जिसके केंद्र में दबे-कुचलों की चिंताएं होती हैं, सामाजिक चिंतन में डूबी विचारधाराएं बन जाती हैं। और इसे ही आगे चलकर राज्य की नीति में परिवर्तित व संदर्भित होते ही राजनैतिक चिंतन के रूप में देखा जा सकता है। इनके सुव्यवस्थित व परिभाषित होकर अकादमिक होते ही शास्त्र बन जाते हैं। यही कालांतर में अलंकृत रूप धारण कर लेते हैं। इसी तरह शनैः शनैः एक नये वाद व संबंधित तंत्र का विकास होता है। शासन व्यवस्थाओं का स्वरूप प्रभावित होता है। ये हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं। सफल होते ही इनका राज्याभिषेक हो जाता है। ये विचारधाराएं ही, विषम परिस्थितियों में आगे चलकर कई बार क्रांति और विद्रोह का कारण बन जाती हैं। इनकी जड़ों में होता है वो चिंतन, जिसके बीज सोचने वाले की चिंताओं से उत्पन्न हुए थे। यही बीज बड़ा होकर वटवृक्ष बन जाता है। इतिहास गवाह है, क्रांतियां सबूत हैं, किसी भी राजनीतिक विचारधारा का विश्लेषण करें तो पाएंगे, समाज की किसी न किसी छोटी-बड़ी मगर जटिल परेशानियों को लेकर उत्पन्न हुए चिंता से ही चिंतन का मूल रूप से जन्म हुआ था। जिसने अपनी कोख में क्रांति का जनन होने से पूर्व लंबे समय तक चिंतन किया होगा। ऐसा ही कुछ व्यक्ति की बाह्‌य अदृश्य व आत्मिक चिंताओं को दूर करने के लिए धार्मिक चिंतन की उत्पति होती है। धार्मिक उपदेशों व कथाओं के माध्यम से उसकी परलौकिक चिंताओं को शांत करने की कोशिश की जाती है। धर्म के द्वार पर आया व्यक्ति चिंताग्रस्त है तो धर्म के पास चिंतन है। चिंतन में नवीनता से नये धर्म की उत्पति होती है। चिंता से चिंतन का जन्म होता है तो चिंतन चिंता के नाश का कारण बनता है। चिंता से मनुष्य का सर्वनाश सुनिश्चित है तो चिंतन से समाज का कल्याण होता है। चिंता चिता में जलती है, चिंतन चेतना को जाग्रत करता है।
व्यक्ति के द्वारा चिंता करना एक स्वाभाविक गुण है। शायद हमारी इतनी अधिक चिंताएं भी हमें अन्य आम जानवरों से अलग करती है। जानवर अमूमन शरीरिक भूख के समय ही मानसिक रूप से क्रियाशील होते हैं। उनके लिए अस्तित्व की सुरक्षा ही चिंता का एकमात्र व प्रमुख कारण दिखाई देता है। अपने किसी और के लिए चिंता करना, सिर्फ मनुष्य का स्वभाव लगता है। मादा जानवर में अपने नवजात शिशु के लिए चिंता के कुछ अंश देखे जा सकते हैं। किसी और प्राणी में यह न के बराबर पाया जाता है। हम, मानव इस मामले में सबसे भिन्न हैं। और शायद यही प्रमुख कारण है जो पृथ्वी पर श्रेष्ठ कहे जाने के अधिकारी हैं। सच तो यह है कि हमारी चिंताओं को चिंतन में परिवर्तित करके ही हम सच्चे अर्थों में मनुष्य होने का गौरव हासिल कर सकते हैं।
मनोज सिंह

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Jun 19 2010

कुत्ते पालने के फायदे

Published by Singh Manoj under Weekly Article

क्या आपने अपने घर में कुत्ता पाल रखा है? अगर इस प्रश्न का उत्तर ÷नहीं’ में है तो यह लेख पढ़ा जा सकता है। मैं आज कुत्ते पालने के पक्ष में कुछ फायदे गिनाने की कोशिश करूंगा। जिनके घरों में पहले से ही कुत्ते पले हुए हैं वो ये पढ़कर शायद मेरे पक्ष में हो जाएं। बहरहाल, इस लेख को सिर्फ दो वाक्य में खत्म करना हो तो कहा जा सकता है कि कुत्तों के पालते ही सुबह की सैर मजबूरी बन जाती है और घर की सुरक्षा मुफ्त में हो जाती है। पशु-पक्षियों में सबसे पुराना इंसान का साथी कुत्ता ही है लेकिन फिर भी हमारे विश्व मानवीय समाज में अवांछित शब्दों की सूची बनाई जाए तो उसमें एक ‘कुत्ता’ अवश्य होगा। दूसरी तरफ आज भी घरों में पाले जाने वाले जानवरों की वांछित सूची में यह शीर्ष पर है। अजीब भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। कुत्ते में कमी है या हमारी सोच में? यह मुश्किल सवाल है। इसे भारी विडंबना कहकर बच सकते हैं। लेकिन फिर कुत्ते पर इतनी आसानी से लेख समाप्त नहीं किया जा सकता।
एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सक ने एक रूखे व तलाक के कगार पर पहुंच चुके दंपति को कुत्ते पालने की सलाह दी थी। दोनों इंसान के बच्चे को गोद लेने को तैयार नहीं होते। डाक्टर की ऐसी सोच थी कि कुत्ते के पिल्ले से उनके बीच में प्रेम जागेगा, दोनों आधुनिक नारी-पुरुष में सेवा-भाव भी उत्पन्न हो सकता है। डाक्टर के मतानुसार ये नन्हा-सा जीव दोनों को नजदीक लाएगा और अंत में वे अपना बच्चा पैदा करने में उत्सुक हो सकते हैं। और यह सच साबित हुआ। कुछ ही दिनों में दोनों हाई प्रोफाइल पति-पत्नी को अपने छोटे से पप्पी (कुत्ते के बच्चे) से प्रेम हो गया और वे उसकी देखभाल के लिए अकसर घर जल्दी आने लगे। उसकी सेवा, ख्याल और फिर उसके साथ खेलने के चक्कर में रहते। उसके लिए विशेष खाना लाया जाता और फिर साथ-साथ या फिर एक बनाता दूसरा खिलाता, समय-समय पर नहलाना, साफ-सफाई करना और फिर तबीयत खराब होने पर डाक्टर के पास ले जाना। न जाने, ऐसा करते-करते कब उनके बीच में प्र्रेम का बीज अंकुरित हो गया, पता ही नहीं चला। बड़ी अजीब कहानी लगती है, मगर नयेपन की खोज में पागल हॉलीवुड में इस पर फिल्म भी बनी और बॉलीवुड ने भी अपने तरह की कुत्ते-प्रेम पर कई फिल्म बनाई। अर्थात संक्षिप्त में फिल्म वालों को भी एक विषय मिल गया। तो दूसरी ओर इन फिल्मों को देखकर कुत्ते पालने वालों को गर्व करने का एक और मौका। अपने कुत्ते के बारे में बड़ाई करने और पड़ोसियों पर प्रभुत्व जमाने का सुनहरा अवसर।
शूगर के मरीज को सुबह-शाम की जबरन सैर करने के लिए अपने घर में एक कुत्ता पाल लेना चाहिए। मजबूरन आपको पैदल निकलना ही पड़ेगा और आप स्वस्थ होंगे। शूगर ही क्यों, आज की अधिकांश बीमारियां, व्यायाम न करने और चर्बीयुक्त भोजन व देर रात जागने के कारण होती है। ऐसे में कुत्तों के कारण सुबह उठना और सुबह उठने के लिए रात जल्दी सोना, शराब और नाइट पार्टियां अपने आप कम हो जाएंगी। यही नहीं, आज के अहम्‌ की दुनिया में जहां इंसान अपने साथी की बातों व व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर सकता वहां यह कुत्ता आपके अकेलेपन का साथी हो सकता है। कुछ कहेगा नहीं सिर्फ दुम हिलाएगा। बड़ी-बड़ी नायिका-खलनायिकाओं के कुत्ते प्रेम को कई रूप में कई तरह से सुना गया है, देखा गया है, पढ़ा गया है। कई सारी कहानिया-किस्से हैं। और यह सच है कि कुछ खुशकिस्मत कुत्ते नरम-नरम लेकिन गर्माहट से भरे हुए रेशमी पलंगों पर सुंदर नायिकाओं व स्मार्ट नायकों के पास ही सोते हैं। यह अपने दुश्मन को नीचा दिखाने के लिए भी काम में आ सकता है। एक नायक के बारे में सुना है कि उसने अपने प्रतिद्वंद्वी हीरो को जलील करने के लिए अपने कुत्ते का नाम उक्त हीरो से मिलता-जुलता रख डाला। और इस तरह से उसकी भड़ास निकलती। कुत्ते पालने का यह अद्भुत फायदा है। सुना तो यह भी है कि पुराने जमाने के रोबीले अदाकार राजकुमार कुत्ते प्रेम के लिए बहुत मशहूर थे। और वे आने वाले अपने हर मेहमान का स्वागत अपने प्यारे कुत्ते के ऊपर कुछ डायलाग मारकर किया करते थे। हो सकता है उनकी इतनी जबरदस्त डायलॉग डिलीवरी इसी आदत के कारण चमकी हो।
छोटे कुत्तों की किस्मत यहां ज्यादा अच्छी होती है जो घरों में घुसकर कमरों में तांक-झांक भी कर लेते हैं। ये ढेले भर का काम भी नहीं करते। और हमेशा घर में किसी एक सदस्य के पीछे-पीछे चलते-फिरते पाये जाएंगे। ये पक्के स्वामी-भक्त होते हैं। उन्हें पता होता है कि घर का कौनसा सदस्य महत्वपूर्ण है। किसकी आज्ञा का पालन करने पर फायदा होगा। और यह उसके अनुयायी बन जाते हैं। अधिकतर घरों में महिलाओं का वर्चस्व होता है। वो अमूमन दिनभर घर में रहती हैं। रसोईघर में भी उनका पूरा नियंत्रण होता है। और यह अक्सर उनके पीछे-पीछे घूमते देखे जा सकते हैं। यहां तक कि किसी मेहमान के आने पर ड्राइंग-रूम में भी मालकिन के पैरों के नजदीक अधिकारपूर्वक बैठ जाते हैं। ऐसे में घर के मालिक की परिस्थिति को देखा व समझा जा सकता है। घर की लड़की अगर जवान उम्र की है तो प्रेमी के लिए यह खलनायक तक बन जाते हैं। प्रेमिका के नजदीक जाने से रोकने की सबसे बड़ी दीवार। अकसर छोटे किस्म के कुत्ते तो गोद में सो जाते हैं, ऐसे में प्रेमी अपना सिर कहां रखेगा? ये तो फायदा नहीं नुकसान का उदाहरण दिखाई देता है? नहीं? बहरहाल, एक कन्या के पिता के लिए तो यह एक आखिरी सहारे की बात हुई! इस कहानी को आज के विज्ञापन जगत में उपयोग किया जा सकता है और कोई भी माल बेचने का स्क्रिप्ट तैयार किया जा सकता है। खैर, एक बच्चे वाले घरों में इन कुत्तों के होने से बच्चों में साथी के साथ सुख-दुःख व समय बांटने के ये माध्यम बन जाते हैं। और इसी बहाने बच्चों में बौद्धिक और सामाजिक विकास होता है और वो अकेलेपन से बच जाते हैं।
कुत्ते पालने का शौक गरीब और अमीर में बराबर से पाया जा सकता है। इसमें किसी और तरह का वर्गीकरण संभव नहीं है। प्रेम, सुरक्षा और अपनापन दोनों ही वर्गों के कुत्ते अपने-अपने मालिक को भरपूर देते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि गरीब का कुत्ता सूखी रोटी पर पलता है जबकि अमीर का कुत्ता बिस्कुट-दूध और गोश्त पर जिंदा होता है। हां, गरीब का कुत्ता मोहल्ले के लिए सामूहिक हो जाता है और ये सबके साथ में मिल-बैठकर जीना रहना सीख जाते हैं। जबकि अमीर का कुत्ता अकेले रहते-रहते अकेलेपन का आदी हो जाता है। इसी कारण से कई बार यह बिगड़ैल और गुस्सैल भी हो जाते हैं और बड़ी-बड़ी कोठियों में आने वाले हर इंसान को नोचने के लिए तैयार रहते हैं। यह एक जंगली जानवर की हद तक बददिमाग बन जाते हैं। वैसे अमूमन अमीर मालिक इसे अपने कुत्ते की गुणवत्ता समझता है। तभी तो ज्यादा खूंखार होकर भौंकने पर डांटने की जगह उसे प्रेम करता है। किसी गरीब आगंतुक को काट ले तो उसे दुलारता है, पुचकारता है। यह सब देख कुत्ता और बिगड़ जाता है रईसजादे की किसी बिगड़ी औलाद की तरह। और फिर जिसे देखकर अच्छे-अच्छे बचने की कोशिश करते हैं। कुछ तथाकथित जागरूक मालिक, कानून से बचने के लिए कम अपने अहम्‌ प्रदर्शन में ÷कुत्तों से सावधान’ का बोर्ड लगाना नहीं भूलते। मगर इसमें आने वाले मेहमान को सावधान करने की कम डराने की भावना का प्रदर्शन अधिक होता है। ऐसा नहीं कि गरीब के कुत्तों में वफादारी नहीं होती, क्वालिटी नहीं होती। कई बार देसी कुत्ते भी बेहद खूबसूरत और आकर्षक लगते हैं। रईस के कुत्ते भी इन्हें देखकर पास जाने की कोशिश करते हैं। इनके बीच कोई भेदभाव नहीं होता और वे प्रेम के लिए किसी दीवार को नहीं मानते। मनुष्य के बीच उत्पन्न होने वाले प्रेम के दुश्मनों को इन दृश्यों को दिखाया जाना चाहिए। कुत्ते पालने के ढंग से समाज की आर्थिक अवस्था का अध्ययन भी किया जा सकता है। कौन कितना रईस है? पता लगाया जा सकता है। अत्यधिक रईस, अमूमन अपने वैभव का प्रदर्शन इनके माध्यम से भी करते हैं। किस घर का कुत्ता कितने महंगे साबुन-शेम्पू से नहाता है, कितनी बार डॉग पार्लर में जाता है, उनके कपड़े और कंबल-रजाई से उनके मालिक की हैसियत का पता चलता है। चाहे तो इनकम टैक्स वाले इस प्रदर्शन का सदुपयोग कर सकते हैं।
एक वरिष्ठ नौकरशाह दोस्त के पास शायद डेढ़ दर्जन कुत्ते हैं। मेरी उनसे मित्रता साहित्य लेखन के कारण हुई थी। लेकिन अब ये उनके कुत्ते-प्रेम को देखकर बढ़ गई है। हरेक कुत्ते के लिए उनकी आलीशान कोठी में अलग-अलग, उनके रहने-खाने-सोने का स्थान, उनके आकार, उनकी फितरत, उनके गुणों-अवगुणों को देखते हुए बनायी गई है। छोटे व मासूम कुत्ते घरों के अंदर पनाह लेते हैं। जबकि खूंखारों को अलग-अलग रखा जाता है। यह सब अलग-अलग नस्ल के हैं। इनकी देखभाल करना अपने आप में एक पूरा काम है। एक दिन वार्तालाप में पता चला कि एक कुत्ते को एक आंख से दिखना बिल्कुल बंद हो गया था। वेटरिनेरी डाक्टर ने हाथ खड़े कर दिये थे। कुत्ता दिनभर इधर-उधर दीवार से टकराता और पागल हो रहा था। हारकर उन्होंने अपने एक नेत्र चिकित्सक दोस्त की मदद से व्यक्तिगत तौर पर उसकी आंखों का आपरेशन करवाया और वेटरनरी डाक्टर की मदद से स्थानीय स्तर पर एक लेंस फिट करवा दिया। आज वह कुत्ता देख सकता है। घर की मैडम को उस कुत्ते से सर्वाधिक प्यार है बाकी सभी सुंदर और सुडौल दिखने वाले कुत्तों से अधिक। ऐसा संवेदनशीलता मैंने अमूमन उनमें पूर्व में नहीं देखी थी। घर के बुजुर्गों से लेकर नौकरों के लिए भी नहीं। बहरहाल, आईएएस-आईपीएस से भरी उस कॉलोनी में इन्हीं कुत्तों के कारण उनकी विशिष्ट पहचान है। ‘कुत्ते वाले साहब’ पूछने पर, कोई भी उनके घर का पता बता देगा। पैसा, ताकत, शोहरत होने के बावजूद किसी खास पहचान के लिए परेशान आज की दुनिया में क्या ये कम फायदे का सौदा है?
मनोज सिंह

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Jun 12 2010

क्या हम सच सुनना पसंद करते हैं?

Published by Singh Manoj under Weekly Article

करेला गुणकारी है मगर खाने में अमूमन पसंद नहीं किया जाता। क्यूं? कड़वापन जिह्ना को भी स्वादपूर्ण नहीं लगता। इसी चक्कर में रोगी की दवाई को भी मीठी या स्वाद में ढालने की कोशिश की जाती है। अर्थात कड़वी दवाई, जीवनदायनी होते हुए भी हमें पसंद नहीं। खाने-पीने की तरह हमें कड़वा सच भी पसंद नहीं। इसे स्वीकार करना तो दूर हम सुनना व समझना भी नहीं चाहते। हम इसका स्वाद नहीं ले पाते। अब क्या करें, कड़वाहट में नमक-मिर्च भी तो नहीं होता। इसलिए इसका मजा नहीं आता। जबकि झूठ मसालेदार व चटपटा होने से हमेशा पसंद किया जाता है। यह भी कड़वा व नंगा सच है कि हम झूठ को जल्दी स्वीकार करते हैं। झूठ में जीना चाहते हैं। सच हमें बर्दाश्त नहीं हो पाता। सच को जानकर हम आगे-पीछे होने लगते हैं। सच को सुनकर मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं। मुद्दे की बात यह है कि सच के साथ जी नहीं पाते।
मीडिया विगत कुछ दशकों में बेहद शक्तिशाली हुआ है। इसमें कोई शक नहीं। अब तो बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ और पैसे वाले भी इससे डरते और बचते हैं। ये रातों-रात नायक को खलनायक और बदमाश को हीरो बना सकता है। गुमनामी के अंधेरे में जी रहे साधारण इंसान को पलभर में घर-घर पहुंचा सकता है। आम को खास बनाकर उसका जीवन बदल सकता है। जाने-अनजाने ही सही अब तो माननीय न्यायालय भी इनकी बातों का नोटिस लेते प्रतीत होते हैं। प्रमाणित तो नहीं किया जा सकता मगर शत प्रतिशत सच है कि यह आदमी की सोच प्रक्रिया में दखल डालता है। जो दिखता है वो बिकता है, यही सिद्धांत यहां भी लगता है। अर्थात एक ही बात को बार-बार बोलने पर झूठ भी सच साबित हो जाता है। इसके द्वारा किसी के चरित्र पर शंका करते ही दर्शक उसे चरित्रहीन समझने लगते हैं और किसी का गुणगान करते ही आसमान पर बैठा देते हैं। लोकप्रिय सरकारें चुनाव हार जाती हैं और हारा हुआ चुनाव जीता जा सकता है। यही नहीं किसी व्यवसायी को रातोंरात मिट्टी में मिलाया जा सकता है। दूसरी ओर, किसी उत्पादक को कौतूहलता के द्वारा बाजार में बिकवाया जा सकता है। बेकार-बर्बाद बिना सिर-पैर की फिल्म को भी सुपरहिट घोषित करके दर्शकों को सिनेमाघर तक पहुंचाया जा सकता है। इसके कैमरे का कमाल है कि छोटे और मोटे लड़के भी गठीले और आकर्षक लगने लगते हैं और हर दूसरे घर में पाये जाने वाली आम कन्या से भी साधारण रूप-रंग वाली किसी युवती को स्वप्नपरी बनाकर नंबर वन की हीरोइन बनाया जा सकता है। फिर चाहे उसे एक्टिंग का क ख भी न आता हो।
अब मीडिया खबरों के लिए समाज के नायकों का पीछा नहीं करता, खुद अपने नायक पैदा करता है। और फिर मनचाहे खबर की रचना करता है। घटनाओं को अपने ढंग से देखता है। इसे वही सुनना पसंद है जो यह चाहता है। और फिर ये वही बोलता है जो सुना जाता है। अब चूंकि सच सुनने का रिवाज नहीं तो यहां झूठ कई मुलम्मे चढ़ाकर पेश किया जाता है। मीडिया को हर वक्त एक नयी खबर चाहिए। न मिले तो बना ली जाती है। यह हमेशा जल्दी में रहता है। चूंकि इसे हर पल नवीनता चाहिए। इसे गहराई नहीं फैलाव चाहिए। इसके लिए यह लोगों के रसोई घर से लेकर बेडरूम तक प्रवेश कर चुका है और खोजी पत्रकारिता के नाम पर तो शौचालय में भी घुसने को तैयार रहता है।
इतने शक्तिशाली होने के कारण ही बड़े से बड़ा नेता-अभिनेता इनके साथ बनाकर चलते हैं। व्यवसायी इन पर पैसा खर्च करते हैं। सुना और देखा गया है कि चोट खाये प्रभावशाली व्यक्तियों ने मीडिया व्यवसाय के अंदर भी इसी कारण से प्रवेश किया। अब तो हर तरह के लोग इस क्षेत्र में घुस आये हैं। पत्रकार-रिपोर्टर-संपादक को छोड़िए, अब तो पूरे समाचारपत्र ही क्यों चैनल तक को खरीदे जाने की खबर छन-छनकर आने लगी है। हफ्तावसूली की बात करना बचकानी हरकत होगी, अब इसका रूप-स्वरूप व जंजाल विकृत व विकराल रूप धारण कर चुका है। एक तरफ मीडिया का आकर्षण पागलपन की हद तक है तो दूसरी तरफ अंदरखाते इसका आतंक चारों ओर फैल गया है। शरीफ आदमी तो हर किसी से डरता है मगर गुंडे-बदमाश पुलिस से कम मीडिया से अधिक डरने लगे हैं। और इसी चक्कर में सफेदपोश बन चुके हैं। कुछ लोग जो इसकी चपेट में आकर इसका स्वाद चख चुके हैं कई बार इसके द्वारा की जाने वाली चर्चा को मीडिया ट्रायल नाम देने लगे हैं। इसकी एकतरफा होने की बातें अब आम हो चुकी है। विडंबना है कि मीडिया जितना प्रभावशाली हुआ है उतनी ही अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। सच है कि बदनामी का थर्मामीटर मई-जून की गर्मी की तरह रिकार्ड तोड़ रहा है।
जहां गुड़ होगा वहां चींटी पहुंचेगी ही। कहावतें गलत नहीं होंती। चूंकि ये जमीन और जीवन से बनती हैं। सच है, सत्ता आदमी को अंधा बना देती है और ताकतवर अमूमन बेरहम हो जाता है। संपूर्ण शक्ति के साथ जिम्मेदारी न हो तो यह अराजक भी हो सकती है। जीवन के इन मूल सिद्धांतों से मीडिया के सशक्त होने की प्रक्रिया कैसे बच सकती थी? हम यह क्यूं नहीं मानते कि अच्छे और बुरे समाज में हैं तो मीडिया में भी होंगे? व्यवसाय हमारे खून में आ चुका है और लाभ कमाना लक्ष्य तो मीडिया इससे कैसे बचेगा? सवाल उठता है कि जब हर व्यक्ति स्वार्थी हो चुका है तो मीडियामैन कैसे बच सकते हैं? हर दूसरा आदमी महत्वाकांक्षी है तो मीडिया का आदमी क्यों नहीं बन सकता? सब अपना घर भरने में लगे हुए हैं तो मीडिया का क्षेत्र कैसे छूट सकता है? चारों ओर अव्यवस्था का आलम है तो मीडिया के क्षेत्र में उसका असर कैसे नहीं होगा? फास्ट-फूड का जमाना है तो मीडिया पैसेंजर की चाल से कैसे चल सकता है? षड्यंत्र आजकल हर जगह हो रहा है तो यहां अपना प्रभाव क्यों नहीं दिखाएगा? और अंत में, जब हम झूठ सुनना पसंद करते हैं तो फिर मीडिया झूठ क्यों नहीं बोलेगा? इन सभी संदर्भों का एक ही स्पष्टीकरण है कि आखिरकार मीडिया भी तो समाज से ही है।
असल में मीडिया पब्लिक ओपिनियम और भीड़ की नब्ज जानता है। वो कोई साधु-महात्मा नहीं। आज जब धर्म के रखवाले और आध्यात्मिक बाबा भी शंका के घेरे में आने लगे हैं तो मीडिया से दूध का धुला होने की उम्मीद क्यों की जाती है? उससे सदैव अच्छे बने रहने की अपेक्षा ही क्यों की जाती है? वो भी किस अधिकार से? समाज की सभी आदर्श संस्थाएं रोगग्रस्त हो चली हैं तो सिर्फ मीडिया से स्वस्थ रहने की बातें करना अटपटी लगती हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता और दर्शनशास्त्र सिर्फ उन पर ही क्यों? वो भी बाजार में आखिरकार अपने किसी उद्देश्य से आया है। मीडिया तो वही दिखाता-बताता है जो वो जानता है कि देखा जाएगा, सुना जाएगा, पढ़ा जाएगा अर्थात शुद्ध शब्दों में बिक सकेगा। सादी दाल-रोटी व उबली सब्जी स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होती है। सलाद और फल-फूल भी खानपान के लिए बेहतर होते हैं। सब जानते हैं। मगर हमें बाजार का मसालेदार-जायकेदार, चाइनीज, फास्ट-फूड, पीजा-बर्गर आदि खाना अच्छा लगता है। फिर चाहे ये महंगे हों, स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हों और मिलावटी हों। घर का खाना कभी पसंद नहीं आता। अब आदमी के स्वाद का क्या किया जाए? इसका फायदा अगर होटल उठा सकता है तो मीडिया क्यों नहीं? हां, तबीयत खराब होने पर दवाई लेनी पड़ती है। ठीक है, समाज के बीमार पड़ने पर उसे भी दवा-दारू की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन अमूमन अच्छा होते ही हम फिर चाट की दुकान पर पहुंच जाते हैं। आईसक्रीम और तला हुआ खाते हैं। क्या करें इंसानी फितरत है। ऐसा ही कुछ तो मीडिया और समाज के रिश्तों के बीच भी है। मीडिया समाज का हिस्सा है तो समाज की बीमारी के कीटाणु मीडिया में भी उपस्थित होंगे, दूसरी तरफ मीडिया समाज को प्रभावित करता है ऐसे में उसकी बीमार निगाहों का और अधिक बुरा असर समाज पर पड़ता है। इस तरह से इस प्रक्रिया में फंसकर बीमारी चक्रवर्ती ब्याज की तरह बढ़ रही है। ऊपर से स्पीड का जमाना है। बुराई का चक्र तेजी से घूम रहा है। चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है।
आरोप-प्रत्यारोप के बीच में, समाज में अंदरखाते, मीडिया पर जमकर प्रहार हो रहे हैं। यह पूरी तरह ठीक नहीं। सच तो यह है, जो कि कड़वा भी है, कि हम स्वयं अपनी जिम्मेवारियों से बचते हैं और दूसरों से अच्छे बने रहने की उम्मीद करते हैं। एक बार के लिए यह मान भी लिया जाये कि मीडिया पूरी तरह सच और यथार्थ दिखाने लगे, तो क्या हम उसे देखना पसंद करेंगे? ऐसा समाचारपत्र क्या कोई पढ़ेगा जो अर्धनग्न फोटो व चटपटी खबर न छापता हो? ऐसा चैनल कोई नहीं देखेगा, जो जिस्म के सौंदर्य से न लुभाये, सनसनी न फैलाये। मीडिया भी क्या करे, मन का सौंदर्य पर्दे पर दिखाना मुश्किल है ऊपर से दर्शक के पास इसे समझने का वक्त नहीं। और फिर किसी के न देखने-पढ़ने पर चैनल-अखबार कुछ ही दिनों में बंद हो जाएगा। ऐसे में यह इल्जाम लगाना कि मीडिया सच नहीं बोलता, स्वयं में एक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
बात हमने करेले से शुरू की थी। उम्र के साथ अमूमन करेले का स्वाद पसंद आने लगता है। डायबीटीस से पीड़ित व्यक्ति मजबूरी में इसे खाते-पीते हैं। और जो नहीं लेते उन्हें ये मीठी बीमारी और अधिक कष्ट देती है। समाज को भी अपना इलाज जल्द करना होगा। स्वादपूर्ण झूठ की मिठास उसके खून में आ चुकी है। सच के कड़वेपन से इसका इलाज जरूरी हो गया है। वरना मीठा रोग (डायबीटीस) शरीर को अंदर से खोखला कर सभी इंद्रियों को कमजोर कर देगा।
मनोज सिंह

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Jun 05 2010

सीमाओं में बंधी जिंदगी

Published by Singh Manoj under Weekly Article

हम सीमा रेखा खींचने में बहुत विश्वास करते हैं। कढ़ाई-बुनाई करने के लिए कपड़े का टुकड़ा मिलते ही उस पर अमूमन पहले बार्डर बनाते हैं। स्कूल-कॉलेज की कॉपियों में चित्र बनाने से पूर्व कोरे कागज को चारों ओर से रेखाएं खींचकर सीमित क्षेत्र में बांध देते हैं। आदमी की तसवीर बनाना हो तो चेहरे और शरीर की बाहरी लकीरों को पहले बना लेने का प्रचलन है। खेल के मैदान में तो सारा खेल ही सीमा रेखा का है। घर बनाना हो तो सबसे पहले बाउंडरी वॉल बनाई जाती है। कारखाने का निर्माण कार्य चारों ओर मजबूत दीवार के बाद ही शुरू होता है। यहां सामान की सुरक्षा प्रमुख कारण होता है। बात सहूलियत की भी हो जाती है। ऐसा नहीं कि यह आधुनिक काल की देन है। आदिकाल में, जबसे आदमी ने अपने आप को सभ्यता के दायरे में परिभाषित करना शुरू किया, उसने सबसे पहले नगर-बस्तियों को चारों दिशाओं से चहारदीवारी द्वारा सुरक्षित किया। उसमें विशालकाय दरवाजों का प्रावधान होता था। ये नगरद्वार कहलाते थे। किले के चारों तरफ ऊंची-ऊंची प्राचीर होती। इस पर सैनिक होते। इन दीवारों को हर तरह से मजबूत किया जाता था। फिर बाहरी दीवार के साथ-साथ गहरी खाई खोदकर बाहरी दुनिया से अंदर की दुनिया को पूरी तरह काट दिया जाता था। प्रवेश द्वार बंद करते ही आप अंदर बंद। युद्ध में ये सब काम आते। विश्लेषित करने पर लगता है कि यह जीत के लिए नहीं हार से बचने के लिए होती थीं। राष्ट्र की सीमा रेखाएं शक्ति के अतिरिक्त शासक के भीतर बैठे डर का भी प्रतीक हैं।
इन सीमा रेखाओं का इतिहास बहुत पुराना है। नंबरदार, जागीरदार, सूबेदार, जमींदार ये सब अपनी सीमाओं के भीतर राज करते थे। मगर पूर्व में ये रेखाएं इतनी स्पष्ट नहीं थी। गांवों-नगरों पर आधिपत्य होता और सारा चक्कर इनकी संख्या को बढ़ाने को लेकर रहता था। जंगलों में इन सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता था। यहां तो सब कुछ जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत पर निर्भर होता। फिर भी अलेग्जेंडर संपूर्ण विश्व पर अकेले राज के द्वारा इन सीमा रेखाओं के चक्कर को ही खत्म कर देना चाहता था। यह दीगर बात है कि उसकी जीवनरेखा अकस्मात छोटी निकली। हिटलर ने भी जर्मनी की सीमा रेखा को चारों ओर फैला देना चाहा था। मगर द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणाम ने जर्मनी को दो भागों में बांट दिया। बर्लिन की दीवार जर्मन नागरिकों के दिल पर से गुजरी थी तभी तो जल्द ही तोड़ दी गयी। मगर कुछ देशों के बीच की सीमा रेखा दिन पर दिन मजबूत की जा रही है। कई सशक्त राष्ट्र को देखें तो उन्होंने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के उद्देश्य से कंटीली तारों का जंजाल फैला दिया। अगर दूसरी ओर कमजोर राष्ट्र है तो वो अमूमन इस बात से निष्फिक्र होता है। उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं। जिनके पास कुछ है वो ही सीमाओं की चिंता करते हैं। नियम, कायदे-कानून का सख्ती से पालन करते हैं। वरना गरीब की झोंपड़ी के बाहर दीवार नहीं होती। हां, चीन की दीवार की अपनी एक विशिष्ट कहानी है। पूरा इतिहास है। वो एक सशक्त राष्ट्र की सुरक्षा में सदियों तक सफल प्रमाणित हुई। उसने बहुत हद तक बाहरी संस्कृति के प्रभाव से भी अपनी सभ्यता को बचाए रखा। यह दीगर बात है कि अंदर की कई दर्दभरी कहानियां चीख बनकर उभरी मगर इन मजबूत ऊंची-चौड़ी दीवारों से टकराकर उसी में चुनवा दी गयीं।
कहा जा सकता है कि इन सीमा रेखाओं का प्रचलन मानव क्रम के साथ और अधिक बढ़ता चला गया। देशों की अपनी सीमाएं बनी, देश के अंदर राज्यों का क्षेत्र सुनिश्चित हुआ तो राज्य के अंदर शहर, शहर में छोटे-छोटे मोहल्ले-कालोनी और फिर उसके अंदर निजी संपत्ति। सब कुछ सीमाओं द्वारा परिभाषित और चिन्हित। थानों की भी अपनी सीमाएं हैं। एक थाना क्षेत्र की पुलिस दूसरे थाना क्षेत्र में वारदात होने पर कार्यवाही नहीं करती। अच्छा है, इससे अनुशासन बना रहता है। ऐसे में किसी भी पुलिस वाले के लिए कितना आसान है यह कहना कि यह हादसा हमारे क्षेत्र का नहीं। लेकिन फिर इसका क्या किया जाए जब किसी हादसे में घायल मुलजिम दो थाना क्षेत्र की सीमा में गिर जाए। तब हमें न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए। मगर यहां भी मुश्किल है, इनकी भी तो अपनी सीमाएं हैं। माननीय न्यायालय संविधान द्वारा संचालित होते हैं। कह सकते हैं कि इन नियम कायदे-कानून ने ही न्याय प्रक्रिया को सीमित कर रखा है। कानून की अपनी सीमा रेखा है। मुश्किल बस इतनी है कि संविधान का पालन करते-करते कार्यालय से लेकर संसद तक में निर्णय लेने की कोई समय सीमा नहीं रह जाती। ठीक भी तो है एक समय में एक ही सीमा का पालन हो सकता है। या तो नियम का या समय का। खैर, जहां कानून का बस नहीं चलता वहां फिर धर्म तो है ही। उसे मानव ने सबसे शुद्ध और अहम चीज बना दिया है। वह इसके लिए जीता है तो इसी के लिए मरता भी है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसी के लिए दूसरे की जान भी लेता है। अजीब विडंबना है, सारे ज्ञान, मानवता, भावना, जीवनदर्शन, सामाजिकता व नैतिकता की परिभाषा गढ़ने वाले धर्म की भी अपनी सीमा है। यह दीगर बात है कि इसकी सीमाएं मजबूत व अभेद्य हैं। इसमें कोई दूसरा धर्म प्रवेश नहीं कर सकता। हां, अन्य धर्म वाले की इच्छा है तो उसे धर्म परिवर्तन वाले एकमात्र द्वार से ही अंदर आना होगा। ऐसे द्वार सभी धर्म ने अपने-अपने क्षेत्रों में खोल रखे हैं। धर्म से याद आया, धर्म के रखवाले, एक से अधिक होते ही उनकी भी अपनी-अपनी सीमाएं चाहे-अनचाहे ही खींच जाती हैं।
धर्म की सीमाएं कट्टरता की प्रतीक हैं। यह वास्तविकता में कहीं दिखाई तो नहीं देती लेकिन इतनी प्रभावशाली हैं कि इसमें अतिक्रमण होने पर दंगा-फसाद से लेकर युद्ध तक हो सकता है। इसमें बदलाव या आगे-पीछे होने की कोई गुंजाइश नहीं। यह आदमी के दिमाग पर, कई तरह से भयभीत करने वाले औजारों द्वारा भावनाओं की स्याही से गहरे तक अंकित है। अक्सर मठाधीशों को अपनी-अपनी धार्मिक सीमाओं के ऊपर झगड़ते देखा जा सकता है। ये अपने समर्थक अनुयायी को आपस में लड़ने के लिए प्रेरित भी करते हैं। यही नहीं अपने तथाकथित धर्म की रक्षा के नाम पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अधर्म करने के लिए कहा जाता हैं। इतिहास के पन्नों पर, अनगिनत सामान्य जन का खून का बहना, कई बार इन सीमाओं की रेखाओं का आपस में उलझने का परिणाम है।
उलझती तो विचारधाराएं भी हैं। बड़े-बड़े विचारकों ने नयी नयी विचारधाराएं समाज को नियमित और संचालित करने के लिए बनाई। समय की आवश्यकतानुसार इनका जन्म होता है। इनकी अपनी, विचारों की भी अपरिभाषित सीमा रेखाएं हैं। एक-दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण करने पर यह भी लड़ने लगते हैं। शब्दों के बाण चलते हैं। और फिर आदमी इंसान से जानवर होता हुआ कब हैवान बन जाता है पता ही नहीं चलता। सारी विचारधाराओं के निहित नैतिकता धरी की धरी रह जाती हैं। मामला एक बार फिर इसी सीमा रेखा के आपस में टकराने से ही उत्पन्न होता है।
नदी, नाले, पहाड़, सागर पर तो आदमी ने अपनी आवश्यकतानुसार लकीरें खींच-खींच कर अपने और पराये को परिभाषित करने की हास्यास्पद कोशिश कर रखी है। कई देशों की सीमा रेखाओं के साथ कुछ महान नदियां अठखेलियां खेलती प्रतीत होती हैं। अनेक बार ये एक देश में प्रवेश करती हैं तो कई बार वहां से बाहर निकलती हैं, मानों मल्टीपल वीजा ले रखा है। कुछ स्थान आज इंसान की पहुंच से बाहर हैं, तो क्या हुआ? उसे ‘नो मैन्स लैंड’ कहकर मनुष्य ने अपनी व्यवहारिकता में होशियारी का प्रमाण दिया है। अर्थात जब इंसान यहां पहुंच जाएगा तब इसे बांट लिया जाएगा। रिकार्ड के लिए कंप्यूटर ने सारा काम आसान कर दिया तो रही-सही कसर सेटेलाइट ने पूरी कर दी। जो गली-गली खबर रखने के लिए ऊपर से झांकता रहता है। वरना तहसीलदार साहब की ताकत, वर्षों तक कागजी रिकार्ड में इन्हीं अदृश्य अस्पष्ट रेखाओं के चक्कर में थीं। बहरहाल, इन सब चक्करों में हवाएं भी अब सीमाओं में बंधने लगी हैं। आकाश को भी बांधा जाने लगा है। उन्मुक्त उड़ते पंछियों की तरह हवाई जहाज उड़ नहीं सकते। दुश्मन के हवाई क्षेत्र में से नहीं गुजारा जा सकता। लंबा चक्कर काटकर जाना होता है। देश के अंदर भी आजकल कुछ क्षेत्र प्रतिबंधित कर दिए गए हैं। जिनके अंदर प्रवेश करते ही मिसाइलें दाग दी जाती हैं।
इस सीमा रेखा की कहानी बड़ी अजीबो-गरीब है। यह यहीं पर आकर नहीं रुकती। हमने दिशाओं को भी मुख्य रूप से चार और फिर आठ भागों में बांट रखा है। इनके बीच में अटे पड़े क्षेत्र को परिभाषित कर नाम भी दे दिया है। वो तो भला हो सृष्टिकर्ता का कि अंतरिक्ष में जाते ही पूरब-पश्चिम तथा ऊपर-नीचे की कहानी समाप्त और सब कुछ दिशाहीन हो जाता है। यहां आकर सभी सीमा रेखाएं लुप्त होती प्रतीत होती हैं। मगर आदमी की फितरत कहां रुकने वाली। इसने अंतरिक्ष को भी शब्दों में बांधने की कोशिश की है। आकाश गंगा, ब्रह्मांड, सौरमंडल और न जाने क्या-क्या? नित नये विचार नयी-नयी परिभाषाएं।
समय क्या है? काल को परिभाषित कर शब्दों की सीमा रेखा के अंदर बांध देना। एक तरह से इसके निरंतर प्रवाह को सीमित करना है। हमने अपनी सहूलियत के लिए किसी भी क्षण को सेकेंड, मिनट, घंटे, दिन और वर्ष के पैमान में ढाल दिया। इस परिभाषा की सीमा रेखा में बंधकर, ये अनमोल अपरिभाषित अदृश्य शक्ति, पता नहीं क्या सोचती होंगी? अनंतकाल से अनंतकाल तक बहने वाले कालचक्र को भी इंसान ने खंडों में विभाजित कर दिया। और अपने ही लोगों को भूत, भविष्य और वर्तमान के चक्कर में उलझा दिया। अरे, इस आदमी की फितरत का कोई हिसाब नहीं। इसने तो अपनी कल्पना में, अपने ही ईश्वर का विभाजन कर, उसके कार्य और अधिकार को भी सीमाओं में बांध दिया। इस इंसान की सोच कितनी सीमाओं में बंधी हुई है, अगर आपको देखना है तो अपने दृष्टिकोण की आंखें बंद कर, मुक्त होकर सोचिए, रेखा ही रेखा दिखाई देगी। जिनके बीच में जीवनरेखा अपने अस्तित्व के तलाश में उलझती, टूटती, अदृश्य होती-सी प्रतीत होती है।
मनोज सिंह

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