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Archive for May, 2010

May 29 2010

मैं क्या हूं?

Published by Singh Manoj under Weekly Article

ऐसा कोई जरूरी नहीं कि इस तरह के सवाल वैचारिक विमर्श करने वाले या दर्शनशास्त्र से संबंधित लोग ही अपने आप से पूछ सकते हैं। सामान्य अवस्था में भी कई बार आमजन यह सवाल करने लगता है। मैं कौन हूं? कहां से आया हूं? इस तरह के प्रश्न करके, मैं शाश्वत रहस्य के घोर अंधकारमय ब्लैक-होल में अपने आप को अस्तित्वहीन नहीं करना चाहता। मैं तो लेखन की दृष्टि से, स्वयं को पहचानकर परिभाषित करने की यहां कोशिश कर रहा हूं। वैसे तो अब तक लेखन में ऐसा कोई तीर नहीं मारा है। फिर भी बीच मझधार में रुककर यह जानने की मन में जिज्ञासा उठती रहती है कि ‘मैं क्या हूं?’ जैसे कि, क्या मैं कवि हूं? प्रारंभ के दिनों में एक खंडकाव्य को छोड़ दें तो मैंने कविता लेखन के क्षेत्र में अपनी तरफ से कोई खास पहल नहीं की। वैसे भी कविता स्वयं प्रकट होती है, लिखी नहीं जाती। और यह सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं। कभी-कभी छिटपुट पंक्तियां, इधर-उधर, क्षणिकाओं की तरह मस्तिष्क में कौंधित जरूर हैं, मगर मैं इतने मात्र से अपने आप को कवि घोषित कर दूं, उचित नहीं लगता। तो क्या मैं उपन्यासकार हूं? इस पर विचार करना पड़ेगा। दो उपन्यास लिख चुका हूं, तीसरे पर काम जारी है। कम से कम मेरी निगाह और अनुभव में यह सबसे कठिन साहित्यिक विधा है। एक लंबी पारी खेलनी पड़ती है। अनगिनत चरित्रों को लंबे समय तक जीने के लिए अपने मूल जीवन को त्यागना पड़ता है। इसके माध्यम से मुझे लगता है कि संपूर्ण समाज का समकालीन जीवन समेटा जा सकता है। इतिहास की समझ के साथ भविष्य की कल्पना भी की जा सकती है। यह मुश्किल कार्य है। और मेरी कोशिश अभी जारी है। उपन्यासकार मान लेने से शायद यह गति रुक जाए। वैसे मैं इस विधा में लिखने का आनंद ले रहा हूं और जुनून महसूस करता हूं। मगर मंजिल अभी दूर है। तो कहीं मैं कहानीकार तो नहीं? कुछ कहानियां लिखी जरूर है, मगर इस संदर्भ में कुछ कहना मुश्किल है। कई बार ऐसा लगता है कि कहानियां लिखना आसान होगा। चूंकि यह उपन्यास का छोटा रूप है। लेकिन यह सत्य नहीं। लिखने में समय जरूर कम लगता है। वैसे तो आज के दौर में समय की कमी के कारण आधुनिक पाठक व लेखक दोनों के लिए यह फायदे का सौदा है। लेकिन यहां सीमित शब्दों में असीमित कथा कह देने की कला आनी चाहिए। यह मुझे सीखने होगी। कोई दर्जनभर कहानी लिखने मात्र से कोई कहानीकार साबित नहीं हो जाता। बहरहाल, कहानी आम पाठक को पसंद आनी चाहिए। लेकिन इस चक्कर में इतनी हल्की भी न हो जाए कि आलोचक निरस्त कर दें। अमूमन आलोचक के लिए लिखी गई कहानी क्लिष्ट और समझ नहीं आती। आलोचक और पाठक, इन दोनों ध्रुवों के बीच संतुलन की आवश्यकता है। और ऐसा करने की मेरी कोशिश जारी है। तो क्या मैं एक स्तंभकार हूं? समाचारपत्रों में आम लेख लिखने वाले यूं भी साहित्य की दुनिया में स्वीकार्य नहीं। पत्रकारों का एक विशिष्ट वर्ग मात्र मानकर टरका दिया जाता है। ठीक भी तो है, फास्ट-फूड की तर्ज पर आवश्यकतानुसार लेख लिखने का फैशन है। पिछले कुछ वर्षों से साप्ताहिक लेख निरंतर लिख रहा हूं। सात दिन कलम घिसता हूं तब जाकर कभी-कभी पाठकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल पाती है। कई बार नये लोग सवाल पूछ लेते हैं कि आप किस तरह का लेख लिखते हैं? अब लेख को कैसे परिभाषित किया जाए? यह एक मुश्किल कार्य है। यह राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, खेलकूद, व्यंग्य, संस्मरण, विज्ञान आधारित कुछ भी हो सकता है। हल्का या गंभीर के साथ ही किसी एक वर्ग या विचारधार से प्रेरित या प्रायोजित भी हो सकता है। मैं इनमें से अपने आप को किसी भी एक शीर्षक के नीचे रखकर सीमित करने में असमर्थ हूं। और इसीलिए जवाब नहीं दे पाता। ऐसे में मेरा स्तंभकार कहलाना भी छिन जाता है। मैं लेखों में साहित्य का पुट और चिंतन का समावेश जरूर कर जाता हूं। जीवन का एक बिंदु उठाते ही सभी क्षेत्रों का घालमेल कर देता हूं। तो कहीं मैं व्यर्थ में कागज काले तो नहीं कर रहा?
शब्दों में परिभाषित व स्वीकृत होते ही कथन अकादमिक हो जाते हैं और सृजन की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। स्पेशलिस्ट का जमाना है। साहित्य में भी विशेषज्ञ बनाए जाने की कोशिश जारी है। मगर क्या यह संभव है? लगता नहीं। जयशंकर प्रसाद, ‘कामायनी’ के बाद कोई दूसरी अद्भुत रचना नहीं दे पाए। एक ही रचना से रचनाकार अमर हो जाता है, मगर अन्य रचनाएं भी अच्छी ही होंगी, इसकी संभावना साहित्य के क्षेत्र में कम ही है। अब चूंकि मैं आधुनिक फार्मेट में किसी भी क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं, तो अपने आप ही सामान्य की श्रेणी में खड़ा हो जाता हूं। यूं तो कुछ नया करने की चाहत, कल्पनाशीलता, जीवन में शब्दों से खेलने की ऊर्जा प्रदान करती रहती है। लेकिन सवाल यहां उठता है कि क्या रचनाकार सृजन प्रक्रिया के लिए पूर्ण रूप से समर्पित है। सीधे शब्दों में, क्या मैं स्वतंत्र रूप से अपने विचार रख पाता हूं? शायद नहीं। यहां कई दबाव, अनचाहे ही मन में आ जाते हैं। वैसे भी संपूर्ण सत्य समाज के लिए कभी भी आवश्यक नहीं रहा। और सच हमेशा कड़वा होता है, बोलकर इससे बचने का उपाय भी आदिकाल से बता दिया गया। ऐसा सच जो नुकसान करे, तकलीफ दे, असुविधाजनक हो, लोक हितकारी न हो, उससे क्या फायदा। अपने आप को संतुलित करना भी, समय के अनुरूप आवश्यक हो जाता है। ऐसा करते हुए मगर मैं सही शब्दों में साहित्यकार कहां रह जाता हूं?
कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि क्या मैं अपनी रचनाओं में विकास विरोधी हूं? शायद नहीं। विकास शब्द में एक तरह की गतिशीलता है। परिवर्तन की प्र्रक्रिया दिखाई देती है। मगर यह फिर सदैव बेहतरी और साकारात्मक दिशा की ओर ही हो रही होगी, ऐसा भावार्थ निकलता है। उन्नति विकास शब्द से स्वतः ही जुड़ जाती है। और जब इन गुणों को मैं नहीं पाता तो किसी भी तरह के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक प्रक्रिया व विचारधारा को आधुनिकीकरण और विकास के नाम पर स्वीकृत कर लूं, उचित जान नहीं पड़ता।
कहीं मैं यथार्थवादी तो नहीं? शब्दार्थ को देखें तो जैसा होना चाहिए, सत्यपूर्वक, वाजिब, उचित, ठीक वैसा। अब यहां यथार्थ से मुंह मोड़ लेना सैद्धांतिक रूप से साहित्य सृजन की प्रक्रिया को समाप्त करने के समान होगा। यथार्थ से कैसे मुंह मोड़ा जा सकता है? लेकिन क्या एक लेखक वास्तविकता को जान और समझ पाता है? दृष्टि और स्तर पर कहीं न कहीं फर्क जरूर रह जाता होगा। और फिर अपना-अपना व्यक्तिगत आकलन अपनी तरह की विशुद्धियां पैदा करता रहता है। तो क्या मैं प्रतिक्रियावादी हूं? यह शब्द अपने आप में मुझे भ्रमित करता है। मूल रूप से तो, सुधार करने वाले का विरोध करने वाले को यह कहा जाता है। मगर सुधार का वास्तविक धरातल पर अपना-अपना पैमाना हो सकता है। प्रतिक्रियावादी संदर्भित सुधार के प्रतिफल को ही मानने से इंकार करता है तभी तो विरोध करता है। ऐसे में वो सुधार विरोधी कैसे हुआ? साहित्य और कला के क्षेत्र में शब्दों को वैज्ञानिक रूप से समझने में मुझे हमेशा कष्ट हुआ। प्रतिक्रिया में भी क्रिया है और हर क्रिया से प्रतिक्रिया का जन्म होता है। यह क्रम निरंतर जारी है। ये ब्रह्मांड के मूल अवयव हैं। मैं अपने लेखन में इसे कितना उतार पाया, यह तो नहीं पता। हां, प्रकृति का रहस्य मुझे कई बार तंग करता है। तो कहीं मैं रहस्यवादी तो नहीं? हो सकता है। मुझे मानवीय स्वभाव, जीवन के रहस्य, सत्य और असत्य के बीच रेखाएं, भाग्य का खेल और ऐसी बहुत सारी बातें हैं, जो तंग करती हैं। अध्यात्म इस पर स्पष्ट नहीं हो पाता, बस सात्विक आत्मानुभूति हो जाती है। इसमें कई बार गहराई से सोचने लगता हूं। प्रकृति प्रेमी जरूर हूं लेकिन कितना समझ पाया हूं? इसमें अभी शंका है। तो कहीं ये मेरे चिंतक होने की निशानी तो नहीं? कभी-कभी आभास तो होता है लेकिन फिर यह चिंता है या चिंतन? या फिर मेरे असंतुष्ट व अपरिपक्व मस्तिष्क का स्वयं से पूछा गया मात्र एक प्रश्न? यह मुझे कई बार एक स्तर पर ले जाकर शून्य में पहुंचा देता है। तो कहीं मैं मूलतः शून्यवादी तो नहीं? लगता नहीं। चूंकि ईश्वरीय शक्ति मुझे सदैव स्वीकार्य रही है। जिसके दरबार में तर्क-वितर्क नहीं चलते। हां, यह भी सत्य है कि एक स्तर पर जाने के बाद निराकार ब्रह्म की कल्पना करने लगता हूं। अस्तित्वहीनता का अहसास आते ही सब कुछ सत्ताहीन व निरर्थक लगने लगता है। परम आनंद की परिकल्पना यहीं से प्रारंभ हो जाती है। जहां मैं अभी तक पहुंचा नहीं। अभी शून्यवाद में विचरण करने का साहस नहीं। ऐसा आदमी सामान्य जीवन में स्वीकार्य नहीं। पागल करार दिया जाता है। उसे व्यवहारिक न होना कहकर निरस्त कर दिया जाता है। और इतने सारे इल्जाम अभी झेलने की मुझसे शक्ति नहीं। क्या मैं प्रकृतिवादी हूं? आज की उपभोक्ता संस्कृति में रहने वाला, प्रकृतिवादी सिर्फ दिखावे के लिए हो सकता है। फैंसी आइटम की तरह। मात्र लोगों का ध्यान आकर्षण करने के लिए। ऐसे तो मैं फिर उपभोगवादी हुआ? इसका जवाब कभी हां कभी न में ही हो सकता है। इसी कारण तो राजनैतिक विचारधारा पर भी मैं पूरी तरह भ्रमित हूं। सुनने-पढ़ने तक सैद्धांतिक रूप से प्रजातांत्रिक हूं। मगर धरातल पर इसके साथ खड़ा नहीं हो पाता। मेरे मतानुसार इसके मूल में ही समस्या है। असल में शासन शब्द से ही मुझे परहेज है। इसके आते ही बाकी सारी मानवीय पक्ष व संवेदनाएं गौण हो जाती हैं। दूसरी ओर, राजाओं-महाराजाओं का मानवीय इतिहास पर लंबे समय तक शासन देख मुझे हैरानी होती है। मनुष्य को छोड़ कोई दूसरा पशु-पक्षी इतने लंबे समय तक अपनो के ही अधीन नहीं रहा। समाजवादी धाराएं आकर्षित जरूर करती हैं मगर इनके व्यवहारिक प्रस्तुतीकरण पर सदैव शंका बनी रहती है। तो मैं राजनैतिक रूप से किसी भी वाद में अपने आप को फिट नहीं बैठा पाता। और अंत में अपनी इसी बेतुकी विचारधारा पर आ जाता हूं कि सारी व्यवस्थाएं व शास्त्र मनुष्य द्वारा मनुष्य पर शासन करने के लिए बनी हैं। तो कहीं मैं क्रांतिकारी भावनाओं से प्रेरित तो नहीं? प्रश्न सुनते ही हंसी आती है। आज के बाजारवाद में क्रांति शब्द की कल्पना भी व्यर्थ है।
इतने सारे प्रश्नों के बीच भी ईश्वरीय आस्था बनी हुई है। तो क्या मैं आस्तिक हूं? घोर असफलताओं के बीच में, बेहद बेचैनी में, दुखों, कष्टों को देखकर कई बार सब कुछ व्यर्थ लगता है, और नास्तिक हो जाने का प्रण कर लेता हूं। यह होता क्षणिक ही है। बहरहाल, यह मेरे अनंत विश्वास को कुछ देर के लिए तोड़ जरूर देता है। इसीलिए तो मैं पक्के तौर पर आस्तिक भी नहीं कह सकता।
अंत में, इन शब्दों की परिभाषाओं में, मैं व्यर्थ में गुमराह हूं। मेरा आकलन तो समय करेगा। मेरे शब्दों का संसार करेंगे। और वो करेंगे जो इन्हें पढ़ रहे हैं। नहीं, वे भी नहीं कर सकते। क्योंकि हर एक की दृष्टि, मुझे समझने के लिए, हरेक स्थान व काल में, अलग-अलग स्तर पर, अपनी-अपनी तरह से देखेगी-पढ़ेगी। वहां मेरा आकलन नहीं होगा। वो तो उसका होगा जो आकलन कर रहा है। उस संदर्भित समय व काल का होगा। अतः मैं आज भी भ्रमित हूं कि ‘मैं क्या हूं?’ और मैं इस मायाजाल की मृगतृष्णा को ही जीवन मानकर जिये जा रहा हूं।

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May 22 2010

कोलकाता की है बात निराली

Published by Singh Manoj under Weekly Article

कोलकाता महानगर को मैंने, थोड़े-थोड़े अंतराल में, बचपन से लेकर आजतक, निरंतर देखा है। ऐसे में, आम आदमी की निगाह में दिखाई देने वाले परिवर्तन को मोटे-मोटे शब्दों में परिभाषित करने की कोशिश की जा सकती है। सत्तर के दशक में कम्युनिस्ट व ट्रेड यूनियन मूवमेंट की धुंधली-धुंधली सी यादें हैं। मजदूरों और श्रमिकों के संघर्ष की आवाज सुनाई देती और हड़ताल व लॉकअप और धीरे-धीरे कुछ कारखानों को बंद होते पढ़ा-सुना। यूं तो 1984 में एस्प्लेनेड से नेताजी भवन तक मेट्रो प्रारंभ हो चुकी थी। मगर अस्सी के दशक में कोलकाता का मुख्य बाजार, टालीगंज से लेकर पीछे दमदम तक का शहर, अंडरग्राउंड मेट्रो के लिए जगह-जगह खुदा पड़ा था। बाद में नब्बे के दशक में पहुंचने पर कोलकाता को अपने मेट्रो पर गर्व होने लगा था। और मेरे लिए यह एक ऐसा अनोखा शहर था जहां सड़कों पर हाथ-ठेला से लेकर काली-पीली एम्बेसडर, बसें और पटरियों पर ट्रॉम एक साथ दौड़ा करतीं तो जमीन के नीचे मेट्रो। तकरीबन सात-आठ वर्ष पूर्व जाने पर वहां की तमाम सैद्धांतिक व्यावसायिक विचारधारा पर प्रश्नचिह्न और तर्क-वितर्क का दौर अपने चरम पर था। इन सब परिवर्तन के बीच भी बंगाल की संस्कृति ने हमेशा आकर्षित किया था और यह अपनी पूरी जीवंतता के साथ उपस्थित थी। सड़कें सपाट हो न हो, गड्ढों के बीच में से जीवन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। इसमें रवीन्द्र संगीत भी था तो कला और नृत्य-गायन घर-घर अपनी पूरी उत्कृष्टता के साथ फल-फूल रही थी। साहित्य पठन-पाठन में बंगाल को प्रारंभ से ही विशेष प्रेम रहा है। मिष्ठी-दही की खटास में मिठास, सॉन्देस-मिठाई का हल्का-हल्का मीठापन, सफेद रसगुल्ले का स्पंजीपन और माछेर-झोल का वो सरसों में भीगा स्वाद बरकरार था। गरीबी तो थी लेकिन सभ्यता में समरसता थी। इसमें बेचैनी नहीं थी। जीवन नीचे से लेकर ऊपर तक तकरीबन एक-सा दिखाई देता। कलकता दो शताब्दी पूर्व ही महानगर का रूप अख्तियार कर चुका था, मगर महानगरीय संस्कृति यहां कभी आंखों में खटकी नहीं। मुंबई वाली भागा-दौड़ी महसूस नहीं होती और दिल्ली का राजनीतिक मिजाज यहां अनुपस्थित था। मुंबई के लोकल की रफ्तार और कोलकाता के ट्राम की गति में उपस्थित विरोधाभास से ही इसे समझा जा सकता है। मूल रूप से देखें तो पूजा और पर्यटन के लिए जाना जाने वाला बंगाली समाज, थोड़े में भी संतुष्ट और संपूर्ण जीवन जी लेता। गुण-अवगुण तो सभी में होते हैं मगर यहां की बौद्धिक क्षमता पर कभी किसी को शक नहीं रहा।
विगत सप्ताह एक बार फिर कोलकाता जाना हुआ। एयरपोर्ट से लेकर पार्क स्ट्रीट तक पहली नजर में ही शहर बदला-बदला सा नजर आ रहा था। सड़कें व्यवस्थित हुई थी और गड्ढे नदारद थे। तेज भागती महंगी और आलीशन गाड़िया देखकर आश्चर्य हुआ। सड़कों के किनारे ऊंची-ऊंची गगनचुम्बी इमारतें, कंक्रीट के बनाये गए माचिस के डिब्बेनुमा फ्लैट के जंगलों को देखकर मैं हैरान था। शेक्सपीयर सरणी व कॅमाक स्ट्रीट से लेकर दक्षिण कोलकाता तक ब्रांडेड शोरूम और मॉल्स की संस्कृति चारों ओर बिखरी हुई थी। फास्टफूड और पश्चिमी संस्कृति ने अपने पैर जमा दिए थे। आईटी सेक्टर और कंप्यूटर कल्चर की चकाचौंध इतनी तेज थी कि यहां की सड़कों और बंगलुरू, हैदराबाद या दिल्ली-मुंबई के बीच फर्क कर पाना मुश्किल हो रहा था। आदमी को दृश्य से हटा दें तो इन कंक्रीट की दीवारों ने सब एक-सा कर दिया है।
कालीघाट मंदिर में श्रद्धालुओं के भीड़ की अपनी रफ्तार बनी हुई थी। हां, बकरे की बलि का क्रम कुछ कम होता जरूर लगा था। दुर्गा मां हमेशा मेरे लिए शक्ति का स्रोत रही हैं और इस बार भी उनके दर्शन कर मैं ऊर्जा से भर गया। मंदिर से बाहर निकला तो दूसरे छोर पर स्थित बूढ़ी गंगा के दर्शन कराए गए। दृश्य देखकर मैं अवाक्‌ था। पूर्व में नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों ने इसे क्यों नहीं दिखाया? शायद यह उनकी निगाह में महत्वपूर्ण न हो। सच है, इसे सामान्य रूप में देखना, वर्तमान युग के पर्यटन में शामिल नहीं। अधिक तो नहीं जान पाया मगर बहुत देर तक तो मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं हुआ कि पूर्व में वास्तविक गंगा की एक शाखा यह भी थी। अब यह किसी गंदे नाले से ज्यादा कुछ नहीं। सुनाई गई कहानी कितनी सत्य है, कहा नहीं जा सकता। जिस युग में दूसरे दिन के अखबार में छपी खबर और आंखों देखी घटना में फर्क आ जाता हो वहां इतिहास के मानवीय प्रस्तुतीकरण में सदा से अविश्वसनीयता बनी रहती है। चाहे जो हो, मगर यह इस बात का प्रमाण तो है ही कि मानव अपनी सभ्यता के विकास नाम से अपने ज्ञान को आधुनिक होने का जितना भी डंका पीटे मगर उसने नैसर्गिक सौंदर्य का भरपेट सत्यानाश किया है। चर्चा के दौरान पता चला कि फ्रांसीसी और अंग्रेजों की आपसी खींचतान में गंगा के इस प्रवाह को दूसरी ओर मोड़ दिया गया जिसके कारण हुगली नदी ने बंगाल की खाड़ी के लिए दूसरा रास्ता अपनाया। बहरहाल, गंगा की इस पवित्र शाखा की इस कदर दुर्गंधभरी दुर्दशा होगी, मेरी कल्पना से परे है। ऐसे दृश्य हिन्दुस्तान के हर शहर में मिल जाएंगे। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक हर शहर में गंगा मैली हुई है। जबकि ये हमारी आस्था की नदी है, पूजनीय है। इन सबके बावजूद हमें यह स्वीकार करने में तकलीफ होती है कि चमकीले कांच से ऑलीशान इमारतों को बनाने वाली सभ्यताएं ठीक उसी तरह से कार्य करती हैं, जिस तरह से एक बीमार व्यक्ति अपने कमजोर व पीले पड़ चुके चेहरे को मेकअप से छुपाकर सुंदर बनाने की कोशिश करता है। पैसे वाले लोग, आभूषणों से अपनी बदसूरती को ढक लेते हैं और इत्र से बदबू को दबा देते हैं।
कोलकाता को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पर गर्व है। और यह आज भी दिखाई देता है। बंगाल गुरुदेव की 150वीं जन्म की वर्षगांठ मना रहा है। रवीन्द्र सदन में संगीत प्रेमियों की चहल-पहल दिखाई दी थी। चौराहों पर उनके पोस्टर विद्यमान थे। कोलकाता ने देश की राजधानी होने का हक 1912 में जरूर छोड़ दिया हो मगर साहित्य की राजधानी होने का दर्जा उसका आज भी बरकरार है। सारी विषमताओं और विपत्ति के बावजूद यहां का पुस्तक मेला अपना आकर्षण बनाए हुए है। यही वह शहर है जिसने अगर असंख्य गरीब और सोनागाच्छी जैसे सेक्स वर्करों का एक विशाल मोहल्ला दिया तो साथ ही सेवा की मूर्ति मदर टेरेसा भी दीं। मैं सौभाग्य से इस बार महाश्वेता देवी के दर्शन कर पाया। यकीन से कह सकता हूं कि इस कद का कोई भी अन्य लोकप्रिय लेखक-लेखिका, आज की तथाकथित आधुनिक दुनिया में इतने सामान्य ढंग से नहीं रह सकता। दो कमरे का एक छोटा-सा फ्लैट, जिसमें सामान उतना ही था जितने की जरूरत एक इंसान को हो सकती है। वो भी अस्त-व्यस्त अर्थात महत्वपूर्ण नहीं। जिस सहजता व नम्रता से उन्होंने हमें बिठाया वहां आत्मीयता थी फिर आतिथ्य की आवश्यकता नहीं रह जाती। उनके पैरों में सूजन को देखकर मुझे हैरानी थी कि इतने शारीरिक कष्ट के बाद भी वे इतनी सक्रिय कैसे? कमरे में दो कुर्सियों के अलावा एक टेबल जिस पर किताबों का अम्बार। चारों ओर बिखरी धूल के बीच में रहकर ही वे मिट्टी से जुड़े गरीब के बारे में इतनी विश्वसनीयता से लिख पाती हैं। वातानुकूलित कमरे में बैठकर गांव की परिस्थितियां नहीं समझी जा सकती और मेरा मन ऐसे कथाकार के लिए आदर से भर गया। यह शायद, यहां की मिट्टी में शक्ति है जो अन्य राजनीतिक नेतृत्व में भी इसी तरह की सादगी के कई मिसाल मिल जाएंगे। यहां किसी एक का नाम लेने पर राजनैतिक पक्षधर कहलाए जाने से बचने की बात महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन यह भी सत्य है कि अवाम ने यहां उसी को अपने कंधे पर बिठाया है जो उनकी तरह ही सीधी-सादी जिंदगी जीता हो।
बंगाल की संस्कृति, सभ्यता व सौंदर्य का मैं प्रशंसक रहा हूं। यहां की महानगरीय संस्कृति में घरों के आसपास पेड़ और मोहल्लों के बीच में तालाब का होना एक पहचान रही है। लाल बॉर्डर वाली हल्के रंग की साड़ियों में यहां की नारी सौंदर्य का अपना विशिष्ट आकर्षण है। धोती-कुर्ता में बंगाली भद्रपुरुष अपनी तमाम मानवीय वैचारिक व राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के साथ खड़ा रहा। बंगाल ने दशकों तक हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री पर भी शासन किया और एसडी व आरडी बर्मन के साथ-साथ हेमंत दा, ऋषिकेश मुखर्जी, सत्यजीत राय ही नहीं अन्य गैर-बंगाली कलाकारों के चरित्र में भी बंगाली व्यक्तित्व दिखाई पड़ता। ‘सफर’, ‘आनंद’ और ‘अमर प्रेम’ का काल हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिम युग कहलाया। ‘देवदास’ और ‘परिणिता’ आज भी सिल्वर स्क्रीन पर धूम मचा देती हैं। शरदचंद्र और बकिमचंद्र का कोई जोड़ नहीं। कोलकाता को सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने बसाया या नहीं? तर्क व ऐतिहासिक संदर्भ की प्रमाणिकता का विषय हो सकता है। मगर मैं इस बात को सोच-सोच कर सदैव हैरान रहा कि अंग्रेजों के आधिपत्य वाले इस महानगर में ब्रिटिश राज के दौरान भी अंग्रेजीयत आमजन में दिखाई नहीं देती थी। तमाम संक्रमण के बावजूद स्थानीय जीवन ने अपनी पहचान कायम रखी थी और शायद तभी वैचारिक व स्वतंत्रता संग्राम के बीज यही अंकुरित हो रहे थे। वैसे टैगोर खानदान के परदादाओं ने बहुत पहले ही समुद्र पार कर लिया था तो रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य विवेकानंद विश्व में धूम मचा आए थे। मैं ऐसी सभ्यता के सामने नतमस्तक हो जाता हूं, जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसा नेतृत्व देश को दिया। लेकिन इस बार की मेरी संक्षिप्त यात्रा ने मेरे इस वैचारिक विश्वास व यादों के धरोहर को ध्वस्त तो नहीं मगर हिला जरूर दिया। मैं भयभीत हूं कि आधुनिकीकरण की तेज आंधी इस विशिष्ट पहचान को कब रेत की दीवारों की तरह ढहाकर उड़ा ले जाएगी, पता ही नहीं चलेगा। मैं नहीं चाहता कि माछ-भात और सफेद रसगुल्ले व सॉन्देस-मिठाई का व्यवसायीकरण हो और यह किसी ब्रांड में ढाल दिये जाएं। डर है कहीं ढाब (नारियल का पानी) बोतलों के अंदर नीले-पीले रंग में बंद न कर दिया जाए। मिट्टी के कुल्हड़ में मिष्ठी-दही की सौंधी खुशबू बरकरार रहे, ऐसी उम्मीद करता हूं।

मनोज सिंह

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May 15 2010

रेल में चलता जीवन

Published by Singh Manoj under Weekly Article

रेल इंजन पहले कोयला खाया करते थे फिर तेल पीने लगे और अब बिजली चूसते हैं। ये कुछ शब्द अपने मित्र के छोटे से बच्चे के कौतूहल भरे प्रश्न के जवाब में मैंने यूं ही कह दिये। मगर इसके पश्चात हम दोनों बहुत देर तक हंसे थे। बच्चों की हंसी में भी निश्छलता होती है। यह सच है, कुछ दशक पूर्व तक भाप वाले काले और मोटे पेट के इंजन रेलगाड़ी की पहचान हुआ करते थे। छुक-छुक रेलगाड़ी ने, जाने कितनी कविताओं और गीत की रचना कर दी। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, उस जमाने में सफर करने वालों के चेहरे और कपड़े अमूमन काले हो जाया करते थे। यहां बात वातानुकूलित कोच की नहीं, आम शयनयान की हो रही है। इंजन से निकलने वाले धुएं से ट्रेन के यात्रियों का बुरा हाल हो जाता था। इसमें कोयले का अंश होता। फिर भी लंबे साथ का प्रेमपूर्वक रिश्ता बना रहा। वैसे भी उन दिनों, दिल साफ और जीवन निष्फिक्र होता। और कई नियमित सफर करने वाले तो चाय पीने के लिए स्टीम इंजन से ही गर्म उबलता पानी ले आया करते थे। इस भाप के इंजन ने दुनिया की रेल पर एक पूरी शताब्दी शासन किया है। और जहां से भी गुजरा लोगों से अपने आप को जोड़ लिया। धीरे-धीरे, ये कब रेलवे संग्रहालय में यादगार के रूप में खड़े कर दिए गए, पता ही नहीं चला। मानों बच्चों के रहते घर का बूढ़ा वृद्धाश्रम में भेज दिया गया हो। सच, समय बड़ा निष्ठुर है। बहरहाल, इनकी विदाई के कई कारण हैं। बेहतर और शक्तिशाली डीजल इंजन की उपलब्धता। वैसे भी कोयले की खदाने तेजी से समाप्त हो रही थीं और भविष्य में हालात बिगड़ते इससे पहले विशेषज्ञों ने डीजल इंजन का बड़ी संख्या में उपयोग शुरू कर दिया। इस बात से हम अंजान नहीं कि डीजल भी बहुत लंबे समय तक हमारे साथ नहीं रहेगा। आवश्यकता आविष्कार की जननी है और रफ्तार के लिए विश्व में बिजली के रेल इंजन का प्रयोग भी बड़ी तेजी से उभरा और चारों ओर फैल गया। रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण, इस विभाग का एक महत्वपूर्ण और विशाल काम, निरंतर जारी है। आधुनिकीकरण की आंधी रेलवे के हर विभाग में तेजी से बह रही है। लॉलटेन की लौ में दिखने वाला सिग्नल अब आधुनिक बिजली उपकरणों व इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल से नियंत्रित है। ड्राइवर-गार्ड-कैबिनमैन-स्टेशन-मास्टर वॉकी-टॉकी से निरंतर संपर्क में रहते हैं। प्लेटफार्म का स्वरूप आधुनिक हीरो-हीइरोन और उनके परिधानों की तरह फैशनेबल और चमकदार हुआ है। फास्ट-फूड ने कैटरिंग व्यवस्था में भी पूरी घुसपैठ की है। और मिट्टी के कुल्हड़ तकरीबन नदारद हैं। टीटी साहब के रुतबे में फर्क आया है या नहीं? कहा नहीं जा सकता। मगर आरक्षण की सुविधा में जरूर फर्क आया है। आधुनिक युग में मध्यम वर्ग की सहूलियतें बढ़ी हैं। रेलवे इसका प्रमाण है। यह दीगर बात है कि जमीनी हकीकत में आम आदमी अभी भी अनारक्षित डिब्बे की भीड़ में पिस रहा है।
विगत सप्ताह छोटी बेटी के साथ रेलवे स्टेशन जाना हुआ। एक विशिष्ट मेहमान का व्यक्तिगत रूप से स्वागत किया जाना था। इसका भी एक मजा है। यह हवाई और बस अड्डों पर नहीं मिलता। अगर बहुत भीड़भाड़ न हो और आराम से खड़े या बैठ जाने को मिल जाए तो रेलवे स्टेशन पर समय बड़े मजे से काटा जा सकता है। जहां भी नजर डालें, एक नया जीवन नये भाव के साथ मिल जाएगा। अनगिनत चरित्र। चहल-पहल और रौनक इतनी की आदमी अकेलापन महसूस नहीं कर सकता। कहानीकार और उपन्यासकार के लिए कई कथासूत्र उपलब्ध होते हैं। चेखव ने अपनी कई लोकप्रिय कहानियां प्लेटफार्म पर ही लिख दीं। भारतीय सिनेमा में भी रेल भरपूर दिख जाता है। वायुयान में सफर करने वाले आज के हीरो-हीरोइन को रेल में सफर करता दिखाकर निर्देशक आज भी दर्शक से जुड़ जाता है। बहरहाल, छोटी बेटी ने जब कहा था कि उसे ट्रेन में सफर करना वायुयान या बस-कार से बेहतर लगता है, वो भी शयनयान के डिब्बों में, सुनकर एक बार तो मुझे आश्चर्य हुआ था। और फिर मैं भी सोचने लगा। सच तो है। ऐसा जीवंत सफर और कहां हो सकता है? विशेषकर जब परिवार या खास दोस्तों के समूह में लंबी यात्रा पर निकला जाए और आप सभी की सीट-बर्थ आमने-सामने हों। ऐसे में चौकड़ी में बैठकर गपशप, खाना-पीना और यहां तक की ताश के पत्तों का खेल भी बेहद मनोरंजक बन पड़ता है। खिड़की से आने वाली तेज हवा, गर्मी के दिनों में भी बुरी नहीं लगती और पसीना सूख जाता है। बहुत कम यात्री सोते हुए सफर करना पसंद करते हैं। वरना ढेर सारी बातें करने का भरपूर मौका मिलता है। और याद करते-करते मैं अपने बचपन में पहुंच गया था।
पिता रेलवे कर्मचारी थे। कुछ वर्षों के अंतराल में नियमित स्थानांतरण होता। अमूमन छुट्टियों में दादी या नानी के घर जाने के लिए ट्रेन से लंबा सफर तय करना पड़ता। सीट आरक्षित करा कर ही हमारा परिवार यात्रा पर निकलता। रास्ते में पिता के जानने वाले मिल जाते और एक बृहद परिवार का अहसास होता। सफर में खाने-पीने के लिए पहले से पूरा इंतजाम किया जाता। जिसमें कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन होते। अमूमन ये सूखे और जल्दी खराब न होने वाले बनाए जाते। पूड़ी-सब्जी और आचार। घर की बनी मिठाइयां व नमकीन। बाजार का प्रचलन कम था और मां के हाथ के बने खाने में गजब स्वाद होता। तभी तो गाड़ी में बैठते के साथ हम बच्चों को भूख लग आती। पूरे रास्ते ऊपर-नीचे की बर्थों पर धमा-चौकड़ी मचाना और कुछ न कुछ खाना। यही तो काम होता। उम्र के साथ-साथ स्टेशन और शहर के नाम याद हो जाते। टेलीफोन और बिजली के खंभों को पीछे भागते हुए अक्सर देखते तो कई बार गिनने लग पड़ते। रास्ते में नदी-नाले, पहाड़, पेड़, घर-मकान-कारखाना, सड़क, जंगल और रेल किनारे शौच करते आदमी-बच्चों का आम दृश्य सेकेंड में आंखों के आगे से निकल जाता। लूडो और सांप-सीढ़ी खेलने के लिए इतनी लंबी इजाजत और कहां मिल सकती थी। आमतौर पर आसपास की बर्थ पर सफर कर रहे परिवार से भी संबंध बन जाते और खाने-पीने का आदान-प्रदान होता। दूसरे के घर के व्यंजनों में, बालपन में, न जाने क्यों अधिक स्वाद मिलता। और हम लोग खूब मांग-मांग कर खाते। सत्यानाश कर दिया आज के आधुनिक युग ने, तभी तो हर इंसान एक-दूसरे के शक के दायरे में आ चुका है। प्लेटफार्म पर चिल्ला-चिल्लाकर की जा रही उद्घोषणा कि अनजान यात्री द्वारा दी गयी चीजें मत खाइए, हमारे इंसान होने पर प्रश्नचिह्न लगाती है। और कोई भी लावारिस सामान देखकर डर लगने लगता है। हमारा बचपन इस भय से मुक्त था।
आज बहुत कुछ बदल गया है। लेकिन जीवन आज भी इन रेलों में चलता-बढ़ता हुआ देखा जा सकता है। प्लेटफार्म पर कई परिवार पलते हुए देखे जा सकते हैं। रेलवे का अपना एक संसार है। इनका अपना प्रशासन है। अपना बजट, अपनी पुलिस और न्यायिक व्यवस्था। इसमें कोई शक नहीं कि अंग्रेजों द्वारा विकसित ये विभाग अपनी विशिष्ट पहचान आज भी कायम रखे हुए हैं। ब्रिटिश युग में अंग्रेज ड्राइवर हुआ करते थे। बाद में एंग्लो इंडियन बहुतायत में देखे जा सकते थे। और आज भी रेलवे के आसपास बसी पुरानी बस्तियों में ‘जूली’ फिल्म के ओमप्रकाश का दृश्य आम देखा जा सकता है। स्टेशन के चारों ओर दिन-रात रौनक होती है। न तो रेल और न ही रेल वाले सोते लगते हैं। किसी भी शहर में चाय या नाश्ते की मुश्किल हो रही हो तो देर रात भी नजदीक के स्टेशन के बाहर या अंदर एक कोशिश की जा सकती है। कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।
1853 में अंग्रेजों द्वारा मुंबई से ठाणें की मात्र 34 किलोमीटर की लंबाई से प्रारंभ की गयी रेल यात्रा अब एक लंबा सफर तय कर चुकी है। यह दुनिया की विशालतम रेल में से एक है। ब्रॉड-गेज, मीटर-गेज, नैरो-गेज, दार्जिलिंग, शिमला, श्रीनगर की ऊंचाइयों के साथ-साथ समुद्र के किनारे-किनारे कोंकण क्षेत्र से होते हुए दिल्ली व कोलकत्ता की जमीन के अंदर और हवा में रेल की पटरियों को बिछा दिया गया। मेट्रो और लोकल महानगरों की जीवन-रेखा बन गयी। लंबी दूरी की ट्रेन में हमने शताब्दी व राजधानी के साथ-साथ जनशताब्दी और गरीब-रथ चलाकर दो वर्ग खड़े कर दिए। राज व्यवस्था खत्म जरूर हुई है मगर पूंजीवादी प्रजातंत्र ने कई महाराजा समाज को दिए। इनके लिए पैलेस-ऑन-व्हील ट्रेन भी हैं। पता नहीं ये दक्षिण अफ्रीका के राजनीतिक घटनाक्रम का असर था या स्वतंत्र चिंतन, जो महात्मा गांधी ने रेल के संदर्भ में एक अलग दृष्टिकोण ‘हिन्द स्वराज’ में प्रदर्शित किया। वे इसमें एक दार्शनिक समाजशास्त्री के रूप में दिखाई देते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन रेलों के माध्यम से समाज का नकारात्मक गलत तत्व तीव्रता से इधर से उधर जा रहा है। शासक और व्यापारी वर्ग के लिए भी रेल अधिक उपयोगी और लाभदायक है। बचपन में चोर-उचक्कों से बचने के लिए, बक्सों और बैगों को पिता भी चेन से बांधा करते थे या नहीं? याद नहीं। मगर मैं ऐसा अब जरूर करता हूं। और बेटी को भी बताकर समझाकर भेजा था जब वो दक्षिण की स्कूल-यात्रा पर गयी थी। यह आज का सत्य है। फिर चाहे आप वातानुकूलित प्रथम श्रेणी में ही सफर क्यूं न कर रहे हों। शायद इन वर्गों में अब ज्यादा जरूरी हो गया है। बड़ी संख्या में असामाजिक तत्व रईस और उच्च वर्ग में पहुंच चुका है। और यह तीव्रतम रफ्तार से धंधा करने के लिए जल्दी से जल्दी गंतव्य तक पहुंचना चाहता है। यहां गांधीजी के हिन्द स्वराज का रेल तथ्य प्रामाणित होता-सा प्रतीत होता है। अब इसमें रेल का क्या दोष? यह हमारे समाज की अवस्था है तो फिर उसी तरह की तो व्यवस्था बनेगी। बहरहाल, इन सबके बीच में भी कई जिंदगियां नयी-नयी कोमल आशाओं के साथ इन रेलों में सफर करती है। नये विवाहित जोड़े का नये सपनों के साथ कहीं जाना तो बेटे का नयी-नयी नौकरी से घर छुट्टी पर आना। इस दृश्य को किसी बूढ़े मां-बाप की आंखों से देखें। स्टेशन पर छोड़ने आने वालों की आंखों से अनायास निकलते आंसू दिल भर देते हैं। और हम प्लेटफार्म पर जाने वाले को दूर तक हाथ हिलाकर विदा करते हैं

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May 08 2010

गर्मी में गर्मी का मजा लें

Published by Singh Manoj under Weekly Article

‘लोहा लोहे को काटता है’ पुरानी कहावत है। इसका भावार्थ सारगर्भित है, व्यवहारिक सत्य है और यहां उतना ही संदर्भित भी। जहर की काट के लिए जहर का इस्तेमाल ही किया जाता है। कहना बहुत आसान है मगर युद्धभूमि में गोले-बारूद का जवाब शराफत और इंसानियत से नहीं दिया जा सकता। गुंडे-मवाली के लिए पुलिस को भी कई बार डंडे बरसाने पड़ते हैं। पता नहीं क्यूं, मगर यह सच है कि ठंड में आईसक्रीम खाने का फैशन है। आधुनिक परिवेश में, खासकर युवकों से अधिक युवतियां-महिलाएं इसका आनंद उठाती हैं। पहाड़ों पर आईसक्रीम खाती हुई युवा पीढ़ी आम दिख जाएगी। शिमला के मॉल रोड पर सोफ्टी खूब बिकती है। यह प्रयोग मैंने भी किया तो पाया सचमुच इसे खाने में मस्ती आती है। स्वाद तो पूरा मिलता है ऊपर से ठंडी नहीं लगती। ठंडे पानी से नहाने पर ठंड भाग जाती है। यूरोप में विशेष अवसर पर बर्फ के पानी से नहाने की पुरानी प्रथा है। कई स्थानों में इसे पारंपरिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। ठीक इसी तरह से पहाड़ और ठंडे प्रदेश में शीतऋतु में घूमने जाने का मजा ही कुछ और है। तो क्या इन उदाहरणों में भी ठंड को ठंड रोकती है? हो सकता है। वैसे भीषण ठंड भी कम तंग नहीं करती। बर्फ गिरते देखना एक पर्यटक के रूप में कुछ समय के लिए अच्छा लग सकता है लेकिन वहां रहना पड़े तो समझ आएगा कि यह बेहद मुश्किल और कठिनाइयों से भरा होता है। मगर अमूमन हम ठंड में भी गर्म प्रदेश की ओर नहीं भागते। उसका आनंद लेते हैं। वर्षा ऋतु तो फिर मनमोहक होती ही है। तो फिर यहां सवाल उठता है कि हम गर्मी से क्यों भागते हैं? परेशान क्यूं होने लगते हैं? कहीं सृष्टि ने इसे बनाकर कोई गलती तो नहीं कर दी? चारों ओर हमारी प्रतिक्रियाओं को देखकर तो यही लगता है।
खुद देख लीजिए, हिल स्टेशन की ओर गर्मियों में पर्यटक भागे चले जाते हैं। कारण कई गिनाए जाते हैं। मसलन, अधिक तापमान से बचने के लिए। पहाड़ों की ठंडी हवा राहत प्रदान करती है। इन दिनों छुट्टियां भी होती हैं। लेकिन फिर पहाड़ों पर इस दौरान बहुत भीड़ हो जाती है। और कई बार तो धक्का-मुक्की वाली बात तक हो जाती है। होटलों में कमरे नहीं मिलते और अगर मिल भी जाएं तो दुगुनी कीमत पर। रेस्टोरेंट में छीना-झपटी जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। एक टेबल पर, जहां बैठकर आप कुछ भी खा-पी रहे हैं, इत्मीनान की अपेक्षा करते हैं मगर बगल में दो-दो लोग आपके टेबल छोड़ते ही बैठने के लिए खड़े मिल जाएंगे। बड़ा अजीब लगता है। कई बार तो खाना खाया ही नहीं जाता, अटपटा जो लगता है। होटल वाला भी आधा कच्चा-आधा पक्का खिलाने में यकीन करता है। खाने का वो स्वाद नहीं मिल पाता। ऊपर से हर जगह कतार ही कतार। ट्रेन में आरक्षण नहीं, कार पार्किंग में जगह नहीं, वायुयान पहाड़ों पर अमूमन कम ही जाते हैं और फिर सभी इससे सफर भी नहीं कर सकते। हालत इतने बदतर हो जाते हैं कि शिमला हो या मसूरी या फिर नैनीताल, इनकी मॉल रोड पर लोग आपस में टकराने लगते हैं। ऐसा लगता है कोई मेला हो, जुलूस निकल रहा हो। छोटे-बड़े स्थानीय पहाड़ी क्षेत्रों में भी यही नजारा होता है। फिर मध्य प्रदेश का पंचमढ़ी हो या दक्षिण का ऊटी या फिर पूर्वोत्तर में शिलांग-दार्जीलिंग इत्यादि। ऐसे में अगर कोई छोटा बच्चा बिछड़ जाए तो उसे ढूंढ़ना तक मुश्किल हो जाता है। पानी की बोतल नहीं मिलती तो होटल की प्लेट कई बार साफ नहीं होती। अर्थात अराजकता का माहौल होता है। कई बार छुट्टी बिताने का आनंद भागमभागी में ही बीत जाता है। फिर भी हम इन्हीं दिनों जाते हैं। यह बीमारी हम हिन्दुस्तानियों में ही नहीं है। विश्व की अन्य सभ्यताओं में भी अधिकांश आम परिवारों के द्वारा यही गलती की जाती है। इसे भेड़चाल कह सकते हैं। क्या गर्मी इतनी कष्टदायक है? शायद नहीं। भीषणता और तीव्रता के पैमाने पर ठंड और गर्मी दोनों बराबर से तंग करती है। फिर भी ठंड के लिए हमारे मन में एक सकारात्मक दृष्टिकोण है तो गर्मी के लिए नकारात्मक। आखिरकार ऐसा क्यों? जबकि प्रकृति का संतुलन हर जगह बराबरी से मिलेगा।
विश्व इतिहास पर प्रकाश डालें तो रेगिस्तान और बर्फीले प्रदेशों में मानवीय सभ्यता का विकास बड़ी मुश्किल से हुआ। दूर-दूर तक फैली रेत हो या बर्फ, देखने में सफेद चादर-सी बिछी दिखाई देती है। दोनों ही स्थानों पर अटूट शांति लगेगी, सिर्फ हवाओं का शोर होता है जो कई बार भयावह लगता है, यहां प्रकृति बहुत बेरहम होती है। मनुष्य ने इन दोनों स्थानों को भी अपना आशियाना बनाया। एकमात्र मानव हर जगह पाया जाने वाला प्राणी है। हां, इन दोनों जगह पनपी सभ्यताओं में जुझारूपन मिलेगा। ये शारीरिक रूप से मजबूत और दृढ़ इरादे वाले होते हैं। सदा प्रकृति से लड़ने को तैयार। मानव के विकास की कहानी रोचक है। इन जगहों पर जीवन सुस्त मगर संघर्षरत है। जबकि मैदान में रहने वाले मानव ने अपनी आदतों के साथ खिलवाड़ कर रखा है। वो बात-बात पर शरीर के लिए आराम के बहाने ढूंढ़ता है। उसने ठंड में हीटर का इंतजाम कर लिया तो गर्मी के लिए एसी-कूलर पैदा कर दिए। और फिर धीरे-धीरे अपने लिये इन्हें जरूरी बना लिया।
क्या वास्तव में इनकी इतनी आवश्यकता है? बिल्कुल नहीं। इसमें भी गर्मी को तो बेवजह ज्यादा बदनाम किया जाता है। सौतेला व्यवहार तो कला-साहित्य ने भी ग्रीष्म ऋतु के साथ कम नहीं किया। वसंत के उल्लास भरे गीत से सीधे वर्षा ऋतु के प्रेम-गीत पर चला गया। लेकिन क्या बीच में ग्रीष्म ऋतु के बिना इनका अस्तित्व संभव था? यही क्यूं, खाने-पीने के शौकीनों ने भी गर्मियों को नाहक बदनाम कर रखा है, जबकि फलों का राजा आम इसी मौसम में आम जनता को दर्शन देता है। जितनी अधिक गर्मी पड़ती है उतना ही इसका स्वाद बढ़ता है। रसीले तरबूज-खरबूज प्रकृति के बेहतरीन तोहफे, इसी मौसम में आते हैं। यही नहीं फलों व सब्जियों की एक लंबी सूची है जो इसी दौरान सृष्टि ने हमें दे रखी है। रसभरी, ब्लैक करंट, स्ट्राबरी, चेरी इतनी विशिष्ट प्रजातियां क्या किसी और मौसम में होती है? काला जंगली बेर और लाल बेर इसी मौसम में होता है। इसमें कई प्राकृतिक गुण हैं। गर्मी को बदनाम करने वालों को जानकार हैरानी होगी कि पहाड़ों पर भी इसी मौसम में सबसे अधिक फल आलू-बुखारा, खुमानी, आड़ू आदि आते हैं। सब्जियों में बड़ी सैम, ब्रोकलि, गाजर, फूलगोभी, ककड़ी-खीरा आदि का स्वाद जो इस मौसम में है अन्य दिनों में नहीं। विज्ञान की बदौलत यूं तो चाहे जब खा लें, लेकिन वो बात नहीं मिलेगी। राजस्थान गर्म प्रदेश है। यहां का काफी बड़ा क्षेत्र रेतीला और रेगिस्तान है। मगर यहां की सभ्यता रंग-बिरंगी है। यहां की संस्कृति में आपको सबसे अधिक रंग मिलेंगे। शायद दूर-दूर तक फैली सफेद रेत के कैनवास पर मानव ने अपने रंगों से भरने की कोशिश की है। अमूमन गर्मी में हल्का खाने को कहा जाता है लेकिन यहां भोजन तीखा और तेज खाया जाता है। हो सकता है यहां भी गर्मी गर्मी को काटती हो? और कुछ नहीं तो कम से कम इंसान के खून में गर्मी तो पैदा कर ही देता है। तभी तो यहां का इतिहास युद्ध में बलिदान व खून से रंगा हुआ है।
हो न हो, सभी को अपने-अपने बचपन की गर्मियां जरूर याद आती हैं। स्कूल से एक लंबी छुट्टी का मिलना, नये कक्षा में जाने का उत्साह। और उससे अधिक दादा-दादी व नान-नानी के पास जाने की मस्ती। खेत-खलिहान देखने का मौका मिलता। कुएं के पानी से नहाने की मटरगश्ती। इन रिश्तों के प्रेम में डूबी गर्मी की छुट्टियों की गर्माहट हर वर्ष याद रहती। और तमाम उम्र रची-बसी रहती। नुक्कड़ पर मिलने वाले बर्फ के रंगीन गोले का मजा, आईस-कैंडी वाले की गली-गली आवाज और गन्ने व बेल का शरबत पी-पीकर नयी पीढ़ी तैयार होती।
प्रकृति का हर सृजन बेहद खूबसूरत है। उसमें विविधता है। हमने एसी की कृत्रिम ठंडी हवा से गर्मी को दूर जरूर कर रखा है लेकिन जाने-अनजाने अपने शरीर को कमजोर बना दिया। इन एसी की ठंडक ने एक तरफ हमारे खून को ठंडा किया है तो दूसरी ओर अपने बाहरी वातावरण को और अधिक गर्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हम एक गलत चक्र में फंसते जा रहे हैं। यह हम भूल जाते हैं कि यही कृत्रिम ठंडी बिजली पी रही है जो फिर नदियों को सुखाकर पर्वतों को उजाड़ रही है। वे सभ्यताएं, जो नदियों के किनारे पली-बसी हैं, का जाने क्या हश्र होगा? गंगा-जमुना और इसी तरह की बड़ी नदियों के किनारे रहने वालों को पता होगा कि शाम से यहां पर कितनी मदहोश कर देने वाली हवा बहती है। गर्मियों में छत पर, आंगन में, यहां तक कि मोहल्ले में घर के सामने की सड़कों पर सोने का आनंद ही कुछ और था। जो किसी बंद कमरे में नहीं आ सकता। नयी सभ्यता के नये रंग-ढंग ने संस्कृति की इस बेहद प्राकृतिक व सामूहिक घटनाक्रम व दृश्य को अपने अंदर समेट कर नष्ट कर दिया। हमारे सारे विज्ञानजनित प्रयत्न गर्मी के प्रकोप को वास्तव में किसी न किसी रूप में बढ़ाते ही हैं और हमें उसके आनंद लेने से वंचित करते हैं। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि गर्मी को अब पहाड़ों पर भी महसूस किया जा सकता है। मैंने हिमाचल में कुछ वर्ष बिताये हैं। वहां भी, हिमाचल के द्वार-नगर परवाणू ही नहीं, अब तो ऊपर शिमला में भी एसी-कूलर लगाना पड़ता है। ये वो जगह हैं जहां कुछ समय पूर्व तक पंखें भी नहीं होते थे। है न कमाल! हमारी नादानियों का दुष्प्रभाव!! अगर यही रफ्तार रही तो शिमला रेगिस्तान होगा। फिर हम कहां जाएंगे? किस ठंडे प्रदेश में? फ्रिज के ठंडे पाने से बाहर निकलिये, मिट्टी का घड़ा लेकर आएं। एक बार इसका पानी पीकर तो देखें। इसकी सौंधी खुशबू और स्वाद किसी भी ठंडे कोक व पेयजल में नहीं मिल सकता। और पसीना निकलने दीजिए, यकीन मानिए आपकी शारीरिक गंदगी निकल रही है। मुफ्त में। और आप स्वस्थ हो रहे हैं। इसी संदर्भ में एक पौराणिक परंपरा याद आ रही है। हिन्दू धर्म प्रकृति प्रेमी भी है, तभी तो जून की भीषण गर्मी में निर्जला एकादशी का पावन त्योहार आता है। यह उत्सव नहीं। शांत, गरिमापूर्ण और पवित्र पर्व है। समस्त पापों से स्वयं के शुद्धीकरण के लिए। इसी गर्मी के मौसम में, प्राचीन धर्म के गहरे रहस्य को जानने-समझने के लिए हमें एक दिन का उपवास करना होगा। शायद तब हम समझ सकेंगे गर्मी के महत्व को। जो दूर भागने से नहीं पेड़ की छांव के नीचे मिलता है।
मनोज सिंह

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