विज्ञापन की दुनिया


December 31, 2012

विज्ञापन कला है। उसका अपना रचना संसार है। उसकी अपनी विशाल दुनिया है। इस क्षेत्र में सृजनशीलता है। यह चित्र भी हो सकता है चलचित्र भी। यहां उद्देश्य है। इसमें संदेश है। और तो और हर एक विज्ञापन में एक कहानी है। इसके पात्र हैं जिनके भिन्न-भिन्न चरित्र हैं। उनकी संवेदनाएं हैं। ये कई बार मूक होकर भी बहुत कुछ बोल सकते हैं। इसका प्रभाव अमूमन तुरंत पड़ता है और गहरा हो सकता है। यह दूसरी रचनाओं की तरह समाज से लेते हैं तो बदले में देते भी हैं। मगर उनका लक्ष्य और कार्यक्षेत्र अन्य साहित्य, कला और रचनाओं से थोड़ा-सा अलग हटकर होता है। विज्ञापन सामाजिक, राजनैतिक या व्यावसायिक आदि-आदि हो सकते हैं। मगर मूल रूप से दर्शक-पाठक को अपनी बात से, किसी भी तरह, प्रभावित करना या अपने तथ्य उन तक पहुंचाना, हर एक में प्रमुख होता है। ऐसा न हो पाने पर ये निरर्थक, व्यर्थ और अर्थहीन तक कहे जा सकते हैं। इनका फलक सीमित मगर गहन होता है। और ऐसा न होने पर वे अपनी मंजिल से दूर नजर आते हैं। विज्ञापन के क्षेत्र में समय और स्पेस की भी सीमाएं हैं। थोड़े और छोटे में अधिक से अधिक कहना-बोलना होता है। वो भी तीव्र गति से। अन्यथा नोटिस न लिये जाने का खतरा यहां नहीं लिया जा सकता। ऊपर से इनके लिए अधिक से अधिक आमजन से जुड़ना जरूरी है। ये विशिष्टताएं हैं जो अन्य साहित्य और कला से इसे अलग करती हैं। और फिर सिर्फ जुड़ना या प्रभावित करना ही नहीं, अपनी बात सही-सही समझाना व बहुत हद तक मनवाना भी है। इसी कारण से स्वाभाविक रूप में विज्ञापन के पात्र, उनका चरित्र, रहन-सहन, भाषा और परिवेश आमजन से जुड़े व आम जीवन के नजदीक नजर आने चाहिए। और फिर उसमें निहित मूल संदेश भी अवाम से कहीं न कहीं संदर्भित होना चाहिए। इसमें समाज की भलाई, उन्नति, विकास या सेवा-भाव का विषय हो सकता है। यह एक आदर्श स्वरूप है। मगर इसमें व्यावसायिकता के आते ही तमाम सकारात्मक पक्ष दूसरे पायदान पर खिसकने लगते हैं।

विज्ञापन का रचयिता, वैसे तो अन्य कलाकारों की तरह पूरी तरह स्वतंत्र है। वो अपने रचना-संसार को अपने ढंग से देख-परखकर परोस सकता है। मगर चूंकि यहां थोड़े में अधिक और तीव्रता से संदेश पहुंचाना है तो इसके लिए उसे विशेष प्रयोजन करने पड़ते हैं। अमूमन भावनात्मक पक्ष को उभारा जाता है। संवेदनशील संबंधों, जनभावनाओं, प्रचलित वाक्यों व सामाजिक प्रचलन का जमकर उपयोग किया जाता है। प्रतीकों-बिम्बों का सहारा भी खूब लिया जाता है। यहां किसी को भी चरित्र बनाया जा सकता है। मनुष्य के अतिरिक्त जानवर और अब कंप्यूटरजनित पात्र। इस दौरान कभी-कभी ये अधिक काल्पनिक भी हो जाते हैं। इन सबके बावजूद, दूसरों के द्वारा सराहे, समझे व सफल माने जायेंगे या नहीं, जरूरी नहीं। एक प्रमुख तथ्य जो इन रचनाकारों को अन्य से अलग करता है, वो है, इन्हें उद्देश्य, मंजिल, लक्ष्य पहले बता दिये जाते हैं, जिसके आधार पर सारा रचना-संसार खड़ा करना पड़ता है। यह उनकी कार्य-पद्धति व शैली को विशिष्ट बना देता है। टारगेट को ध्यान में रखकर कल्पना-संसार में ऊंची उड़ान भरना, कठिन मगर रोचक होता है। यही कारण है जो, बाजारवाद के युग में जब कुछ न कुछ बेचना ही उद्देश्य रह गया हो तो, उसने इस क्षेत्र में कई परिवर्तन कर डाले। कई दूसरे पक्ष और मुद्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया। बाजार को अपनी चकाचैंध की ओर आकर्षित करना है तो उसने हर एक को सजाकर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। फिर चाहे वो उपभोग की वस्तु हो, सेवा या चिकित्सा की सुविधा। यही नहीं, इसके चक्कर में उसके तमाम चरित्र सजे-धजे, सुंदर और स्वस्थ नजर आते हैं। घर भव्य और आकर्षक होता है और रहन-सहन में अमीरी झलकती है। जो समाज की हकीकत से कोसों दूर है। मगर बाजार के विज्ञापन को इससे क्या? वो अपने उद्देश्य में सफल है। वो तो उल्टे मानवीय कमजोरी का भरपूर लाभ उठाता है। उसकी इच्छाओं और चाहतों को उभारता है। तभी तो विज्ञापन देख-देखकर, दर्शक उनके जैसा बनने के चक्कर में और अधिक खरीदारी करते हैं। वेशभूषा, आभूषण, घर की साज-सज्जा, खान-पान, रहन-सहन, जीवनशैली से जुड़ी तमाम वस्तुओं का प्रदर्शन जाने-अनजाने ही दर्शक को ये सब खरीदने के लिए प्रेरित करता है। मगर इस चक्कर में विज्ञापन की दुनिया समाज व उसके हित से कितनी दूर हो चुकी है, अब यह किसी से छिपा नहीं। कई बार अति होती नजर आती है। और कभी-कभी अब तो देखी व झेली भी नहीं जाती। वैसे तो इसका प्रभाव पूरे समाज में पड़ा है। मगर हो न हो इसने सर्वाधिक असर मध्यमवर्ग पर डाला है। यह एक बड़ा वर्ग है जो अत्यधिक क्रियाशील और खरीददारी करता है। तभी तो बाजार ने रोज दीवाली मनायी और पूंजीवाद ने सफल पूंजीपति दिये।

बाजार के विज्ञापन ने समाज को एक नया वर्ग भी दिया। छद्म नायक-नायिकाओं का। यह मात्र फिल्म व टीवी सीरियल की कहानी के नायक नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक बना दिये जाते हैं। सर्वप्रथम इनका आभामंडल बनाया जाता है। इनका काल्पनिक चरित्र रचा जाता है। वैसे तो ये अमूमन अपने-अपने क्षेत्र के शीर्ष व सफल व्यक्ति होते  हैं। मगर इनके बारे में जबरन दिलचस्पी व आकर्षण पैदा किया जाता है। बड़ी चतुराई से इनकी खबरों को आम जनता की बातचीत का आधार बनवाया जाता है। इनके बारे में रोचकता पैदा की जाती है। काल्पनिक किस्से-कहानियां गढ़ी जाती हैं। इस तरह इन्हें आम से विशेष बनाकर फिर इनका उपयोग किसी माल या सेवा को बेचने के विज्ञापन में किया जाता है। ये अपने नाम व कृत्रिम व्यक्तित्व के आकर्षण के कारण आम लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और माल बिकवाने में अधिक तेजी व तीव्रता से प्रभाव डालते हैं। इनकी लोकप्रियता का सहारा लेकर किसी भी माल की जानकारी रातोंरात घर-घर पहुंचा दी जाती है। यह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। दुर्भाग्यवश यहां विज्ञापन की कलात्मकता का कम नकली नायक के नायकत्व के प्रभाव का उपयोग अधिक किया जाता है। बाजार का यह प्रयोग अत्यधिक सफल रहा। ऐसा करके कई कंपनियां लाखों-करोड़ों कमाने में सफल हुई और बदले में विज्ञापन के नायक-नायिका को भी अच्छी-खासी रकम मिली। कई बार तो यह उनके कार्यक्षेत्र में मिलने वाले पारिश्रमिक से भी कहीं अधिक होता है। बाजार के शब्दों मे सबको लाभ हुआ। मगर असल में विज्ञापन अपनी मूल कीमत गंवा बैठा। यह विज्ञापन का एक ऐसा पक्ष है जिसने व्यवसाय में पक्की घुसपैठ रखने के चक्कर में अपनी नयी पहचान रच दी। और अब यह हर दूसरे क्षेत्र में बैठे अपने नायकों का हित साधने में मदद भी करता है।प्रतिस्पद्र्धा में पड़कर विज्ञापन ने कई स्थानों पर समाज की धारणाओं को भी तोड़ा है तो कई बार कुछ नये के चक्कर में लक्ष्मण-रेखा को पार करते हुए असामाजिक चरित्रों तक का निर्माण कर डाला। यकीनन इस खरीद-फरोख्त के चक्रव्यूह में फंसकर विज्ञापन ने समाज में अश्लीलता व अराजकता भी फैलायी है। युगों-युगों से स्थापित पारिवारिक संबंधों, आस्थाओं, अटूट विश्वास और संस्कार की धज्जियां उड़ा दी गयीं। विज्ञापन अपने मूल उद्देश्य से कब भटक गया उसे स्वयं नहीं पता। बहरहाल, इसने एक नयी संस्कृति को जन्म दिया जो काल्पनिक होने के कारण खोखली है।यूं तो तमाम व्यावसायिक प्रक्रिया में माल बेचना ही प्रमुख उद्देश्य होता है। मगर विज्ञापन मूल रूप से है तो कला ही। बहरहाल, कला को व्यावसायिक होते हुए देखना भी अपने आप में एक अलग अनुभव है। किसी भी विज्ञापन में कला और व्यवसाय का प्रतिशत कितना है, यह समीक्षकों के लिए एक अतिरिक्त पैमाना हो सकता है। यकीनन विज्ञापन, संदर्भित समाज से संबंधित होता है और उसके निरंतर संपर्क में रहता है। यह कहना कि विज्ञापन समाज पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डालते, कहना गलता होगा। इसमें तो कल्पना-संसार का एक पूरा भ्रमित-जाल बुना जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में आधुनिक भारत के विज्ञापन की दुनिया में पश्चिमी समाज की संस्कृति और सभ्यता का वर्चस्व रहा है। और इसने बड़ी चतुराई से धीरे-धीरे भारतीय समाज को पश्चिमी रंग-ढंग में ढाल दिया। भारतीय संस्कारों और संस्कृति को भी बाजार का ऐसा रंग चढ़ाया गया कि मूल सभ्यता कहीं नजर ही नहीं आती। विज्ञापन के चरित्र, उनकी भाषा, रहन-सहन, परिवेश, यहां तक कि सोच भी, सब कुछ पश्चिमी समाज के नजदीक लगते हैं। यह सब कुछ इस तरह दिखाया जाता है कि लोग इसकी परिकल्पना करके इसके पीछे भागने लगे। यह कल्पना-संसार हकीकत से कोसों दूर है और जिसका प्रभाव दूरगामी होगा। यह अहितकारी भी हो सकता है। मगर आदमी की मृगतृष्णा की फितरत को बाजार ने खूब इस्तेमाल किया। पिछले दिनों, कुछ एक विज्ञापनों ने रुककर सोचने के लिए मजबूर किया था। इस बार उनका एक सकारात्मक पक्ष उभरा था। इनमें एक आशा की किरण दिखायी दी, जब कुछ एक विज्ञापन के चरित्रों ने अपनी ओर ध्यान आकर्षित किया था। ये आम भारतीय लग रहे थे। साधारण पुरुष और महिलाएं, जो हर दूसरे गली-मोहल्ले में आम देखे जा सकते हैं। परिवेश सामान्य था। महिला-पुरुष सांवले एवं आम नागरिक की तरह होते हुए भी अच्छा प्रभाव छोड़ रहे थे। शारीरिक रूप से कोई मोटा तो कोई पतला। कई तो मोटे-मोटे चश्मे में नजर आये। कइयों की उम्र अधेड़ और बाल खिचड़ी हो रखे थे। कई कम बाल वाले भी दिखाई पड़े तो कई तोंदवाले भी थे। सीधे-सरल शब्दों में कहें तो ये हिन्दी फिल्मों के चाकलेटी हीरो-हीरोइन नहीं थे। और न ही खेल-जगत में पैदा किये गये नकली भगवान। ये सभी आमजन लग रहे थे। जो किसी भी घर-परिवार का एक सदस्य हो सकता है। मगर ये स्वयं को दर्शकों से अधिक जोड़ पाने में सफल हो रहे थे क्योंकि विज्ञापन का निर्देशन उमदा था। यकीनन ये खरीददार को भी अधिक प्रभावित करेंगे। लगता है अन्य विज्ञापन बनाने वाले कला-प्रेमियों की निगाह में भी यह बात आई है। तभी इस तरह के सामान्य विज्ञापनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सच भी है बड़े-बड़े सितारों के खर्चे और नखरे से बचकर अगर प्रभावी विज्ञापन बन जाये तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। वरना नकली नायकों की हवा की बातें कुछ दिनों बाद हवा में ही उड़ जाती हैं और नीचे धरातल पर कुछ नहीं रह जाता।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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