सृजन रोग


November 26, 2012

दुनिया में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां बच्चों ने बड़े-बुजुर्गों को मात देते हुए छोटी उम्र में ही बड़े-बड़े विश्व कीर्तिमान स्थापित कर दिये तो कई बुजुर्गों ने अच्छी-बड़ी उम्र में उन कामों को किया जो कई जवान अपनी तमाम अच्छी उम्र में नहीं कर पाये थे। ऐसे विशिष्ट-जन हर क्षेत्र में देखे जा सकते हैं। कहा जाता है कि परमात्मा की इन आत्माओं पर विशेष कृपा होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्ति विशेष में विशिष्ट गुण विद्यमान होने चाहिए। ये लाखों में एक होते हैं। वरना आमजन तो वर्षों तक प्रयासरत रहने के बावजूद जीवन में कुछ विशेष नहीं कर पाता तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे विरले भी होते हैं जो पहली ही बार में अपनी पहचान स्थापित कर लेते हैं। बिना किसी अनुभव के अपना लोहा मनवा चुके उदाहरणों की भी इतिहास में कमी नहीं है। इन अति विशिष्ट व लोकप्रिय लोगों के अतिरिक्त भी ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे जहां हर एक उम्र में निरंतर प्रयोग किये गये। विशेष रूप से कला, साहित्य व संगीत के क्षेत्र में। यह कोई जरूरी नहीं कि सभी को सफलता का चरम प्राप्त हो। यहां मात्र कुछ प्रयास करना भी कम प्रशंसनीय नहीं। यह सत्य है कि पढ़ने-लिखने-सीखने व कुछ करने की, कोई उम्र नहीं होती। वैसे तो कला-संगीत-साहित्य तपस्या है। अर्थात यहां साधना से ही निखार आता है जिसके लिए समय चाहिए। लंबे वक्त के लिए मेहनत वो भी एकाग्रता के साथ करनी पड़ती है। यहां स्वयं को जितना घिसा जाये उतनी ही चमक आती है। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो यह सबके बस की बात नहीं। इसे ईश्वरीय विशिष्ट-कार्य के रूप में लिया जाना चाहिए। यह सृजन का क्षेत्र है। बहरहाल, कला, संगीत व साहित्य के लिए उम्र, जाति, धर्म, समाज, देश, लिंग का कोई बंधन नहीं। छोटा-बड़ा, महिला-पुरुष, बच्चा-बूढ़ा, गरीब-अमीर, अनपढ़-ज्ञानी कोई भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है। यह दीगर बात है कि यहां आम आदमी एक दर्शक और पाठक तो आसानी से हो सकता है लेकिन हर एक सक्रिय होकर सृजन करने लगे मुश्किल है और सभी सृजनकर्ता अपनी पहचान भी स्थापित कर ले, सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो संभव नहीं। और इसीलिए इसे विशिष्ट क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। इसी चक्कर में अधिकांश कला-प्रेमी छोटी उम्र से ही इस क्षेत्र में प्रवेश कर प्रयासरत हो जाते हैं। 

विगत दिवस एक मित्र सहकर्मी के यह बताने पर कि उनकी और उनकी पत्नी, दोनों की एक-एक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है, सुनकर मैं हैरान हुआ था। वह एक सख्त किस्म के सरकारी अफसर है। और बहुत कम लोगों को अपने नजदीक आने देते हैं। एक रूखा व अव्यवहारिक व्यक्ति भी साहित्य सृजन कर सकता है, सोचकर ही अटपटा लग रहा था। मगर सच तो यह है कि किसी भी व्यक्तित्व को ठीक-ठीक समझ पाना इतना आसान नहीं। हर एक व्यक्ति के चारों ओर कई बाहरी परतें होती हैं। मगर सभी के भीतर एक दिल धड़कता है। यह अंदर दबा-छिपा बीज कब सभी आवरण को तोड़ते-फोड़ते हुए बाहर निकल अंकुरित हो जाये, कहना मुश्किल है। मन-मस्तिष्क भी कमाल करता है। यहां सभी का अपना एक संसार होता है, भिन्न-भिन्न विचार होते हैं, अपना-अपना कल्पना-लोक होता है, विशिष्ट अनुभव होता है। उसे मात्र शब्दों में ढालकर पन्नों में उतारने की ही आवश्यकता होती है और एक नयी रचना उपस्थित हो जाती है। यहां भी दोनों पति-पत्नी ने उम्र के इस पड़ाव पर आकर, जब बच्चों की जिम्मेवारियां न के बराबर रह गयी थीं, अपने-अपने अनुभवों को लिखकर लोगों में बांटने की कोशिश की थी। पुस्तक में लेखक के नौकरी व कार्यालय के अनुभव तो लेखिका के गृहस्थ जीवन के अनगिनत पक्ष अपने विशिष्ट अंदाज में प्रस्तुत हो रहे थे। ऐसा महसूस हुआ कि इस रचना प्रक्रिया ने उन दोनों को आनंदित किया था। पुस्तक प्रकाशित होने पर कितनी खुशी मिलती है वो एक लेखक ही जान व समझ सकता है। यहां तो दोनों पति-पत्नी की पुस्तकें एक साथ प्रकाशित होनी थीं। यकीनन वे इस दौरान अत्यंत सक्रिय और प्रसन्न रहे होंगे। रचना का अच्छा-बुरा, श्रेष्ठ या सामान्य होना, कला की दृष्टि के पैमानों पर उतारते हुए उसका विश्लेषण करना, आलोचकों का काम है। बहरहाल, उन्होंने अपने एक नये संसार को रचा और उसमें अपने जीवन के पल दिये, यह क्या कम है?

सृजन के क्षेत्र में निम्नतम या अधिकतम आयु की कोई सीमा नहीं होती। यहां तक कि शारीरिक अक्षमता भी रुकावट नहीं बन पाती। सच तो यह है कि इस क्षेत्र को किसी भी तरह से शब्दों में बांधकर परिभाषित नहीं किया जा सकता। यह ईश्वरीय-गुण कब किसे किस रूप में प्राप्त हो जाये, कहना मुश्किल है। कई बार तो कुछ एक उदाहरण देखकर हैरानी होती है। इस क्षेत्र में भी ऐसे कई मिल जायेंगे जहां लोग तमाम उम्र लिखते-पढ़ते रहते हैं मगर एक भी ऐसी रचना नहीं कर पाते जो पढ़ने योग्य भी हो। जो उन्हें अमर कर सके यह तो बहुत दूर की बात है। वहीं दूसरी ओर विश्व साहित्य में ऐसे कई महान लेखक मिल जायेंगे जहां उनकी प्रथम रचना ने ही उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया। संक्षिप्त में कहें तो इन क्षेत्रों में कोई पैमाना सदा के लिए सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। अनुभवहीनता कई बार सृजनता में सौंदर्य उत्पन्न कर देती है तो दूसरी ओर अत्यधिक अनुभव कभी-कभी सृजनकर्ता की मौलिकता को अपने बोझ तले दबाकर कुचल देता है। ऐसे भी उदाहरण मिलेंगे जहां जन्मजात नेत्रहीन ने बिना कुछ देखे मात्र अपनी कल्पना से उत्कृष्ट रचना रच दी तो ऐसे उदाहरण भी कम नहीं जहां समाज के तिरस्कृत व अनपढ़ लोगों ने लोक-साहित्य की रचना की और फिर तमाम उम्र घूम-घूमकर अपनी श्रेष्ठ रचनाओं के द्वारा समाज की सेवा करते रहे। कालांतर में इतिहास इन्हें अपने पन्नों पर स्थान देने के लिए स्वयं मजबूर हुआ।सृजनता में एक किस्म का नशा है, आकर्षण है, जुनून है। सृजन के रोग के कई फायदे हैं। इसे रोग कहने के कई कारण दिये जा सकते हैं। यह शरीर व मन-मस्तिष्क को अपने नियंत्रण में ले लेता है। जीवन के भौतिक, व्यवहारिक, अध्यात्मिक हर पक्ष पर प्रभाव डालता है। यह संक्रमण रोग का रूप धारण कर सकता है। अगर आप इसमें पूरी तरह से डूबे हुए हैं तो कुछ और कर पाने की संभावना कम हो जाती है। हां, कुछ और संबंधित रोग या लत जरूर लग सकती है। बहरहाल, कई साहित्यकारों को शारीरिक रूप से बीमार हालत में भी सृजन में डूबे होने के कारण मदमस्त जीवन जीते हुए देखा जा सकता है। वे इस दौरान अमूमन कुछ और सोच ही नहीं पाते, अतः चिंतामुक्त हो जाते हैं। लेखक अपने सृजन के संसार में इतना खोया होता है कि आमतौर पर उसे होश ही नहीं रहता। इस भावनात्मक बहाव के कारण जीवन की अन्य व्यवहारिक दिक्कतें और सांसारिक मुश्किलें कई बार अनजाने ही कहीं पीछे छूट जाती हैं। ध्यान न दिये जाने के कारण उसका व्यक्तिगत जीवन पर प्रभाव स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है। मगर इस चक्कर में रचनाकार अपनी पारिवारिक अहम जिम्मेवारियों से दूर रह जाता है। उन्हें निभा नहीं पाता और इसके कारण परिवार कई बार मुश्किल में पड़ जाता है। निकट संबंधी दुःख भोगते हैं। परिणामस्वरूप कई बार रिश्ते-संबंध टूटने लगते हैं। मगर सृजन में डूबा सृजनकर्ता बेफिक्र अपने आप में व्यस्त रहता है। दुनियादारी से दूर। तभी इन्हें समाज में सामान्य रूप से नहीं लिया जाता। और अति हो जाने पर मानसिक रूप से बीमार होने का इल्जाम तक लगा दिया जाता है। यह भी एक पक्ष है। अब क्या किया जाये, एक बार इसका नशा परवान चढ़ गया तो फिर उतरने का नाम नहीं लेता। हां, इसके भी कई लक्षण व गुण-अवगुण हैं, जो सभी पर बराबरी से लागू नहीं होते। हर एक का अपना-अपना स्तर भी होता है। किस हद तक रचनाकार रचना-कर्म में लीन है इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। वह जितना अधिक इस घटनाक्रम में स्वयं को केंद्रित करेगा उतना ही दुनिया से बेखबर होगा। तभी कई रचनाकार गरीबी और बदहाली व भूखे के स्थिति में भी प्रसन्नचित्त मिल जायेंगे।

बहुत हद तक सृजनता वृद्धा अवस्था के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है। यह व्यक्ति को स्वयं के साथ व्यस्त रखता है। सबसे बड़ी बात है कि इसमें किसी बड़े आर्थिक सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं। अधिक शारीरिक ऊर्जा भी जरूरी नहीं। अर्थात बिना किसी खर्चे व ऊर्जा व्यय के यह जीवन में सकारात्मकता ला सकता है। इससे जीवन जीने की एक नयी आशा बनती है। एक किस्म की चाहत पैदा होती है। इससे नयी ऊर्जा का संचार होता है। व्यक्ति मानसिक रूप से सक्रिय हो जाता है। अतः इसे वृद्धों के बीच में विशिष्ट गुण के रूप में ही चिन्हित किया जाना चाहिए। बशर्ते कि वह उसमें अति न करे। ऐसे कई वृद्ध मिल जायेंगे जो अपने अनुभवों को दूसरों के साथ बांटकर समाज का ऋण चुकाने की कोशिश करते हैं और जीवन में, अंतिम समय तक, कुछ न कुछ करने के लिए प्रेरित रहते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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