समाज की जिम्मेवारियां


November 16, 2012

पिछले दिनों विकलांगों को लेकर खूब हो-हल्ला मचाया गया था। मैं इसके पीछे के असली मकसद को आसानी से समझ न सका। यह सामने वाले की गलतियों को उजागर करना मात्र था या फिर शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों की पीड़ा को आक्रोश में बदलकर उस पर राजनीति की जा रही थी? चाहे जो हो, दोनों ही संदर्भ में यह बेहद अनुचित था मगर मीडिया ने इसे खूब सराहा और उछाला। मेरे अपने मत के पीछे कई कारण हैं। सर्वप्रथम, जो सिर्फ दूसरों की गलतियां निकालते हैं उनके व्यक्तित्व और मानसिकता पर टिप्पणी करना समय व्यर्थ करना है। दूसरे संदर्भ को देखें तो माना राजनीति हर मुद्दे पर की जाती रही है मगर एक ऐसे कंधों पर रखकर इसे खेलना जो ईश्वर-प्रकृति ने स्वयं कमजोर करके भेजी है क्या यह उचित है? हो सकता है, सेवा के नाम पर कुछ लोग, जाने-अनजाने ही सही, छोटी या बड़ी गलतियां या गड़बड़ियां कर रहे हों, लेकिन उन्हें आईना दिखाकर सेवा में सुधार के लिए प्रेरित करना बेहतर होता, कम से कम इस हद तक आरोपित नहीं करना चाहिए कि वो सेवाभाव से ही दूर हो जाये? समाज का एक वर्ग जो अपने जीवन से बिना किसी कारण स्वयं ही पीड़ित हैं उनके दुःख को सहलाने व हरसंभव सहयोग करना उचित होगा या उनकी भावनाओं को कुरेदते हुए उकसा कर परेशान करना? यहां सवाल उठना चाहिए कि हम हासिल क्या करना चाहते हैं? क्या हम समाज को सिर्फ यह दिखाना चाहते हैं कि सामने वाला गलत है, देखो उसने एक कमजोर को भी नहीं बख्शा? बस इतना ही? और उसके बाद? ठीक है यह मीडिया और राजनीति करने वालों के लिए एक मुद्दा तो बना मगर विकलांग तो हाशिये पर ही रहे। उग्र तमाशे और बयानबाजी की जगह अगर संबंधित तकलीफ-मंद की शारीरिक व मानसिक रूप से मदद करते हुए इस बात को शालीनता के साथ समाज के सामने रखा जाता तो इसका प्रभाव अधिक गहरा पड़ता। और तो और, नेतागिरी में हुए खर्चे और हो-हल्ला के पीछे की ऊर्जा से कहीं कम में काम बन जाता। खैर, आज के युग में सकारात्मकता की कल्पना करना व्यर्थ है। मुश्किल इस बात की है कि वर्तमान समय में राजनीति में समाज-सेवा का पुट पूरी तरह से नदारद है। मगर इस बात से अधिक मुझे इस प्रश्न ने झकझोरा कि उन विकलांगों पर अब क्या बीत रही होगी? अब इनके लिए दोनों ही पक्षों के पास वक्त नहीं होगा। आरोप लगाने वाला वर्ग अब तक दूसरे मुद्दों पर पहुंच चुका होगा। अर्थात विकलांग वर्ग इस प्रकरण के बाद और अधिक दुखी होगा। असल में दोषारोपण करने वालों ने उनकी पीड़ा को समझने की कोशिश ही नहीं की, अन्यथा वे राजनीतिक प्रदर्शन के साथ-साथ सेवा-कर्म को भी बराबरी से महत्व देते। क्या मानवीय समाज और राजनीति इस हद तक गिर चुकी है? मानसिक रूप से बीमार नायिका पर आधारित उपन्यास में एक शारीरिक रूप से अक्षम के चरित्र का चित्रण करने के दौरान मैं इनकी संवेदनाओं को नजदीक से देख पाया हूं और यकीन से कह सकता हूं कि वे इस तमाम घटनाक्रम के बाद अंदर से और अधिक टूट गये होंगे।

हम सभी को यह नहीं भूलना चाहिए कि ये जीवन है। और अगर उसकी सत्यता और प्रकृति के वीभत्स रूप को देखना हो तो किसी अनाथालय या फिर शारीरिक-मानसिक रूप से विकलांग लोगों के लिए बनाए गए विशिष्ट घरों में चले जायें। थोड़ी देर ठहकर कर शांति से देखें तो सोचने के लिए मजबूर हो जाएंगे। सबकी अपनी विशिष्ट समस्या और सीमाएं हैं। इन्हें कई वर्गों में बांटा जा सकता है। मानसिक रूप से विक्षिप्त मगर शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट लोगों को देखकर एक अजीब-सा अहसास होता है वहीं मानसिक रूप से स्वस्थ मगर शारीरिक रूप से अपाहिज लोगों को देखकर भिन्न भाव जागते हैं। एक और वर्ग है, जिन्हें अलग श्रेणी में रखना होगा, बुजुर्ग वर्ग। इनके परिवार वालों ने इन्हें साथ रखने से मना किया हुआ है जबकि उम्र के प्रभाव में वे शारीरिक रूप से असमर्थ हो चुके हैं। अब इसे ईश्वर की मनमानी कहें या प्रकृति का खेल, कई बच्चे विभिन्न चुनौतियों के साथ जन्म लेते हैं। कुछ शारीरिक तो कुछ मानसिक। विज्ञान ने इन चुनौतियों का सामना कर असमानता को पाटने की एक महत्वपूर्ण कोशिश की है। कई लोगों का जीवन बहुत हद तक जीने के लायक बना दिया गया। और वे स्वतंत्र होकर स्वावलंबी जीवन जीने के लिए सक्षम हैं। मगर यहां माता-पिता व समाज का रोल महत्वपूर्ण हो जाता है। कई ईलाज इतने महंगे और कई बार उपलब्ध न होने के कारण हरेक जरूरमंद तक नहीं पहुंच पाते, वो भी समय पर। ऐसे में एक जीवन किस तरह से नष्ट हो सकता है, इनके बीच में जाकर खोजा जा सकता है। दुःख-दर्द और संवेदनाओं की बात करने वाले इनके जीवन में झांककर देखें, यहां दुखों की कोई सीमा नहीं। हम आमतौर पर स्वीकार कर लेते हैं कि इनका तो जीवन ही ऐसा है। जरा-जरा सी बातों पर रिश्ते टूटने और तथाकथित सांसारिक प्यार में विरह-वेदना पर दुखों का पहाड़ खड़ा कर देने वाला मनुष्य पता नहीं क्यों इस ओर ध्यान नहीं देता? जहां तमाम उम्र एक पीड़ा के साथ जीना है। स्वस्थ पुरुष या महिला द्वारा अपने प्रिय के बिछड़ने से, फिर चाहे वो जिस भी कारण से हो, स्वयं को शराब में डूबो लेना, गमगीन कर लेना, गजल और शायरी लिखकर संवेदना प्रकट करना, ऐसे चरित्र हमारे दिल को बड़े छूते हैं। वहीं दूसरी ओर हर पल जीवन से लड़ते हुए जीने वालों पर हम मात्र दया दिखाने में विश्वास रखते हैं। उनके प्रति हमारी संवदेना नहीं होती। उनके दुखों को हम समझना नहीं चाहते। यह एक किस्म का मानवीय दोगलापन है जहां हम अपने आप को धोखा देते हैं। यहां तक कि इनके जीवन की मुश्किलों को दिखाने वाली रचनाओं में भी मौलिकता नहीं होती। साहित्य में इसे वो दर्जा नहीं मिल पाता जो प्रेम-श्रंगार के विरह भक्तों को मिल जाता है। फिल्मों में तो इनकी भावनाओं को बेचने के उद्देश्य के लिए ही रखा जाता है।

शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है। एक जो जन्मजात होते हैं और दूसरे जो किसी न किसी कारणवश बाद में शारीरिक रूप से अक्षमता का शिकार हो जाते हैं। सामान्य रूप से इनके व्यक्तित्व और व्यवहार को किसी परिधि में तो नहीं रखा जा सकता लेकिन फिर भी कुछ एक बातें इन दोनों वर्गों में अलग-अलग रंग-ढंग में पायी जाती हैं। मसलन जन्मजात वर्ग में अपनी दुर्बलता-सीमाओं को लेकर स्वीकारोक्ति अधिक होती है। उनमें जीवन के साथ समन्वय बनाते हुए चुनौतियों से लड़ने की ईच्छाशक्ति ज्यादा पाई जाती है। इनमें स्वाभिमान अधिक होता है। यह आमतौर पर दया-भाव पसंद नहीं करते। इनमें कुछ करने की ललक देखी जा सकती है। और कई किसी-किसी क्षेत्र में विरले और अत्यधिक गुणवान भी सिद्ध होते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो जन्मजात विकलांग होते हुए भी अपने-अपने क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध हुए। दूसरी तरफ दुर्घटनावश, बीमारी या किसी भी कारण से शारीरिक रूप से असमर्थ होने पर संबंधित व्यक्ति को सामान्य होने में वक्त लगता है। कई बार यह काफी लंबा भी हो सकता है। इस दौरान उनमें चिड़चिड़ापन और व्यक्तित्व में नकारात्मकता आ जाती है। सत्य को स्वीकारने में उन्हें वक्त लगता है। हीन भावना से ग्रसित होने की संभावना होती है। अवसाद भी हो सकता है। विशेष रूप ईश्वर के प्रति मन ही मन में आक्रोश कई रूप में उभरता है। प्रथम वर्ग जहां परिवार से सामंजस्य बनाकर चलता है वहीं दूसरा वर्ग जाने-अनजाने ही उसमें उथल-पुथल मचा जाता है। परिवार व समाज के अन्य सदस्य भी इन दोनों वर्गों से तालमेल बैठाने में भिन्न-भिन्न रूप से स्वयं को प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में कई बार दूसरों का व्यवहार इनकी मुश्किलें बढ़ा देता है।

मानसिक रोगी के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह स्वयं नहीं जानता कि वह सामान्य नहीं है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां दुःख में होते हुए भी व्यक्ति को स्वयं इसका अहसास नहीं होता। उसके सगे-संबंधी, जो उससे प्यार करते हैं, वो अधिक कष्ट भोगते हैं। और जो प्यार नहीं करते उनके लिए तो खैर ये कोई मुद्दा ही नहीं। इसमें एक वर्ग और है जो मानसिक रूप से बीमार होते हुए शारीरिक कष्ट भी भोगता है। वह किस हद तक जीवन से सामंजस्य बना पाता होगा यह सोचने और समझने वाली बात है। शायद दुःख और पीड़ा की चरम-सीमा यहां देखी जा सकती है। साहित्य, संस्कृति सभ्यता में इन लोगों के लिए तरह-तरह के विचार, भाव, व्यवहार समाज की जवाबदारी-हिस्सेदारी अपने-अपने रूप से परिभाषित की गई है और उसकी व्याख्या भी है। जो समय के हिसाब से बदलती रही है। कभी इन्हें ईश्वर का विशेष प्रिय भी माना गया। मैं एक लड़के से व्यक्तिगत रूप से मिल चुका हूं जो जन्मजात अंधा-बहरा और गूंगा था। परिकल्पना कीजिए उसके मस्तिष्क के बारे में जिसने न कुछ सुना हो और न देखा हो। अर्थात इस मानवीय संस्कृति व सभ्यता से पूर्णतः अनजान। हां, प्रकृति का अहसास उसे स्पर्श व गंध के माध्यम से कुछ हद तक हो पाता होगा। मगर उस बालक के चेहरे पर जो ओज, आकर्षण और आभा, मैंने देखी व अद्वितीय थी। ऐसा प्रतीत होता जैसे ईश्वर स्वयं विद्यमान हों। वह शारीरिक रूप से पूरी तरह तंदुरुस्त है। समय से पहले बूढ़े हो रहे मां-बाप ने उसे बड़े प्यार से पाला है। क्या एक परिवार का ऐसा भी जीवन हो सकता है? और अगर है तो क्यूं? इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं। सवाल तो अनंत हो सकते हैं, उदाहरण भी अनगिनत हो सकते हैं, मगर इसकी व्याख्या शब्दों में नहीं की जा सकती। और की भी नहीं जानी चाहिए। हां, समाज इस अप्रकृति को अपना अंग समझकर, जितनी खूबसूरती से निभा पायेगा, वह मनुष्य को उतना ही अन्य जानवरों से भिन्न घोषित करने के लिए काफी होगा।

आधुनिक युग में बुजुर्गों को जिस तरह से हमने अपने समाज में स्थान दिया है, कई तरह से कई बार सैकड़ों प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। सवाल तो हर काल में उठते रहे हैं मगर इस बार स्थिति भयावह है। ऐसा ही कुछ हाल विकलांगों के साथ भी है जहां हमने उन्हें मात्र विज्ञान का सहारा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। जबकि जीवन इसके आगे कुछ और भी चाहता है। एक प्यार का अहसास, अपनापन। पता नहीं हम क्यूं और कैसे इस सत्य को भूल जाते हैं कि हमें भी एक न एक दिन बुजुर्गों के वर्ग में सम्मिलित होना है। जीवन के इस खेल में हमें यह भी याद रखना चाहिए कि शारीरिक अक्षमता किसी भी रूप में किसी भी समय किसी को हो सकती है। इसीलिए, और कुछ नहीं तो कम से कम स्वार्थी बनकर ही इस क्षेत्र में कुछ ऐसा योगदान दिया जाये कि वे समय पड़ने पर स्वयं के लिए भविष्य में लाभकारी सिद्ध हो। सच कहें तो पुरुषार्थ विकलांगों के पास है जो प्रकृति की चुनौती को स्वीकार कर जीवन जीते हैं। हम तो उनके सामने आंख मिलाकर बात करने के योग्य भी नहीं।
मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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