सृजन की आलोचना


November 16, 2012

किसी भी मां के सामने उसके बच्चे की बुराई कीजिए और फिर तमाशा देखिये। वह पलटवार करते हुए बातचीत के दौरान आपको भला-बुरा कह सकती है। बहस के बीच में गालियां दे सकती है, झगड़ा भी कर सकती है। और कुछ नहीं तो बुरा तो मान ही सकती है। फिर चाहे वो बच्चा कितना भी नकारा, अयोग्य, बुद्धू-बेवकूफ ही क्यों न हो। यहां तक कि बड़े होने पर बदमाश, लोफर, लफंगा और शराबी-कबाबी बन जाने के बावजूद बेटे का पक्ष लेते हुए कई बूढ़े माता-पिता देखे जा सकते हैं। बदसूरत से बदसूरत बच्चा भी अपनी मां को अति प्रिय होता है। संक्षिप्त में कहें तो माताएं अपने बच्चों को बिना शर्त लाड़-प्यार करती हैं। अपने नवजात शिशु की सुरक्षा-पालन-पोषण प्रकृति का हर एक जीव-जंतु कैसे और किस हद तक करता है, देखना रोचक होता है। वैसे भी अच्छा-बुरा, सुंदर-बदसूरत, गुण-अवगुण बहुत हद तक मानवीय परिभाषाएं एवं पैमाने हैं। क्या प्रकृति की व्यवस्था में इसका कोई अस्तित्व है? बिल्कुल नहीं। शेर अत्यधिक आलसी होता है और इसलिए अधिकांश समय आराम करते हुए बिताता है, मगर उसका विशेष प्रभाव जंगल में स्थापित है। अजीब-अजीब किस्म के कीड़े-मकोड़े जिनके रंग-रूप और गंध हम मनुष्य की दृष्टि में अप्रिय हो सकते हैं, लेकिन इन सबका अपना-अपना अस्तित्व है। और ध्यान से देखें तो हर एक में अपना सौंदर्य है। शायद यह मनुष्य की बौद्धिकता का ही दुष्परिणाम है कि उसने शब्दों का तानाबाना बुनकर विचारों के माध्यम से भावनाओं, संवेदनाओं, इच्छाओं, चाहतों से लेकर जिंदा जीव-जंतु को भी भिन्न-भिन्न वर्गों में बांट दिया। नयी-नयी परिभाषाएं रच दीं। दुष्परिणाम इसलिए कि इन पसंद-नापसंद, अच्छा-बुरा यहां तक कि धर्म-अधर्म जैसे खतरनाक शब्दों के माध्यम से दो वर्गों में सबको बांट दिया गया और इनमें आपस में दुश्मनी पैदा कर दी गई। खतरनाक इसलिए कि इससे होने वाले दुष्प्रभाव से हम सब परिचित हैं। जिसे हम अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता के रूप में देखते हैं वह असल में मनुष्य की कुटिलता का ही एक बेहतर स्वरूप है। जहां स्वयं को बेहतर सिद्ध करने के लिए किसी को तो निकृष्ट बनाना ही होगा। और फिर यह खेल लंबा चलता है, चल रहा है। समाज के प्रारंभिक दौर से। अब तो इसके प्रभाव से कुछ भी नहीं बच पाता। मानवीय संवेदनाओं से लेकर रिश्ते, खान-पान, संस्कृति-सभ्यता, भाषा, कला-साहित्य सब कुछ, और इस अच्छे-बुरे के विश्लेषण में फंसकर लोगों को परेशान होते देखा जा सकता है।

क्या प्रकृति में किसी सृजन का विश्लेषण होते देखा है? नहीं। फिर चाहे वो जो मर्जी हो। आकाशपटल पर हर पल बदलते दृश्य अधिकांश के लिए नीरस हो सकते हैं मगर ध्यान से देखें तो हर रंग-रूप में वो अपने आप में अद्भुत, निराला और विशिष्ट है। ऐसा ही कुछ हर दूसरी प्राकृतिक रचनाओं के साथ है। सिर्फ देखने वाले की निगाह होनी चाहिए। मगर न जाने क्यों हम मानवीय कलाकृतियों, साहित्य, संगीत की हरवक्त हरसंभव आलोचना करने से नहीं चूकते। हर एक का विश्लेषण करना नहीं भूलते। यहां उल्लेखनीय है कि आलोचना करने वाला वर्ग सर्वप्रथम अपने आपको विशिष्ट और बुद्धिमान घोषित करता है। स्वयं का स्थान सुनिश्चित कर उसे समाज में स्वीकृत करवाता है। और फिर हर मानवीय रचना पर अपनी टिप्पणी की मोहर लगाने की प्रक्रिया को आवश्यक घोषित कर देता है। प्रश्न उठता है कि क्या इसकी जरूरत है? ये सवाल सर्वप्रथम उनसे पूछिये जिसने सृजन किया है। जवाब से कई गुत्थियां स्वयं ही सुलझ जायेगी। सच तो यह है कि रचनाकार को अपनी रचनाओं से किस हद तक लगाव होता है, शब्दों में कहना मुश्किल है। ऐसे में आलोचनात्मक टिप्पणी से उस पर क्या बीतती होगी? अंदाज लगाया जा सकता है। मैंने कई रचनाकारों के दिल में उतरकर जानने की कोशिश की है। अधिकांश कुछ कह तो नहीं पाते परंतु आमतौर पर आलोचकों की टिप्पणी को बरदाष्त भी नहीं कर पाते। जो अमूमन नकारात्मक होती है। क्या कभी आपने किसी आलोचना में खुलकर प्रशंसा व सकारात्मकता देखी है? सामान्यतः यह नामुमकिन है। और अगर कहीं उत्साहवर्द्धन किया भी जा रहा है तो मान लीजिए कि उसके पीछे कई अन्य कारण होंगे जो राज बनकर छिपे मिलेंगे।

हिन्दी साहित्य में तो यह खेल बड़े नाटकीय ढंग से चल रहा है। अमूमन इस पर विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों का कब्जा है। पाठ्य-पुस्तकों को पढ़ाते-पढ़ाते वे कब आलोचक बन जाते हैं, यह उन्हें खुद पता नहीं होता। वे हर नयी रचना पर बेझिझक होकर टिप्पणी तो कर देते हैं। मगर अगर उनसे पूछा जाये कि पाठ्यक्रम की सभी रचनाएं, क्या उच्चस्तरीय और उनके पैमाने पर खरी उतरती हैं? तो वे इसका सीधा-सीधा जवाब नहीं दे पायेंगे। कम से कम खुली टिप्पणी, वो भी नकारात्मक तो बिल्कुल नहीं कर सकते। मगर जिस अंदाज से हर नयी रचना पर वे कुछ भी कहने से नहीं चूकते, देखने लायक होता है। इस क्षेत्र में होने वाले इस खेल के कई मनोरंजक पहलू भी हैं। अधिकांश आलोचक रचना-धर्म से दूर मिलेंगे। एक आलोचक दूसरे आलोचक की टिप्पणी को स्वीकार नहीं करता। यही नहीं, उल्टे वह दूसरे की हर एक बात को काटने के लिए तत्पर रहता है। इसीलिए पुस्तक लोकार्पण और साहित्यिक चर्चा के कार्यक्रमों में, जो सबसे तेज या चालाक (सिर्फ बुद्धिमान कहना उचित न होगा) आलोचक होता है या कह लें जिसका नाम अधिक चलता है, वह अंत में बोलने के चक्कर में रहता है। जिससे वह पूर्व आलोचकों की आलोचना तो खुल के कर सके मगर उसकी आलोचना की कोई गुंजाइश न रहे। इसके लिए वह अपने से पूर्व कहे गये आलोचक वक्ताओं की बातों को जिस तरह से काटता है, सुनने लायक होता है। यूं तो कार्यक्रम में बोलने वालों का क्रम वरिष्ठता के हिसाब से रखा जाता है। लेकिन यह वरिष्ठता किस तरह से होती है? अब इसका कोई सुनिश्चित आधार तो है नहीं!! हां, उम्र और अनुभव को आमतौर पर पैमाना बनाया जाता है। यहां भी अपवाद होते हैं मगर फिर ऐसा किसी विशिष्ट आलोचक के लिए ही किया जाता है। ये अति विशिष्ट आलोचक अच्छे वक्ता होते हैं, अपनी बात को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करना जानते हैं, इनका बाजार में नाम होता है या फिर ये यह जानते कि कब-कहां-कैसे बोलना है। मीडिया इन्हें पसंद करता है और ये लोकप्रिय हो जाते हैं। ये अमूमन वाक्चातुर्य में माहिर होते हैं। इनकी पहचान बड़ी आसान है, ये सदैव कार्यक्रम के अंत में बोलते हैं। बहरहाल, इस आलोचना के खेल का मजा लेना हो तो किसी दो प्रतिस्पर्धी आलोचकों को एक कार्यक्रम में बुला लीजिए। फिर देखिये तमाशा। ये अपनी-अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने व प्रभाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। शब्दिक युद्ध-कौशल व राजनीति की क्षमताओं का खुलकर प्रयोग होता है। मगर अंत में बाजी वही मार ले जाता है जो सबसे आखिर में बोलता है। आलोचना की राजनीति का निचोड़ कहें तो यहां सारा खेल मुख्य अतिथि या अध्यक्ष बनने का है जिसके लिए जोड़तोड़ किया जाता है। ऐसे में कार्यक्रम संचालकों  व आयोजनकर्ता की स्थिति को समझ पाना आसान नहीं।सवाल उठता है कि यह कैसी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन है? क्या यही बुद्धिमानों की दुनिया है? फिर इसके समर्थन में चाहे जितने तर्क दिये जायें यह सरलता से गले नहीं उतरता। इस आलोचना की आलोचना करने का मन करता है। कई बातें स्वाभाविक रूप से उठती हैं। सच कहें तो आलोचनात्मक टिप्पणी संबंधित आलोचक की व्यक्तिगत राय ही तो होती है। तो फिर प्रश्न उठता है कि किसी की निजी पसंद-नापसंद किसी भी रचना को कैसे निरस्त कर सकती है? क्या आलोचक कुछ भी लिखने-बोलने से पूर्व इस बात का ध्यान रखते हैं कि पाठकों को क्या पसंद है? क्या वे इस दौरान कई बार बहुत अकादमिक नहीं हो जाते? क्या वे आलोचना के द्वारा रचनाकार को हतोत्साहित नहीं करते? क्या वे इस दौरान अपने शाब्दिक प्रहार से स्वयं की श्रेष्ठता और रचनाकार को हीन प्रमाणित करने का प्रयास नहीं करते? यह सत्य है कि कुछ रचनाएं बेहद सामान्य और अरुचिपूर्ण हो सकती हैं। मगर फिर ये उस रचनाकार के भाव हैं। उसका अपना रचना संसार है। उसकी अपनी सोच और दृष्टिकोण है। उसके अपने दायरे हैं। जिसे दूसरा पसंद करे न करे, जरूरी नहीं। जहां तक रही बात रचना की गुणवत्ता की जांच की अनिवार्यता के संदर्भ में, तो यह ठीक है कि चूंकि रचना व्यक्तिगत नहीं रह जाती इसलिए समाज में परोसे जाने से पूर्व इसका आकलन करना कुछ हद तक उचित है। ठीक है, मगर सवाल उठता है कि पाठक-समाज को क्या स्वीकार्य है, इसका फैसला करने का अधिकार आलोचकों को किसने दिया? किसी आलोचक को किसी भी रचना को निरस्त या प्रशस्त करने का क्या हक है? समाज अपने अच्छे-बुरे का फैसला स्वयं करने में सक्षम है। असल में आलोचना भी एक व्यवसाय बन गया है। इसमें बाजार के सभी गुण-अवगुण आ चुके है। फिर चाहे वो किसी किताब की समीक्षा हो या फिल्म समीक्षा। बेचने-खरीदने का धंधा यहां भी चालू है। परिणामस्वरूप यह कई बार पाठक-दर्शक को भ्रमित करता है।

 सच तो यह है कि जो भी रचना सरलता और सहजता के साथ सामान्य रूप से अवतरित होती है उसमें स्वयं का कोई न कोई सौंदर्य अवश्य होता है। जो किसी और को पसंद आये न आये उस रचनाकार को जरूर अति प्रिय होती है। वह उसका रचयिता है, जननी है। हमें उस ईश्वरीय शक्ति की सृजन प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए जिसे मनुष्य किसी रचना के रचने के दौरान महसूस करता है। इस घटनाक्रम में हम ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं। जहां आलोचना का कोई स्थान नहीं।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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