आरोपों की राजनीति


October 23, 2012

अगर आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं है मगर थोड़ी-सी हिम्मत रखते हैं तो आप किसी भी सफल और लोकप्रिय व्यक्ति पर झूठे-सच्चे आरोप लगाकर कुछ न कुछ तो बदले में प्राप्त कर ही सकते हैं। यह आरोप तरह-तरह से लगाये जा सकते हैं। लेकिन इसका असर अधिकतम तभी होता है जब यह आम जनता के बीच तक पहुंचे, जिससे संबंधित व्यक्ति की बदनामी हो। या फिर विभिन्न सरकारी सतर्कता संस्थानों में शिकायत भेजकर उसकी आय, संपत्ति व व्यवसाय आदि की उचित जांच की मांग की जा सकती है। लेकिन ऐसा करना सबके बस का नहीं। हां, कुछ खास लोगों में ये विशिष्ट (अव)गुण देखे जा सकते हैं। सरकारी कार्यालयों में एक-दो कर्मचारी ऐसे अवश्य मिल जायेंगे जिन्हें ड्यूटी से अधिक शिकायत लिखने-करने की आदत होती है। यूनियन भी ऐसे लोगों को पालकर रखती है। ये छोटे अधिकारी की शिकायत बड़े अधिकारी से और प्रभारी अधिकारी की शिकायत हेडक्वार्टर में किया करते हैं। ये कार्यालय में फाइलों को सूंघते रहते हैं। भ्रष्ट कर्मचारी-अधिकारी इनसे मिल-जुलकर रहने का प्रयास करते हैं, लेन-देन का प्रयास होता है, मगर फिर भी बात न बनने पर शिकायत कर दी जाती है। यही नहीं ये सच्चे व ईमानदार को भी झूठे आरोप में फंसाकर परेशान करने से नहीं चूकते हैं। इनसे आमतौर पर प्रशासन बचता है। ये एक तरह से ब्लैकमेलर का काम करते हैं। प्राइवेट संस्थानों में भी ऐसों की कमी नहीं। बस यहां की कार्यप्रणाली भिन्न होने की वजह से इनके तरीके थोड़े भिन्न होते हैं। ये मालिकों के लिए चुगलखोरी करते हैं। उनके कान भरते हैं। बदले में ऐश करते हैं। राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में भी ऐसे चरित्र मिल जायेंगे जिन्होंने अपना धंधा इसी से चमका रखा है।

 आरोप लगाने वाला उपरोक्त विशिष्ट वर्ग अमूमन बहुत निडर, बेशर्म एवं अति आत्मविश्वास से भरा होता है। ये वाक्चातुर्य की कला में माहिर होते हैं। इनके झूठ को पकड़ना नामुमकिन है, ये फंसने पर विषय ही बदल देते हैं। इनका चतुर, चालाक के साथ ही धूर्त और मौकापरस्त होना तो स्वाभाविक है। ये आमजन से अधिक बुद्धिमान मगर नकारात्मक सोच से ग्रसित रहते हैं। आमतौर पर मृदुभाषी और मिलनसार बनने के लिए प्रयासरत रहते हैं और अपनी मासूमियत प्रकट करने व स्वयं को सरल एवं सच्चा साबित करने का कोई मौका नहीं चूकते। हर किसी पर आरोप लगाना इनका स्वभाव होता है जो आगे जाकर पेशा बन जाता है। दुर्भाग्यवश इन्हें लोग जल्द पहचान लेते हैं मगर कुछ भी कहने-करने से बचते हैं। ऐसा नहीं कि इनके निशाने पर हमेशा भ्रष्ट और गलत व्यक्ति ही हो। समाज में अच्छे और भले लोगों की आज भी कमी नहीं। मगर इनको भी झूठ बोलकर फंसाने में ये विशिष्ट वर्ग माहिर होता है। असल में झूठे इल्जाम से और कुछ नहीं तो बदनामी और तंग तो किया ही जा सकता है। यही कारण है जो शरीफ और सामान्य व्यक्ति इनसे दूर रहने की कोशिश करता है। कौन बेवजह की चकल्लस में फंसे। और फिर कभी-कभी जाने-अनजाने में छोटी-बड़ी गलतियां हो भी जाती हैं। मगर आरोप लगाने वाला वर्ग तो इसी के इंतजार में सदा रहता है। बहरहाल, ये आरोप लगाने वाला वर्ग कभी काम नहीं करता और न ही उससे किसी साकारात्मकता की उम्मीद की जा सकती है। हां, हर काम करने वाले पर उंगली उठाने से जरूर नहीं चूकता। खैर, इनके चक्कर में लोग अधिक सतर्कता से काम करते हैं लेकिन कभी-कभी काम प्रभावित भी होने लगता है। ऐसे लोगों के अधिक पनपने पर आमजन डरकर सामान्य काम करने से भी बचने लगते हैं। ऐसी अवस्था में, कुछ न करके ही किसी जानी-अनजानी गलती से बचा जा सकता है, की मानसिकता उपजती है। फलस्वरूप कार्यालयों में निष्क्रियता और उदासीनता फैलती है। और अंत में नुकसान संपूर्ण व्यवस्था का होता है। मगर इससे आरोप लगाने वाले वर्ग को क्या? वो तो इससे एक कदम आगे बढ़कर लोगों के व्यक्तिगत जीवन में भी झांकता रहता है। और सामाजिक बदनामी करने से भी नहीं चूकता। इन लोगों का एक खतरनाक रोल और भी है, कई बार व्यक्तिगत हित साधने के लिए अपने दुश्मन के विरोध में इस तरह के लोगों का इस्तेमाल भी किया जाता है। इसके लिए कई तरह की आंतरिक सूचनाएं खुद इन लोगों को प्रदान की जाती हैं। मजेदारी तो यह है कि मौके का फायदा उठाकर आरोप लगाने वाला ये वर्ग कई बार दोनों ओर के मजे लूटता है। इस आरोप-प्रत्यारोपों में सामने वाला व्यक्ति-संस्थान जितना बड़ा होगा बदले में उतने ही बड़े लाभ की उम्मीद की जा सकती है। इसीलिए ये विशिष्ट वर्ग अपने सामथ्र्य और समझ में आने वाले सबसे शीर्ष व्यक्ति को घेरने के चक्कर में रहता है। ऐसा नहीं कि ये हमेशा ही अपने मकसद में सफल हो जाते हैं। कई बार सामने वाला पक्ष अधिक मजबूत व सशक्त निकला तो हाथ-पैर भी तुड़वा सकता है। मगर ये लोग अमूमन मोटी चमड़ी के निर्लज्ज प्राणी होते हैं। इसका सही-सही आकलन तो नहीं किया जा सकता कि इस तरह से आरोप लगाने वाला वर्ग स्वयं कितने प्रतिशत नुकसान या डर में रहता है? मगर यकीनन इसका प्रतिशत कम ही होता है। अर्थात अधिकांश अपने मकसद में, कुछ हद तक ही सही, कामयाब हो जाते हैं। और समाज में मस्ती करते हुए देखे जा सकते हैं। और कुछ नहीं तो मुफ्त की लोकप्रियता और झूठा डर व दबदबा तो हो ही जाता है।

ऐसा नहीं कि आरोप लगाने वाला हर व्यक्ति ही गलत होता है। या उसका आरोप सदैव झूठा होता है। विभिन्न व्यक्तिगत कारणों से तंग आकर, प्रताड़ित होकर कई बार आम आदमी इसका उपयोग अंतिम अस्त्र के रूप में करता है। मगर इस तरह के मामलों की प्रतिशत संख्या कम ही होती है। और जो होते भी हैं वे भावनात्मक एवं प्रतिशोधात्मक अधिक होते हैं। और फिर यह किसी व्यक्ति द्वारा किसी एक मामले तक ही सीमित होता है। मगर कोई समाज और राष्ट्र के लिए निःस्वार्थ भाव से निरंतर ऐसा करे, यह व्यावहारिक नहीं। फिर भी अगर ऐसा कोई कह-कर रहा है तो उसके कार्य की विश्वसनीयता एवं सत्यता को ध्यान से परखने पर बहुत कुछ समझा जा सकता है। आमतौर पर इस तरह के व्यक्ति-समूह की कोई न कोई व्यक्तिगत हित साधने की मंशा होती है। क्योंकि राष्ट्रहित में समाज की सेवा करने वाला व्यक्ति सिर्फ आरोप लगाने का काम नहीं करेगा, वह कुछ सकारात्मक कार्य भी करेगा। वह देशहित में अपनी ऊर्जा को सृजनात्मक रूप में लगाने के प्रयास में रहेगा। तभी सामाजिक कार्यकर्ता व आंदोलनकारी सदैव व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं। जबकि आरोप लगाने वाला समूह सिर्फ व्यक्तियों के पीछे पड़ा रहता है।

यूं तो आदर्श रूप में देखें तो आरोप लगाने की प्रक्रिया को सिर्फ नकारात्मक रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। यह एक तरह से कमजोर का शस्त्र है तो सामथ्र्यवान के लिए एक स्पीडब्रेकर। हर एक व्यक्ति जो सत्ता या संस्थानों में किसी भी जिम्मेवारी वाले कार्य का निष्पादन कर रहा है, उसको सतर्क करता है। और आरोपित होने का डर कई गलतियों को होने से रोकता है। यहां यह बात गौर करने वाली है कि आरोप लगाने वाले से अधिक आरोप को देखा जाना चाहिए। आरोप के समर्थन में प्रस्तुत किये गये साक्ष्य, तथ्य और तर्क अगर समुचित और प्रमाणित नहीं हैं तो इसका संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए। ऐसा कहा भी जाता है। शासकीय कार्यालयों में यह प्रचलन में भी है। अगर ऐसा न हो तो आरोप लगाने की राजनीति मुसीबत का एक नया अध्याय खोल सकती है। इसके परिणाम संबंधित कार्यालय, समाज और राष्ट्र के लिए दूरगामी व नकारात्मक और कई रूप में भयानक और अकल्पनीय भी हो सकते हैं।

 पिछले कुछ दिनों से इलेक्ट्रानिक मीडिया में आरोप लगाने का सिलसिला चल पड़ा है। ध्यान से देखें तो ये कई प्रश्न खड़े करता है। मीडिया अपनी पहुंच और शक्ति को जानता है। वो मिनटों में ही लाखों-करोड़ों दर्शकों तक पहुंच सकता है। ऐसे में किसी व्यक्ति के हाथ में माइक और सामने कैमरा हो, और अगर वो आरोप लगाने वाला उपरोक्त किस्म का चरित्र भी हो तो कितना तूफान खड़ा कर सकता है। किसी की भी पूरी जिंदगी की कमाई हुई पूंजी, व्यक्तिगत चरित्र, इज्जत, सामाजिक प्रतिष्ठा मिनटांे में खत्म की जा सकती है। और ऐसा हो भी रहा है। ऐसे में कल्पना करें जिसके ऊपर आरोप लगाया गया है या लगाये जाने की संभावना है, उसके पास इससे बचने के कितने रास्ते हो सकते हैं। अगर वह चुप रहता है तो कइयों के मन में संदेह बना रहेगा। और अगर अपना सही पक्ष भी रखना है तो फिर उसे उसी मीडिया का इस्तेमाल करना होता है जिसके माध्यम से उस पर आरोप लगाये गये हैं। ऐसे में अगर माध्यम स्वयं आरोप लगाने की प्रक्रिया का भागीदार रहा है तो वो सामने वाले की सफाई को उतनी ही बेबाकी और संतुलन से पेश क्यों करेगा? जहां तक रही बात बचाव के लिए न्यायालय में जाने की तो यह एक लंबी प्रक्रिया है। और इसमें उलझकर आदमी का संपूर्ण जीवन नष्ट हो सकता है। और फिर आप अगर जीत भी गये तो क्या आपकी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हो सकती है? क्या पैसों से बदनामी व बेइज्जती की भरपाई की जा सकती है? कदापि नहीं। सच पूछा जाये तो इस प्रकार से हर हाल में व्यक्तिगत हानि सुनिश्चित है। फिर चाहे कोई कितना भी सच्चा क्यूं न हो और उस पर झूठा आरोप ही क्यूं न लगाया गया हो। यहां व्यक्ति विशेष जितना बड़ा होगा वो उतनी ही अधिक प्रतिष्ठा गंवाता है। उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ होता है। इसलिए तो वह इन सबसे डरता है। मगर इससे डराने वाले की हिम्मत और बढ़ती चली जाती है। यही कारण है जो हर एक व्यक्ति ऐसे लोगों को अपने पक्ष में बनाये रखने का हरसंभव प्रयास करते हैं। यह तरीके अमूमन गलत होते हैं। यहां से शुरू होता है गलत नीतियों, भ्रष्टाचार आदि का एक नया अध्याय, जहां से समाज का संतुलन बिगड़ने लगता है। और आगे चलकर अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। 

यह सच है कि देश-समाज में आज असामान्य परिस्थिति है। लोगों में आक्रोश है। मगर क्या इस क्रोध को हवा दी जानी चाहिए? नहीं, बल्कि और अधिक सक्रियता के साथ शांति व सतर्कता से सोच-समझकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। मगर ऐसा हो नहीं रहा, मौके का फायदा उठाकर आरोप लगाने वाला वर्ग अति सक्रिय है। वो जनमानस के आक्रोश पर सवार होना चाहता है। क्या यह उचित होगा? क्या हम अपने कार्यालयों-संस्थानों का नियंत्रण ऐसे लोगों को देना पसंद करेंगे, जो दिन-रात आरोप लगाने, शिकायत करने और सिर्फ भड़काने का काम करते हैं? क्या घर-परिवार में नकारात्मक सोच के निठल्ले और अराजक सदस्य को महत्व दिया जाना चाहिए या फिर उसे जो कमाकर दो पैसे घर-परिवार में लाता है जिम्मेवारियां निभाता है और सबको साथ लेकर चलने में प्रयासरत रहता है? तो फिर देश और समाज में किसको महत्व दिया जाना चाहिए, को भी इसी दृष्टिकोण से देखना जरूरी है। यहां यह कहने का तात्पर्य नहीं कि आजकल लगाये जाने वाले अधिकांश आरोप गलत ही होंगे। मगर जिस तरह से ये लगाये जा रहे हैं, मीडिया ट्रायल हो रहा है, एक आरोप को उसकी मंजिल तक पहुंचाये बिना दूसरा प्रारंभ कर देना और फिर उसकी झड़ी लगा देना, मन में कई सवाल पैदा करता है। आखिरकार ऐसा करने का उद्देश्य क्या है? ऐसा करने से समाज को क्या हासिल होगा? और फिर जब आरोप लगाने वाला खुद ही उसका निर्णय भी सुनाने लगता है तो शंकाएं और अधिक बढ़ जाती है। और तो और जब वो उन्हीं को निशाने पर लेता है जिन्हें वो विस्थापित करना चाहता है तो उसका स्वार्थ व महत्वाकांक्षा जगजाहिर हो जाती है। बहरहाल, समाज इस मानसिकता के लोगों से निपटना जानता है, मगर जब अपने हित साधने के लिए मीडिया कुछ ऐसे ही चरित्रों का निर्माण करता है और इनके माध्यम से अपना निशाना साधता है तो स्थिति और भयावह हो जाती है। अवाम भ्रमित हो जाता है। यहां मीडिया को समझना होगा कि उसका मौलिक कार्य खबरों को दर्शकों तक पहुंचना है, न कि अपनी तरफ से इसे बनाना और निर्णय देना। रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए, वरना यह दिग्भ्रमित कर सकती है। मगर आज जिस तरह से वह अपने कर्तव्य और दायित्व से दूर होता जा रहा है उतनी ही स्वयं की विश्वसनीयता कम कर रहा है। क्या उसे भी यह याद दिलाना होगा कि आरोप लगाने वाले की समाज में क्या स्थिति रही है? और उसे किस रूप में लिया जाता है? उसे अपनी नयी पहचान गढ़ने से पूर्व इन बिंदुओं पर विचार करना होगा।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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