विचारों की आपाधापी


July 30, 2012

इलेक्ट्रॉनिक सोशल नेटवर्क साइट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अहसास किया जा सकता है। यह आम से खास के लिए लिखने-बोलने का खुला मंच है। यहीं से अवाम की मानसिकता और समाज की सोच को पढ़ा और देखा जा सकता है। यहां इसे परखा और जांचा भी जा सकता है। यूं तो इसका विश्लेषण करने पर कई तरह के तथ्य सामने उभरकर सामने आते हैं। मगर बड़ी-बड़ी बौद्धिकता की बातें करने से पूर्व इस बात को हमें स्वीकार करना होगा कि कई इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्कर अपनी बातों को सही ढंग से लिख भी नहीं पाते। अपना पक्ष रख नहीं पाते। सोचते कुछ हैं तो लिखा कुछ और जाता है। कभी-कभी अर्थ का अनर्थ हो जाता है। यह भी सच है कि अधिकांश नेटवर्कर तो कुछ सोचते ही नहीं हैं। और जो सोचते भी हैं उनमें सब लिखना नहीं चाहते। फिर ठीक भी तो है, लेखन भी तो एक कला है। निष्कर्ष निकलता है कि इस सोशल मीडिया को भी सैद्धांतिक रूप से प्रजातंत्र का प्रमाणिक उदाहरण घोषित नहीं किया जा सकता। चूंकि यहां भी अवाम की शतप्रतिशत भागीदारी नहीं। अर्थात ये नेटवर्कर सोशलिस्ट कहलाने से भी वंचित रह जाते हैं। बहरहाल, अंत में यहां भी फिर वही वाक्‌चातुर्य और शब्दों से खेलने वाले जादूगरों द्वारा सिक्का जमा लिया जाता है। और फिर विचारों का आतंक व विद्वानों का साम्राज्य यहां भी फलता-फूलता और फैलता है। इन सबके बावजूद समाज के प्रतिबिंब की धुंधली छाया यहां देखने को मिल जाती है। धर्म और राजनैतिक विचारधाराओं की प्रतिबद्धता से यह काल्पनिक समाज भी किस हद तक बंटा हुआ है, देखा जा सकता है। सत्ता और शक्ति के केंद्र में बैठे लोगों के इर्दगिर्द घूमते चापलूस यहां भी सक्रिय हैं। किसी भी नेटवर्कर की मित्र संख्या और उसके मतों पर आने वाली प्रतिक्रिया व उसे पसंद करने वालों की संख्या से उसके पद की ऊंचाई और उसकी विभिन्न शक्तियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। यकीनन यह व्यक्ति के (नकारात्मक) प्रभाव और उसकी शक्ति के दुरुपयोग का कमाल होता है जो उसके फूहड़ मतों को भी पसंद करने वालों की संख्या कभी कम नहीं होती। भेड़-बकरी की चाल का बड़ा हास्यास्पद दृश्य यहां देखा जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में, विशेष रूप से महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के वरिष्ठ छात्रों द्वारा, यहां अपने प्रोफेसरों की जी-हुजूरी का नमूना देखकर सरकारी-गैरसरकारी कार्यालय के अफसरों के चमचों को भी शर्म आ जाती होगी। समाचारपत्र के संपादकों व टेलीविजन के एंकरों की वाहवाही करने वाले छपास रोग से ग्रसित लोगों की भी कमी नहीं। हैरान करने वाली बात है कि इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। ये वर्ग लोकप्रिय होने के लिए कुछ भी करेगा का सिद्धांत अपनाते हैं। ठीक भी तो है, अपने आका की तर्कहीन एकपक्षीय बातों की हां में हां मिलाने में एक गुलाम का क्या जाता है? यहां किसी प्रभावशाली व्यक्ति की हर बात पर सहमति प्रकट करना मध्ययुगीन काल के राजदरबार की याद दिला देता है। आवेश में आकर, भावनाओं में बहकर, आक्रोश में, बिना सोचे-समझे लिखने के उदाहरण यहां आम देखे जा सकते हैं। जिसमें विभिन्न मानवीय गुण-दोष का प्रतिबिंब होता है। यहां संवेदनशीलता व संतुलित विचार व व्यवहार का प्रतिशत उतना ही है जितना आप समाज में इसे पाते हैं। गहरे व सारगर्भित मत और उस पर बहस के उदाहरण कम मिलते हैं। बेसिर-पैर की बातों और व्यक्तिगत दिनचर्या को लिखने वालों की भरमार है। उद्दंडता व अराजकता का अनुपात भी कम नहीं। यह काल्पनिक समाज झूठ, धोखा, जालसाजी से भी अछूता नहीं। हो भी नहीं सकता। धर्म की कट्टरता का तो यहां कोई हिसाब नहीं। कोई सीमा नहीं। जबकि कहा तो यही जाता है, जो शायद सच भी है कि अभी तक अधिकांश इंटरनेट उपभोक्ता पढ़े-लिखे वर्ग से हैं। यकीनन खाते-पीते घर से भी होंगे। जिनके पेट भरे हैं, सिर पर छत है, उनसे गुमराह होने की उम्मीद तो नहीं लगाई जा सकती। मगर यह देखकर आश्चर्य होता है कि इनमें अपने धर्म के प्रति अंधविश्वास अधिक है। नौजवानों में भी धार्मिक कट्टरता की कोई सीमा नहीं। कभी-कभी तो यह आम व्यक्तियों से भी कुछ आगे बढ़कर दिखाई देती है। विभिन्न धर्मों की कट्टरता का पैमाना नापना हो तो इसे एक प्रामाणिक प्रयोगशाला के रूप में लिया जा सकता है। कई नेटवर्कर द्वारा पागलपन की हद तक अपने धर्म की बड़ाई करते हुए देखा जा सकता है तो कुछ एक के द्वारा अपने धर्म के संदर्भ में नयी-नयी बातें और चित्र लगा-लगाकर खूब वाहवाही लूटी जाती है। और फिर उस धर्म से जुड़े अन्य लोगों को आप एकजुट होकर समर्थन में प्रतिक्रिया देते हुए देख सकते हैं। पसंद करने वालों की बाढ़ आ जाती हैं। ऐसा ही कुछ हाल तो हमारे चुनाव के दौरान वोटिंग में भी होता है, फलस्वरूप प्रजातंत्र का हाल हम देख रहे हैं!! बहरहाल, दूसरे वर्ग को नीचा दिखाने के लिए किस्म-किस्म की हरकतें और हथकंडे अपनाये जाते हैं। बात गाली-गलौज तक पहुंच सकती है और यहां इलेक्ट्रॉनिक गैंगवार भी हो जाता है। यह आम बात है। हां, गाली की किस्में हम यहां खूब देख सकते हैं। खैर, यह इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र व्यक्ति के मानसिक भड़ास का एक जरिया तो बनता ही जा रहा है। जो बातें सामान्य मीडिया में, विभिन्न कारणों से नहीं छापी और दिखाई जाती, यहां सरेआम लिख दी जाती हैं। बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों के काले कारनामों को खुलकर लिखा जाता है। परिणामस्वरूप कइयों को धूल चटा दी जाती है। मगर कई बार अच्छों को भी इसका शिकार बना दिया जाता है। कई किस्म के गिरोह इस काम में सक्रिय हैं। ये फिर किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन सब बातों से प्रदर्शित होता है कि हम मानसिक रूप से कितने विकृत और बीमार हैं। हम कितने अधर्मी और कुकर्मी हैं। हम कितने मूर्ख और अज्ञानी हैं। हम कितने अमानवीय हैं जो किसी की मौत की खबर को भी यहां पसंद कर जाते हैं। यह कम आश्चर्यजनक नहीं कि यहां नापसंद का बटन नहीं रखा गया। शायद आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक समाज को किसी भी तरह की आलोचना पसंद नहीं। अर्थात आप मेरे मत को स्वीकार करो या चुप रहो।एक भारतीय मूल की अमेरिकी महिला मित्र ने एक दिन एक टिप्पणी लिखी कि दुनिया को पुरुषविहीन कर दिया जाना चाहिए, चूंकि समाज की सारी मुसीबतों की जड़ आदमी ही है, आदि-आदि। यह किसी व्यक्तिगत कारणों से क्रोधवश की गई टिप्पणी हो सकती है। आवेश में आकर विरोधस्वरूप कहे गये अस्थायी विचार भी हो सकता है। खैर, यह किसी आम व्यक्ति द्वारा कहा जाये तो शायद बुरा न लगे, मगर एक लेखिका से इस तरह के वक्तव्य की उम्मीद नहीं की जा सकती। बहरहाल, यह मान भी लें कि सभी लेखक पूर्णतः परिपक्व हों, जरूरी नहीं। तब भी क्या यह हैरान करने वाला नहीं था कि इस बिना सिर-पैर के मत को पसंद करने वाले उनके तथाकथित मित्रों की लाइन लग गयी। कई लोगों के मत भी समर्थन में आये। क्या सभी क्षणिक आवेश में आकर निरंतर बह रहे थे? नहीं। असल में जब हम नारी के सौंदर्य के दीवाने हो जाते हैं तो सब कुछ लुटाकर भी होश में नहीं आते। यह तो सिर्फ इस बात का प्रमाण है कि कैसे हमारे पूर्वज अपनी जागीरदारी तक गंवा बैठते थे। इन सोशल मीडिया साइट पर भी कई पुरुष अपने व्यक्तित्व से लेकर अस्तित्व तक को मिटाकर किसी काल्पनिक हुस्न में डूब जाने को तैयार देखे जा सकते हैं। इसका मजा सुंदरियां किस तरह से लेती हैं यहां देखना मनोरंजक होता है। आप किसी काल्पनिक महिला नाम के साथ एक सुंदर-सी फोटो चिपका दें, फिर देखें रातोंरात आपको कितने मित्र-निवेदन प्राप्त होते हैं। और अगर महिला विदेशी हो तो ऐसे में फिर हमारा हिंदुस्तानी आदमी तो अपने कपड़े फाड़कर सड़क पर नंगा दौड़ने के लिए तैयार हो जाता है। तभी तो किसी एक सज्जन पुरुष ने जब उपरोक्त कथन पर अपनी विरोधस्वरूप टिप्पणी देनी चाही तो कई अपने शब्दों, विचारों, मतों के शस्त्र लेकर उस पर पिल पड़े। ऐसे कई हास्यास्पद घटनाक्रम आपको सोशल नेटवर्क मीडिया में देखने को मिलेंगे। कई बार अच्छा मनोरंजन हो जाता है, मगर कई बार यह हमें सोचने के लिए मजबूर करता है। उचित-अनुचित तो बहुत दूर की बात है, हमारा आचरण कई बार अव्यवहारिक, असंतुलित व अपरिपक्व दिखाई देता है। सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या यही हमारी बौद्धिकता का स्तर है? असल में मुश्किल इस बात की है कि हम विचारों को सही रूप में जाने व समझे बिना ही प्रकट कर देते हैं। जैसे उपरोक्त उदाहरण में, क्या पुरुषविहीन समाज की परिकल्पना की जा सकती है? क्या तमाम स्त्रियां पूरी तरह शतप्रतिशत सच और सही हो सकती हैं? क्या समाज की बुराइयों, अपराधों, भ्रष्टाचार व कुरीतियों में वे बराबर की भागीदार नहीं हैं? चश्मा उतारकर अपने चारों ओर देखने पर यह नंगा सच हम आसानी से देख सकते हैं। मगर मुश्किल इस बात की है कि हम जानकर भी कुछ बातों से अनजान बने रहते हैं और सामाजिक या फिर भावना में बहकर भेड़-बकरी की चाल की तरह पीछे चलने लग पड़ते हैं। नासमझ और अनपढ़ को तो समझाया जा सकता है मगर पढ़े-लिखे को समझाना नामुमकिन है। तभी तो बहस में किसी के विचारों से सहमत होने के घटनाक्रम यहां कम ही होते हैं। विरोधी की बात को मान लेने का तो सवाल ही नहीं, चाहे फिर वो ठीक ही क्यों न हो। यह स्वयंभू विशेषज्ञों के अहंकार का दौर है, जहां फिर किसी की भी नहीं सुनी जाती। तथाकथित आधुनिक युग के इस वैज्ञानिक माध्यम में भी जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद का पागलपन देख हैरानी होना स्वाभाविक है। बहरहाल, हमारी कमजोरियां इलेक्ट्रॉनिक कचरा बनकर यहां प्रदर्शित होती रहती हैं। यह सच में समाज का ही नहीं हमारा भी आईना है।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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