सभ्यता की आत्मा


July 7, 2012

किसी नगर, प्रांत, देश के बारे में सही-सही जानकारी प्राप्त करना, उनके रहन-सहन व जीवन को समझना एक बाहरी व्यक्ति के लिए किस हद तक और कितना संभव है, और कैसे? इसका जवाब चाहे जो भी दिया जाये मगर असल में यह थोड़ा मुश्किल काम है। वो भी तब जब सभ्यता अति प्राचीन हो, जिसका इतिहास काफी रोचक, घटना-प्रधान और लंबा रहा हो। यूं तो दो-तीन दिन के लिए ऐसे किसी शहर में घूमने जाने वालों के लिए यह कार्य बड़ा आसान बना दिया गया है। प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों, स्थलों व संस्थाओं या फिर प्राकृतिक पिकनिक स्पॉट को देखकर आम पर्यटक संतुष्ट हो जाते हैं। विशेष रूप से वहां के लोकप्रिय यादगार चिन्ह व प्रतीक खरीदे जाते हैं, और अपने घर में इसे सजाकर हम अति प्रसन्न भी हो जाते हैं। मगर इससे किसी भी सभ्यता का सतही-ज्ञान ही हो पाता है। अमूमन तो हिन्दुस्तान में हर स्थान पर संदर्भित किताबें मिलती नहीं हैं, और अगर अति लोकप्रिय स्थानों पर यह उपलब्ध हुई भी तो इनमें अति संक्षिप्त जानकारी ही होती है। इनके द्वारा भी एक सुनिश्चित सीमा तक ही सूचना प्राप्त हो पाती है। और तो और इसमें लेखक की दृष्टि से ही सब कुछ देखना-समझना पड़ता है। जो कि एकपक्षीय हो सकता है। बहरहाल, इस मामले में हम भारतीय एक पिछड्डी पर्यटक के रूप में जाने जाने चाहिए। हम आमतौर पर प्रमुख नामी स्थानों को भी मिनटों में छू-छू कर उनके गरिमामय इतिहास की एक तरह से धज्जियां उड़ा देते हैं। और यह भी सत्य है कि आम महिलाएं दूसरे शहरों में जाकर भी खरीदारी में अधिक दिलचस्पी रखती हैं। हैरानी इस बात को देखकर होती है कि हमारा युवावर्ग नये शहर में भी मॉल और प्लाजा को ढूंढ़ता है। जबकि आज के खुले बाजार के जमाने में दुनियाभर में इनकी एकरूपता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से लेकर भोपाल-कानपुर-चंडीगढ़ हर जगह एक जैसे ही ये खिड़कीबंद बाजार हैं। बस इनके आकार और प्रकार में अंतर हो सकता है। यही नहीं, हम इन ऐतिहासिक जगहों पर जाकर भी पिज्जा-बर्गर और चाऊमीन ही खाने में ढूंढ़ते हैं।इस बार कोलकाता में व्यक्तिगत कार्य से दस दिन रहना था। खाली समय की अतिरिक्त उपलब्धता थी तो सोचा इतने प्राचीन शहर की आत्मा को खोजा जाये। इसमें कोई शक नहीं कि हिंदुस्तान में शायद ही ऐसा कोई शहर हो जिसने पिछली दो-तीन शताब्दियों के दौरान देश के हर क्षेत्र में कई प्रकार से महत्वपूर्ण घटनाओं के बीज बोये। जिसने फिर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचायी। शायद ही कोई ऐसा कार्य-क्षेत्र हो, जहां इस शहर ने अपने विशेष व्यक्तियों के द्वारा शीर्ष पर आसन स्थापित न किया हो। साहित्य में रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र, बकिम चंद्र, राजनीति में सुभाष चंद्र बोस, सामाजिक कार्य में राजा राममोहन राय से लेकर मदर टैरेसा यहां तक कि विज्ञान के क्षेत्र में सत्येंद्रनाथ बोस, अध्यात्म के क्षेत्र में रामकिशन परमहंस से लेकर विवेकानंद व श्री अरविंदो आदि ऐसे कई नाम हैं। और यह सिलसिला आज भी जारी है। ये कुछ ऐसे शख्स हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान के विचारों को स्पंदित किया है। भारतीय समाज को एक नई दिशा दी। इनसे संबंधित इमारतों, संस्थाओं व स्थानों को देखने मात्र से आप आत्मविभोर हो जाते हैं और फिर कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में प्रेरित होने लगते हैं। ये जीवन में संघर्ष करने के लिए, आगे बढ़ने के लिए आपको अतिरिक्त ऊर्जा देते हैं। खुशी इस बात को देखकर होती है कि बंगाल ने इनकी यादों को सहजतापूर्ण ढंग से संजोकर रखा है और इन्हें आज भी यहां सिर-माथे पर बिठाया जाता है। लोकप्रिय बांग्ला साहित्य की समाज में शुरू से पकड़ रही है और वो बरकरार है। यही नहीं, प्राचीन संस्कृति की झलक संकरी तंग गलियों में आज भी देखी जा सकती है। इन बस्तियों में घूमने पर 1960 और '70 के दशक की हिन्दी फिल्मों के चित्र आंखों के सामने से गुजर जाते हैं। कोलकाता ने हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम युग को अपने आंगन में फलने-फूलने दिया। उनकी सजीव तसवीरों को नंगी आंखों से देखा जा सकता है। पूंजीवाद ने मुख्य सड़कों को बेशक अपनी चपेट में ले लिया हो लेकिन नंगा और भयावह सत्य अंदर की गलियों में आम दिख जाता है। जहां भयानक गरीबी और बदहाली अपना पैर-पसार रही है। यह दीगर बात है कि आधुनिक युग में यही हाल, कम या ज्यादा हर जगह है। बाजारवाद के परिणामस्वरूप विश्वस्तर पर गरीब-अमीर के बीच बढ़ रही खाई के बावजूद, यह बात प्रमुखता से कही जानी चाहिए कि गरीबों के प्रति सजगता व संवेदना को लेकर यहां का शासक वर्ग संजीदा है। यह बड़ी काबिलेतारीफ बात है कि कोलकाता ने अपनी धरोहरों को बहुत अच्छे तरीके से संभाला है। सड़कों पर रेंगती ट्रेन अर्थात ट्रॉम आज भी मुख्य सड़कों पर खड़खड़ाते हुए दिख जायेंगी। हां, कानूनन प्रतिबंध के बावजूद हाथ से खींचने वाले रिक्शों का दिखना दुःख देता है। कोलकाता के आसपास घूमने निकला जाये तो कंक्रीट से बने विकास के मीनार तो खड़े हो रहे हैं मगर उनकी नींव अभी गहरी नहीं। सड़कों पर बिखरे हुए प्लास्टिक कम नजर आते हैं। आलू और न जाने किस-किस रसायन से बने हुए विभिन्न पैक्ड खाद्य सामग्री आज भी यहां बहुत कम देखी जाती हैं। कोलकाता से बाहर जाने पर दूर-दूर तक आधुनिकता के पदचिन्ह दिखाई नहीं देते। हो सकता है हमारी निगाहों में स्थानीय लोग अविकसित व पिछड़े हों लेकिन मुझे इस बात पर हमेशा ऐतराज रहा है। क्या पैक्ड फूड, बोतल-बंद पानी और जींस-स्कर्ट पहनने से ही जीवन का मूल्य बढ़ता है? क्या मात्र यही विकास के पैमाने हैं? छोटे-छोटे तालाब में मछली मारकर, चावल के साथ पकाकर, अगर मेरा ग्रामीण क्षेत्र दो वक्त अपना पेट भरकर संतुष्ट है और सुख व शांति से जी रहा है तो ऐसे जीवन में तथाकथित आधुनिकता का कंकड़ फेंककर उथल-पुथल मचाने की क्या आवश्यकता है?यह सच है कि खानपान से किसी संस्कृति को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। यूं तो हर बार यहां आकर मैंने बंगाली व्यंजनों के सतही स्वाद का खूब आनंद लिया है। मगर इस बार मैंने पेट के रास्ते यहां की आत्मा में घुसने की कोशिश की। यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि ऐसे कई रेस्तरां हैं जहां विशुद्ध बंगाली व्यंजन अपने मूल रूप में परोसा जाता है। और बजट के अनुरूप भिन्न-भिन्न स्तर पर यह उपलब्ध हैं। 'सोलह-आने रेस्तरां' एक आम परिवार की बंगाली खाना खाने के इच्छा के लिए समुचित व्यवस्था प्रदान करता है वहीं 'भजोरी-मन्ना' उनके लिए एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरता है। यहां आम से कुलीन परिवार तक को जाते हुए देखा जा सकता है। छह बालीगंज, नाम सुनकर किसी घर के पते का अहसास होता है। और यह कुछ हद तक सत्य भी है क्योंकि यह आज भी उस क्षेत्र में एक आम मकान ही है। मगर यहां चलने वाला रेस्तरां पूरे कोलकाता में प्रसिद्ध है। यहां का प्रत्येक व्यंजन बेहद स्वादपूर्ण है। यहां के कई डिश बार-बार खाने के लिए ललचाते से प्रतीत होते हैं। आज के आधुनिक व मध्यम-वर्ग में बेहतरीन बंगाली खाने के शौकीन लोगों के लिए यह एक प्रमुख स्थल कहा जा सकता है। कोलकाता ने अपने उच्चवर्ग का भी पूरा ध्यान रखा है और 'ओह कलकत्ता' एक स्तरीय बंगाली रेस्तरां के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि कुछ एक-दो विशिष्ट नगरों जैसे कि अमृतसर, लखनऊ, मेरठ-मथुरा के बाद एक ऐसा शहर दिखाई दिया जिसकी अपनी खान-पान की शैली व विशेष पहचान है। जैसे कि दक्षिण भारत के खान-पान का अपना तरीका है तो गुजरात और राजस्थान का अपना स्टाइल। इससे ठीक अलग हटकर बंगाली भोजन-कला कितना अधिक विविधतापूर्ण हो सकता है, मैंने इस बार जाना। यूं तो बंगाली रसगुल्ला और छेने की मिठाइयों ने यहां से निकलकर पूरे विश्व में अपना प्रभाव जमा रखा है लेकिन यहां बनी मछलियों का स्वाद कहीं और मिल पाना अभी भी मुश्किल है। सरसों के तेल में बनाये गये झोल, फिर चाहे वो रोहू मछली हो या फिर हिल्सा, कोई, पाब्दा, भेदकी या पेम्पलेट हरेक का अपना एक विशिष्ट स्वाद है। हर एक मछली को बनाने व परोसने का अपना एक तरीका है। मुझे खुशी है कि बर्गर और पिज्जा की तूफान के सामने बंगाल की मछलियों ने अपना दम नहीं तोड़ा और अपने स्वाद और महक से बंगाल की संस्कृति को आज भी जिंदा रखा हुआ है। इतनी विविधतापूर्ण संस्कृति व ऐतिहासिक सभ्यता के लिए एक लेख पर्याप्त नहीं। आने वाले लेखों में भिन्न-भिन्न मुद्दों पर इनकी विस्तार से चर्चा होगी।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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