जीवन का चक्र


June 30, 2012

विगत वर्ष छोटी बेटी को उच्च शिक्षा के लिए घर, शहर व देश छोड़कर बाहर जाना पड़ा था। अब बड़ी बेटी स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए हमसे दूर जा रही है। हम पति-पत्नी एक बार फिर पूरी तरह अकेले होंगे। ऐसा महसूस होता है कि जीवन जहां से शुरू किया था, वहीं वापस लौटकर एक बार फिर पहुंच चुका है। मगर दोनों घटनाक्रम में बड़ा अंतर है। शादी के उपरांत पारिवारिक जीवन प्रारंभ करने में नया जोश, उमंग और बहुत सारे ख्वाब थे, जबकि आज आगे आने वाले अकेलेपन को सोच-सोचकर दिल घबरा रहा है। एक खालीपन-सा महसूस होने लगा है। यूं तो जीवनपर्यंत बच्चों की जवाबदारी व जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हुआ जा सकता और होना भी नहीं चाहिए मगर एक उम्र के बाद उन्हें उनके निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र कर देना चाहिए। शास्त्र और परम्परा भी यही कहती है। उनका अपना जीवन है। अर्थात व्यवहारिक रूप से देखें तो अब हमारे पास कोई उद्देश्य नहीं बचा। यूं तो मानवीय चाहत का कोई अंत नहीं, मगर मां-बाप का बच्चों के प्रति अति मोह नुकसानदायक ही साबित होता है और  ऐसे में अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना ही अपेक्षित होता है। इस मानसिक दुविधा व द्वंद्व की अवस्था का सही वर्णन आसान नहीं। बहरहाल, घर की दीवारें काटने को दौड़ रही हैं। ऊपर से बच्चों की बचपन की शरारतें, रूठना, जिद, प्यार करना रह-रहकर आंखों के सामने अनायास ही उभर आता है। और अब उनका छुट्टियों में घर आने का इंतजार, दिनभर के लिए एक प्रमुख कार्य के रूप में बन गया है। निगाहें बार-बार कैलेंडर की तारीखों पर चली जाती हैं मानो ऐसा करने से दिन-महीने जल्दी आगे बढ़ जायेंगे।यूं तो कहा जा सकता है कि लड़कियां शादी के बाद अपने ससुराल चली जाती हैं। मगर लड़कियों के माता-पिता के लिए आधुनिक युग में इसकी परिभाषा बहुत हद तक बदली है और बदलनी भी चाहिए। यह दीगर बात है कि लड़की के परिवार में मां-बाप का अधिक हस्तक्षेप करना उचित नहीं होता। लेकिन फिर यह बात तो आजकल लड़कों और उनके अभिभावकों पर भी बराबरी से लागू होती हैं। यह भी सच है कि बच्चा फिर वो कोई भी हो, पढ़ाई, नौकरी फिर शादी या और कोई भी कारण हो, घर से बाहर एक बार गया नहीं कि आमतौर पर लौटकर नहीं आता। जीवन के इस मोड़ पर खड़े होने पर याद आता है कि हम भी तो इसी तरह एक दिन अचानक घर से दूर गए थे और फिर चाहते हुए भी कहां लौट पाये। हां, मगर आज इस बात का अहसास हुआ है कि हमारे माता-पिता पर उस वक्त क्या गुजरी होगी। अपने पर बीतने पर ही सही अर्थों में भावों का, पीड़ाओं का, मानसिक ऊहापोह का, दिल के डूबने का, घबराने का अनुभव हो पाता है। एक संतुलित और बौद्धिक रूप से उपदेश देना तो बहुत आसान है। मगर जीवन में उसका सामना करना उतना सरल नहीं।बहरहाल, यही जीवन का सत्य है और इसे हमें सकारात्मक रूप में लेना चाहिए। बच्चों की अपनी जिंदगी है उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने का अवसर प्रदान करना चाहिए। यही प्रकृति का भी नियम है। समस्त प्राणि-जगत्‌ में इसे देखा जा सकता है। ठीक है, मगर व्यक्ति अपनी भावनाओं को, अपनी मानवीय कमजोरियों को, बच्चों के प्रति प्रेम व आसक्ति को कहां नियंत्रित और नियमित कर पाता है? यहां फिर मोहमाया के मूल सिद्धांत लागू हो जाते हैं। और उसके यथोचित परिणाम अपने-अपने हिसाब से भोगने पड़ते हैं। यही कारण है जो हर तरह के उदाहरण समाज में मिल जायेंगे। कोई एक सुनिश्चित जीवन-प्रक्रिया सैद्धांतिक रूप से प्रस्तुत नहीं की जा सकती। वैसे भी हर व्यक्ति का अपना-अपना भाग्य है। और फिर, सब कुछ आपके हाथ में भी तो नहीं है। बस इसी बात को कहकर तसल्ली दे दी जाती है।जीवन भी तो एक चक्र है। जन्म, बालपन से युवा होना, विवाह और फिर बच्चों का होना, परिवार का विस्तार, वृद्धावस्था और फिर मृत्यु। यहां सवाल किया जा सकता है कि चक्र पूरा कहां हुआ? यह तो कहीं से प्रारंभ होकर कहीं और अंत हो रहा है। शायद नहीं। यह सच नहीं है, मां के पेट के भीतर के शून्य से प्रारंभ हुआ सफर मृत्यु के साथ अस्तित्वहीन होते हुए ब्रह्मांड के शून्य में ही तो समा जाता है। यह जीवन का संपूर्ण चक्र है जिसका सिर्फ शून्य वाला भाग हमारी समझ से परे है। बाकी के समय-काल में हम विश्व मंच के नाटक में एक पात्र का रोल ही तो अदा करते हैं। और फिर इस दौरान कई चरित्र अपने-अपने रूप-रंग में हमसे मिलते और बिछुड़ते हैं। ध्यान से सोचें और समझें तो संपूर्ण घटनाक्रम अंत में बेहद अर्थहीन लगता है। और स्वयं के चरित्र से बाहर निकलकर दर्शक के रूप में देखने पर विरक्ति-सी महसूस होती है। मगर जब यही दर्शक अपने सामने चल रहे नाटक के किसी भी चरित्र के साथ एक सीमा से अधिक जुड़ जाता है तो ऐसे में स्थिति भावनात्मक होती चली जाती है। संबंध विशिष्ट हो जाते हैं और उनमें लगाव उत्पन्न हो जाता है। चरित्र के रोने पर वह रोता है उसके हंसने पर हंसता है। वह उसके दुःख-सुख से जुड़ जाता है। हम अपने चहेते नायक-नायिकाओं से कुछ इसी तरह से तो जुड़ जाते हैं। और फिर इसका असर हम पर किस हद तक होता है इसका अहसास हम हर फिल्म के अंत में महसूस कर सकते हैं। जीवन के रंगमंच से दूर, इन नाटक व सिनेमा में दर्शक की मानसिकता के माध्यम से इस दर्शन को बेहतर ढंग से विश्लेषित व समझा जा सकता है। मगर अगर ऐसा कुछ न हो तो सिनेमा का मजा ही नहीं, अर्थात जीवन भी तो रसहीन हो जायेगा। आखिर इतनी बौद्धिक समझदारी का फायदा भी क्या? हजारों साल से वेद और शास्त्र ने हमें जीवन के रहस्य को खोलकर हमारे सामने सीधे-सीधे प्रस्तुत कर रखा है। फिर भी हम इसमें डूबकर जीवन का सफर तय करते हैं। यही तो इसका मजा है। मोहमाया के बिना जीवन भी कैसा? सुख और दुःख के अहसास के बिना क्या जीवन संभव है? यह कहना यहां उचित नहीं होगा कि जानवर अपने बच्चों को पैरों पर खड़ा करके स्वतंत्र हो जाने पर अपने-अपने रास्ते की ओर चल पड़ते हैं। ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे जहां पशु-समाज में भी परिवार की भावना है। वे झुंड में रहते हैं और वहां भी आपस में मिलने और बिछुड़ने का अहसास अपने ढंग से जीवित है। और फिर हम जानवरों से भिन्न भी तो हैं।बहरहाल, इसमें कोई शक नहीं कि आज संयुक्त परिवार की कमी का अहसास होता है। इसके फायदे और अधिक समझ में आते हैं। आधुनिक जीवन ने हमें बहुत कुछ दिया लेकिन बदले में अगर हमसे कुछ छीना है तो वो है हमारा पारिवारिक जीवन, इसने हमें अकेला कर दिया। मनुष्य प्राकृतिक रूप से एक समूह में रहने वाला प्राणी है। उसे अपनी सजातीय लोगों के साथ समूह में रहने पर सुख-चैन प्राप्त होता है। घर से बाहर हम ज्ञान और नौकरीपेशा के लिए निकलते जरूर हैं लेकिन ऐसी विद्या और रोजी-रोटी का क्या फायदा जो हमें अपने परिवार व जीवन से दूर कर दे। आज इस अकेलेपन के अहसास से एक बात, अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, साफ निकलकर सामने आ रही है कि कुछ लोगों के लिए इस तरह का जीवन और अधिक आगे बढ़ने और तथाकथित विकास के मार्ग पर चलने का माध्यम हो सकता है मगर यह हकीकत में, हमें क्या कुछ देता है यह तोल पाना उतना आसान नहीं। कई बुद्धिजीवी इसे भावनात्मक बहाव का क्षणिक परिणाम के रूप में देखेंगे और समाज को मध्ययुगीन काल में ले जाने का इलजाम ठोक सकते हैं। मगर अगर पीछे जाकर हमें जीवन की सच्ची खुशी प्राप्त होती है तो इसमें बुराई कैसी। कई बार लगता है कि अगर हम भी अपने घर-परिवार से दूर न जाकर अपने सीमित संसाधनों से जीवनयापन करते तो शायद भौतिक सुख-सुविधा तो कुछ कम-ज्यादा हो जाती मगर सबके साथ रहने का मजा जीवन के अंत तक लेते। आने वाली पीढ़ी इस सिद्धांत पर एक बार फिर पुनर्विचार करेगी, इन्हीं आशाओं के साथ।मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

Copyright 2004-2015, All Rights Reserved with Manoj Singh, | Site by: Classic Computers