खेल खेल में


May 26, 2012

'खेलोगे कूदोगे बनोगे गंवार, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब'। पीढ़ियों से कुछ इसी तरह के भावार्थ वाले शब्दों के माध्यम से परिवार के बड़े-बुजुर्गों को बच्चों के साथ खेलते हुए देखा गया है। मगर समय के साथ खेल के मायने व रूप-स्वरूप बदला है। खेल अब पढ़ाई से अधिक महत्वपूर्ण हो चुका है। वो दिन लद गये जब खिलाड़ियों को राजे-महाराजाओं को आकर्षित करना होता था। उन्हें जीवनयापन के लिए संरक्षण प्राप्त करना पड़ता था। गामा पहलवान को पंजाब-राजस्थान की रियासतों से लेकर दतिया के महाराज तक ने आश्रय प्रदान किया था तो ध्यानचंद के खेल को देखकर हिटलर भी सोचने के लिए मजबूर हुआ था। ध्यानचंद-हिटलर के बीच की आगे की कहानी जन-जन में लोकप्रिय है। लेकिन इतनी खुद्दारी के बाद भी जीवन के अंतिम दिनों में इनके दुर्दशा की कहानी किसी से छिपी नहीं। मगर अब यह बीते दिनों की बात है। अब खेल में भरपूर पैसा है। यही नहीं, पैसे से खेला भी जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसके लिए खेल रहे हैं। तभी तो, वो काल्पनिक काल प्रतीत होता है जब मात्र देश के लिए खेलना शान की बात हुआ करती थी। अब तो खेल से आप अपना पूरा साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं। जहां कई सम्राट भी मिलने के लिए कतारबद्ध प्रतीक्षारत हो सकते हैं। और फिर क्यों नहीं, आखिरकार, साम्राज्य में भी तो खेल ही खेला जाता है। देश की सत्ता हथियाने के लिए पक्ष-विपक्ष के बीच खेल ही तो होता है, और दर्शक होता है अवाम। खेल में चाहे कोई भी जीते, दर्शक को तो ताली बजाने से मतलब है। अब सवाल उठता है कि जब सत्ताधारी वर्ग खेल खेल सकता है तो खेलने वाले राजनीति में क्यों नहीं जा सकते? तभी तो खेल के माध्यम से विधानसभा, राज्यसभा और लोकसभा में पहुंचना आसान होता जा रहा है। और फिर खेल-खेल में मंत्री ही क्यों शासनाध्यक्ष भी बना जा सकता है। अब इस बिंदु पर परेशान होने वाली जैसी कोई बात नहीं। बुद्धिजीवियों को भी यहां ज्यादा दिमाग लगाकर शब्दों से खेलने की आवश्यकता नहीं। खेल का संबंध व्यवसाय और राजनीति से जुड़ने पर चिंता-चिंता खेलने की जरूरत नहीं। चूंकि व्यवसायी भी क्या करता है? एक राजनीतिज्ञ क्या करता है? व्यवसायी बाजार में खेलता है तो राजनीतिज्ञ अवाम के साथ खेलता है। व्यवसायी पैसे के लिए खेलता है तो राजनीतिज्ञ सत्ता के लिए खेलता है। तो फिर खिलाड़ी व्यवसाय और राजनीति के क्षेत्र में क्यूं न खेले? यह दीगर बात है कि खिलाड़ी मैदान में चाहे जैसा खेल खेले, इनके संगठन में असली खेल व्यवसायी और राजनीतिज्ञों द्वारा ही खेला जाता है। और फिर खेल को दिल पर लेने की आवश्यकता नहीं, जीत-हार का खेल मैदान में नहीं, सट्टा बाजार में खेला जाता है। और हां, दर्शक चाहे जितना भी झुठला ले, असली खेल पैवेलियन में होता है।यूं देखा जाये तो हम सभी सुबह से शाम तक कोई न कोई खेल खेलते रहते हैं। घर से लेकर सरकारी दफ्तर या फिर कारपोरेट कार्यालय तक में खेल चलता रहता है। कह सकते हैं कि जीवन एक खेल है। फिर हर एक खेल में भी तो जीवन है। ऐसा न हो तो खेल में वो मजा नहीं रह जाता। उधर, जीवन को खेलते रहें तो सब ठीक है, वरना यह बोझिल हो जाता है। घर में हम रिश्तों के साथ खेलते हैं। एक-दूसरे की भावनाओं के साथ खेलते हैं। जीत-हार यहां भी तो होती है। पति-पत्नी के बीच भी एक खेल ही तो होता है। दिन का खेल अलग, रात का कुछ और। नर-नारी के संबंधों को देखें तो यह प्राकृतिक खेल ही है। इस खेल में परमानंद की अनुभूति होती है। वैसे हम कोई भी खेल खेलें या देखें सदा जोश से भर जाते हैं। अतिरिक्त ऊर्जा आ जाती है। हमारी क्रियाशीलता बढ़ जाती है। पर हम अमूमन दो समूह में बंट जाते हैं। परिवार ही नहीं मोहल्ले में भी भिन्न-भिन्न किस्म का खेल चलता रहता है। दिन में औरतें बतियाने के बहाने एक-दूसरे से खूब खेलती हैं। व्यंग्यों, चुटकियों, पूछाताछी, चुगलखोरी, तेरी-मेरी के साथ जमकर खेला जाता है। औरतें आंखों से खेलने में माहिर मानी जा सकती हैं। मगर आदमी भी इस खेल में पीछे नहीं। उधर, बच्चे खेलने के लिए पहले शाम का इंतजार किया करते थे। मगर यह अब पिछली पीढ़ी की बात हो गयी है। अब तो घर पर दिनभर खेला जा सकता है। कंप्यूटर ने मैदान के खेल को स्टडी-टेबल पर पहुंचा दिया है। इसे देखकर मां-बाप भी खुश होते हैं। हां, गर्मी की छुट्टियों में और कुछ नहीं तो कई सारी खेल अकादमी में प्रवेश दिला देते हैं। परीक्षा में अच्छे अंक आये न आये मगर किसी खेल में हाथ जम जाये तो सोने पे सुहागा है। इस पर अभिभावक पैसा खर्च करने को भी तैयार हैं। उलटे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। क्या किया जाये? स्कूल में भी तो अब पढ़ाई के नाम पर खेल ही होता है। मोटी-मोटी किताबों से बेवजह खेलना पड़ता है। जो बच्चे खेलने-कूदते पढ़ते हैं वो अमूमन जीवन में आगे निकलते प्रतीत होते हैं। उनका व्यक्तित्व बेहतर होता है। वरना किताबी-कीड़े को कोई नहीं पूछता। स्कूल से निकलने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं का खेल चालू होता है। यह भी अपने आप में एक बड़ा खेल है। इसमें हर पक्ष अपने-अपने ढंग से खेलता है। कोचिंग संस्थाओं का खेल निराला है तो अधिकांश मां-बाप अपने बच्चे के लिए एक बार लाखों का जुआ ब्लाइंड खेलने के लिए तैयार हो जाते हैं। कमजोर घोड़े पर भी दांव खेला जाता है। बड़ी-बड़ी उम्मीद लिये हुए छात्र सवालों से खेलने लगता है। परीक्षा भी अब खेल बन चुकी है। और फिर महाविद्यालयों की चयन प्रक्रिया के पीछे भी कई किस्म का खेल जारी है। बहरहाल, स्कूली जीवन के खेल से कॉलेज के जीवन का खेल भिन्न और अपने आप में निराला होता है। मगर यहां से निकलने के बाद असल जीवन का खेल चालू होता है।आदमी हो या औरत, दिनभर दफ्तर-घर में कोई न कोई खेल खेलते रहते हैं। कार्यालयों में कुछ खेल आम हैं तो कुछ खेल विशिष्ट रूप से खेले जाते हैं। पत्रकार खबरों के साथ खेलता है तो संपादक स्टोरीज के साथ खेलता है। इन दोनों से इतर अखबार का मालिक विज्ञापनों में खेलता है। न्यायालय में शब्दों का खेल है तो पुलिस डंडे के साथ खेलती है। अर्थशास्त्री चाहे जितनी होशियारी से खेले, बाजार का खेल सेठ-साहूकारों द्वारा खेला जाता है। शेयर बाजार के खेल को समझना अच्छे-अच्छे के बस की बात नहीं। ऑडिट वाला आंकड़ों से खेलता है तो सरकारी बाबू का सारा खेल फाइलों में चलता है। समाज व जीवन में रुपयों का खेल समझना अब मुश्किल नहीं। यह दीगर बात है कि आजकल दफ्तरों में पैसे का खेल सावधानीपूर्वक खेला जाता है। बॉस अपने अधीनस्थ के साथ खेलता है तो छोटा कर्मचारी अधिकारियों के साथ खेलने में प्रयासरत रहता है। मैनेजमेंट और यूनियन के बीच भी तो खेल चलता रहता है। इसमें जो अधिक चतुर-चालाक होगा वही जीत जायेगा। दिनभर चपरासी बंद दरवाजे के पीछे बैठे अधिकारी का खेल देखता-समझता है। अधिकारी इस बात से अनजान हर आने वाले आगंतुक के साथ खेलता है। उधर मिलने वाला मेहमान उच्च अधिकारी से खेलने की कोशिश करता है। यही नहीं, कला के क्षेत्र में भी खेल खेला जाता है। मनोरंजन और खेल अब एक सिक्के के दो पहलू हो गये हैं। नाट्य-मंच से लेकर सिनेमा में जो देखा जाता है वो भी एक खेल ही तो है लेकिन असली खेल तो पर्दे के पीछे डायरेक्टर खेलता है। नहीं-नहीं, कहानीकार पात्रों के साथ खेलता है। ठीक उसी तरह जिस तरह कठपुतलियां सामने खेलती हुई जरूर नजर आती हैं मगर असली खेल तो कोई और पर्दे के पीछे उंगलियों से खेलता है। किसी भी दो व्यक्ति के आपस में संपर्क में आने पर एक-दूसरे के बीच का खेल शुरू हो जाता है। हम तमाम उम्र अनगिनत खेल खेलते हैं। किसी महत्वपूर्ण खेल में जीत को सुनिश्चित करने के उद्देश्य व हार जाने पर परेशान होकर मंदिर तक में चले जाते हैं। मगर वहां भी हम भगवान के साथ खेलने के चक्कर में रहते हैं। ईश्वर का तो पता नहीं लेकिन उसके नाम पर कइयों को खेल खेलते देखा जा सकता है। यह धर्म का क्षेत्र है, आस्था का क्षेत्र है, यहां आसानी से खेल खेला जा सकता है। यूं भावनाओं के साथ खेलने पर लोगों का दिल टूट जाता है। फिर भी प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे के साथ खेल ही तो खेलते हैं। रिश्तों में अगर खेल बिगड़ जाये तो संबंध टूट सकते हैं। इसीलिए समझाया जाता है कि कुछ संबंधों में सावधानीपूर्वक खेलना होता है। वैसे एक खेल में हार जाने पर हम दूसरा खेल खेलने के लिए झट से तैयार हो जाते हैं। यह हमारा स्वभाव है। इस खेल-खेल में शरीर को चोट पहुंचे तो उसका भी इंतजाम हमने कर रखा है। यह दीगर बात है कि अस्पताल का डॉक्टर हमारे शरीर के साथ जमकर खेलता है। किसी की आत्मा से खेलना और शरीर से खेलने में कोई फर्क नहीं। मगर न जाने क्यूं शरीर से खेलने-खिलाने वाले को समाज में बहुत गलत ढंग से लिया जाता है। पता नहीं व्यक्ति सच को कबूल क्यों नहीं करता। जबकि शरीर का खेल एकमात्र वो क्षेत्र है जहां हर कोई नये-नये खिलाड़ी के साथ खेलने की इच्छा रखता है। बहरहाल, इस खेल-खेल में समय कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। अंत में जाकर समझ आता है कि जिंदगी हमारे साथ खेल खेल रही थी। जीवन के खेल में विजय तो मृत्यु की ही होती है। यह दीगर बात है कि मौत को भी कई बार खेलते देखा जा सकता है। हां, मौत के साथ खेलना हिम्मत की बात है और यह सदैव आश्चर्य पैदा करता है। मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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