देवभूमि में विकास


April 28, 2012

हिमाचल प्रदेश में लंबे समय तक मैंने निवास किया है। स्थानांतरित होने के बाद भी वहां निरंतर जाता रहा हूं। इस बार कुछ लंबे अंतराल के बाद जाना हुआ था। यूं तो बढ़ती जनसंख्या का दबाव यहां भी साफ दिखाई देता है और तथाकथित विकास की हवा जमीन से यहां पूरी गर्मी के साथ पहुंचती रही है। लेकिन फिर भी देवभूमि का अपना प्रभाव है कि पहाड़ की ठंडी व शुद्ध हवाएं तन और मन को शांतचित्त करने में अब भी सक्षम है। लेकिन कब तक? यह सवाल प्रकृति-प्रेमी के मन में अमूमन उभरता रहा है। ऊंचे-ऊंचे पर्वत जिस तरह से अटल होकर कायम हैं, इनकी विशालता के बावजूद पूर्ण स्थिरता मनुष्य को सदा अचम्भित और आकर्षित करती रही है। ईश्वर के दर्शन के लिए व्यक्ति-विशेष की अपनी दृष्टि भी आवश्यक है। फिर परमात्मा से साक्षात्कार कहीं भी हो सकता है। मगर यहां तो ये पर्वत श्रृंखलाएं स्वयं देवताओं से कम नहीं और अच्छे-अच्छे नास्तिक भी इनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं। पहाड़ों की चोटी पर बैठकर जीवन का दर्शन स्वतः ही नयी ऊंचाइयों की ओर पहुंचने लगता है और अध्यात्म के दर्शन बिना किसी प्रयास के हो जाते हैं। यहां हिन्दू धर्म की सार्थकता प्रामाणित होती है कि उसने प्रकृति के हर अंग और रूप ही नहीं कण-कण में ईश्वर के होने का जयघोष कर रखा है। यहां हिन्दू संस्कृति प्रकृति के नजदीक पूरी तन्मयता और समन्वयता के साथ खड़ी मिलती है। प्राचीन संस्कृति प्रकृति की गोद में कैसे विकसित होती रही है, यहां नंगी आंखों से साफ देखा जा सकता है। शायद इसीलिए कहा गया कि हिन्दू कोई धर्म नहीं, जीवन-दर्शन है, जीवन-संस्कार है। एक सामान्य मनुष्य की प्राकृतिक जीवनशैली है। प्रकृति के साथ तालमेल बिठाते हुए सुखमय और संतोषभरा जीवन कैसे जिया जा सकता है, पहाड़ों की संस्कृति से सीखा जाना चाहिए। अंग्रेजों ने शिमला बसाया था।  यहां वे भी प्रकृति-प्रेमी ही नजर आते हैं। उनके बनाये घर-सड़क-बाजार से लेकर कार्यालय-चर्च भी प्रकृति से बातचीत करते हुए प्रतीत होते हैं। यहां उन्होंने योजनाबद्ध विकास के दौरान प्रकृति के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की थी शायद तभी शिमला की खूबसूरती आज भी बहुत हद तक बरकरार है।पहाड़ों की संस्कृति ने जमीन की जीवनशैली को प्रभावित किया हो या नहीं, मगर नीचे से आये अति महत्वाकांक्षी लोगों ने ऊपर पहुंचकर पूरी रफ्तार के साथ परिवर्तन करने का प्रयास किया है। और वे अब काफी हद तक सफल भी दिखाई पड़ते हैं। पहाड़ों पर आजकल वो सब कुछ है जो दिल्ली-मुंबई के कंक्रीट मॉल्स के जंगलों में बिकता है। तेज रफ्तार लग्जरी गाड़ियां, आलीशान सीमेंट-लोहे के मकान, फास्ट-फूड, क्या नहीं है? चारों ओर तथाकथित विकास की आंधी तूफान बनकर फैल रही है। लेकिन इसने जो तबाही मचा रखी है, देखकर दुःख होता है। जनसंख्या के दबाव को तो प्रकृति एक बार सह भी लेती मगर इंसानी चाहत और फितरत का क्या करोगे? चारों ओर निर्माण कार्य इतना तेजी से हो रहा है कि वातावरण में धूल ही धूल महसूस होती है। पहाड़ों की चोटियां कंक्रीट के डिब्बों से अटी पड़ी दिखाई देती हैं। एक समय था जब कालका से निकलते ही परवाणु आते-आते ठंडी हवा के झोंके मिलने लगते थे। इनमें इतनी ताजगी और शुद्धता होती थी कि मन अपने आप ही प्रफुल्लित हो उठता था। शरीर में ऊर्जा प्रवाहित होने लगती थी। वातानुकूलित गाड़ियों में सफर करने वाले सेठ-साहूकार से लेकर नवधनाढ्य युवक-युवती भी यहां पहुंचकर मशीनी हवा बंदकर अपनी कार के शीशे नीचे उतार लिया करते थे। परवाणु से थोड़ा ऊपर चढ़ते नवआगंतुक मेहमानों को अपनी गाड़ियां सड़क किनारे खड़ी करके प्रकृति को निहारते देखा जा सकता था। नवदंपतियां आनंद विभोर होते हुए आम मिल जातीं। देवभूमि के इस प्रवेशद्वार पर हिमाचल की पहली झलक देखकर ही किसी पर्यटक को उसकी भव्यता को स्वीकार करने में कोई भी रुकावट नहीं होती थी। और फिर यात्री आगे के संपूर्ण रास्ते में चारों ओर बिखरे हुए प्रकृति के वैभव को देखकर आत्ममुग्ध होता चला जाता था। उसका व्यक्तिगत अहम्‌ पीछे कहीं जमीन पर छूट जाता था। पहाड़ों का सर्पीला रास्ता उसकी गति के लिए एक प्राकृतिक स्पीडब्रेकर का काम करता था। यहां तेज रफ्तार पर स्वतः ही रोक लग जाती थी। पहाड़ हर मानवीय कृत्रिम गति को रोकने का काम करता। उसके भौतिक विचार, इच्छाएं, चाहत, महत्वाकांक्षा ही नहीं उसकी विकास की बातें भी यहां अनावश्यक जान पड़ती। यहां तेज दौड़ने पर मिनटों में ही आदमी हांफने लगता। शायद तभी यहां के स्थानीय लोगों को धीरे-धीरे चलते और चढ़ते देखा जा सकता है। हो सकता है यही कारण हो जो यहां के नृत्यों में भी लयबद्धता तो है मगर अनावश्यक तेजी नहीं। बाहर से आने वाला कुशल से कुशल ड्राइवर भी पहाड़ पर चढ़ते के साथ ही अधिक चौंकन्ना, सावधान और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार करने लगता। बगल की गहरी खाई जरा-सी चूक की सजा देने को तत्पर दिखाई पड़ती। आने और जाने वाली गाड़ियों के बीच यहां पूरा तालमेल होना चाहिए अन्यथा वाहनों का व्यवस्थित आवागमन संभव नहीं। कतारबद्ध खड़ी गाड़ियां इस बात का प्रमाण हैं कि यहां अनुशासित रहना पड़ता है। जाने-अनजाने ही प्रकृति यहां सब कुछ सीखा देती है। इसके बावजूद अगर किसी ने चालाकी करते हुए होशियारी दिखाने की कोशिश की तो फिर घंटों जाम लग सकता है जिसका भुगतान सभी चालकों को करना पड़ता। शायद इसीलिए ऐसे चतुर चालक को अन्य इस तरह से घूरते हैं कि वो फिर कभी ऐसा करने का साहस न करे। देवभूमि के प्रवेशद्वार कालका पर बरसों पुराने संकरे रास्ते पर आवागमन कभी-कभार अवरुद्ध अवश्य हो जाता था मगर कतारबद्ध धीमी गति से चलती गाड़ियां हिमाचल आगमन का संदेश हर यात्री को दे दिया करती थीं। इस बार वहां जाने पर, नवनिर्मित फोर-लेन की चौड़ी सड़क के द्वारा पिंजौर, कालका और परवाणु बाइपास से सीधे हिमालय में प्रवेश करना एक नया अनुभव था। मानवीय विकास की एक और कहानी। आधुनिक मनुष्य को इतराने के लिए एक और बहाना। इसमें कोई शक नहीं कि यह भीड़भाड़ से दूर तेज रफ्तार गाड़ियों के लिए कम समय में पहाड़ के बीच में घुसने का एक सफल परियोजन है। लेकिन इसके द्वारा हम क्या पाना चाहते हैं? और फिर किस कीमत पर? सड़क निर्माण से बचा-खुचा सामान रास्ते के दोनों ओर यहां-वहां बिखरा हुआ था। सड़क तो चमकदार और सपाट बना दी गयी मगर पहाड़ की सतहों को कई जगहों से खरोंचने पर उसे बदसूरत  कर दिया गया प्रतीत होता था। ऐसा अहसास हो रहा था कि मानो मनुष्य ने पर्वतों को जख्म दिये हैं और स्वार्थवश अपनी सुविधा के लिए पहाड़ों के शरीर को बीच से काट दिया है। प्रकृति के साथ किस हद तक हम असंतुलन बना सकते हैं? इसका निर्धारण हम स्वयं कभी नहीं कर सकते। और फिर करेंगे भी तो स्वार्थी होकर अपनी सुख-सुविधाओं के लिए कई तर्क और प्रमाण इकट्ठे कर देंगे। हम यह भूल जाते हैं कि हमारे कुतर्कों का विरोध करने के लिए यहां कोई नहीं। यह दीगर बात है कि प्रकृति की मार हमें अपने आप समय-समय पर मिलती रही है। लेकिन वो निर्दयी कभी नहीं हुई उसने हमें सदा समय से पूर्व चेतावनी दी है। मगर हम चेतने का नाम ही नहीं लेते। परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपने प्रेम के स्रोतों का मुख बंद कर दिया है। पहाड़ों पर झरने अब दिखाई नहीं देते। नदियां सूख गई हैं। हरियाली तेजी से घट रही है। और जो कुछ बचा उसे प्लास्टिक पॉलीथिन ने ढक दिया है। फास्ट-फूड संस्कृति ने स्थानीयता की मीठी सुगंध को समाप्त-सा कर दिया है। जीवन मूल्य नष्ट हो चुके हैं। रही-सही कसर राजनीति ने पूरी कर रखी है। पूर्व में भी यह मेरे लिये सदा आश्चर्य का विषय रहा है कि यहां पर राजनीति किसी भी मामले में जमीन से कम नहीं। सभी दलों का अमूमन एक-सा हाल है। इस बार एक राजनैतिक दल की रैली को देखने का मौका मिला था। सैकड़ों की तादाद में वाहन पार्टी का झंडा लगाकर दौड़ रहे थे। एक कस्बे में इनके पहुंचते के साथ ही जीवन ठहर-सा गया था। ये कतारबद्ध तो जरूर थे मगर इन्हें देखकर अटपटा लग रहा था। आदमियों से अधिक वाहनों की संख्या थी। आगे-आगे चलते नेता जी पूरी तरह से आश्वस्त और प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। यूं तो स्थानीय निवासी अन्य स्थानों की तरह ही इसमें कम दिलचस्पी दिखा रहे थे। मगर फिर भी तथाकथित कार्यकर्ताओं द्वारा दिखावे की पूरी कोशिश की जा रही थी। क्या प्रदेश की बेहतरी के लिए राजनीति में शक्ति प्रदर्शन, वो भी वाहनों की संख्या के माध्यम से दिखाना जरूरी है? इस तरह की सोच ने हमारे जीवन को, समाज को कितना प्रदूषित किया है? इस पर कोई संदेह नहीं। मुझे कुछ और नहीं, इस बात की बेहद चिंता है कि मानवीय संस्कृति की एक अत्यंत प्राचीन धरोहर और विरासत जो थोड़ी-बहुत पहाड़ों पर बची हुई थी, हम उसे तेजी से नष्ट कर रहे हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से अधिक दुःख इस बात का था कि प्रकृति-पूजा का दम भरने वाले हम हिन्दुस्तानी किस हद तक स्वार्थी हो सकते हैं। हमारी सोच की इस रफ्तार से क्या यह प्रदेश भविष्य में भी देवभूमि कहलायेगा? इस बात का मुझे संदेह है।
मनोज सिंह

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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