शब्दों का शोर


March 31, 2012

विभिन्न महत्वपूर्ण नौकरियों एवं उच्च शिक्षा की संस्थाओं में प्रवेश की चयन प्रक्रिया में सामूहिक बहस (ग्रुप डिसकशन) एक महत्वपूर्ण पायदान बनता चला जा रहा है। जिसमें एक सुनिश्चित संख्या के अभ्यर्थियों को एक बड़े व बंद कमरे में बिठा दिया जाता है और किसी एक विषय पर उन्हें बहस करनी होती है। परीक्षक/निरीक्षक दूर से बैठकर इन सारी गतिविधियों को ध्यान से देखते रहते हैं। इस बहस का समय सुनिश्चित होता है। चूंकि विषय अचानक दिया जाता है इसलिए आप पहले से इस पर तैयार नहीं हो सकते। यही कारण है जो आपके मस्तिष्क की, उस विषय पर पहली क्या प्रतिक्रिया होती है, उसे बखूबी सुना व देखा जा सकता है। आप किसी विषय पर कितना जानते हैं? जांचा जा सकता है। आपकी समझ को परखा जा सकता है। आपके कहे गये विचारों का विश्लेषण हो सकता है। बीच में समय नहीं होता इसी कारण से आप किसी और से मुद्दे पर पूछताछ भी नहीं कर सकते। यह विशुद्ध आपका अपना दृष्टिकोण होता है। यही नहीं, आप अपनी बात किस तरह रखते हैं, यहां यह भी महत्वपूर्ण होता है। विद्वानों की राय माने तो सिर्फ अपनी बात कहना ही नहीं दूसरों की बात सुनना भी उतना ही जरूरी होता है। अर्थात आप अन्य की कही गयी सही बातों का भी समर्थन करते हैं या नहीं? या सिर्फ अपनी ही चलाते हैं? और अगर गलत मत भी है तो विरोधी पक्ष की बातों को आप किस तरह से काटते हैं? दूसरों को अपनी बातों से किस तरह से प्रभावित करते हैं? अर्थात इस दौरान आपके तर्क-वितर्क की क्षमता का भी मूल्यांकन हो जाता है। यहां शालीनता से अपनी बात रखना अधिक प्रभावशाली माना जाता है। और कोई माने या न माने सामान्य शिष्टाचार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मगर अमूमन देखा गया है कि इस तरह की सामूहिक बहस एक शोर में परिवर्तित हो जाती है। जिसमें सभी जोर-जोर से चिल्लाकर अपनी बात रखते हैं। कोई किसी की बात को सुनने के लिए तैयार नहीं होता। अधिक से अधिक बोलने की होड़ मच जाती है। ऊंची से ऊंची आवाज में बोलने की कोशिश की जाती है। तभी दूर से देखने पर कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि झगड़ा हो रहा है। ऐसे में आमतौर पर बहस का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा पाता। यह सामूहिक वार्तालाप न होकर एक तरह की ‘अपनी डफली अपना राग’ बन जाता है। कई बार अभ्यर्थी खुद बाहर आने पर यह कहते पाये जा सकते हैं कि अंदर मछली-बाजार बन गया था। और वे अमूमन इस हरकत से बड़े असंतुष्ट रहते हैं और कई बार दुखी भी दिखायी पड़ते हैं।
उपरोक्त परिस्थिति बड़ी हास्यास्पद कही जानी चाहिए। और फिर छात्रों द्वारा बाद में पछताने से क्या फायदा। जबकि वे सभी इस सत्य को जानते हैं कि अधिक बोलना, चिल्लाना, दूसरों को न सुनना, अपनी ही बात बोलना आदि-आदि सैद्धांतिक रूप से गलत है और इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मगर फिर भी अधिकांश इस गलती को करने से नहीं बच पाते। इतना ही नहीं, जोश में अपनी ही कही बात को बाद में किसी अन्य संदर्भ में उलट देते हैं अर्थात एक ही बहस में अलग-अलग राय दे जाते हैं। जबकि यह बड़ी गलती मानी जानी चाहिए। मगर फिर भी आम विद्यार्थी जल्दबाजी में ही सही ऐसा करने से नहीं चूकते। कह सकते हैं कि यह एक किस्म की फितरत बन चुकी है। प्रवाह में हमें कुछ होश नहीं रहता। हां, बाद में रुकने पर खुद अहसास होता है। उधर, निरीक्षक तो आसानी से समझ जाता है। और ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं कि जब मात्र एक बार बोलने वाला अभ्यर्थी चुन लिया गया और पूरे समय बोलने वाला निकाल दिया गया। शांत, गंभीर रहते हुए किसी एक ही कथन से आप अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रख सकते हैं। समूह में किसी एक का सटीक मत दूसरों के लिए मुश्किल बन सकता है। इन सामान्य से दिखने वाले महत्वपूर्ण बिंदुओं को, कोचिंग संस्थाओं में तमाम अध्यापक घुट्टी की तरह पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। फिर भी छात्र वही गलती करते हैं, क्यों? क्योंकि यह हमारी कमजोरी नहीं आदत बन चुकी है। समाज का स्वभाव बन चुका है।
ऐसा ही कुछ दृश्य आप टेलीविजन पर होने वाले विभिन्न बहसों में देख सकते हैं। यहां अमूमन वरिष्ठ एवं विशिष्ट लोगों को अपनी-अपनी बात रखने के लिए बुलाया जाता है। विषय भी पहले से सुनिश्चित होता है और भाग लेने वाला हर एक व्यक्ति किसी विशेष वर्ग या विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है, सभी को पहले से ही पता होता है। इसके बावजूद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, बहस जिस रूप में आगे बढ़ती है, उसका वर्णन यहां न ही किया जाये तो अच्छा है। कई बार शब्दों में शालीनता की सभी सीमाएं टूट जाती है। खुद की गलती को कभी नहीं स्वीकारा जाता उल्टा दूसरों की गलती को उभारा जाता है। क्या इससे आप सही साबित हो जाते हैं? बिल्कुल नहीं। और ऐसे में यह बहस तू-तू, मैं-मैं में बदल जाती है। कई बार कुछ भी सुनाई और समझ नहीं आता। तथाकथित परिपक्व और बुद्धिजीवी वर्ग का प्रभाव आम दर्शक पर क्या होता होगा? क्या वार्ता में भाग लेने वाले नहीं जानते? जानते और समझते हैं, मगर फिर भी वही गलती करते हैं। आखिरकार क्यूं? शायद यह हमारे आधुनिक जीवन मूल्यों को दर्शाता है।
ऐसा ही कुछ-कुछ लोकसभा, राज्यसभा और विधासभाओं में भी देखा जा सकता है। स्थिति कई बार इतनी गंभीर हो जाती है कि इन सभाओं के अध्यक्ष इसे किस तरह नियंत्रण में कर पाते होंगे, देखकर आश्चर्य होता है। इस घटनाक्रम को वो किस रूप में लेते होंगे, गहन विश्लेषण और चिंतन का विषय लगता है। चूंकि वे अमूमन इन सभाओं के सदस्य भी रह चुके होते हैं। ऐसे में इनका स्वयं का आचरण सभा में बहस के दौरान एक सदस्य के रूप में किस तरह होता था? क्या वे कभी रुककर सोच पाते होंगे? यह अवलोकन एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का विषय है। सभापति के आसन पर विराजमान होने पर दूसरों के व्यवहार में स्वयं का प्रतिबिंब देखते होंगे तो कैसा लगता होगा? हो सकता है तकलीफ होती हो। क्या कभी स्वयं से प्रश्न पूछने के लिए विवश होते होंगे? क्या आत्मचिंतन होता होगा?
उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर सीधे-सीधे दे पाना किसी के लिए भी मुश्किल है। मगर इसी तरह का दृश्य जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी आम देखे जा सकते हैं। घर-परिवार के अंदर जहां बोलने की पूरी स्वतंत्रता है वहां हम दूसरों की बातें कितना सुनते हैं? किस तरह का व्यवहार करते हैं, किस तरह से समझते हैं, अपनी बातों को किस तरह से दूसरों पर थोपते हैं, हर दूसरे घर में देखा जा सकता है। यहां पर परिवार के मुखिया की स्थिति को आसानी से समझा और परखा भी जा सकता है। कई बार कितनी विकट परिस्थितियों से वह गुजरता होगा, दूर बैठकर भी जाना जा सकता है। बाकी के सदस्य जीवन में उसी पद पर आसीन होने पर इसकी भूमिका के महत्व को समझ पाते होंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। मगर यह भी जरूरी नहीं। लेकिन हां अपनी डफली अपना राग बनाने पर परिवार में विघटन हो रहा है, घुटन हो रही है, एक रसोई कई चूल्हों में बदल जाती है तो परिवार के बीच दीवार खड़ी हो जाती है। ऐसा ही कुछ आधुनिक समाज के अंदर भी देखा जा सकता है। जहां हर वर्ग सिर्फ अपनी-अपनी बात कहने के चक्कर में रहता है। अधिक से अधिक संख्या में एकत्रित होकर चिल्लाकर ज्यादा से ज्यादा प्रभाव बनाने की कोशिश की जाती है। हम यह भूल जाते हैं कि ऐसा सभी करने लगे तो शोर उत्पन्न होगा। समाज की शांति भंग हो सकती है। हम जानकर भी अनजान बन जाते हैं। जब सब एक साथ बोलेंगे तो क्या होगा? जब कोई किसी को सुनने को तैयार ही नहीं तो क्या फायदा? दुःख इस बात का है कि हम धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जहां समाज मछली-बाजार बनता जा रहा है। मुश्किल इस बात की है कि यह किसी एक क्षेत्र या वर्ग में नहीं, हर जगह है। फिर चाहे वो खेल का क्षेत्र हो, व्यवसाय हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, उच्च, मध्यम या निम्न वर्ग हो। यहां तक कि धर्म के क्षेत्र में भी धर्मगुरुओं को एक-दूसरे से उलझते हुए, टीका-टिप्पणी करते हुए आम देखा जा सकता है। पता नहीं आदिकाल में महान धर्मगुरुओं के बीच शास्त्रार्थ कैसे हुआ करता था? वे जरूर उपरोक्त बातों का ध्यान रखते होंगे। मगर हम इतिहास और अपने पूर्वजों के संस्कारों से कभी शिक्षा नहीं लेते। यह सच होता जा रहा है कि पढ़े-लिखे को समझाना ज्यादा मुश्किल काम है। आज टेलीविजन के किसी भी चैनल को खोलकर देख लें, कुछ समय के पश्चात दिल और दिमाग उलझकर भ्रमित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि मानों कई दिशाओं से तरह-तरह के विचारों, घटनाओं, सनसनियों के बम फेंके जा रहे हैं। आपका मन-मस्तिष्क एक को सुनकर-समझकर अभी संभल ही पाता है कि दूसरा तीर आ लगता है। ऐसे में कोई भी तंग हो सकता है। ऐसी परिस्थिति में आप अशांत, मानसिक रूप से परेशान और हो सकता है उद्वेलित होकर कहें- बंद करो ये शोर। क्योंकि आपको शांति चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

Copyright 2004-2015, All Rights Reserved with Manoj Singh, | Site by: Classic Computers