कुछ अनुत्तरित प्रश्न


March 17, 2012

एक मित्र के व्यवहार ने कल मुझे हैरान किया था। वे एक प्रमुख समाचारपत्र से संबंधित हैं और हिंदी साहित्य में भी दखल रखते हैं। विभिन्न विषयों पर उनसे समय-समय पर बहस करने में मजा आया करता था। उनकी सटीक टिप्पणियां और तर्कों के साथ-साथ तथ्यों और आंकड़ों के आगे जब निरुत्तर हो जाता तो मुझे तकलीफ नहीं होती थी। कहीं भी इसे मैं व्यक्तिगत नहीं लिया करता था न ही कभी जीत-हार के रूप में सोचा करता था। बल्कि मेरी कल्पना नयी ऊर्जा पाती। उसे व्यापकता के साथ नयी दिशा भी प्राप्त होती। फलस्वरूप आत्मचिंतन और विचार मंथन की प्रक्रिया तेज होती। हम हर मुद्दे पर घंटों बहस करते थे मगर हर बार अंत में रिश्तों में ताजगी और अपनापन महसूस होता। अमूमन हमारा उद्देश्य एक ही होता, समाज का विकास और देशहित। लेकिन कल सब कुछ बदला हुआ था। विगत दिवस हुए चुनावों में हार-जीत पर मेरी टिप्पणी पर उनकी प्रतिक्रिया को सुनकर पहले तो मैं समझ नहीं पाया। मोबाइल पर हो रही बातचीत के अचानक कट जाने पर मुझे लगा कि शायद यह अनायास ही हुआ है। मेरे द्वारा पुनः डायल करने पर वह यह कहते हुए पाये गये कि मैं उन लोगों से बात तक करना पसंद नहीं करता जो अमुक-अमुक विचारधारा का बातचीत में भी समर्थन करते हों। कथन समाप्त होते ही टेलीफोन एक बार फिर कट गया तो इस बार मुझे शक हुआ था। एक बार फिर टेलीफोन मिलाने तक मैं समझ चुका था कि बात कुछ और है। तीसरी बार फोन लगाने पर यह बिल्कुल साफ हो चुका था कि वह एक विचारधारा से नफरत करते हैं। जबकि मेरे लिये विचारधारा और राजनीतिक दल बुद्धिजीवी मित्र से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकते। मगर उनके लिए उनकी सोच और पसंद-नापसंद प्रमुख थी और वह उसके लिए मुझ जैसे लेखकीय दोस्त की दोस्ती भी तोड़ने के लिए तैयार बैठे थे। बहरहाल, मैंने दूसरे संदर्भों की बात शुरू करके अपने मूल्यवान संबंधों को बचाने का प्रयास किया और सामान्य रूप में बातचीत समाप्त की।
उपरोक्त घटनाक्रम एवं व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं मगर फिर भी प्रश्न उठता है कि क्या एक बुद्धिजीवी का ऐसा व्यवहार उचित हो सकता है? क्या यह संकीर्ण मानसिकता का परिचायक नहीं? सवाल तो कई उठते हैं जैसे कि यह पूछे जाने पर कि किसी भी विचारधारा से सहमत या असहमत होना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन उससे नफरत करना क्या उचित है? और फिर नफरत का कोई कारण भी तो होना चाहिए? इस प्रश्न पर वह थोड़ा भड़के भी थे। बाद में शांत मन से विश्लेषण किया तो लगा कि ये विचार उनके कोई व्यक्तिगत अनुभव आधारित नहीं बस एक किस्म की कट्टरता है जो उन्हें कुछ और न सोचने के लिए मजबूर करती है। यह समाज के लिए एक अत्यंत घातक परिस्थिति मानी जानी चाहिए। किसी पार्टी के कार्यकर्ता से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है और आम जनता में भी कुछ एक लोग अपनी-अपनी पक्की राय रख सकते हैं मगर एक लेखक व मीडियामैन में इसकी संभावना कम होनी चाहिए। लेकिन हिंदुस्तान में तथाकथित बुद्धिजीवियों का इस तरह का आचरण मीडिया में अमूमन देखा जा सकता है। उधर, सामान्य हिंदी लेखकों का ऐसा व्यवहार फेस बुक से लेकर छोटी-मोटी गोष्ठियों में कई बार इन हदों को भी पार कर जाता है। सामान्य शिष्टाचार भी नहीं निभाये जाते। यहां तक कि पुरस्कार लेने और देने में भी कुछ लोगों को अछूत घोषित कर दिया जाता है। और लिये-दिये गये मान-सम्मान को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार संदर्भित व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता है। विरोधी विचारधारा की प्रजातांत्रिक सरकार को भी स्वीकार नहीं किया जाता। चुनी हुई सरकार के प्रति ऐसा दृष्टिकोण क्या अवाम का अपमान नहीं है? क्या लोकतंत्र में इस तरह के व्यवहार पर प्रश्नचिन्ह नहीं उठना चाहिए? यह समाज को कितना नुकसान पहुंचा सकता है? इसे चंद शब्दों में सीधे-सीधे कह देना संभव नहीं होगा। ऐसी अवस्था में व्यक्ति अपने पसंदीदा नेताओं एवं संबंधित विचारधारा की बुरी बातों की जहां अनदेखी करता है वहीं नफरत होने के कारण विरोधी पार्टी के अच्छे कार्य और सकारात्मक विचार भी स्वीकार नहीं करता। उलटे एक की कट्टरता को देख प्रतिक्रिया में दूसरा और अधिक कट्टर बन जाता है। संक्षिप्त में कहें तो ज्ञानी में इस अवगुण के आते ही क्या वो अज्ञानी नहीं हो जाता? चूंकि यह कहीं न कहीं उसकी लेखनी और वक्तव्य पर भी असर डालता है। ऐसा लेखन फिर समाज को भ्रमित व प्रदूषित कर सकता है, कहना गलत न होगा।
दुर्भाग्य से ऐसे कट्टर बुद्धिजीवियों की संख्या बढ़ती जा रही है। दूसरे पर दोषारोपण करने वालों को पता नहीं चलता कि वो स्वयं कितना कट्टर हो रहा है। देखने व समझने वालों के लिए यह बड़ी हास्यास्पद स्थिति होती है। मगर इसके फलने-फूलने के कारण कई हैं-व्यक्तिगत लाभ, अहम्‌ का तुष्टिकरण, सामाजिक सुरक्षा, संकीर्ण मानसिकता, धार्मिक प्रतिबद्धता, भावनात्मक लगाव, प्रतिस्पर्धा के युग में पहचान और सफलता का शार्ट-कट। और फिर कहीं न कहीं बाजारवाद। क्योंकि और कुछ हो न हो कट्टरता से फायदे तो होते ही हैं। आपको अपनी तरह के लोगों का खुला समर्थन प्राप्त होता है। आप एक ग्रुप (यहां गैंग शब्द बेहतर होगा) में होने का फायदा उठाते हैं। लेकिन फिर समाज कई खंडों में पूरी तरह से बंट जाता है। जहां किसी भी तरह का खुलापन न हो उस कमरे में घुटन स्वाभाविक है। मुश्किल इस बात की है कि यह सिर्फ बुद्धिजीवियों में ही नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र को सीमाओं में बांध दिया गया है। पढ़ा-लिखा व्यक्ति अधिक कट्टर हो जाता है क्योंकि आधुनिक पढ़ाई उसे नया सोचने की इजाजत नहीं देती। यह ज्ञान नहीं सूचना पर आधारित शिक्षा का प्रतिफल है। यहां ऐसा महसूस कराया जाता है कि आप सब जानते हैं। जब आप किसी दूसरे को सुनना ही नहीं चाहते, समझना ही नहीं चाहते तो आपको अपनी गलतियों का पता कैसे चलेगा? ऐसी अवस्था राजनीति के लिए अनुकूल होती है। ऐसी कट्टरता भी। फिर चाहे वो धर्म या विचारधारा के नाम पर हो या फिर किसी एक वर्ग या विचारधारा को विरोधी घोषित करके हो, डराकर हो, भावनाओं के साथ खेलकर हो, इतिहास और भूगोल की गवाही देकर पैदा की जाये मगर होती राजनीतिज्ञों के लिए फायदे का सौदा। यही कारण है जो राजनेता भी जाने-अनजाने कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। आश्चर्य यह देखकर होता है कि हार के बाद भी वे खुलेदिल से अपनी गलतियों को समझना नहीं चाहते। विश्लेषण के दौरान भी चालाकी करने की कोशिश करते हैं। मूल कारणों में जाना ही नहीं चाहते। चूंकि यह व्यक्तित्व द्वारा ओढ़े गये आवरण को हटा सकता है, जीवनशैली को आघात पहुंचा सकता है। वे अपने आपसे भी झूठ बोलने लगते हैं और फलस्वरूप झूठे अहम्‌ में जीना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि एक समय के बाद फिर गद्दी मिलेगी। चाहे फिर जो भी गलती कर रखी हो।
तो क्या सारी गलती अवाम की है? यह उसका स्वभावजनित प्रतिफल कहें तो बेहतर होगा क्योंकि वह अपना ही नुकसान सदियों से कराता आ रहा है। स्वयं को शासित एवं शोषित बनाये रखने की शासक की चालाकी को वो कभी नहीं समझ पाया। शासक भी फिर चाहे जिस भी रूप में हो, उसकी पीठ थपथपाकर उसे चने के झाड़ पर चढ़ाये रखता है। और अपना उल्लू सीधा करता रहता है। तो क्या अवाम के पास कोई विकल्प नहीं? होता है भी तो हम मौका नहीं देते। बार-बार कहा जाता है कि अब सादे सच्चे खुले विचार वाले चिंतक नेताओं की कमी महसूस होती है। क्या कभी अवाम ने महसूस किया कि जब ये लोग प्रासंगिक भी थे तो क्या इन्हें स्वीकार किया गया था? जिन लोगों का नाम लेकर आज आहें भरी जाती हैं, क्या वे अपने समय में सफल हो पाये थे? सत्ता पर वही विराजमान होता आया है जिनके पास संगठन और सत्ता तक पहुंचने की तमाम सीढ़ियां व चाबियां हैं। इक्के-दुक्के उदाहरण को छोड़ दें। इन्हें दुर्घटना कहा जाना चाहिए। आज भी राजनीति में उन्हीं को मौका मिल पाता है जिसके पास तथाकथित क्षमता और सक्षमता हो। राजनेता इस तथ्य व सत्य को भलीभांति जानता है तभी राजनीति की बात करने वाले सामान्यजन को इस क्षेत्र में आकर चुनाव लड़ने की चुनौती दी जाती है। वो जानता है यह उसके बस का नहीं। उधर, हम खुद नहीं चाहते कि हमारा शासक सीधा, सरल व सच्चा कोई नया व्यक्ति हो। ऐसे में राजनेताओं में अगर अहम्‌ आता है, कट्टरता आती है तो क्या गलत है? ऐसी परिस्थितिजन्य समाज में बुद्धिजीवी भी अपनी पसंद का राजनेता और विचारधारा चुन ले तो इसमें किसी को परेशानी क्यों? मुझे उपरोक्त दोस्त के व्यवहार से अब कोई भी आश्चर्य नहीं हो रहा। मेरा उनकी निगाहों में मूल्य ही क्या है? मुझसे उनको मिल ही क्या सकता था? एक स्वस्थ व खुले विचार!! बस!! इसकी कीमत क्या है? कुछ नहीं। असल में सच तो यह है कि जो हम चाहते हैं जैसा हम सोचते हैं वैसी ही सरकार हमें मिलती है, वैसे ही राजनेता होते हैं और वैसे ही बुद्धिजीवी भी पनपते हैं। और फिर मित्र भी तो इसी समाज से आते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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