विकास या सुशासन


November 26, 2011

पिछले दो दशक में अगर किसी एक शब्द को भारतीय ही नहीं विश्व राजनीति के साथ-साथ मीडिया में सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है, तो वो एक शब्द ‘विकास’ हो सकता है। कई आम चुनाव इसके नाम पर जीत लिये गये तो कहीं-कहीं इसके अभाव में बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ हार गये। शायद ठीक भी है, चारों तरफ नजर दौड़ायें तो तथाकथित विकास की अघोषित परिभाषा इधर-उधर बिखरी हुई आम दिख जायेगी। और कुछ समझ आये न आये, यह तो सच ही है कि सड़कें चौड़ी हुई हैं तो साथ ही चमचमा भी रही हैं। और उस पर दौड़ रही हैं लाखों-करोड़ों की अनगिनत लग्जरी गाड़ियां। पहले जहां नगर के प्रतिष्ठित सेठ-साहूकार भी एम्बेसेडर और फीयेट से काम चलाया करते थे वहीं अब शहर की संभ्रांत कालोनी के हर दूसरे घर के सामने बड़ी-बड़ी वातानूकुलित आरामदेय ब्रांडेड गाड़ियां खड़ी मिल जाएंगी। नगर के चारों ओर तेजी से कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे कांच की दीवारों से बने विशाल मॉल और उसमें इठलाती-इतराती पश्चिमी वेशभूषा (आधी-अधूरी) में लिपटी जीरो फीगर वाली भारतीय सुंदरियां। साथ में विचरते चौड़ी छाती और बलिष्ठ भुजाओं वाले भारतीय युवा। वैसे नयी पीढ़ी को देखकर कभी-कभी उनके भारतीय होने पर भी शक हो जाता है। चूंकि इनकी बोलचाल में अंग्रेजी ने अंदर तक प्रवेश कर लिया है। सांस्कृतिक जीवन रात को डिस्को से प्रारंभ होकर तेज बजते संगीत में सुबह तक थिरकता है। हर हाथ में मोबाइल और हर छात्र को पहले इंजीनियरिंग के बाद मैनेजमेंट के पागलपन का भूत सवार है। और फिर मेडिकल हो या वकालत, हर क्षेत्र में पांच डिजीट के पैकेज के बिना मानों समाज में मनुष्य की इज्जत छोड़ अस्तित्व ही नहीं। जीवनशैली में ब्रेड-बटर व पिज्जा-बर्गर आ ही चुके हैं। तुरंत खाना, तुरंत प्यार, तुरंत तरक्की, सब कुछ तुरंत चाहिए, तेज भागती गाड़ियों की रफ्तार से भी तेज। इंटरनेट के स्पीड की बात की जाती है और इसे गांव-गांव पहुंचाने की योजना का क्रियान्वयन हो रहा है। कंप्यूटर घर-घर में पहुंच चुका है। सामान की पैकिंग आकर्षक हुई है और दुकानें सजी-संवरी सी लगती हैं। संक्षिप्त में कहें तो सांसारिक मायाजाल का वैभव अपने चरम पर है। इन सबको ही देखकर तो कहा जाता है कि सचमुच विकास हुआ है।
उपरोक्त विकास की महिमा बखान में कोई कमी रह गई हो तो कुछ दो-चार और भी चमचमाते शब्द उपयोग में लाये जा सकते हैं। जैसे कि विकास दर, अर्थव्यवस्था, खुला बाजार, कारपोरेट, शेयर आदि-आदि। ये ऐसे कुछ शब्द हैं जो विश्व जनमानस के विचार और सोचने की क्षमता में प्रवेश कर चुके हैं। इन शब्दों के बिना आधुनिक जीवन की कोई भी व्याख्या हो ही नहीं सकती। समाचारपत्र इनके गुणगान से भरा पड़ा होता है। मीडिया भी इनसे संचालित होता है। खेल और मनोरंजन तक पूरी तरह से कारपोरेट के नियंत्रण में आ चुके हैं। इसकी प्रतिध्वनि प्रजातंत्र के शिखर संस्था संसद के भीतर भी गूंजती सुनाई देती है। संक्षेप में कहें तो अर्थव्यवस्था ने राज्य की व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया है। वित्त सभी मंत्रालयों के केंद्र में आ चुका है। आर्थिक नीतियां राज्य की सभी योजनाओं को संचालित करने लगी हैं। हर संस्था, विभाग और कार्यालय में आर्थिक विभाग सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया है। पूर्व में सैन्य बल किसी राष्ट्र की शाक्ति का पैमाना होता था। धन महत्वपूर्ण तो था मगर एक सहयोगी के रूप में। अब आर्थिक शक्ति विश्व शक्ति बनने के लिए आवश्यक है। कारपोरेट की दुनिया सेना नायकों को खरीद सकती हैं। सवाल उठता है कि क्या यह उचित है? बहरहाल, चारों ओर फैल रहे असंतोष को कम से कम सकारात्मक रूप में तो नहीं लिया जा सकता। असल में अति किसी भी चीज की खराब होती है। बहुत अधिक मीठा भी जहर बन जाता है। ऐसा लगता है मानो पैसे के पैरों तले जीवन कुचल गया है और सांसें बमुश्किल निकल पा रही है। फिर भी आधुनिक बुद्धिजीवी अभी तक विकास की इसी मॉडल को सही ठहरा रहे हैं।
अकादमिक या बौद्धिक विश्लेषण न करते हुए भी चारों ओर नजर डालें तो एक चीज साफ दिखाई देती है कि भ्रष्टाचार बढ़ा है। उसकी तीव्रता बढ़ी है। घोटालों में लिप्त होने वालों की संख्या बढ़ी है। पेट्रोल पर कब्जा और सैन्य सामग्री की बिक्री के लिए कई राष्ट्रों को विश्व शक्तियों द्वारा अस्थिर कर दिया गया। उधर विकासशील देशों के चौराहों की रेड लाइट पर चमचमाती गाड़ियों के साथ ही मांगने वाले भिखारियों की संख्या भी बढ़ी है। हमने पार्क में पार्किंग शुरू कर दी है। देखने में तो हर दूसरा युवक बलिष्ठ भुजाओं वाला पहलवान नजर आता है मगर वो प्राकृतिक रूप से स्वस्थ नहीं। आत्महत्याएं अब आम हुई हैं तो तलाक हर दूसरे घर में हुआ या होने वाला है। हजारों दवाइयों एवं चिकित्सा विज्ञान के अद्भुत विकास के बाद भी मनुष्य अधिक बीमार हुआ है। अस्पतालों में मरीजों की कतारें लंबी हुई हैं। वकीलों और डाक्टरों ने एक व्यवसायी की तरह पैसे तो कमाये हैं मगर अपनी इज्जत को गंवाया है। मारकाट, छीनाझपटी, हत्याएं, लूट की संख्या बढ़ी हैं। औरतें स्वतंत्र तो हुई हैं मगर बलात्कारों की संख्या साथ में बढ़ी है। घर वीरान और उदास हुए हैं और मकान बाजार बन चुके हैं। राज-सिंहासनों के लिए राज-परिवार में षड्यंत्र और हत्याओं को इतिहास में पढ़ा था, अब पैसे की लालच में हर घर में इसके काले अध्याय जुड़ने लगे हैं। शहर के साथ-साथ गांव की गलियां भी असुरक्षित हुई हैं। प्रजातंत्र शब्द मोहित तो करता है मगर कमजोर और भूखे की आवाज दबाना पहले की अपेक्षा आसान हुआ है। यही नहीं मिनटों में बड़े-बड़े असाधारण सात्विक प्रवृति के मनुष्य की इज्जत भी बर्बाद करना संभव हुआ है। पदों के नाम बड़े-बड़े और गरिमापूर्ण हुए हैं मगर व्यक्ति ने आत्मसम्मान और आत्मिक शांति को खोया है। शिक्षण से लेकर सामाजिक और धार्मिक कार्य तक में पैसे का लेन-देन महत्वपूर्ण हो गया है। भगवान भी नोटों की मालाओं के पीछे छिपा दिये गये हैं। संपूर्ण व्यवस्था नोट के इशारे पर चलती है। इसे यकीनन सामान्य तो नहीं कहा जा सकता। तो क्या वास्तव में विकास को उसके वर्तमान स्वरूप में लिया जाना चाहिए? अवाम अब इस प्रश्न पर बेचैन होने लगा है। भूख की ज्वाला से उपजी असंतोष की चिंगारी आग बनकर कब धधक उठे कहा नहीं जा सकता।
आखिरकार प्रश्न उठता है कि सिर्फ विकास चाहिए या सुशासन? प्रश्न के मूल में ही सैद्धांतिक रूप से उत्तर भी कहीं छुपा है। सिर्फ विकास के द्वारा शासन नहीं चलाया जा सकता जबकि सुशासन में विकास एक आवश्यक अवयव के रूप में विद्यमान होता है। घर में लाखों रुपये ऐशो-आराम के साथ विकास का हर पैमाना उपलब्ध हो, मगर बच्चे बिगड़ जाये, पति-पत्नी के बीच मारकाट मची हो, ऐसी आर्थिक उन्नति किस काम की? अर्थव्यवस्था राज्य-व्यवस्था में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका जरूर निभाता है मगर यह अपने आप में संपूर्ण व्यवस्था नहीं हो सकती। बस विकास की परिभाषा के आधुनिक समझ में यहीं गलती हो गई। हमने मात्र आर्थिक और भौतिक विकास को संपूर्ण विकास मान लिया। सत्ता जब भी धन पर केंद्रित हुई है तब-तब अनियंत्रित हुई है। और इसने नशे में चूर होकर अवाम की जेबों को काटा है। अर्थ पर आधारित सरकारें महंगे चश्में पहनकर चारों ओर देखती हैं जहां लोगों के फटे कपड़े और भूखे पेट भी रंगीन होकर उसे भ्रमित करते हैं। कॉस्मेटिक सर्जरी द्वारा समाज के चेहरे को चमकाया गया मगर नीचे छिपाये गए काले धब्बे इतनी जल्दी उभरकर दिखाई देने लगेंगे, बड़े-बड़े महान अर्थशास्त्रियों ने भी अनुमान नहीं लगाया था। यूं तो व्यवसाय विज्ञान के विकास के पूर्व से ही मानवीय जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। समुद्र मार्ग से महीनों सफर करके लोग विश्व व्यापार करने जाया करते थे। व्यापारियों द्वारा राज व्यवस्था को प्रभावित करने के किस्से भी सुनाई देते हैं मगर अर्थव्यवस्था ने संपूर्ण राज-व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया हो ऐसा अध्याय इतिहास में दिखाई नहीं देता। धन महत्वपूर्ण हो सकता है संपूर्ण नहीं। इसीलिए अमेरिका जैसा शीर्ष पर बैठा विकसित देश भी फिर उसी चौराहे पर खड़ा हुआ अपने आप को ठगा-सा महसूस कर रहा है, जहां से राज की नीति को एक नये रास्ते की तलाश है। यकीनन यह सुशासन की ओर ही जाता है। जिसमें सभी नागरिक को समाज में सामान्य अवस्था में समान रूप से ससम्मान जीवनयापन करने का न केवल अधिकार प्राप्त हो वो ऐसा कर भी पाये। उसे विकसित नहीं संतुष्ट जीवन और संतुलित समाज चाहिए। समाज सुरक्षित न हो तो कांच की चमकीली दीवारें भी डर पैदा करती हैं। असंतुलन जीवन ही नहीं प्रकृति में भी बाढ़ और तूफान लाते हैं। जबकि आधुनिक विकास ने समाज में गहरी असमानता पैदा कर दी है। ऐसी चमचमाती तेज रफ्तार में दौड़ती गाड़ी का क्या फायदा अगर सड़क और चौराहे पर अनुशासन न हो। ऐसे में दुर्घटना होने की संभावना पर भीषण परिणाम भुगतने पड़ते हैं। सुरक्षा और मूल आवश्यकताओं की पूर्ति आर्थिक विकास से कहीं अधिक जरूरी है। नागरिक को सिर्फ विकास नहीं सुशासन चाहिए। जो दे संपूर्ण समानता।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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