भाषा का व्यावसायिक महत्व


November 11, 2011

एक मोबाइल कंपनी के प्रमुख क्षेत्रीय अधिकारी से चर्चा के दौरान कई विषयों पर बातचीत हुई थी। इसमें कई तथ्य और जानकारियां निकलकर आई थीं। ‘बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी’ की तर्ज पर भाषा के मुद्दे पर बातचीत ने ध्यान आकर्षित किया था और यह काफी लंबी चली थी। इस दौरान हिन्दी का लेखक होने के कारण हिन्दी भाषा पर चर्चा होना स्वाभाविक था। बहरहाल, भविष्य की क्या योजना है? प्रश्न पूछने पर उनका मत था कि अब हमें नये प्रयोग करने पड़ रहे हैं। कई राज्यों में तो टेलीडेंसिटी शतप्रतिशत पहुंच चुकी है। अर्थात तकरीबन हर घर में फोन है और हर एक हाथ में मोबाइल है। जो छूट रहे हैं, उनमें से अधिकतर गरीब तबके से हैं या मजदूर वर्ग के हैं, वरना स्थिति यह है कि अधिकांश सब्जी बेचने वाले और रिक्शा चलाने वालों के पास भी मोबाइल मिलेगा। कहीं-कहीं तो भिखारी भी अब मोबाइल के साथ देखे जा सकते हैं। घर में काम करने वाली महिलाओं के पास मोबाइल का होना तो अब आम बात है। ये सभी वर्ग आर्थिक रूप से एक अलग तरह का तबका है। इनकी आय सीमित है। इनके खर्चा करने की सामर्थ्य भी कम है। परंतु चूंकि इनकी संख्या बहुत बड़ी है इसीलिए इन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। बाजार द्वारा जनसंख्या के इसी विशाल हिस्से को अब निशाना बनाया जा रहा है।
उपरोक्त बात आसानी से समझ में आयी थी। सुनने के बाद मैंने उन्हें सुझाव दिया था कि आप टीवी और समाचारपत्रों में जो विज्ञापन देते हैं वो इस वर्ग को समझ नहीं आता। इनके द्वारा पढ़ा नहीं जाता। वो इनके साथ संवाद नहीं बना पाता। इन्हें खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करता। इसी क्रम में मैंने आगे कहा था कि क्या आपको नहीं लगता कि इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने के लिए उन्हीं की भाषा में बात करना बेहतर होगा? चूंकि यह कम पढ़ा-लिखा वर्ग है, अपनी बोली को ज्यादा समझता है। मातृभाषा उनके दिलदिमाग को छूती है। यह माना जा सकता है कि अंग्रेजी के बोले गये शब्दों के चकाचौंध से आकर्षित होकर एक हद तक चीजें खरीदी जाती हैं मगर स्थानीय भाषा के माध्यम से माल बेचा जाये तो बिक्री ज्यादा आसान और अधिक होगी। विशेषकर, उपभोग, मनोरंजन और सेवा सेक्टर में। बड़े-बड़े पश्चिमी फिल्म निर्माता-निर्देशक व अंग्रेजी कलाकार द्वारा हिन्दी सिनेमा में प्रवेश इस बात का प्रमाण है। अगर यह उदाहरण काफी नहीं तो भोजपुरी फिल्मों के व्यापार को देखा जा सकता है जिसका क्षेत्र वर्तमान में व्यापक और करोड़ों में पहुंच चुका है और तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। अब यह किसी भी मामले में हिन्दी से कम नहीं। उपरोक्त अधिकारी को बात जंची थी। आगे यह कहने पर कि हिन्दी ही नहीं सभी स्थानीय भाषाओं का उपयोग अधिक से अधिक किया जाना चाहिए, उनके चेहरे पर उभरती गंभीरता पढ़ी जा सकती थी। यूं तो इसका प्रयोग व उपयोग किया भी जा रहा है मगर अभी भी यह काफी कम प्रतिशत में हो रहा है। मैंने उन्हें हिन्दी समाचारपत्र की प्रसार संख्या के तीव्र गति से बढ़ने का उदाहरण भी दिया था। चूंकि आज कस्बों में, गांवों में संचार सेवाएं पहुंच चुकी हैं इसलिए अगर किसी मोबाइल कंपनी को अपना अस्तित्व सुरक्षित रखना है और आगे विस्तार करना है तो उन्हें स्थानीय सरल भाषा का प्रयोग करना होगा। चाहे फिर यह बेचने वाले पश्चिमी विचारधारा से पोषित तथाकथित मैनेजमेंट वर्ग को पसंद हो या न हो। इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं।
खबर आती रहती है कि अमेरिका और कई विकसित राष्ट्रों को अपने यहां पर एक बार फिर से हिन्दी को बढ़ावा देने का अहसास हुआ है। भारत जैसे विशाल बाजार को नियमित और नियंत्रित करना है तो उसी की भाषा में समझना और समझाना होगा। यह बात विदेशी कंपनियां समझ चुकी हैं। अब हम इंतजार करेंगे कि कब देसी कंपनियां इस बात को समझ सके। जिस दिन भी वे ये बात जान जाएंगी उस दिन उनके लाभ का सवेरा होगा। व्यापार के क्षेत्र में भाषा के महत्व की यह एक मिसाल है। व्यवसाय में भाषा के योगदान से साहित्य में भी एक नये युग की शुरुआत होगी।
भाषाएं सत्ता-सुख लेती हैं तो देती भी हैं। अगर एक तरफ सत्ता के साथ-साथ इनका प्रभाव क्षेत्र विस्तृत होता है तो सत्ता को विस्तारित करने में भी इनका योगदान होता है। शासक की भाषा में राजयोग साफ देखा जा सकता है। वैसे भी भाषाएं मुख्यतः तीन तरह से प्रचारित और प्रसारित हो सकती हैं। सत्ता के साथ, ज्ञान की भाषा के रूप में एवं व्यवसाय की भाषा बनकर। उर्दू ने मुगल शासनकाल में अपने पैर तेजी से पसारे तो अंग्रेजी अंग्रेजों के साथ आयी और गहरे तक फैल गई। ज्ञान की बात करें तो संस्कृत आज भी सिर्फ इसलिए जिंदा है कि इसमे ज्ञान का अथाह भंडार है। वरना वर्तमान युग में अवाम से इसका कोई भी संबंध नहीं बच पाया है। ग्रीक और अन्य यूरोपीय भाषाएं विज्ञान व साहित्य में अपने योगदान के कारण ही आज तक जिंदा हैं। लेकिन इन सबके बीच अंग्रेजी का विश्व भाषा बनना इन तीनों कारणों के एकसाथ होने के कारण ही संभव हो पाया। अंग्रेजों ने काफी लंबे समय तक विश्व के एक बड़े हिस्से पर राज किया तो साथ ही तमाम यूरोपीय भाषाओं में उपस्थित ज्ञान-विज्ञान और साहित्य को अंग्रेजी में अनुवाद और कहीं-कहीं लिप्यांतर आदि के द्वारा अपने अंदर आत्मसात भी किया। अंग्रेजों की शासन पद्धति में अप्रत्यक्ष रूप से ही सही मगर साथ ही स्वयं के व्यवसाय को प्रमुखता से विस्तार देने का उद्देश्य छिपा रहता था। यही कारण है कि अंग्रेजी इस दौरान व्यापार की भाषा भी बन गयी। इन तीनों कारणों का मिलाजुला प्रतिफल है कि विश्व की संपर्क भाषा का दर्जा हासिल करने में अंग्रेजी को आसानी हुई। जबकि विश्व के दो प्रमुख व विशाल जनसंख्या खंड द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी और चीनी विश्व स्वरूप नहीं हासिल कर पायी। अंग्रेजी के इतने सुनहरे सफर के बावजूद अन्य भाषाएं समानांतर में जीवित हैं और फल-फूल रही हैं तो उसके भी कई कारण हैं। वर्तमान बाजार के परिस्थितिजन्य नियमों ने अंग्रेजी के प्रभाव क्षेत्र को कम तो नहीं किया लेकिन बहुत हद तक नियंत्रित कर दिया है। यहां पर बाजार का दबाव देखा जाना चाहिए और इसी परिपे्रक्ष्य में हिंदी का व्यावसायिक महत्व समझा जा सकता है। अभी यह अपने प्रचार-प्रसार में और अधिक तीव्र होगी। इसे रोका नहीं जा सकता। हां, यह दीगर बात है कि इस संघर्ष के दौरान भाषाओं के बीच आपस में लेनदेन और तीव्र होने की संभावना है। मगर लंबी दौड़ में वही आगे बढ़ेगा जो अधिक चतुर, चालाक और बुद्धिमान होगा। भाषाएं भी मनुष्य के जैसा व्यवहार करती हैं। जो जितना अधिक लचीला होगा वो उतना अधिक स्वस्थ और लंबी आयु को प्राप्त होगा। अंग्रेजी में लचीलेपन की कोई सीमा नहीं। और दूसरी ओर अन्य प्राचीन भाषाओं के धीरे-धीरे लुप्त होने का यही प्रमुख कारण है कि उनमें लचीलापन नहीं था। हिंदी इस मामले में भी सर्वगुण संपन्न साबित हुई। चूंकि समय व परिस्थिति के अनुकूल ढल जाना न केवल हिंदी का स्वभाव है यह उसकी पहचान भी है। इसी कारण से यह आज अंग्रेजी के युग में भी फलफूल रही है। वरना न तो यह कभी शासक की भाषा रही और न ही ज्ञान-विज्ञान की। हां, इसके प्रभाव क्षेत्र में भी इसके भिन्न-भिन्न कई रूप देखे जा सकते हैं। जो हर दस किलोमीटर में बदल जाती है। यही उसके सुखी, समृद्ध और सफल जीवन का राज और गुण है। जहां से जैसे भी जो भी मिला उसे अपने अंदर समेटते हुए यह बड़ी तेजी से आगे बढ़ी है। तभी तो विदेशी व्यापारी भी यहां आकर टुटी-फूटी ही सही हिंदी में बोलने का प्रयास करते हैं। बाजार के नियम खरीदने वाला तय करता है। और आज खरीदने वाला हिंदी भाषी है। इसीलिए बेचने वाले को उसकी बात सुननी भी पड़ेगी और माननी भी पड़ेगी।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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