असंतोष की चिंगारी


October 29, 2011

एल्गजेंडर की सैन्य महत्वाकांक्षा, उसकी व्यक्तिगत अभिलाषाओं और चाहतों को विश्व अभियान का नाम क्यों दिया गया? उसे महान विश्व विजेता क्यों घोषित किया गया? पता नहीं। शायद उन दिनों के इतिहासकारों को दुनिया का मतलब ग्रीक से लेकर भारत के गंगा क्षेत्र तक ही समझ आता था। साथ ही वे राजा के चापलूस बनने से स्वयं को बचा न पाये। 20वीं शाताब्दी के दो युद्धों को विश्वयुद्ध का नाम न जाने क्यों दिया गया? जबकि मात्र दो राष्ट्र या उनके समूह के बीच युद्ध था। शायद वे दोनों देश शक्तिशाली थे और पूरे विष्व पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राज कर रहे थे, परिणामस्वरूप कुछ गुलाम देश तो न चाहते हुए भी इस जंजाल में फंस गये। और इस तरह से कई राष्ट्र आपस में उलझ पड़े। इतिहास, शासकों के अहसान तले-दबे इतिहासकारों के द्वारा ही लिखा जाता है जिन्होंने सदा अपने-अपने मालिकों को खुश करने में कभी कोई कमी नहीं रखी। पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान ने पूरे संसार को एकसूत्र में बांध दिया है। यह इतिहास के लिए भी एक अनोखा अनुभव है। इसके अतिरिक्त पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने भी पूरे विश्व को अपने प्रभाव में लिया है। मीडिया ने, जो आज एक इतिहासकार का काम कर रहा है, अगर उसकी स्वतंत्रता की बात यहां न भी मानी जाये तो भी, इस वैश्विक अर्थव्यवस्था को उसने ठीक ही एक सुनहरा विश्व रूप दिया है। उसकी प्रशंसा में कई गीत गाये हैं। लेकिन इसके अतिरिक्त साथ-साथ एक और चीज है जो उसी रफ्तार से साथ-साथ लगातार चारों ओर फैल रही है। और वो है असंतोष। यह पूरी तीव्रता के साथ पनप रही है। यकीनन इसका स्वरूप भी विश्वव्यापी है। यही असंतोष समय-समय व क्षेत्र के अनुसार विद्रोह का रूप धारण करता जा रहा है। लेकिन टुकड़ों में बंटा असंतोष विश्व क्रांति के रूप में कब परिवर्तित होगा? पता नहीं। मगर एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के आसार जरूर बन रहे हैं जिसे वर्तमान का चाटुकार इतिहासकार भी नजरअंदाज नहीं कर पायेगा।
कहीं इस विश्व क्रांति का बीज पश्चिम एशिया व आसपास के देशों में तो नहीं बोया गया? शायद। पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम को देखें तो असंतोष की शुरुआत इसी क्षेत्र में हुई। यहां विद्रोह ने विकराल रूप धारण कर लिया था। जिसे फिर महाभारत के संजय के तरीके से धृतराष्ट्र की अंधी आंखों वाले पूरे विश्व को दिखाया गया था। लेकिन तब यह अंदेशा नहीं था कि यह आग विश्व स्तर पर फैलेगी। उलटे भ्रम की स्थिति बनी थी। ऐसा महसूस होता था कि यह शक्तिशाली बड़े देशों की चाल भी हो सकती है। दबी आवाज से कहा जा रहा था कि हो सकता है कि प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने की यह एक रणनीति मात्र हो। प्रारंभिक अवस्था में यह कुछ हद तक सच भी हो, मगर समय ने इसे स्वतः ही निरस्त कर दिया। पहले मिस्र फिर लीबिया के तख्ता पलट को मात्र तानाशाहों के खिलाफ विद्रोह के रूप में देखना मूर्खता होगी। असल में यह आम जनता के दिल की आवाज है। आज इस असंतोष की आग एक तरफ यूरोप अमेरिका तो दूसरी ओर सुदूर पूर्वी देशों तक और यही नहीं चीन की मजबूत दीवारों को तोड़ते हुए कम्युनिस्ट साम्राज्य के भीतर तक घुस चुकी है। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जहां यह उपस्थित न हो। भारत को इससे बचा हुआ कहना मूर्खता होगी चूंकि यहां संतोष अवाम का स्वभाव है और बद से बदतर हालत में भी खुश रहना यहां की जीवनशैली। इसीलिए यहां असंतोष उभर नहीं पाता।
यह तो होना ही था। असमानता, जो इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने उत्पन्न कर रखी है वो इस हद तक पहुंच चुकी है कि प्राकृतिक नियमों के हिसाब से यह चल ही नहीं सकता। असमानता इतनी कि एक ही देश में एक व्यक्ति खा-खा के मोटा फिर बीमार हो रहा है तो दूसरा भुखमरी से मरने की कगार पर खड़ा है। एक बीसीयों मंजिल वाली भव्य इमारत में रह रहा है तो दूसरे को झोपड़ी भी नसीब नहीं। प्रकृति ने भी इतनी असमानता नहीं कर रखी है। माना कि कोई भी दो जीव-जंतु एक समान नहीं होते लेकिन जीवन की दृष्टि में मूल रूप से उनके बीच में असमानता भी नहीं। वे अपनी-अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हैं और खाते-पीते जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इससे कम या अधिक कुछ नहीं। असल में प्रकृति ने सभी को असामान्य बनाया है असमान नहीं। उनकी आपस की असमानता है भी तो उनके जीवन निर्वाह में रुकावट नहीं। सबकी अपनी-अपनी शक्तियां हैं तो अपनी-अपनी कमजोरियां भी। और सभी स्वतंत्र हैं। एक-दूसरे के पूरक और निर्भर होते हुए भी कहा जा सकता है कि वे आत्मनिर्भर हैं। व्यवस्था में संतुलन है और यह अनंतकाल से निरंतर जारी है। दूसरी ओर मनुष्य की प्रारंभिक शासकीय व्यवस्था राजतंत्र को देखें तो यहां कई बार मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों को छीन लिया जाता था और जनता भूखो मरने के लिए छोड़ दी जाती थी। कई बार उनका जीवन राजाओं की अति महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता था। इसके बावजूद लोग सह लेते थे और सदियों तक यह व्यवस्था चली। अनेक क्रांति और विद्रोह भी हुए मगर राजतंत्र के लंबे समय-काल के सामने इनकी संख्या कुछ नहीं। कारण स्पष्ट था कि एक राजा के अतिरिक्त कोई अन्य नहीं होता था। बाकी अवाम के बीच आपस में विशेष असमानता नहीं थी। मगर पूंजीपति व्यवस्था ने कुछ ही वर्षों में सैकड़ों राजा पैदा किये हैं। सिर्फ यही नहीं उसने पहले आम आदमी की इच्छाओं को चढ़ाया-बढ़ाया फिर उसे पूरा भी नहीं किया। यह तो संभव भी नहीं था। मगर अति चाहत में डूब चुकी जनता फिर इसे समझने के लिए तैयार क्यों हो? ठीक ही तो है, उसे रोज दिवास्वप्न दिखाये गये थे। अतः असंतोष की चिंगारी शोला बनकर हर व्यक्ति के दिल में भड़क उठी।
पूंजीपति व्यवस्था ने अगर कई अरबपति बना डाले तो उनकी रईसी के अनुपात में उतनी ही संख्या में गरीब भी बने। चंद पूंजीपतियों के आधुनिक महल इन असंख्य गरीबों के जनआक्रोश को कब तक सह पायेंगे यह तो समय ही बतायेगा। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि कांच की दीवारें पत्थरों के आगे टिका नहीं करतीं। मनुष्य यह भूल जाता है कि इतिहास उसी के पूर्वजों का है। वह कभी इतिहास से सबक नहीं लेता और इसीलिए इतिहास की पुनरावृत्ति होती है। बर्बरता व शोषण चाहे किसी भी रूप में हो किसी को भी स्वीकार नहीं होता। फिर चाहे वो धर्म के नाम पर हो या शासन व्यवस्था के नाम पर। आज शक्तिशाली ने न केवल खेलने (शासन व्यवस्था) के तरीके बदल लिये बल्कि खेल (शासन) को खतरनाक भी कर दिया। नये शासकों द्वारा शोषण के नये तरीके निकाले गये जहां शोषित को लुभाया जाता है। उसे लालच दिया जाता है। इसके लिए उसने खुद के चेहरे पर अलग-अलग मुखौटे लगा लिये हैं, हर तरह से लोगों को बेवकूफ बनाने की कोशिश की जाती है। इस काम में कुछ लोगों की मदद भी ली गयी। कारपोरेट के नाम पर कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के समूह में सत्ता-सुख बांटा गया। इसमें सभी क्षेत्र के शीर्ष लोगों को भागीदारी दी गयी। और फिर इनकी संख्या के अनुपात में अवाम को लूटा भी गया। खेल यूं तो बड़ी चतुराई से खेला गया। प्रजातंत्र और पूंजीवाद के नाम पर स्वतंत्रता और विकास के सुहावने स्वप्न दिखाये गये, जबकि वो तो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, मगर असल में दो वक्त की रोटी भी उससे छीन ली गई है। वरना कैसे रईसों की बड़ी-बड़ी अट्टालिकायें बन पातीं? राजे-महाराजे चले गये लेकिन उनके राजसी ठाठ समाप्त नहीं हुए। बस तरीके बदल गये। इस चतुर खेल का एक उदाहरण देखें। स्वतंत्रता और आधुनिकता के नाम पर, सौंदर्य और कला की आड़ में सरेआम मंच पर अर्धनग्न स्त्रियों को प्रदर्शन के लिए चलाया जाता है। लेकिन उसे शब्दों में लपेटकर फैशन परेड नाम दे दिया गया। इसके माध्यम से भी नव धनाढ्य की विभिन्न चाहतों को पूरा करना मकसद रहा। और यह बाजार की एक भव्य दुकान बनकर उभरी। यही नहीं हर क्षेत्र व रूप से पैसे कमाये जा रहे हैं। खेल, शिक्षा, विज्ञान, लेखन, नृत्य कोई भी क्षेत्र अब अछूता नहीं। रईसों ने अपने पैसे के बल पर आदमी के सोचने के ढंग को भी अपने-अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की। कुछ हद तक वो सफल भी रहा। लेकिन फिर वही भस्मासुर बनकर उसके सर्वनाश का कारण बनता जा रहा है। क्या किया जाये, उसने सबकी चाहतों को हवा जो दे दी। जिसकी चपेट में आकर हर आदमी अरबपति बनना चाहता है। जेट प्लेन में चलना चाहता है। बड़े-बड़े फाइव स्टार में खाना चाहता है। बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमना चाहता हैं। और वह इसके लिए स्वयं को सक्षम भी मानता है। और फिर इसमें गलत भी क्या है? मगर चूंकि यह संभव नहीं इसलिए यहीं से उत्पन्न होता है असंतोष। वरना क्या वजह है जो अमेरिका जैसे विकसित देश में भी असंतोष भड़क उठा। विश्व कारपोरेट की चमकीली राजधानी न्यूयार्क के मजबूत वॉल स्ट्रीट को लोग धराशायी करने के लिए वहां धरना दे रहे हैं और उसे कब्जा करने के मूड में हैं। एक आम अमेरिकी भी अपने शासक और रईसों से क्रोधित हैं क्योंकि वहां भी असमानता है। अन्य स्थान पर यह असमानता खाई और पहाड़ की तरह विकराल रूप धारण कर चुकी है जिसमें कूदने पर लाखों की जान चली जायेगी। मगर फिर भी ये खाई पटने का नाम नहीं लेगी। इस आक्रोश को अभी और हवा मिलेगी जिसकी आंच में बड़े-बड़े किले और अट्टालिकायें ध्वस्त होंगी और यह जनक्रांति बिना किसी युद्ध के कइयों की जान लेगा। इसमें कोई शक नहीं कि 21वीं शताब्दी में अब नयी व्यवस्था के दर्शन होंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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