राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया


October 11, 2011

देश-प्रेम की भावना, मातृभूमि से प्यार व राष्ट्र के लिए मर-मिटना आदि कुछेक ऐसे बिषय हैं जिस पर थोड़ा-सा भी बोलकर बड़ी आसानी के साथ जनता को प्रभावित किया जा सकता है, मोहित किया जा सकता है। सीधे और कटु शब्दों का इस्तेमाल करने वाला कहेगा कि इन विषयों के माध्यम से आमजन की भावनाओं के साथ खेला जा सकता है। सत्य है, इन बातों से सामान्यजन को सोते से जगाया जा सकता है। इन भावनाओं को अवाम के बीच आसानी से फैलाया जा सकता है। इसे बच्चे बूढे+-जवान हर दिल में पैदा किया जा सकता है। विश्व के तमाम युद्ध या तो धर्म के लिए या राष्ट्र के नाम पर लड़े गए। हर काल में, तकरीबन हर सभ्यता ने, यूं तो असंख्य लड़ाइयां लड़ी हैं मगर सच पूछें तो इनमें से एक भी मानवता के लिए नहीं लड़ी गयीं। अधिकांश समय तो सैनिकों को पता ही नहीं होता कि युद्ध वास्तव में किसलिए लड़ा जा रहा है। इस दौरान धर्म और राष्ट्र के नारे जरूर लगते हैं मगर ये जोश से भरने मात्र के लिए होते हैं। मगर इन्हीं युद्धरत सैनिकों से आसान-सा सवाल सरल शब्दों में पूछा जाये तो राष्ट्र की सीधी-सी परिभाषा तक रेखांकित करना मुश्किल हो जाता है। यही सवाल बुद्धिजीवियों से पूछा जाये तो वे तुरंत हमेशा की तरह शब्दों के साथ खेलने लगेंगे। मगर उनकी चिर-परिचित व्याख्या में से कुछ एक सवाल उभरते हैं। क्या राष्ट्र मात्र एक भूखंड है, जिसे नदियों, पहाड़ों व समुद्र या फिर मानचित्र पर खींची गयी काल्पनिक रेखाओं द्वारा सीमांकित किया जाता है? या फिर एक सभ्यता और संस्कृति की पहचान के रूप में राष्ट्र उपस्थित होता है? राष्ट्र निर्माण में क्या धर्म भी अपना रोल अदा करता है? क्या धर्म के माध्यम से भी देश परिभाषित होते हैं? यूं तो विश्वास और सदियों से चली आ रही परंपरा-जनित व्यवस्था भी राष्ट्र निर्माण का एक कारण बन जाती है। तो दूसरी ओर कई बार व्यक्तिगत जागीर भी होता है राष्ट्र, जैसे कि राजाओं द्वारा शासित प्रदेश। तो क्या राष्ट्र का आकार अपरिवर्तनशील है? बिल्कुल नहीं। इतिहास प्रमाण है। इसकी सीमा रेखाएं और विस्तार समय के साथ परिवर्तित होते रहते हैं। इसका स्वरूप भी बदलता रहता है। यह टूटता-जुड़ता रहता है। यही नहीं राष्ट्र की नीति व शासन व्यवस्था तक बदलती रहती हैं। क्या राष्ट्र एक संगठन है जो बाहरी शक्तियों से अपने नागरिकों का बचाव करता है? क्या वो अवाम की सुरक्षा व स्वतंत्रता की गारंटी देता है? कहीं इस प्रक्रिया में शासन के नाम पर वो स्वयं कमजोरों का शोषण तो नहीं करता? ये कुछ एक मुश्किल सवाल है जिनका जवाब भी आसान नहीं हो सकता।
यकीकन आदिकाल में राष्ट्र का अस्तित्व नहीं रहा होगा। यह मानव जाति के विकासक्रम में प्रारंभिक काल की उत्पत्ति है। मनुष्य के समूह में रहने की कमजोरी ने समाज का निर्माण किया जो कालांतर में राष्ट्र बना। यह समाज का एक राजनीतिक पहलू है। शासन व्यवस्था को परिभाषित व क्रियान्वित करने के लिए, शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा पहले भूखंड का विभाजन कर स्वामित्व प्राप्त किया गया और फिर स्वयं को शासक कहलवाया। यहां राज-परिवार को एक वृहद् परिवार के रूप में भी देखा जा सकता है। जिसका विशाल जमीन पर नियंत्रण है और जिसने अपने भू-स्वामित्व को, मुंडेर, बाड़ों व दीवार से बनी सीमाओं द्वारा परिभाषित कर रखा है। जब-जब राज-परिवार का विभाजन हुआ, राज्य भी बंटते चले गये। यह टूटने और जुड़ने की प्रक्रिया निरंतर जारी रही। जिस तरह परिवार की शक्तियां तब बढ़ती हैं जब वह नयी जमीन और व्यवसाय को जोड़ता है, उसी तरह से राष्ट्र भी विकसित और आगे बढ़ते हैं। शक्तिशाली परिवार बड़ी जमीन वाले होते हैं। जिस तरह जमीन के टुकड़े का आकार, प्रतिवर्ष की उपज, साधन-संपन्नता से ही जमींदार की शक्ति का मूल्यांकन होता है उसी तरह से शक्तिशाली राष्ट्र भी परिभाषित किए जाते हैं। बड़े संयुक्त परिवार की अपनी मुसीबतें हैं तो बड़े राष्ट्र भी आंतरिक मामलों में उसी तरह से संघर्ष करते हुए देखे जा सकते हैं।
राष्ट्र का स्वरूप, समय के पैमाने पर कभी भी स्थायी नहीं हो सकता। बड़े-बड़े साम्राज्य महत्वाकांक्षी शासकों के साथ ही नेस्तनाबूद हो गए। रोम के साम्राज्य का वैभवशाली काल तो हमने सिर्फ इतिहास में पढ़ा है, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के स्वर्णकाल को हमारे बुजुर्गों ने अपनी आंखों से देखा है। और फिर उसके गिरते ग्राफ के हम साक्षी हैं। सोवियत यूनियन के पतन और विघटन को ज्यादा समय नहीं हुआ है। यह इस बात को प्रदर्शित करता है कि समय-काल के निष्ठुर हाथों में कोई भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं। वर्तमान का मूल्यांकन तो भविष्य ही करेगा। इसीलिए आज के शक्तिशाली राष्ट्रों को इस बात पर इतराने की आवश्यकता नहीं क्योंकि भविष्य के अंधकार में क्या छिपा है किसी को पता नहीं।
मुद्दा उठता है कि राष्ट्र की परिकल्पना से आम आदमी को क्या मिलता है? संवेदनशील ही सही मगर ध्यान से विश्लेषण करने पर जवाब झकझोरने वाले मिलते हैं। यहां सोवियत यूनियन एक ज्वलंत उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। जार की शासन व्यवस्था हो या स्टालिन का अधिनायकवाद या फिर कम्यूनिस्ट गोर्वाचोव के हाथों से निकलने के बाद प्रजातांत्रिक रूस, देखने वाली बात है कि आम आदमी के जीवन में क्या वास्तव में कोई फर्क पड़ता है? उसे तो मात्र दो वक्त की रोटी और एक छत चाहिए। उसे अपने छोटे-छोटे सपनों को साकार करने के लिए छोटी-सी जमीन का टुकड़ा चाहिए। बहुत हुआ तो बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए एक संतुलित व सुरक्षित समाज, जहां वो और उसका परिवार इज्जत से जी सकें। समान अधिकार की बात तो बहुत बाद में आती है। क्या ये सब उसको मिल पाता है? हर एक राष्ट्र इसकी बात तो करता है मगर गारंटी नहीं देता। तो सवाल उठता है कि राष्ट्र निर्माण से असल में किसे फायदा होता है? और इसके टूटने से किसको सर्वाधिक नुकसान होता है? सीधे-सीधे पूछें तो इसके बनने से सबसे अधिक लाभ किसको पहुंचता है? चाहे जितनी भी बातें कर लें, भावनाओं से बाहर निकलकर देखें तो गुलाम देश और स्वतंत्र राष्ट्र के आम आदमी में कितना फर्क आता है? कुछ विशिष्ट उदाहरण को छोड़ दें तो सामान्यतः शायद कुछ विशेष नहीं। स्वतंत्र राष्ट्र में लाखों नागरिकों के भूखे रहने के उदाहरण हैं तो दूसरी ओर गुलाम राष्ट्र में अमन-चैन की कहानी भी देखी गई है। राजनीतिक स्वतंत्रता की ही बात कर लें तो क्या स्वतंत्र राष्ट्र का नागरिक पूरी तरह स्वतंत्र हो पाता है? व्यावहारिक धरातल पर शायद नहीं। उस पर होने वाले जुल्म अत्याचारों की कमी नहीं। बस शायद तरीके बदल जाते हैं। शोषण न सही शासन का चक्र तो चलता ही है। आमजन के मुंह से निवाला निकालने के लिए गुलामी में विदेशियों के हाथ होते हैं तो स्वतंत्र राष्ट्र में अपनों के हाथ। फर्क आता है तो केवल इतना कि तख्त पर बैठने वाले शख्स का रूप और रंग बदल जाता है। ताज व मुकुट पहनने वाले चेहरे बदल जाते हैं। हमारा देखने व समझने का दृष्टिकोण बदल जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं बदलता। राष्ट्र गुलाम है या स्वतंत्र, शासक व उसकी शासन प्रणाली के बदलने मात्र से निर्धारित होता है। हर नया आने वाला शासक सत्ता चलाने के लिए आवश्यक नीति का निर्धारण करता है।
तो कहीं ये मात्र एक भावनात्मक मुद्दा तो नहीं? कहीं ये शासित को पहचान देने की कवायद तो नहीं जिसके माध्मय से फिर शासक शासन कर सके? कई बार ऐसा लगता कि इस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा ने आम आदमी के जीवन को अधिक क्लिष्ट किया है। सीमाओं पर युद्ध में आम आदमी के बच्चे ही मरते हैं। एक तरफ किसी देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाला सेनानी हो या दूसरी तरफ आधुनिक काल में असंतोष या फिर धार्मिक वैमनस्यता व कट्टरता से पनप रहा आतंकवादी, उग्रवादी, नक्सलवादी, सब के सब आम आदमी ही तो होते हैं। दो राष्ट्र बनने पर दो सिंहासन जरूर बन जाते हैं लेकिन दो राष्ट्र के बनने से वहां रहने वाले नागरिकों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आता। किसी राष्ट्र के शाक्तिशाली बन जाने पर आम आदमी के जीवन पर कितना फर्क आता है? इसे बहुत सीमित दायरे में न देखा जाए। यह एक संकेत है कि हमारी भावनाओं से राज्य की परिभाषा तो रेखांकित जरूर होती है मगर उसके नाम से जीवन नहीं चलता। जिस दिन यह आम आदमी समझ जाएगा उस दिन राष्ट्र के नाम पर खेले जाने वाले खेल से वह सावधान हो जाएगा।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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