भारतीय व्यवस्था पर व्यंग्य


August 2, 2011

विगत सप्ताह, मुंबई में रहने वाली कॉलेज के दिनों की सहपाठी ने एक मेल भेजा। इसमें एक कहानी के माध्यम से वर्तमान भारतीय व्यवस्था पर व्यंग्य था। कटाक्ष इतना गहरा लगा कि महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई भी इसे पढ़कर ऊपर स्वर्गलोक में एक बार जरूर सोचेंगे। हो सकता है इसे कई पाठकों ने पहले ही पढ़ रखा हो। यह यकीनन लोकप्रिय और आम बातचीत में प्रचलित होगा। समय-समय पर इसमें कई तरह की तोड़-मरोड़ हुई होगी और कहानी में उलट-फेर कर कई संस्करण बना दिये गए होंगे। मगर सभी की आत्मा एक-सी और शैली सैद्धांतिक रूप से व्यंग्यात्मक होगी। प्राप्त मेल अंग्रेजी भाषा में था। इसका अनुवाद करने की कोशिश की गयी है, जिसमें मैं दक्ष नहीं। अर्थात उपयुक्त शब्दों की अनुपस्थिति की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। बहरहाल, इसमें आज के कुछ एक चर्चित व्यक्तियों के नाम सीधे-सीधे तो कुछेक प्रतीकात्मक रूप में थे, जो कहानी में एक काल्पनिक चरित्र के रूप में उपस्थित होते हैं। ईमेल-एसएमएस व निजी समूहों की बातचीत में तो यह मजाक में हंसने-हंसाने के काम आ सकता है, लेकिन किसी का नाम खुले में लेना शोभा नहीं देता। यह हमारी स्वस्थ परंपरा भी नहीं है। न ही आलोचना या व्यंग्य को सीधे-सीधे कहना/लिखना पारंपरिक रूप से हमारे समाज में स्वीकार्य रहा है। हां, पिछले कुछ समय से सनसनी के द्वारा लोकप्रियता हासिल करना आम होता जा रहा है। हालात इतने तेजी से बदले हैं कि एक हद तक बदनामी से भी, आज के लोकप्रिय लोगों को, नुकसान कम फायदा अधिक होता है। उलटे लोग चर्चा में बने रहने का उपाय ढूंढ़ते हैं। इस तरह के चरित्र आज समाज में एक ढूंढ़ों कई मिल जाएंगे, अलग-अलग नाम, स्वरूप व भेष में। ऐसे में किसी एक का नाम लेकर उसे ही चर्चा में क्यूं लाया जाए? वैसे भी संकेत रूप से लिखे जाने पर यह पाठकों को हंसाने के लिए और अपनी कल्पना अनुसार चरित्र ढूंढ़ने के लिए मददगार साबित होता है।
यह कहानी वास्तविकता में मेहनत करने वाले, फिर चाहे वो शारीरिक कार्य करने वाला मजदूर हो या मानसिक क्षमता का उपयोग करने वाला बुद्धिजीवी, दोनों के लिए लिखी गई है। जिन्हें हमारे समाज में कई बार उचित स्थान व सम्मान प्राप्त नहीं होता। कर्म का समुचित फल नहीं मिलता। वहीं कुछ न करने वाले आलसी व निकम्मे मगर चतुर-चालाक लोगों की आजकल चांदी है। वो कैसे? विश्लेषण करने पर कोई और निष्कर्ष निकले या न निकले मगर यह दावे से कहा जा सकता है कि ऐसी परिस्थिति तकरीबन हर जगह, हर एक जाति, धर्म, भाषा व वर्ग में देखी जा सकती है।
सर्वविदित है कि चींटी योजनाबद्ध ढंग से निरंतर खूब मेहनत करती है। गर्मी के दौरान भी भविष्य के लिए इस तरह की व्यवस्था करने में जुटी रहती है कि जिससे आने वाली सर्दी में आराम से रहा जा सके। वो अपने कार्य को समय पर पूरा करने के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। यह सब देखकर टिड्डा हंसता है और चींटी को बेवकूफ मानता और समझता है। वो दूसरों का मजाक उड़ाने और पूरी बरसात खेलने-कूदने में गुजार देता है। बहरहाल, ठंड के आते ही चींटी अपनी बनाई व्यवस्था के अंदर गर्माहट में रहकर किसी तरह जिंदा बच जाती है मगर टिड्डे के पास चूंकि कोई इंतजाम नहीं होता और वो ठंड में ठिठुरकर भूख-प्यास से मरने लगता है।
इस कहानी का भारतीय परिप्रेक्ष्य में रूपांतर किया गया है। वो कुछ इस प्रकार बन पड़ा है। चींटी पूरी गर्मी मेहनत करती है, जबकि टिड्डा मस्ती करता है। लेकिन सर्दी आते ही टिड्डा दल का नेता एक प्रेस कानफ्रेंस बुलाता है और अपने अधिकारों की मांग करता है। वो हक के साथ यह जानना चाहता है कि चींटी को अकेले कैसे गर्माहट में भरपेट खाते-पीते चैन से रहने दिया जा सकता है, जबकि अन्य ठंड में भूखे मर रहे हैं। टिड्डों का दल छोटा जरूर मगर संगठित है। उसका नेता आक्रामक एवं चतुर है। वो प्रजातंत्र के दांवपेंच से वाकिफ है। वो शब्दों से खेलना जानता है। वो स्वयं तो शांतप्रिय ढंग से अपनी बात रखता है मगर उसके साथी कई जगह तोड़-फोड़ भी करते हैं।
हिन्दुस्तान में यह रातोंरात बड़ी खबर बन जाती है। मीडिया को मैनेज किया जाता है। अंत में, तमाम समाचार चैनलों तथा समाचारपत्रों द्वारा एक तरफ ठंड में ठिठुरते टिड्डों को और दूसरी तरफ मस्ती से खाती-पीती हुईं चींटियों को दिखाया जाता है। यह देख पूरी दुनिया अचंभित होती है। टेलीविजन पर बहस छिड़ जाती है। यहां मूल सवाल उठता है कि एक समाज में इतनी असमानता कैसे हो सकती है? पूछा जाता है कि आज के प्रजातांत्रिक व्यवस्था, ऊपर से आधुनिक संचार युग में, यह कैसे संभव है? इस बीच सदैव उलटा चलने व सोचने के लिए मशहूर एक तथाकथित चर्चित भारतीय लेखिका चींटी के विरोध में लेख लिखती हैं और टिड्डों के दल में पहुंचकर भड़काऊ भाषण देती है। मानवीय अधिकारों की बात जोर-शोर से उठाती है। साथ ही समर्थन में कई तर्क भी देती है। इतिहास को तोड़-मरोड़कर, दर्शन को शब्दों से खेलकर, अपना पक्ष मजबूत करती है। मीडिया को तो सदा कुछ नया चाहिए, असामान्य खबर व वक्तव्य को तो प्रथम पृष्ठ पर स्थान मिलता है। और इस तरह टिड्डा दल और लेखिका को अगले दिन खूब प्रचार मिलता है। प्रचार का भूखा एक समाजसेवक कुछ साथियों के साथ राजधानी की सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए मांग करता है कि ऐसा गर्म स्थान टिड्डों को भी दिया जाये। इसी बीच एक वृद्ध टिड्डे की प्राकृतिक मौत पर भी शक जाहिर कर दिया जाता है और मामला अचानक गरमा जाता है। इसके बाद तो घटनाक्रम तेजी से बदलने लगते हैं। मीडिया अति सक्रिय हो जाता है। एक राजनेता, टिड्डों का दल जिसका स्थायी वोट बैंक है, इस पूरे घटनाक्रम के न्यायिक व सीबीआई जांच की मांग करता है। वो इसे विशिष्ट समूह पर हो रहे अत्याचार के रूप में लेता है और घटनास्थल पर पहुंचकर धरने पर बैठ जाता है। हवा का रुख देखकर तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियां इस मृत्यु की भर्त्सना करती हैं। कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन इस बात पर जमकर आलोचना करते हैं कि सरकार अपने नागरिक के मूलभूत अधिकारों की रक्षा करने में असमर्थ रही है। इंटरनेट पर टिड्डा दल के समर्थन में ब्लाग लिखे जाते हैं। शहरों-कस्बों में हस्ताक्षर अभियान में युवक जुट जाते हैं तो विरोधी पार्टी के माननीय सांसद संसद से वाक्‌आउट कर जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर की एक मजदूर यूनियन अपने संदर्भित राजनीतिक पार्टी के साथ मिलकर बंद की घोषणा कर देती हैं। इस दौरान जमकर तोड़फोड़ होती है।
टिड्डों की अच्छी संख्या वाले एक राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी, चींटी को गर्मी में अतिरिक्त कार्य करने से रोकने के लिए नियम पास करती है। इसके समर्थन में तर्क दिया जाता है कि इससे समाज की गरीबी में समानता लायी जा सकेगी!! सबको बराबर से अवसर मिलेगा। तत्कालीन रेलमंत्री एक नयी रेलगाड़ी की घोषणा कर देते हैं, जिनका नाम टिड्डा रथ रखा जाता है। वातानुकूलित शयनयान के किराये में छूट दे दी जाती है। उधर, सरकार दबाव में आकर एक संसदीय कमेटी का गठन करती है। टिड्डों के बचाव में तैयार किए गए टिड्डा सुरक्षा बिल को पास करने के लिए, संसद में विशिष्ट बहस के लिए विशेष सत्र बुलाया जाता है। इसे लोकप्रियता प्रदान करने के लिए टिसू (काल्पनिक) नाम दिया जाता है। उधर शहर के एक थाने में चींटियों के ऊपर हत्या की कोशिश का केस दर्ज हो जाता है। दलील दी जाती है कि सभी चींटियों ने मिलकर टिड्डों को मारने की साजिश रची है। एक नेता तो चींटियों को आतंकवादी तक घोषित कर देता है और दूसरी ओर टिड्डों को विशिष्ट वर्ग घोषित करने के लिए आंदोलन करने की धमकी देता है। एक उभरता नेता टिड्डों को आर्थिक रूप से अति पिछड़ा नाम देने के चक्कर में लग जाता है। और विभिन्न आयोगों में अर्जी लगा दी जाती है। न्यायालय में जनहित याचिका दायर हो जाती है। तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियां टिड्डों के लिए सरकारी व गैर-सरकारी नौकरी में आरक्षण की मांग करती हैं। केंद्रीय बजट में अतिरिक्त अनुदान की घोषणा होती है। जन-आंदोलन की तीव्रता को देख अंत में वृद्ध टिड्डे की मौत के लिए जांच कमेटी बिठाई जाती है। उधर, चींटियों की कमाई पर खोजबीन शुरू कर दी जाती है। पुराने मुद्दे उभारकर उन पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाता है। यही नहीं, टिड्डों को खुश करने के लिए चींटी के कुछ घरों को शासन द्वारा जब्त कर लिया जाता है। बाद में उसे चींटी और टिड्डों में आधा-आधा बांट दिया जाता है। यह कार्यक्रम सभी प्रमुख चैनलों में प्रमुखता से दिखाया जाता है। तथाकथित चर्चित लेखिका इसे न्याय की जीत और अधिकांश राजनेता इसे सामाजिक न्याय करार देते है। यूनियन इसे गरीब और असहाय मजदूरों के संघर्ष में जीत के रूप में लेती हैं। कई फोरम पर वक्तव्य के लिए टिड्डों के नेता को आमंत्रित किया जाता है। कालांतर में इन्हीं में से कुछ चतुर चालाक टिड्डे लोकसभा व विधानसभा में पहुंच जाते हैं। बॉलीवुड का जाना-माना फिल्मकार इस घटनाक्रम पर फिल्म बनाने की घोषणा करता है। इस पर लिखी अंग्रेजी किताब की धूम मच जाती है। आखिर में हारकर चींटिया पलायन करने का फैसला लेकर दूसरे स्थान पर चली जाती हैं।
कहानी का अंत अभी नहीं हुआ है। अगले वर्ष टिड्डों का दल एक बार फिर भूखे मरने के कगार पर है। और वे कोई नया रास्ता ढूंढ़ रहे हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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