हम ये कहां पहुंच गए!


May 24, 2008

तरबूज, खरबूज और आम इनके साथ गर्मियां भी मजे से झेली जा सकती हैं। युगों-युगों से ये हमारे खानपान में प्राकृतिक रूप से सम्मिलित हैं। प्रकृति ने, मौसम के हिसाब से, हर एक जीव-जंतु के लिए, अपनी तरफ से कुछ खास इंतजाम कर रखा है। हर जगह गजब का संतुलन देखा जा सकता है। कुछ बात है इस प्रकृति में, तभी तो अगली पीढ़ी की मेरी छोटी बेटी के लिए भी ये ताजे-ताजे फल अन्य विशिष्ट मिष्ठान, बेहतरीन व्यंजनों व फास्ट फूड से बढ़कर खाने की चीज हैं। यह देखकर मन हमेशा प्रसन्न रहता था कि वह कम से कम मौसम के फलों को तो पूरे चाव से खाती है। वैसे अन्य बच्चों की तरह उसे भी जंक फूड खाने का शौक तो है मगर इन फलों के महत्व से वो अनजान नहीं। एक सामान्य बाप होने की हैसियत से हर दूसरे अभिभावक की तरह मैं भी नियमित रूप से इन फलों को लाने की कोशिश में रहता हूं। और साथ यह कोशिश भी बनी रहती है कि खरीदा गया फल अधिक से अधिक मीठा और रसभरा निकले। इसीलिए हर दुकानदार से यह जरूर पूछता हूं कि फल मीठा है या नहीं? शायद बच्चे वाले सभी ऐसा करते हैं। पिछले सप्ताह घर पर लाया गया तरबूज इस मौसम का सबसे मीठा फल था और रसदार भी। थोड़ा बड़ा होने से इसे अगले दिन भी इस्तेमाल में लाया जाना था। मगर जब छोटी बेटी ने अचानक अगले दिन इसे खाने से मना किया तो घर के सभी सदस्य हैरान थे। और फिर बच्चे ने जो कुछ बताया उसके बाद बहुत दिनों तक आंखों के आगे अंधेरा छाया रहा। उसे पिछले कुछ दिनों से मल में बिना पचा तरबूज निकला करता था। और इसीलिए उस दिन खाने से पूर्व जब उसने ध्यान से तरबूज को देखा तो पता चला कि इसमें कहीं न कहीं गड़बड़ी है। उसे उसमें प्राकृतिक रेशों की जगह कृत्रिमता का अहसास हुआ था और स्वाद में कुछ भिन्नता थी। जबकि तरबूज देखने में अत्यधिक लाल सुर्ख रसदार और मीठा था। इसे देते समय दुकानदार ने भी बड़े विश्वास के साथ इसका मीठा होना बताया था। घर आकर इतने बड़े आकार में इतना बढ़िया फल निकलने पर मैं भी अत्यधिक खुश हुआ था। लेकिन जब बच्चे के बताने पर सभी के द्वारा अधिक ध्यान से देखा गया तो धीरे-धीरे यह अहसास हुआ कि यह यकीनन सामान्य प्राकृतिक फल नहीं है और कृत्रिम रूप से बड़े किये तरबूज का एक उदाहरण है।
सुनते तो थे कि आजकल कृत्रिम रूप से फलों को बड़ा, मीठा व रसदार बना दिया जाता है। हारमोन के इंजेक्शन, रासायनिक खाद और इसी तरह के कुछ वैज्ञानिक इंतजाम कर देने से कुछ दिनों में ही ये फल आकार में कई गुणा बड़े हो जाते हैं। तरबूज, खरबूज, लौकी, कुम्हड़ा का बड़े आकार में मिलना एक आम बात है। ये देखने में भी चमकीले, साफ-सुथरे और सुंदर होते हैं जबकि कुछ वर्ष पूर्व तक इस तरह से इनका मिलना असंभव होता था। अब तक जीवन की व्यस्तताओं में कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। जबकि कई बार इस तरह की बातें पढ़ी और सुनी भी गयी थीं। आज खुद पर बीतने पर जब रुककर देखा तो नजरों के सामने से कई दृश्य घूम गए। कई चौराहों पर बड़े-बड़े तरबूजों की दुकानें और सभी के द्वारा उसे मीठा होने के बारे में दावेदारी से कहना, सुनकर कुछ अजीब-सा लगता है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो बचपन में इन फलों के मीठा व अच्छा निकलने की उम्मीद बहुत कम हुआ करती थी। थोड़ी-सी पूछताछ पर ही पता चला कि खेतों में इस तरह से इनके पैदा करने का आजकल आम प्रचलन है। पिछले कुछ सालों से दूध के कृत्रिम बनाये जाने की जानकारी समाचारपत्रों में आती रहती है। इसी तरह से पिछली कुछ होली-दीवाली से नकली खोये की खेप पकड़े जाने की खबर भी तेजी से आयी थी। इसके बाद तो लोगों ने मिठाई खाना काफी कम कर दिया था। सुना है इस डर का बाजार में इनकी बिक्री पर भी जबरदस्त प्रभाव पड़ा था। शादी में जाने पर पनीर की सब्जी से भी बचा जाता क्योंकि बताया गया कि यह भी सब नकली पनीर है। एक सज्जन ने तो उलटे प्रश्न पूछ लिया था कि जितना पनीर आजकल शादियों में बनाया जाता है इतना कहां से बन सकता है। इन सबका ही परिणाम था कि लोगों ने एक-दूसरे को त्योहारों में फलों की टोकरी व बिस्किट-चॉकलेट देना अधिक पसंद कर लिया था। मगर अब उपरोक्त परिस्थिति में क्या होगा? क्या दें और क्या खायें, अब समझ से बाहर है। मसाले और आटे में मिलावट हो रही है। नकली काजू भी बनकर तैयार हैं। खाने का कोई भी क्षेत्र अब इस रोग से अछूता नहीं। सच पूछें तो आदमी ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल खुद के विनाश के रूप में ही किया है।
विगत सप्ताह एक खबर पढ़ी थी कि चीन में आदमी से भी बड़े आकार की लौकी को पैदा किया गया है। बढ़ती आबादी घटती जमीन के लिए अब यही एक उपाय बचता है। इसे विज्ञान के द्वारा बढ़ोतरी और समाज के द्वारा स्वीकृति दी जा रही है। विदेशी प्रवास पर बड़े सुंदर और साफ-सुथरे फलों को देखकर कई बार अहसास होता था कि यह कहीं पेंट किए गए तो नहीं। इन्हें देखकर किसी का भी मन प्रसन्न हो सकता है। बाद में पता चलता था कि देखने में तो यह सुंदर हैं परंतु गुणों में कम हैं। क्योंकि यह रासायनिक खाद व अन्य वैज्ञानिक प्रक्रिया की मदद से पैदा किए गए हैं। यह सत्य और प्रमाणित है कि इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे शरीर के लिए जहर है। इन परिस्थितियों में हम क्या खा रहे हैं, किसी को कुछ नहीं पता। नयी-नयी बीमारियों का जन्म और हमारा भविष्य के प्रति आतंकित होना स्वाभाविक है। इसी का परिणाम है कि विदेशों में आर्गेनिक फल-सब्जियों व खाद्यान्नों का प्रचलन बढ़ा है। महंगी होने पर भी इनकी मांग तेजी से बढ़ी है। इन्हें बिना खाद व कीटनाशक दवाई से शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में पैदा किया जाता है। इनके स्वाद को लोग पसंद कर रहे हैं और अपने स्वास्थ्य को लेकर अधिक जागरूक हैं। कुछ रईसों ने तो हिन्दुस्तान में भी अपने लिये बिना खाद व दवाई के बिना अनाज व सब्जियां उगाने का इंतजाम कर रखा है। और इसके लिए अपने खेत का एक छोटा-सा टुकड़ा सुनिश्चित कर रखा है।
अति प्राचीनकाल से खाद व दवाई का प्रयोग मानवीय सभ्यता के प्रचलन में है। तकरीबन तीन-चार हजार वर्ष पूर्व से इसे निरंतर उपयोग में लाया जा रहा है। चीटियों, कीड़ों, पक्षियों से बचाने व अधिक पैदावार एक प्रमुख वजह रही है। मांग और सप्लाई का सिद्धांत है। विकास की तीव्रधारा बह रही है। कोई रुककर सोचने को तैयार नहीं। विज्ञान प्रगति करते हुए यहां तक तो ले आया आगे कहां ले जायेगा समझकर रूह कांप जाती है। कुछ दिनों पश्चात जमीन की जगह यह फल-फूल फैक्टरियों में पैदा होने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं। हो सकता है, कुछ हद तक हमारा शरीर भी इनके अनुकूल ढल जाये। कुछ दिनों के बाद इन फल-फूलों के इंजेक्शन और गोलियां बन जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जिसमें पेट्रोल व डीजल की विभिन्न वैरायटी की तरह ही हमारे लिये भी दुकानों पर कई प्रकार के इंधन की उपलब्धता हो। ऐसा भी तो हो सकता है कि कुछ वर्षों बाद हम बैटरी चार्जिंग की तरह ही अपने आप को भी किसी तंत्र से चार्ज करते पाये जाएं। और फिर आने वाले युगों में फलों के स्वाद का अहसास कराते बिजली का करंट हों या फिर इलेक्ट्रानिक्स चिप्स जिसमें तरबूज व खरबूज के प्रोग्राम स्टोर हो। हो सकता है! मगर फिर इंसान का स्वरूप कैसा होगा? शायद मैं अपने वंश को इस मशीनी रूप में देखना पसंद न करूं। क्या आप पसंद करेंगे?

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

Copyright 2004-2015, All Rights Reserved with Manoj Singh, | Site by: Classic Computers