क्या हम चीन से डरने लगे हैं?


April 19, 2008

पिछले रविवार एक राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचारपत्र के संपादकीय पृष्ठ पर चार स्थायी स्तंभकारों के लेखों ने ध्यानाकर्षण किया था। सभी का एक ही विषय था ‘तिब्बत’। ऐसा कम ही होता है कि सारे लेख एक ही विषय के इर्द-गिर्द लिखे गए हों। इसे संयोग भी कह सकते हैं। यह सत्य है कि चीन में आयोजित की जाने वाली ओलम्पिक खेल की मशाल यात्रा में तिब्बत की समस्या प्रमुखता से उभरी है। और इसने विश्व समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। और आजकल यह सभी चर्चाओं के केंद्र में है। जबरदस्त प्रदर्शन, चिंतन-मनन से भरे लेख, गरमा-गरम बहस के द्वारा हर एक देश में इसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। और यही वजह थी कि मैं भी उपरोक्त चारों स्तंभ एक साथ पढ़ गया। मगर मुश्किल तब पैदा हुई जब पढ़कर अंत में पूरी तरह भ्रमित हो गया। चारों के भिन्न दृष्टिकोण, अपने-अपने तर्क और अपनी-अपनी राय थी। अब कौन-सा सही है पाठक के लिए कहना और समझना बड़ा मुश्किल है। पाठक को स्वयं सुनिश्चित करना था कि कौन-सा सटीक है। लग रहा था मानो पाठकों को खुली छूट दे रखी थी कि वह अपने पसंद के हिसाब से अपनी राय बना ले। दूसरे सरल शब्दों में हर तरह के लोगों के लिए हर एक दृष्टिकोण से लिखे गये लेख उपलब्ध थे। सभी के लिए कुछ न कुछ। तो फिर अखबार किस विचारधारा के साथ है, किसी को नहीं पता। बढ़िया तरीका है, सब को साथ लेकर चलने का। कोई भी बुरा न माने। वैसे भी यह सत्य है कि प्रजातांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सभी को अपना मत कहने का हक है। लेकिन फिर एक स्पष्ट दिशा-निर्देश भी तो होना चाहिए। मगर नहीं, अब पत्रकारिता भी बाजार की तरह हो चुकी है। समाचारपत्रों में हर एक वर्ग के लिए तरह-तरह का सामान उपलब्ध है और लोग अपनी पसंद और बुद्धि के हिसाब से लेख पढ़ सकते हैं। मत प्रदर्शन अच्छी बात है लेकिन इस तरह से मतों का विभाजित होना देश के हक में नहीं। माना कि लोगों की सोच में मतांतर व विभाजन होना स्वाभाविक है लेकिन फिर एक राष्ट्र के हैसियत से खड़े होने के लिए आम राय जरूरी है। इसलिए समाचारपत्र से किसी एक दृष्टिकोण की ओर इशारा होना चाहिए जिससे लोगों के बीच में एक आम राय बन सके। इसी को विचारधारा कहते हैं। पूर्व में हर प्रकाशन समूह, समाचारपत्र, व्यक्ति, राजनैतिक पार्टियां भी अपनी-अपनी विचारधाराओं से पहचानी जाती थी। मगर आज यह सब कुछ खुले बाजार की नीतियों के भेंट चढ़ चुका है। प्रजातंत्र भी तो इससे अछूता नहीं जिसमें हर वर्ग की पसंद को ध्यान रखा जाता है। और फिर सभी को संतुष्ट करने के चक्कर में एक बाजार की उत्पत्ति होती है। ‘बाजार’ जहां उपभोक्ता के पसंद को ध्यान में रखकर सामान तैयार किया जाता है, और फिर उसे सम्मोहित कर उसी को पकड़ा दिया जाता है। तो क्या समाचारपत्र जो पूर्व में जनता की राजनैतिक भूख को शांत किया करते थे, राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाते थे, आज भ्रमित हो चुके हैं? शायद।
इसमे कोई शक नहीं कि उपरोक्त परिस्थितियों की तरह ही हमारी राष्ट्रीय सोच भी कहीं-कहीं भ्रमित, खंडित और दिशाहीन होती जा रही है। आज हम आम राय बना नहीं पाते। तर्क-वितर्क में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो है मगर एकमत पर पहुंचना उद्देश्य नहीं रह गया। हरेक का लक्ष्य रह गया है कि सिर्फ अपनी बात मनवाना, जिसके लिए जोर-शोर से चिल्लाना, लोगों का अधिक से अधिक ध्यान आकर्षित करना, दूसरे की बिल्कुल न सुनना। और हम एक सुदृढ़ राष्ट्र होने के लक्षणों से दूर होते जा रहे हैं। और यही कारण है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था भी एक भीड़ में परिवर्तित हो चुकी है। जहां देश हित के लिए आम राय बनाने की कोशिश नहीं की जाती। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए हर वो हथकंडे अपनाये जाते हैं जिसे असंवैधानिक और अपारंपरिक कहा जा सकता है। तिब्बत के मसले में भी यही कुछ एक बार पुनः उभरा है। पूर्व में भी कई मुद्दों पर हम एक अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि राजनैतिक दल अपने ही द्वारा प्रारंभ किए गए योजनाओं पर विपक्ष में पहुंचकर विरोध करना शुरू कर देते हैं। तो कुछ अपनी ही स्थापित नीतियों को तोड़ने लगते हैं। और यही हाल तिब्बत मसले पर भी हो रहा है। पूर्व में हमने अपने घर में तिब्बतियों को शरण देकर एक स्पष्ट संदेश विश्व को दिया था। मगर कालांतर में वो आज धीरे-धीरे अस्पष्ट होता जा रहा है। मगर क्यों? क्या हम चीन के साथ अपने संबंधों को लेकर किए गए अनुभवों से आंखें मूंद रहे हैं? या फिर कहीं अधिक सरल बनकर अपनी कमजोरी प्रदर्शित तो नहीं कर रहे हैं? तो ऐसी क्या वजह है कि हम चीन के मामले में अत्यधिक समझौतावादी होते जा रहे हैं? कहीं हमने उसे भविष्य की महाशक्ति तो नहीं मान लिया? जबकि हम जानते हैं कि वह हमारा दोस्त कभी नहीं हो सकता। तो फिर यह अतिरिक्त प्रयास क्यों? उलटे आज उनके साथ प्रतिस्पर्द्धा जरूर है लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे और हम उनके सामने कमजोर और नरम पड़ते चले गए तो अवश्य वो इस दौड़ में आगे निकल जाएगा। संबंधों में संतुलन जरूरी है मगर अपनी उपस्थिति दर्ज होनी चाहिए।
चीन की ओर देखें तो उसने अपनी बात हमेशा चतुराई और बेबाकी से रखी है। चाहे फिर वो सीमा विवाद हो या फिर अरुणाचल प्रदेश में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जाना। यह प्रदेश हमारा अभिन्न अंग है फिर भी चीन ने अपनी आंख दिखा दी थी। कश्मीर हमारा आंतरिक मसला है मगर उसने कई बार अपनी राय जाहिर करने में कोताही नहीं बरती। हां, जब हम अपने ही घर में रह रहे तिब्बति शरणार्थी को डरा-धमका कर चुप कराया तो चीन ने हमारी पीठ जरूर थपथपाई। आश्चर्य इस बात पर अधिक हुआ कि हम उसकी शाबाशी को ले लेकर प्रसन्न हो रहे थे। मगर क्यो? अब जो हमारे घर रह रहा है वो तो हमारी बात सुनेगा ही। हम माननीय न्यायालय के इस बात को भी स्वीकार नहीं कर पाये कि अपनी बात का प्रदर्शन करना तिब्बतियों का भी हक है। एक बार फिर हम चीन को खुश करने की गलतफहमी पाले हुए हैं।
प्रारंभ की चर्चा में आये चार स्तंभों में से एक में, जो कि समाचारपत्र के पूर्व संपादक द्वारा लिखा गया था, का यह कथन कि ‘तिब्बत चीन का आंतरिक मामला है ठीक उसी तरह जिस तरह कश्मीर हिन्दुस्तान का आंतरिक मामला है।’ उनकी इस बयान ने मुझे परेशान किया था। आगे उन्होंने कहा कि ‘अगर हम तिब्बत के बारे में अपनी राय जाहिर करेंगे तो कश्मीर के संदर्भ में भी चीन कह सकता है’ अर्थात सीधे शब्दों में उन्होंने कश्मीर और तिब्ब्त को एक कटघरे में खड़ा कर दिया। पता नहीं यह कितना सही है। मगर जहां तक इतिहास को पलटा जाए तो दोनों मामले भिन्न हैं। दोनों की परिस्थितियां भिन्न हैं। एक तरफ तिब्बत में चीन की ज्यादतियां अब छुपी नहीं तो दूसरी ओर कश्मीर में आज प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था है। और फिर विश्व इतिहास के पन्नों को प्रारंभ से पढ़ें तो यह राजगद्दी और उसके छीनाझपटी को लेकर भरा पड़ा है। कमजोर पर शक्तिशाली ने हमेशा आक्रमण किया और राज किया। लेकिन कोई भी शक्तिशाली स्थायी नहीं रहे। समय के निशानों पर कभी ग्रीक तो कभी रोमन साम्राज्य तो कभी अंग्रेज तो आज अमेरिका का शासन रहा है। सत्ता हाथों में बदलती रही है। आज के यूरोप के कई स्वतंत्र देश वर्षों तक दूसरों के गुलाम रहे तो स्वयं कई वर्षों तक दूसरों पर शासन किया। और आज सभी स्वतंत्र राष्ट्र हैं। तो क्या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखकर आज भी अधिकांश देशों को गुलाम नहीं होना चाहिए था? उसी तरह तिब्बत पर भी कई बाहरी आक्रमण होते रहे और वो सदैव जीत-हार की आंख-मिचौली खेलता रहा। मगर 1951 से पूर्व तक उसकी एक विशिष्ट विश्व पहचान थी। जिसे इंकार नहीं किया जा सकता। हां, कई मौकों पर चीन का सहयोग जरूर लिया गया था। तो क्या सहायता करने वाले कब्जा कर लेते हैं? नहीं। बहरहाल, अंग्रेजी समाचारपत्र हमारे तथाकथित बुद्धिमान वर्ग को प्रदर्शित करता है। तो क्या हम वास्तव में चीन से डरने लगे हैं? शायद। तभी तो आज हमारा पूरा बाजार चीन के सामान से अटा पड़ा है। उसकी गुणवत्ता पर सवाल जरूर उठ रहा हैं मगर फिर भी कुछ खास नहीं हो रहा। आर्थिक रूप से वो हमे कमजोर कर रहा है मगर फिर भी यह हम समझ नहीं पा रहे हैं। आखिरकार क्यों?

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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