भक्तिरस का आनंद


March 8, 2008

पिछले दिनों समाचारपत्रों में लेट नाइट डिस्को की एक खबर पढ़ी। हो सकता है यह उस डिस्कोथिक के मालिक द्वारा दिया हुआ विज्ञापन ही हो। लिखा था कि अमुक-अमुक डिस्को में युवाओं की भीड़ बढ़ रही है। इस तरह के स्थानों पर शराब, सिगरेट और मसालेदार खाने के साथ-साथ तेज-तेज गानों पर पश्चिमी नृत्य की मस्ती ली जा सकती है। आगे लिखा था कि इसमें लड़के लड़कियां बराबरी से हिस्सा ले रहे हैं। किसी एक का मत था कि लड़कियों के हाथों में लड़कों से अधिक सिगरेट देखी जा सकती है। अर्थात लड़कियां इस क्षेत्र में भी आगे बढ़ने की होड़ में शामिल हैं। इस तरह के क्लबों में आमतौर से, डांस फ्लोर पर पैग के नशे में धुत रात दो बजे तक जबरदस्त डांस का कार्यक्रम चलता है। किसी पत्रकार द्वारा एक लड़की से पूछने पर जवाब मिला था कि यहां आना बड़ा रिफ्रेशिंग होता है। बताया गया कि यह दिनभर की थकावट और टेंशन को दूर करता है। बात मेरे समझ में नहीं आई। चूंकि जिस रात भी देर से सोता हूं तो अगले दिन नींद आती रहती है और आलस व थकावट बनी रहती है। और ज्यादा भारी भोजन खा लें तो पेट अलग फूल जाता है। ज्यादा धमा-चौकड़ी करने पर तो कई बार दूसरे दिन हाथ-पैर दुखते हैं। यह आज की नहीं अपने कालेज के दिनों को याद कर बता रहा हूं। हॉस्टल के दूसरे छात्रों के साथ भी अमूमन यही होता था। जिस रात देर तक मस्ती की तो अगले दिन क्लास से गायब ही रहना पड़ता था। अब पता नहीं यह कितना सत्य है कि तेज-तेज आवाज में जबरन उछलकूद करने से टेंशन कैसे दूर होता है? ऊपर से बीयर बार में अक्सर जवानी के गरूर में या फिर लड़की को लेकर किसी के साथ हाथापाई हो जाने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। फिर ऐसे में कैसे कोई टेंशन फ्री रह सकता है जब आपका साथी अतिसुंदर और स्मार्ट हो। बहरहाल, अगर कोई दुर्घटना हो गयी तो फिर पुलिस, कानून-व्यवस्था व समाज पर दोषारोपण बड़ी आसानी से कर दिया जाता है।
उपरोक्त खबर के पढ़ने वाले दिन ही पड़ोस में एक वरिष्ठ अधिकारी के घर पर सुंदरकांड पढ़ने के लिए जाना पड़ा था। पहले पहल तो दैनिक जीवन की व्यस्तताओं के कारण मुश्किल लगा लेकिन फिर पत्नी के आग्रह पर साथ हो लिया था। दस मिनट बाद ही कुछ अच्छा-सा लगने लगा तो फिर मैं पाठ के आखिर तक बैठा रहा। इसी दौरान मुझे याद आया कि इन दिनों में यह मेरा दूसरा अवसर था जब सुंदरकांड सुनने का मौका मिला। पहला, कुछ दिनों पूर्व अपने गृह नगर जबलपुर में घर पर आयोजित सुंदरकांड को सुना था। यह सौभाग्य की बात थी कि इतने वर्षों बाद दो-दो सुंदरकांड का पाठ एक साथ। याद आते ही तुलना की तो समझ आया कि जबलपुर में किया गया सुंदरकांड इतना अधिक संगीतमय था, लयबद्ध था, राग से गाया जा रहा था कि कुछ मिनटों बाद ही मैं शब्द और उसके भावार्थ से कहीं दूर भक्तिरस में ऐसा डूबा कि मनमस्तिष्क आनंद से विभोर हो उठा। शारीरिक रूप से प्रफुल्लित हुआ तो मानसिक रूप से पूर्णतः शांत। सुंदरकांड के खत्म होने पर मुख्य पाठ करने वाले को मैंने बधाई दी थी। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया था कि वो बचपन से ही पिता के साथ इसका पाठ करते रहे हैं और हनुमानजी के भक्त हैं। जबकि वह एक सिख परिवार से ताल्लुक रखते हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। हनुमान मंदिरों में कई सिखों को तो गुरुद्वारों में हजारों हिन्दुओं को जाते हुए देखा जा सकता है। बहरहाल, चंडीगढ़ शहर के सुंदरकांड में भी आनंद तो था परंतु भक्तिरस का वो रसास्वादन नहीं हो पा रहा था जो अक्सर मुझे मिला करता है। मन ही मन विश्लेषण करने पर समझ आया कि असल कारण यहां संगीत का अभाव है। और फिर यहां सुंदरकांड गाया नहीं पढ़ा जा रहा था। वो तो इस धार्मिक महाकाव्य में इतनी जबरदस्त लयबद्धता व काव्य का सौंदर्य है कि सामान्य रूप से पढ़ने पर भी वे एक गीत-सा स्वरूप प्रकट करते हैं। असल में इस क्षेत्र में जागरण का अधिक प्रचलन है और जहां कहीं भी सुंदरकांड का पाठ होता है वहां गाने वाले प्रमुखतः मंदिर से बुलाये गये पुजारी होते हैं। जो उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश या बिहार से रिश्ता रखते हैं। अन्यथा बाकी सारे चुपचाप बांटी गयी रामायण की प्रतियों को देख-देख मन ही मन पढ़ते रहते हैं। ऐसा नहीं कि यहां पर उत्तर भारतीयों की संख्या कम है परंतु उनमें भी धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने का प्रचलन पिछले कुछ दिनों में कम होता दिखाई दिया। अमूमन यही हाल अन्य क्षेत्रों में भी है। अन्यथा पूर्व में रातों को मंदिरों में, घरों में, सार्वजनिक स्थानों पर, संगीत की थाप के ऊपर सुंदरकांड और अखंड रामायण का पाठ करते हुए आम सुना जा सकता था। आज के खोखले मनोरंजन युग की चकाचौंध में फंसा तथाकथित आधुनिक मानव इस पूर्णतः हानिरहित, सामाजिक, नैतिक व धार्मिक प्रथा के महत्व को समझ नहीं पा रहा। और अक्सर जब तक समझ पाता है बहुत देर हो चुकी होती है।
सुंदरकांड रामायण के सात खंडों में से पांचवां और महत्वपूर्ण अध्याय है। यह हनुमान चालीसा की तरह शुद्ध, धार्मिक, पुण्य व भक्ति से परिपूर्ण साथ ही शक्तिशाली खंड है जिसमें हनुमानजी को अपनी शक्ति का पुनः आभास कराया जाता है। उन्हें यह बताया जाता है कि वे उड़ सकते हैं। और फिर वे उड़कर सीता माता की खोज में आगे बढ़ जाते हैं। यह प्रतीक है जन-जन को बताने का कि प्रेम, शक्तिरूपी ईश्वर तक पहुंचने के लिए कई सारी बाधाएं आती हैं, फिर भी मनुष्य के पास शक्तियां हैं कि वह उड़कर उस तक पहुंच सके। मुश्किल सिर्फ इस बात की है कि हम इन सब बातों से अनजान हैं। और इसी की याद दिलाता है सुंदरकांड। तुलसीदास द्वारा रचित रामायण महाकाव्य में गजब का प्रवाह है। इस महाकाव्य के लोकप्रिय होने के पीछे धर्म एवं उससे जुड़ी कहानियां व आस्था तो है ही, राग में गाते हुए संगीत में डूबकर आनंद प्राप्त करना एक बहुत बड़ा पक्ष है। अशिक्षित, कम पढ़ी-लिखी आम जनता जीवन के गूढ़ रहस्य को अधिक नहीं समझती और समझना भी नहीं चाहती। और अगर समझना चाहती भी है तो सरलता से, किसी कहानी रूप में। उसे संगीत बड़ी आसानी से मोहित करता है, यह श्रोताओं को बांध लेता है, संपूर्ण वातावरण को रसमय कर देता है। यह संगीत, स्वर और शब्दों को मिला-जुलाकर उत्पन्न होने वाली शक्ति ही है जो प्रायः हर धर्म, मत और गुरुओं द्वारा उपयोग में लायी जाती है। पुरानी प्रथाओं का प्रचलन जितना भी कम हो गया हो मगर जब आधुनिक युवा पीढ़ी भी थक हारकर आधुनिक बाबाओं के पास पहुंचती है तो वहां भी इसी भजन और संगीत से उसका वास्ता पड़ता है।
आधुनिक गीत-संगीत में वो मिठास नहीं। लयबद्धता समाप्त हो चुकी है। इनमें शोर अधिक है। मस्ती तो है मगर आनंद अनुपस्थित है। हालात यहां तक बदल गए कि कविताओं तक में रूखापन है इसलिए वो प्रचलित भी नहीं होती। इस तेज दौड़ते युग में, बहुत से हिन्दी व संस्कृत के शब्द जो सुनने में बड़े मधुर, कर्णप्रिय और मिठास से भरे हुए हैं, अंग्रेजी की कर्कश मार से दम तोड़ चुके है। और अब सुनाई नहीं देते। हर चीज में अंग्रेजी सभ्यता के माध्यम से मस्ती देखने वाली इस युवा पीढ़ी को अगर वास्तव में आनंद प्राप्त करना है, मेडिटेशन करना है, थकावट दूर करनी है, चिंताओं से मुक्त होना है, मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित और स्वस्थ रखना है तो इन धार्मिक व भजनमंडली मंडली में एक बार बैठकर देखें। कुछ खोने के बाद मंदिरों-मस्जिदों के चक्कर लगाने या आधुनिक धर्मगुरुओं के पास जाने से अच्छा है कि पहले ही इन प्राचीन व प्रमाणित प्रथाओं को स्वीकार कर लें, इन शास्त्रों का अध्ययन करें। अन्यथा बाद में पछताने से कोई फायदा नहीं। हां, शोर से भरे हुए मॉडर्न हिन्दी फिल्मी के गानों के पैरोडी के रूप में गाये जाने वाले भजनों से जरूर बचना चाहिए। यह सुनने में भी अजीब लगते हैं और भक्तिरस के स्थान पर मूल गाने का भाव पैदा कर देते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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