क्या यह तमाशा नैतिक व संवैधानिक है?


March 1, 2008

बाजार को खूब सजाया गया, भरपूर प्रचार हुआ, बड़े-बड़े व्यापारी आये, कुछ एक के साथ में सुंदरियां भी थीं, ऊंची-ऊंची बोली लगी और माल खरीद लिया गया। समाचारपत्रों में दूसरे दिन यह खबर मुख पृष्ठ पर छपी। जिसका कारण था, माल कोई और नहीं क्रिकेटर के रूप में आदमी था। मगर छिटपुट नकारात्मक रिपोर्टिंग को छोड़ दे तो इस बात पर किसी ने ध्यान भी नहीं दिया कि यह आदमी के खरीद-फरोख्त का मसला है। उलटे यह अधिक उभारा गया कि कौन कितने अधिक से बिका या फिर एक खिलाड़ी दूसरे से कम में कैसे बिका। बाजार के अपने अजीबोगरीब नियम हैं और इस भेड़चाल में सायमंड्स अपने कप्तान रिकी पोंटिंग से दोगुना रेट में बिक गए तो ‘एक और ओवर करेगा’ बोलकर जीवन परिवर्तित कर देने वाले कप्तान अनिल कुंबले अपने ही नवजात खिलाड़ी ईशांत शर्मा से पिछड़ गये। वैसे क्रिकेट का यह तमाशा अच्छा होगा, चूंकि अब सौरव गांगुली, बंगाल का तथाकथित टाइगर, शाहरुख खान के इशारे पर ही गुर्रा सकेगा। ब्रेटली और युवराज, प्रीति जिंटा के कहने पर क्रिकेट छोड़ उनके साथ हिमाचल की लांग ड्राइव या फिल्म की शूटिंग पर जाने के लिए मजबूर हो सकते हैं। सचिन तेंदुलकर को मुकेश अंबानी को खुश करने के लिए उनके बच्चों के साथ फ्रेंडली मैच खेलना पड़े तो वह अब मना नहीं कर सकते। बड़ा अजीब लगेगा जब दो दोस्त प्रतिद्वंदी टीम में होंगे और कई पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी एक साथ एक टीम में। पता नहीं पंजाब वाले हरभजन सिंह को मोहाली टीम के विरुद्ध खेलते हुए किस तरह से लेंगे। जहां तक रही खिलाड़ियों की बात तो इनके लिए लगता है ये सब मायने नहीं रखता या फिर वे मशीन बन चुके हैं।
आज समाज परिवर्तन प्रक्रिया के तीव्र मोड़ पर खड़ा है। इसे कुछ लोग मनुष्य की स्वतंत्रता तो कुछ उच्छृंखलता का नाम दे सकते हैं। कुछ आर्थिक रूप से स्वर्णिम युग तो कुछ अराजक और कुछ संवादहीनकाल का खंड कह सकते हैं। सत्य है सब कुछ खुला बाजार है। पैसा ही सब कुछ है। भारत का कप्तान मात्र छह करोड़ में बिक कर हैदराबाद तक सीमित हो गया। अजीब दिशाहीन बाजार का फैलाव है जहां पैसा कमाने के लिए राष्ट्रप्रेम, भावनाएं ही नहीं अपना सब कुछ लुटाकर खरीदने और बेचने की प्रक्रिया अहम हो गयी है।
यहां यह सवाल उठाना बेमानी होना चाहिए मगर हमारे इस धंधे के कुछ शुभचिंतकों को इसकी चिंता सताने लगी कि हजारों-करोड़ों रुपया लगा देने वाले इस आईपीएल के ग्लैमर्स व्यापारियों को पैसा कहां से वापस मिलेगा? सवाल तो सही है और इसकी सफल होने पर शक जाहिर करना भी उचित लगता है परंतु हिन्दुस्तान की भीड़ जिसके लिए मस्ती और मनोरंजन के नाम पर किसी भी तरह का भोंडापन चाहिए उसे यह चतुर व्यापारी अच्छी तरह जानते हैं। वह आईसीएल की तरह अपने खेल के मैदानों में हर वो उपाय करने से नहीं हिचकिचाएंगे जो सुंदर लड़कियों के नाचने से लेकर खेल के मैदान को एक अड्डा बना दे। आज के विज्ञापन के युग में, लोगों के दिमाग पर इसे, इस कदर और इस तरह से दिखाया जाएगा कि करोड़ों की जनसंख्या वाले इस विशाल देश में कुछ प्रतिशत लोग भी अगर पहुंच गए तो उनका पैसा वसूल हो जाएगा। कुछ लोगों का यह कहना कि क्रिकेट में अब तक भावनाएं होती थीं, देश से जुड़े होने के कारण जीतने और हारने के प्रति उमंग और जुनून होता था। लोग सचिन तेंदुलकर को नहीं पहचानते, वे तो हिन्दुस्तान के लिए खेलने वाले एक नौजवान को पसंद करते हैं जो छोटे कद का होते हुए भी घोड़ों के समान तेज रफ्तार से दौड़ने वाले विदेशी की सैकड़ों किलोमीटर की रफ्तार से फेंकी गई बॉल को बड़ी चतुराई से पीटता है। सच है। मगर मदारी के तमाशे पर भीड़, हिन्दुस्तान में आज भी इकट्ठा हो जाती है। वैसे तो सच है कि महेंद्र सिंह धोनी को छह करोड़ इसलिए नहीं मिले कि वह लंबा-चौड़ा और बलिष्ठ है। न ही इसलिए कि उनके बाल लंबे थे। इस तरह के लंबे-चौड़े युवक तो रांची की गलियों में बहुत मिल जाएंगे। इस तरह के चौके-छक्के मारने वाले भी हर दूसरे शहर में मिल जाएंगे वो तो इसलिए मिले कि अभी ताजा-ताजा हिन्दुस्तान की जीत का उसने नेतृत्व किया था और वह मुंबई की गलियों में घुमाया गया था। जिसका नाम आज बिकता है। मगर सवाल उठता है कि हैदराबाद क्लब के जीतने के बाद क्या महेंद्र सिंह धोनी को इसी तरह का स्वागत मुंबई में मिलेगा?
भेड़-बकरियों की तरह बिके हुए क्रिकेट खिलाड़ियों पर कई लोगों ने आंसू भी बहाए। तो दूसरी ओर इनमें से कुछे एक रोने वालों का यह भी कहना था कि हमारे क्रिकेटर तो यूरोप और अमेरिका के स्टार खिलाड़ियों से कम दाम में बिके हैं। अब इन महानुभावों को यह नहीं पता कि यह गरीब देश है। पश्चिम और यहां के जीवनस्तर में अंतर है। यहां के छह करोड़ वहां के कई सौ करोड़ के बराबर है। दूसरी तरफ कुछ बूढ़े हो रहे स्टार खिलाड़ियों ने जुम्मा-जुम्मा दो दिन के पैदा हुए नवोदित खिलाड़ियों को अधिक पैसा मिलने पर हैरानी दिखाई। इनको यह नहीं पता कि बाजार में नये माल की कीमत हमेशा ज्यादा होती है। और पुरानी पड़ चुकी चीजों को कोई नहीं खरीदता। सायमंड्स को अधिक पैसा मिलने पर पोंटिंग के क्रोध पर दुःख होता है कि इस चालाक चतुर कप्तान को यह भी नहीं पता कि बाजार में गुणवत्ता की कोई कीमत नहीं। यहां तो अधिक नौटंकी वाला ऊंचे दाम पर बिकता है।
बात इस बात की भी अब नहीं है कि क्या खरीदा-बेचा गया। बात इस बात की है कि हमारी मानसिकता के दिवालियापन की कोई सीमा है या नहीं? बाजार ने हमारे घर, रिश्तों, भावनाओं तक पर कब्जा कर लिया। स्वतंत्र बाजार के पैरवीकार और आधुनिक परिवर्तन के समर्थक चाहे जो मर्जी कहें, सवाल तो एक बार फिर वही है, देश के प्रतिनिधि और संविधान के तमाम रखवाले इस बात को सुनिश्चित करें कि अगर आदमी का बेचना और खरीदना किसी भी तरह से खुले बाजार में जायज है तो फिर किसी भी तरह की, किसी और क्षेत्र में रोक कैसी? क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अपने नामी-गिरामी वकीलों के द्वारा भारी-भारी शब्दों से कोर्ट-कचहरी में यह बेशक साबित कर दें मगर क्या आदमी की इस तरह से खरीद-फरोख्त सही है? पैसे के लिए पागल मीडिया से पैसों की शक्ति पर इसको जितना भी प्रचारित कर लिया जाये मगर क्या यह खेल भावना के अनुरूप है? मेरा मत है कि अगर खुलेपन की यही परिभाषा है जिसमें सामान को बनाने और बेचने की स्वतंत्रता है, अपनी सेवाओं को बेचने की स्वतंत्रता है, कर्ज लेने और देने की स्वतंत्रता है, और अब खिलाड़ियों को बेचने और उसे खरीदने की स्वतंत्रता है, मनोरंजन के नाम पर सब कुछ खुला है तो फिर इसी समाज में परिवार चलाने के लिए, दूसरों के शारीरिक सुख की खातिर अपने जिस्म को बेचने और खरीदने वाले को क्यों लांछित किया जाता है? उन्हें अनैतिक बताकर क्यों जेल के सीखचों के पीछे भेजते हुए रोज पेपरों में पढ़ा जाता है? आइटम गर्ल के नाम पर अश्लीलता परोसकर भी लाखों कमाने वाली की तो चर्चा होती है और फिर हीरो-हीरोइन करोड़ों लेकर शादी व सालगिरह में नाच सकते हैं, फिर घर व व्यक्तिगत मनोरंजन में, क्लब व बार में नाचने वाली पर बंदिश क्यों लगायी जाती है? फिल्म की नायिका अपना जिस्म प्रदर्शन के लिए परदे पर जितने में भी बेचे दूसरी ओर छोटे स्तर पर एक औरत को अपनी सुंदरता को बेचने का क्यूं हक नहीं? या फिर कोई स्मार्ट नौजवान अपने युवापन को किसी रईस महिला के हाथों क्यों नहीं गिरवी रख सकता? एक तरफ क्रिकेट के सरताज खुद क्रिकेट में पैसों का खेल खेल रहे हैं तो इन्हीं पर सट्टा खेलने के लिए पैसा लगाने वालों को पुलिस क्यों पकड़ती है? शेयर में दिन-रात पैसे के लिए पागल होने वाली इस दुनिया में, चौराहों पर कुछ सौ रुपए के जुए खेलने पर पुलिस क्यों तंग करती है? क्या यह स्वतंत्रता की अपनी-अपनी सहूलियत से परिभाषित करने का मामला दिखाई नहीं देता? या फिर ताकतवर के लिए नियमों को अपने पक्ष में मोड़ना आसान है? समाज में दोहरा मापदंड कब तक चलेगा?

 

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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