तेज प्रचार के बासी फंडे


February 16, 2008

राज ठाकरे का मकसद पूरा हुआ-सा प्रतीत होता है। इस तरह के सैकड़ों लेख उनके नाम पर लिख दिए गए और तमाम समाचारपत्रों के मुख्य पृष्ठ पर उनका चेहरा और नाम स्थान पा सका। कई सफल और चर्चित लोग, जिन्होंने अपने जीवन के कई साल, मेहनत करते हुए, अपने-अपने क्षेत्र की बुलंदियों को छूने में लगा दिये, बड़ी चतुराई से उनका मात्र नाम लेकर, राज ठाकरे उनके समकक्ष कुछ हद तक खड़े होने में सफल हुए। जया भादुड़ी का यह कथन कि यह राज ठाकरे कौन है वो नहीं जानती, कितना सत्य है, नहीं पता। लेकिन इतना अवश्य है कि अब हिन्दुस्तान के घर-घर में लोग इस नये ठाकरे को जानने लगे हैं। मेरे मतानुसार यही राज ठाकरे का मकसद था जो पूरा हुआ। अब क्रिया है तो प्रतिक्रिया भी होगी। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को जहां छोटी ही सही अपनी एक जमीन मिली वहीं अन्य राजनीतिक पार्टियों के कुछ आधारहीन नेताओं और संजय निरुपम जैसे विचार व आदर्शहीन नेताओं को अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए एक और सुनहरा मौका मिला। अंततः किसको फायदा होगा या किसको नुकसान, यह तो कोई नहीं जानता। न ही ये लोग जानना चाहते हैं। वैसे भी यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा होता है। तो फिर इनके लिए यह क्या कम है कि कम से कम आज तो चर्चा में आ गये। और फिर अच्छाई और बुराई के बारे में आज के मस्ती-मनोरंजन के युग में कोई नहीं समझना चाहता। कुछ लोगों का यह कहना कि यही हथियार चालीस साल पहले बाल ठाकरे उपयोग में लाये थे, अब नहीं चल सकता। कुछ हद तक ही सही मगर गलत लगता है। इतिहास को देखें तो कह सकते हैं कि राजनीति में यह मानवजाति के अंतिम चरण तक सदैव विद्यमान रहेगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि किसी की चल पायेगी तो किसी की नहीं। किसी की थोड़ी चलेगी तो किसी की ज्यादा। हिटलर ने दुनिया को विश्वयुद्ध में धकेल दिया था। हार-जीत को छोड़ दें तो वह एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उभरा। उससे नफरत हम चाहे जितनी कर लें मगर उसके नाम के बिना इतिहास अधूरा है। अगर वो जीत जाता तो कल्पना करें कि दुनिया का स्वरूप क्या होता। और इतिहास नये तरीके से लिखा जाता। बहरहाल, हारने पर भी कुछ लोग उसे आज भी याद करते हैं। यह हिटलर इसी तरह के जातिवाद और क्षेत्रीयवाद के विचारों से अपने आप को उस स्थान तक ऊंचा उठा ले गया था। और इसका एकदम सरल और सीधा कारण था कि उसे अपने लोगों से जबरदस्त समर्थन मिला था। अन्यथा क्या इस हद तक उसका जाना संभव था। विश्व में उसके बाद इस तरह की विचारधारा वाले हरेक इंसान को हिटलरशाही के नाम से जाना जाता है। फिर चाहे वो ईसाईयत पर खेले जाने वाला खेल हो, गोरे काले का जहर हो या फिर हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता में डूबे लोग, जिसको जिस हद तक सफलता मिली वो उस हद तक प्रयास करता रहा। हां, जो जीता वही सिकंदर की बात यहां जरूर मायने रखती है। विश्वयुद्ध में इतनी तबाही के बाद क्या कोई इस तरह की बातें सोच सकता था? नहीं। लेकिन उसके बाद भी सैकड़ों घटनाएं घटी। हिन्दुस्तान का विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का उदाहरण सामने आया। और फिर स्वतंत्र भारत में बाल ठाकरे का उदय। इसी तरह के और भी कई क्षेत्रीय नेता हैं कुछ सफल और कुछ असफल। मगर यह सब समय के रास्ते पर आज भी उपस्थित हैं और आगे भी होते रहेंगे। कारण है, असल में आदमी अपने आप को पढ़ा-लिखा, आधुनिक, विकसित होने का जितना भी दंभ भर ले उसकी मूल सोच ईर्ष्या, द्वेष, संकुचित मानसिकता, स्वार्थ सब अपने-अपने ढंग के होते हैं और सदा रहेंगे। एक और पुरानी कहावत है जब तक एक भी लालची, मूर्ख और बेवकूफ जिंदा है तब तक महत्वकांक्षी, धूर्त और चालाक को चिंता करने की आवश्यकता नहीं।
यहां सोचने की बात है कि क्या सिर्फ शहर ही अपने निवासियों को देता है? निवासी उस शहर के लिए कुछ नहीं? क्या यह बताने की आवश्यकता है कि सिर्फ मुंबई ने ही अमिताभ बच्चन को नहीं दिया बदले में बहुत कुछ लिया भी है। कोई शहर क्या सिर्फ मिट्टी और पत्थरों से बनता है? नहीं। क्या मुंबई को इस स्तर तक पहुंचाने में सिर्फ मराठियों का ही हाथ है? नहीं। बॉलीवुड सिर्फ मुंबई के लिए नहीं बना। वह तो सारा हिन्दुस्तान, पूरे विश्व में फैले हिन्दी भाषी, हिन्दी फिल्म देखते हैं, इसीलिए बॉलीवुड का आज इतना आकर्षण है। और चूंकि यह मुंबई में है इसलिए पूरे विश्व का पैसा मुंबई में पहुंचता हैं। टाटा-बिरला, अम्बानी, गोयंका अगर मुंबई में पैसा लगाकर पैसा कमा रहे हैं तो वह सिर्फ मुंबई का पैसा नहीं है पूरी दुनिया का पैसा वहां पहुंच रहा है। क्या राज ठाकरे यह नहीं जानते कि मुंबई में बनाया गया सामान बाहर नहीं बिकेगा तो मुंबई के उद्योग क्या करेंगे? अगर उत्तर भारत का विशाल जनसमूह हिन्दी फिल्म नहीं देखेगा तो मुंबई के सारे स्टुडियो खाली हो जाएंगे। क्या मुंबई का सारा पैसा मुंबई के अंदर से कमाया जाता है? नहीं। मुंबई के अंदर जितने भी चर्चित लोग हैं उनमें अधिकांश बाहर के हैं। टाटा-बिरला अगर मुंबई की जगह किसी गांव में रहकर व्यवसाय करे तो यही गांव मुंबई बन जाएगा। अगर सारे पंजाब और बंगाल के कलाप्रेमी फिल्मी व्यवसाय के लोग अपने गृह प्रदेश पंजाब और बंगाल चले जाएं तो मुंबई का बॉलीवुड क्या अकेले राज ठाकरे की सेना चला सकती है? अपने पहले प्रेस कानफ्रेंस में राज ठाकरे ने हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारों को आने नहीं दिया। अगर समस्त हिन्दी सिनेमा का व्यापार मुंबई से हटा दिया जाये तो मुंबई को होने वाले नुकसान को राज ठाकरे कैसे भरपायी करेंगे। और फिर दर्शक कहां से इकट्ठा करेंगे। क्या राज ठाकरे जैसा बुद्धिमान व्यक्ति यह सब नहीं जानता कि अगर गैर महाराष्ट्रीयन को निकाल दिया तो मुंबई अपनी पहचान खो देगी। मुंबई का अस्तित्व सभी से मिलकर बना है। स्वयं मुंबई अपने आप में कुछ नहीं। वैसे भी क्या मुंबई को राज ठाकरे ने बनाया है? और फिर सवाल उठता है कि कितने महाराष्ट्रीयन का समर्थन उन्हें प्राप्त है। एक बार के लिए मान भी लिया जाए कि उत्तर भारतीयों को हटाने से सारी परेशानी हल हो जायेगी तो बचे हुए मराठों पर क्या वो अपना संपूर्ण अधिकार दिखा सकते हैं? उन्हें यह भी बताना होगा कि इसके बाद क्या सारी समस्याओं का हल उनके पास है? वो किस नवनिर्माण का दम भरते हैं? साथ में राज ठाकरे को अपने घर से उत्तर भारतीय को निकालने से पूर्व यह भी बताना होगा कि उत्तर भारत में बसे महाराष्ट्रीयनों के साथ प्रतिक्रिया में कुछ गलत हो गया तो उसके लिए कौन जिम्मेवार होगा? उस इतिहास का वो क्या करेंगे जिसमें वर्षों पूर्व मराठा शासकों ने उत्तर भारत में आकर सफलतापूर्वक शासन किया। और जिसकी खुशबू आज भी वर्तमान संस्कृति में मिल जाती है। आज पूरे देश को लक्ष्मीबाई पर गर्व है। तो क्या राज ठाकरे की बीमार मानसिकता से पीड़ित होकर भारतीय समुदाय इतिहास के पन्नों को फाड़ दे। आज भी हजारों-सैकड़ों महाराष्ट्रीयन महाराष्ट्र की सीमा के बाहर रह रहे हैं और सफल हैं तो राज ठाकरे उनके लिए चिंतित क्यों नहीं। आज गणतंत्र भारत के विशाल राष्ट्रपति भवन में श्रीमती प्रतिभा पाटिल विराजमान हैं जो हमारे गर्व का प्रतीक भी हैं। उधर, क्या सचिन तेंदुलकर, लता मंगेश्कर केवल महाराष्ट्र के हैं? अगर वे संपूर्ण भारत के चहेते न होते, हिन्दी फिल्म संगीत न होता, लाखों-करोड़ों चाहने वाले नहीं होते तो इनकी वो स्टार हैसियत नहीं होती जो आज है। इन सभी सवालों का जवाब ही नहीं, इन संदर्भों को भी राज ठाकरे जानते और समझते हैं। मगर वो उसे प्रदर्शित करना नहीं चाहते, वो इसे दिखाना नहीं चाहते। यहां तो उनका मकसद ही कुछ और है। सस्ता प्रचार पाना। और इस क्षेत्र में आज भी वही फंडे चल रहे हैं। कारण है कुछ कमजोर दिल और दिमाग के लोग जो सदा से रहे हैं वे आगे भी रहेंगे, उनकी भावनाओं से खेलना। इनकी संख्या कम ज्यादा हो सकती है। मगर राजनीति के गलियारे में शून्य हो रहे राज ठाकरे को मुट्ठीभर सिरफिरों का साथ भी मिल जाए तो क्या कम है। इन्हीं लोगों के उपयोग करने की कोशिश में वे लगे हुए जान पड़ते हैं। अपने नाम को हिन्दुस्तान के घर-घर पहुंचाना चाहते हैं। और हम सब उनके इस कूटनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। अगर हिन्दी और अंग्रेजी के तमाम समाचारपत्र उनकी खबर को छापना बंद कर दे और फिर देखें तो उनमें ज्यादा झुंझलाहट दिखाई देगी। मगर अजगरी भूख से पीड़ित तथाकथित वर्तमान का आधुनिक मीडिया सब कुछ जानते हुए भी अनजान है और घर से दुत्कार कर निकाल दिये जाने के बावजूद उसी आदमी के मुस्कुराते हुए चेहरे को अपने समाचारपत्र के मुख पृष्ठ पर बखूबी छाप रहा है। मगर राज ठाकरे को भी खुश नहीं हो जाना चाहिए, इतिहास गवाह है कि उनको इससे सफलता नहीं मिलेगी। वो भूल रहे हैं कि इस तरह की भावना भारतीय और भारत में, और यहां की संस्कृति में कभी ज्यादा नहीं पनप पाई। उनके चाचा को भी अंत में इससे अपने आप को दूर करना पड़ा। फिर भी पुराने दिन के दाग उनके चेहरे से मिट नहीं पा रहे और वो एक सीमा से अधिक कुछ नहीं कर पाये। राज को वास्तव में अगर हिन्दुस्तान की गद्दी पर राज करना है तो उन्हें सम्राट अकबर से सीख लेनी होगी जिसने हमेशा रिश्तों को बढ़ाने की कोशिश की। अन्यथा औरंगजेब की तरह वो गुमनाम इतिहास में दफन कर दिए जाएंगे। वैसे भी वो इस हद तक तो आ गये इसके आगे जाने के लिए उन्हें नयी रणनीति बनानी होगी मगर तब यह आज का वर्तमान आगे पुराना इतिहास बनकर उन्हें हमेशा तंग करेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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