दूसरी सभ्यता की खोज


February 9, 2008

कुछ दिन पूर्व, मंगल ग्रह की खींची गई तस्वीरों में मनुष्य के जैसे एक आकार के आ जाने से अंतरिक्ष संबंधित विभागों में हड़कंप मच गयी। किसी-किसी समाचारपत्रों के प्रमुख पृष्ठों ने इस खबर को स्थान दिया था। पहली झलक में देखने पर इंसान जैसा कोई खड़ा हुआ प्रतीत होता है। लेकिन फिर बाद में यह स्पष्ट किया गया कि यह किसी चट्टान की छाया भी हो सकती है। ऐसा पर्वतों पर अक्सर देखा गया है, जहां कई पहाड़ों की श्रृंखलाएं, दूर से देखने पर कहीं-कहीं सोयी हुई औरत-सी प्रतीत होती है तो कहीं पर इन पर्वतों की चोटियां शंकर जी के त्रिशूल-सी दिखाई देती हैं और कई जगह हनुमान जी की आकृति। वैसे अनजान अंतरिक्ष की जिज्ञासा शैशवकाल से ही मानव को परेशान करती रही है। काली अंधेरी रात, तेज बारिश व भयानक बिजली के कड़कने से डरकर आदमी ने पूजा करना प्रारंभ किया और यही कारण है कि जो सभी प्राचीन धर्मों में प्रकृति को तरह-तरह से पूजने की प्रथा है। आसमान में उड़ते पिंडो व तारों को देखकर सभ्यताएं भयभीत होती रही हैं। और अंत में सामान्य जनमानस को संतुष्ट करने के लिए बुद्धिमानों ने अति उत्साह में कई तरह की काल्पनिक बातें चांद और अन्य ग्रहों के लिए भी समय-समय पर बना डाली। उड़नतस्तरी का नामकरण भी हुआ। आदिकाल से ही मनुष्य ने चांद के दाग व पुच्छल तारों पर ढेरों कल्पनाएं कर दी थीं। और अंतरिक्ष विज्ञान के प्रारंभिक दौर से ही अंतरिक्ष खोजी वैज्ञानिक मनुष्य के अनुकूल वातावरण की खोज में आकाश में आंखें गढ़ाते रहे हैं। हरेक ग्रह पर पानी और आक्सीजन की संभावनाओं को तलाशा जाता है। और इसकी जरा-सी भी संभावना से हमारी ही तरह के यानी कि दूसरे ग्रह पर रहने वाले, जिसे एलियन नाम दिया गया है, की चर्चा शुरू हो जाती है। और फिर तरह-तरह की परिकल्पनाएं की जाने लगती हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक में कई कहानियों ने जन्म लिया। और आश्चर्य वाली बात रही कि इस पर बनाई गई तकरीबन हर फिल्म सुपरहिट हुई। असल में, यह आदमी का प्राकृतिक स्वभाव है कि जहां हम भीड़ में रहकर एक-दूसरे की ओर देखते भी नहीं, वहीं सुनसान जंगल में फंसते ही तुरंत दूसरे आदमी की खोज शुरू कर देते हैं। यही नहीं दूसरे देश, दूसरी सभ्यता में पहुंचकर अपने जैसों की तालाश करने लगते हैं। यह आदमी की फितरत है। और यही खोज आगे बढ़कर ब्रह्मांड की ओर ऊंचे अनंत आसमान में पहुंचकर अपनों को ढूंढ़ती है कि हमारे जैसा इस पूरी दुनिया में कोई और भी तो होगा।
मेरे मन में सवाल उठता है कि जब इस पृथ्वी पर ही कोई दो आदमी एक जैसे नहीं और स्थान के बदलते ही उनका रंग रूप आकार बदल जाता है तो फिर अंतरिक्ष में हम जैसा दूसरा कैसे मिल सकता है? कहने वाले कह सकते हैं कि हम सब मानव जाति की शारीरिक संरचना में मूल गुण एक जैसे ही हैं। सभी सांस लेते हैं और आहार-पानी ग्रहण कर उससे अपनी आवश्यक ऊर्जा लेकर शौच के द्वारा व्यर्थ पदार्थ को त्याग देते हैं। जनन-प्रजनन हमारा अन्य प्राकृतिक गुण हैं। लेकिन फिर इसी पृथ्वी पर ऐसे कई जीवित हैं जो इन बातों से कहीं न कहीं भिन्न हैं। तभी तो ख्याल आता है कि ऐसा भी तो हो सकता है कि कोई प्रजाति पेड़ों की भांति आक्सीजन की जगह कार्बन डायआक्साइड ग्रहण कर आक्सीजन वापस करती हो या फिर कोई और गैस लेकर कुछ और को बाहर छोड़ती हो। जमीन और जल में भी जीवन है। मगर कोई ऐसी सभ्यता भी तो हो सकती है जो आग में पलती हो, और कुछ ऐसे लोग भी तो हो सकते हैं जिनका निवास सूर्य के अंदर हो। और फिर यही क्यूं, कुछ ऐसे भी तो हो सकते हैं जिन्हें हवा की जरूरत ही न हो। कुछ ऐसे भी तो हो सकते हैं जो उजाले में आते ही मर जाते हो। कुछ ऐसे भी तो हो सकते हैं जिनका आहार कुछ और हो। इसी बात को आगे बढ़ाएं तो कुछ ऐसे भी तो हो सकते हैं जो हमारी सोच, कल्पना से बाहर हो। हमारी समझ से बाहर हो। हमारे रहन-सहन, खान-पान से अलग हो। हमारी दृष्टि की शक्ति से बाहर हो। जिन्हें हम देख नहीं सकते। उनका स्पर्श या अस्तित्व ही पूर्णतः भिन्न हो। ऐसा भी तो हो सकता है कि वो हमारी तरह सीधा न देख कई मोड़ों के पार आड़ा-टेढ़ा भी देख सकते हों। कुछ ऐसे भी तो हो सकते हैं जो गुरुत्वाकर्षण एवं वायुमंडल से बाहर शून्य में रहते हों। कुछ ऐसे भी तो हो सकते हैं जिन्हें किसी जमीन की जरूरत ही न हो। ऐसे भी तो हो सकते हैं जिनकी काया ग्रहों से भी विशाल हो तो ऐसे भी तो हो सकते हैं जो सूक्ष्म से सूक्ष्म कणों से भी सूक्ष्म हो। और अंत में ऐसा भी तो हो सकता है कि वो हमें देख सकते हों मगर हम उन्हें देख नहीं पा रहे हो। जबकि वो हमारे आसपास ही हों। वैसे हिन्दू धर्म में, उपरोक्त कुछ कल्पनाओं को ईश्वरीय स्वरूप प्रदान कर उन्हें पूजनीय स्वीकार किया है।
अब जरा देखिए! हमारे पैरों के नीचे चींटी के आ जाने पर अचानक उसका अंत हो जाता है। जाने-अनजाने ही सही। जबकि हम उन्हें देख सकते हैं। इसी तरह सिर के बालों से जुएं को निकालकर, नोचकर मार दिया जाता है। चूंकि वो हमें कष्ट देते हैं। ऐसे में उनके साथी शायद यही तो सोचते होंगे कि दुर्द्घटना में उसकी मौत हो गयी। यह सिर्फ इसलिये क्योंकि वे हमसे अनजान हैं। ठीक इसी तरह कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह से चींटी या जुएं हमारे अस्तित्व से अनभिज्ञ हैं, हमें देख नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते। इसी तरह हम भी किसी को न देख पा रहे हों, मगर वो हमारे साथ हमारे आसपास ही मौजूद हों। और फिर जिस तरह हम चींटियों को देख सकते हैं कोई हमें देख रहा हो। और वो अपनी सुविधानुसार हमारी हत्या कर देता हो। परिणामस्वरूप हम अकारण व असमय हुई मौत या कई जानी-अनजानी बीमारियों से अचानक मरने वालों को एक प्राकृतिक प्रक्रिया व हादसा समझकर रो लेते हों। वैसे तो आमतौर पर हम चींटियों की सभ्यता को बहुत हद तक पनपने देते हैं, जीने देते हैं, बढ़कर फलने-फूलने देते हैं। गौर ही नहीं करते। हमारे सामने से वे निकल जाएं हम देखकर भी उन्हें अनदेखा कर देते हैं। हां, द्घर पर अधिक संख्या में आ जाने पर बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और अगर शरीर पर चढ़ने लगे तो तुरंत मार देते हैं। कहीं-कहीं, कभी-कभी जरूर उन्हें बेवजह भी मार दिया जाता है। ठीक इसी तरह हो सकता है हमें भी कुछ समय तक तो जीने दिया जा रहा हो मगर फिर एक समय के बाद, एक सीमा के बाद हमें भी मार दिया जाता हो। हमारी सभ्यता नष्ट कर दी जाती हो। चींटियों को पैरों से कुचल दिये जाने की तरह हमें भी कोई मसल देता हो। जिस तरह हम कभी-कभी अपने स्वार्थ में चींटियों द्वारा बनाये गये पूरे स्थान को साफ कर देते हैं। ठीक उसी तरह कोई हमारी जमीन को हिलाकर, भूकंप और सूनामी लाकर हमें खत्म कर देता हो।
अंत में, एक और कल्पना, हम चींटियों के जीवन पर अध्ययन करते हैं, उनकी सामाजिक व पारिवारिक व्यवस्था पर शोध कार्य करते रहते हैं, संबंधित जानकारियों को इकट्ठा करते रहते हैं, उन्हें निरंतर विकसित भी होने देते हैं। मगर वे फिर भी हमसे अनजान हैं उलटे हम पर निर्भर हैं। जबकि दोनों ही प्रकृति के द्वारा उत्पन्न किये गये हैं। असल में दोनों की अपनी-अपनी नैसर्गिक सीमाएं हैं तो दोनों ने ही अपनी क्षमताओं का विकास भी किया हैं। मगर हम उनसे काफी आगे निकल गये जिस कारण हम उनके बारे में तो बहुत हद तक जान सके, समझ सके, मगर वे आज भी हमसें पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। ठीक इसी तरह से कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई हमसे भी अधिक विकसित हो, और हमें आगे बढ़ता हुआ देख रहा हो, जान रहा हो। और फिर हम पर हंस भी रहा हो, क्योंकि वो हमसे कहीं अधिक शक्तिशाली है। कल्पना करें, आपको अपनी अस्तित्वहीनता का आभास होने लगेगा। अंतरिक्ष और जीव वैज्ञानिक क्या इस कल्पना पर ध्यान देंगे?

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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