समाज की बदलती तसवीर


January 26, 2008

गणतंत्र दिवस पर फ्रांस के राष्ट्रपति इस बार मुख्य अतिथि होंगे। वैसे तो किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का हमारे राष्ट्रीय पर्व पर भारत आगमन एक पारंपरिक व्यवस्था है मगर इस बार यह अधिक चर्चा का विषय है। यह किसी राजनीति आर्थिक संबंध या दो देशों के बीच कूटनीति या फिर आंतकवाद को लेकर नहीं बल्कि राष्ट्रपति श्री निकोलस सरकोजी की महिला मित्र कार्ला ब्रूनी के कारण है। वैसे तो इस प्रेम-प्रसंग की चर्चा उनके स्वयं के देश के साथ-साथ पूरे विश्व में हो रही है और वे पेज थ्री के अंतर्राष्ट्रीय नायक बनकर उभरे हैं। आजकल कॉफी हाउस और शराब के मयखानो से लेकर फिल्म और कला के रंगीन गलियारों में भी उनकी बातें चटकारे लेकर की जा रही हैं तो मीडिया में वे दोनों छाये हुए हैं। उनके सुंदर, आकर्षक और बेहद उत्साह से भरे हुए चित्रों की समाचारपत्रों में प्रदर्शनी लगाई जाती-सी प्रतीत हो रही है। भारत में भी इसी तरह की चर्चा स्वाभाविक है। मगर विभिन्न स्तम्भों और लेखों में इस बात को पढ़ने से अधिक आश्चर्य हो रहा है कि उपरोक्त महिला मित्र को उचित सम्मान मिलना चाहिए। अधिकांश लेखकों का यही मत है। इन कथनों के पीछे की परतों को पलटें तो कहीं न कहीं इन लेखों के अंदर इस रिश्ते की स्वीकृति की सुगंध आती है। यह दीगर बात है कि सत्ता के गलियारों के उच्च ओहदेदारों ने राष्ट्रपति की प्रेमिका को प्रथम महिला के समकक्ष न मानते हुए, भारतीय जनता की भावनाओं को समझकर, इस विवाद से दूर ही रहने की कोशिश की है। परंतु यह एक सामाजिक बहस का मुद्दा तो बन ही सकता है। हो न हो यह इस बात का एक प्रतीक चर्िैं जरूर है कि विश्वस्तर पर स्त्री-पुरुष के संबंधों ने अपने स्वरूप को तेजी से बदला है। विवाह की संस्था अतिशीघ्र एक नये रूप में दिखने जा रही है। और हिंदुस्तान इससे अछूता नहीं।
यूरोप में खुले समाज का आगमन बहुत पहले हो चुका था। आज वहां तलाक एक आम बात है। इसके नकारात्मक पहलू को न देखें तो एक पक्ष तो स्पष्ट है कि यह इंसानी स्वतंत्रता और चाहत को एक मुकम्मल रास्ता प्रदान करता है। और इन पति-पत्नी के नाजुक रिश्तों के विकास की कहानी आम जनता के साथ-साथ वहां के शासन वर्ग में भी दिखाई देने लगी हैं। निकोलस सरकोजी के राष्ट्रपति बनने से पूर्व एक तलाक और प्रथम विवाह से दो पुत्र पहले से ही थे और निवर्तमान दूसरी पत्नी से एक पुत्र था। अर्थात राष्ट्रपति के उम्मीदवार के द्वितीय विवाह को प्रजातांत्रिक स्वीकृति मिल चुकी थी। यह हाल अमूमन हर दूसरे पश्चिमी राष्ट्र में देखे जा सकते हैं। हां, अमेरिका और इंग्लैंड इस बात का अपवाद कहे जा सकते हैं। वैसे तो वहां भी संबंधों के खुलेपन में कोई कमी नहीं। विवाहोत्तर रिश्ते व खुला सेक्स आम बात है। लेकिन फिर भी वहां की जनता अपने शासक के परिवार में आदर्श व्यवस्था की अपेक्षा करती है। मोनिका-क्लिंटन प्रकरण को भुलाया नहीं जा सकता है। याद करें, अंत में हिलेरी को आगे बढ़कर अपने पति का सार्वजनिक साथ देना पड़ा था। अन्यथा क्लिंटन को अपने पद से हाथ धोना पड़ सकता था। वही हाल आज के संदर्भ में भी देखें तो चुनाव प्रचार के दौरान हिलेरी के साथ बिल क्लिंटन को ही नहीं बेटी चेल्सी को भी खुलकर सार्वजनिक रूप से साथ आना पड़ा है। इसी कड़ी में ब्रिटेन की शासन व्यवस्था भी अत्यधिक पारंपरिक है जहां शासकों के लिए आदर्श पारिवारिक व्यवस्था बनाये रखना एक मजबूरी बन जाती है। राज परिवार के प्रेम-प्रसंग और उनमुक्त होने की कशमकश हर बार सामाजिक दबाव के चलते दब जाती है। एक तरफ डायना के चाहत की छटपटाहट को वहां की जनता का गहरा भावनात्मक समर्थन प्राप्त होता है तो वहीं चार्ल्स के प्रेम को दबे पांव धीरे-धीरे स्वीकार किया जाता है। पारंपरिक समाज का यह विरोधाभास, मनुष्य के प्राकृतिक स्वभाव एवं सामाजिक बंधन के बीच के अंतर्द्वंद्व को प्रदर्शित करता है।
भारतीय संदर्भ में देखें तो आदिकाल से बहुविवाह प्रथा अपने विभिन्न रूपों में यहां प्रचलित रही है। प्रेम-प्रसंग हिंदू समाज का अभिन्न अंग रहा है। महाभारत से लेकर आज तक विभिन्न रजवाड़ों के अंदर फलती-फूलती प्रेम कहानियां लोगों के बीच चर्चा का विषय रही है। राजे-महाराजे और प्रभावशाली लोग विवाह संस्था से कभी नहीं बंधे रहे और उनके उन्मुक्त प्रेम को समाज की स्वीकृति प्रदान थी। हां, मध्यम वर्ग इस बात से हमेशा बचता रहा और संस्कृति, परिवार व मर्यादा के नाम पर अपनी इच्छाओं का गला घोंटता रहा। आज भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। उच्च व निम्न वर्ग में संबंधों की स्वतंत्रता रही है। पूर्व में मध्यमवर्गीय समाज खुद तो इनसे दूर रहा मगर दूसरों के संबंधों पर अधिक चर्चा न करके दबी जुबान से चटकारे लेते हुए स्वीकृति प्रदान करता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अचानक बहुत तीव्र गति से इसमें बदलाव आया है। हर एक वर्ग व धर्म की सोच में परिवर्तन है। तलाक हर दूसरे घर में दिखाई देने लगा है। पुनर्विवाह एक आम बात है। बड़े और परिपक्व बच्चों की माताओं तक से शादी करने के लिए जवान कुंवारे तैयार खड़े हैं। अब इस तरह की खबरों में कोई भी अनहोनी बातें नहीं रह गई। विवाहोत्तर संबंध भी अब खूब फल-फूल रहे हैं। यही गति रही तो यकीनन कुछ वर्षों में ही समाज पूर्ण रूप से बदल चुका होगा। वैवाहिक संस्थाएं खत्म हों न हों लेकिन उसका स्वरूप परिवर्तित होगा। इन परिवर्तन के विरोध में कहने वाले तमाम लेखकों को अगर टटोल कर पूछा जाये जो वे स्वयं अपनी जवानी में किसी न किसी नारी से मित्रता और संबंध बनाने के लिए उतावले रहे होंगे। उनमें से कइयों को मौका नहीं मिला होगा तो कई ने छुपकर अचानक मिले अवसरों का लाभ अवश्य उठाया होगा। चूंकि पहले घर से बाहर स्त्री का निकलना संभव नहीं था। असल में मनुष्य प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र है। वह अपने संबंधों में कभी भी बंधा हुआ नहीं रहना चाहता। परिवर्तन उसका नैसर्गिक स्वभाव है और नयापन उसकी चाहत। हकीकत है कि इस शारीरिक भूख, जिसे मृगतृष्णा कहकर हंसी में उड़ा दिया जाता है, को समाप्त कर दिया जाये तो जीवन नीरस हो जायेगा। वैसे तो यह संभव नहीं लेकिन अगर ऐसा हो भी गया तो न तो कोई संबंध रहेगा, न ही कोई बंधन और न ही कोई परिवार और समाज। यह नैसर्गिक चाहत और इसी छटपटाहट के कारण मनुष्य स्वयं की बनाई पारंपरिक व्यवस्थाओं के विरोध में अनैतिक व सामाजिक विद्रोह करता रहा है। आज कई परिवार के अंदर झांक कर देखें तो जो टूट नहीं चुके हैं वे टूटने की कगार पर हैं या फिर घुटन इतनी है कि लोग उससे निकलना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि सभी परिवार से विमुख हैं, कइयों में भावनाएं हैं, जिस कारण से वे दुःखी होते हुए भी साथ रहना पसंद करते हैं। अन्यथा कइयों के साथ मुश्किल इस बात की है कि उनके पास रास्ते नहीं है। नयी मंजिल नहीं है। शारीरिक और मानसिक शक्ति नहीं है। और जिस दिन जिस किसी को भी यह प्राप्त होती जा रही है वह परिवार के बंधन से टूटकर भाग रहा है। इस सत्य को हमें स्वीकार करना होगा।
यह भी सत्य है कि समाज, परिवार और उसकी व्यवस्थाओं को इस अवस्था तक लाने के पीछे एक बहुत बड़ा मकसद रहा है। इसमें समानता है, सुरक्षा है, अकेलेपन से दूर रहने की व्यवस्था है, स्थायीपन है। अन्यथा कमजोर खासकर स्त्री के साथ अराजकता, छीनाझपटी, जोर-जबरदस्ती, बलात्कार, हिंसा, असंतोष बढ़ेगा। मगर समाज में बदलाव एक निरंतर प्रक्रिया है। वो अपने वर्तमान परिस्थितियों से उत्पन्न हो रही मुश्किलों का सामना नये-नये नियम बनाकर करता है और बड़ी उद्दंडता से पुराने आदर्शों को तोड़ता चला जाता है। इसी संदर्भ में देखें तो आज की महिला तो स्वयं कई बंधनों से छूटना चाहती है। आम आदमी वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन चाहता है। और यही कारण है कि परिवर्तन तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। ब्रूनो और सरकोजी तो इस नये रास्ते के मील के पत्थर मात्र हैं जिन पर नयी मंजिल का फासला अंकित है। सुखद आश्चर्य इस बात का है कि भारतीय मानसिक तंत्र ने भी इस मार्ग की स्वीकृति प्रदान की है। सच है कि आने वाली नयी व्यवस्था को हम रोक नहीं सकते। सिर्फ सोचने वाली बात यह है कि पुरानों को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार होना होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 



   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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